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मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

यादों का सफ़र/रंजन जैदी

दिल्ली बदल रही है. उसका रंग-रूप, उसकी भाषा, पहचान, चाल-चलन, हदें, सोच और बहुत कुछ अब पहले जैसा नहीं रहा है. जामा मस्जिद की रौनक, उर्दू बाज़ार का इल्मी जलवा, मशायरों की रौनकें, आपस की मुहब्बतें, टी-हॉउस की बहसें और कुतुबखाना अजीज़िया के बाहर बड़े-बड़े शायरों, अदीबों की बैठकें वक्त की रेत के नीचे दफ़्न हो चुकी हैं. अब तो बस आह निकलती है कि क्या रौनक थी, वक्त ने कैसे ज़माने का चलन छीन लिया. दिल्ली, दुनिया के चंद खूबसूरत शहरों में से एक है. इसे अरब हिंदुस्तान का 'उरूसुलबलाद' कहते हैं. जिसे कभी नींद ही नहीं आती है. जो खुद भी जगता है और सारे देश को भी जगाता रहता है. समुद्र-तट से २३९ मीटर की ऊँचाई प़र बसा यह शहर अपने ३००० वर्षों का इतिहास लिये गलियों, गलियारों, खंडहरों, मीनारों, विकास की तस्वीरें दिखाते हुए निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है. कहते हैं कि यह शहर पांडवों के समय इन्द्रप्रस्थ के नाम से जाना जाता था. शायद हस्तिनापुर के नाम से भी. मूलतः पुरानी दिल्ली इन्द्रप्रस्थ से लेकर लालकिले तक फैली हुई थी. नाम कुछ भी रहा हो प़र, शहर आज भी जिंदा है. शताब्दियों के कारवानों के पैरों के निशान आज भी दिल्ली की हथेलियों प़र अंकित हैं. अरावली की संगलाख वादियों में अगर आजतक पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता की मुहब्बत के नगमें गूंजते हैं तो महरौली की पथरीली बावड़ियों से  मुग़ल शहजादियों की दर्दनाक चीखें भी सुनाई देती रहती हैं. अगर इसी शहर ने तुगलकाबाद की महराबों से इतिहास के पन्नों के बीच लोबान के धुएं को उठते  देखा है तो शाहजहानाबाद की सूखती नहरों में फूटते और बहते हुए खून के फव्वारे भी देखे हैं. इसी शहर ने लालकिले की बुर्जों से मुग़ल सल्तनत के सूरज को डूबते हुए देखा है तो देश को अंग्रेजी साम्राज के अधीन गुलाम होते हुए भी देखा है. यमुना का पानी इतनी बार लाल हुआ है कि अरावली के जंगलों से फलहारी परिंदों ने भी अपने रिश्ते तोड़ लिये.आज भी दिल्ली की सरहदों के अन्दर-बाहर (हर तरफ) इब्रहीम लोदी, तैमूर लंग, नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली की चमकती तलवारें और उनके घोड़ों की टापों की आवाजें गूंजती रहती हैं. वह १४वीं  शताब्दी का ज़माना था. दिल्ली प़र मुहम्मद बिन तुगलक का शासन था.इसी के ज़माने में मोरक्को के तापियर निवासी विद्वान् इब्नेबतूता पैदल चलकर उत्तरी अफ्रीका और फारस को पार कर भारत में दाखिल हुए. तुगलक ने उसे काज़िये-शह्र (मुख्य न्यायाधीश) की पदवी देकर सम्मानित किया. वह नौ वर्षों तक दिल्ली में ससम्मान रहा और तुगलक की राजनीति का हिस्सा बना रहा. शहर ने देखा है मरहठा भाऊ राव की फौजों का आतंक और ईस्ट इण्डिया कंपनी की सेना की तोपों की घन-गरज. हादसे, वक्त की मुट्ठी में बंद रेत की तरह बहते चले गए. न कोई सिकंदर रहा, न कलंदर. मगर दिल्ली अब भी अपने पूरे जाहोजलाल के साथ उरूसुल्बलाद बनी हुई है.डेढ़ सौ वर्षों तक दिल्ली सात दरवाज़ों से घिरी रही थी. हर दरवाज़ा शह्र को एक रास्ता देता था. अंग्रेजों ने एक रास्ते का नाम रखा जार्ज पंचम रोड, एक का हेस्टिंग रोड. एक का क्लीव रोड तो दूसरे का बेलेजली रोड. बाबर, हुमायूं, अकबर और शाहजहाँ रोड प्रतीक के रूपमें रखे गए. एक सड़क आखरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के नाम से भी है जिसके बाद मुगलों का सूरज डूब गया. अंगेजों ने जिन सड़कों का नाम रखा, उनके अपने ऐतिहासिक कारण थे जैसे, जार्ज पंचम रोड प़र किंग जोर्ज की मूर्ति थी. लार्ड हेस्टिंग (रोड) ने न केवल दिल्ली को वरन अवध की बेगमात और बनारस के राजा के राजकोष को बड़ी निर्दयता से लूटा था बल्कि उसने बनारस के राजा को तो   बंदी बनाकर जेल तक में डाल दिया था. लार्ड क्लायु (रोड) ने प्लासी के युद्ध में नवाब सिराजुद्दौला को पराजित कर उसका सिर धड से अलग कर दिया था. लार्ड बेलेजली (रोड) ने युद्ध के दौरान टीपू सुल्तान की तलवार तोड़ी थी और जनरल हेवलोक (हेवलोक स्क्वायर) ने झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई का क़त्ल किया था. जिन बादशाहों के नाम प़र रोड पह्चंवाये गए, उसका अर्थ था कि ये वे शूरवीर और पराक्रमी मुस्लिम शासक थे जिन्हें हराना आसान नहीं था, किन्तु अंग्रेजों ने उन्हें भी न केवल हरा दिया बल्कि उनकी डायनेस्टी को ही हमेशा के लिये समाप्त कर दिया.                                                  (जारी)/-2                                                                                                                               09415111271

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