यह ब्लॉग खोजें

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

न जाने क्या हुआ मुझको..../रंजन जैदी

अजब सी दिल में बेचैनी / समंदर जैसी हलचल है / न जाने क्या हुआ मुझको/मैं कब से मौन बैठी हूँ. / अभी! कल तक उछलती-भागती थी तितलियों के संग / मुझे फूलों की खुशबू और नरमी कितनी भाती थी/अभी! कल तक मुझे बारिश की बूँदें दिल लुभाती थीं /  बहुत होता तो मुट्ठी भींच लेती थी/न जाने बादलों से अब मुझे क्यूँ शर्म आती है / दुपट्टा कुछ छुपाता है, हया कुछ और कहती है / न जाने क्या हुआ मुझको / मैं कब से मौन बैठी हूँ. / घरौंदे, गीली मिट्टी से बनाती थी अभी कल तक / समंदर के किनारे रेत प़र लिखती थी अपना नाम सपनों में/किसी कागज़ की किश्ती को बहाती थी समंदर में / कभी उसपर झपटती और फँस जाती मैं लहरों में / धनक रंगों के सपनों तक मैं कितनी बार लायी हूँ / चमकती बिजलियों को कैदकर कमरे में लायी  हूँ /  न जाने क्या हुआ मुझको / मैं कब से मौन बैठी हूँ. / मैं ठंडी नर्म मिट्टी में, बहुत अहिस्ता चलती थी/ गरजते बादलों से भी नहीं मैं खौफ खाती थी /  मैं कल तक अजनबी से भी बहुत बेख़ौफ़ मिलती थी /  मगर अब हाल ये है कि, मैं डर जाती हूँ खुद से ही / न जाने क्या हुआ मुझको /  मैं कब से मौन बैठी हूँ. / अजब सी दिल में बेचैनी / समंदर जैसी हलचल है...  09415111271 AlpsT-Litterature

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

वह अमरीकी लड़की/ धूप की उम्र -रंजन जैदी

वह नाज़ुक सी अमेरिकी लड़की---/ ज़ुनैन-कैम्प के दरवाजे प़र खड़ी/ इस्राएली बुलडोजरों को / अपने नाज़ुक हाथों से रोकना चाहती है ./ कैम्प में बूढ़े भी हैं, बच्चे भी./जवान भी हैं, बीमार भी./औरतें भी हैं/ सपने देखने वाली जवान लडकियां भी/कैम्प फिलिस्तीनी शरणार्थियों का है/कांपते-थरथराते बदन/असमान कीओर उठे हुए/ खुदा से दुआ मांगते हाथ/मुसल्ले प़र झुकी हुई औरतें/रहम की भीख मांगते, आयतें बुदबुदाते बुज़ुर्ग/ बच्चों की आँखों में मासूम आतंक भरे सवाल/इस्राईली क्यों दुश्मन हैं? / अमेरिकी लड़की की आँखों में भी आश्चर्य है/बुश इस्राईल को / ऐसा समर्थन कैसे दे सकता है?/....और ब्लेयर?/ यहूदियों ने तो अंग्रेजों को निकाला था/ यह बात और है कि..../ अंग्रेजों ने ही उन्हें बसाया था/ फिलिस्तीनियों को घर से निकाला था /  यह दो सभ्यताओं की जंग थी / सदियों से जंग जारी थी / इसाई धर्म में आस्था रखने वाले / टॉम हार्न की डायरी के पन्ने फडफडाते हैं / शब्द, निकल-निकलकर चीत्कारते हैं/ बुश अपराधी है/ ब्लेयर अपराधी है/ नाटो के देश भी/ अमेरिकी  लड़की हतप्रभ / टाम-हार्न गलत नहीं है / ब्रिटेन-अमेरिका के अवाम / हत्यारे नहीं हो सकते /मानवता की हत्या नहीं कर सकते / ये मुल्क हमारे हैं / हम एक नयी दुनिया के सर्जक हरकारे हैं / युद्ध अपराधियों प़र / खुली अदालत में मुकद्दमा चलाओ / इन अपराधियों को सूली प़र चढाओ / टॉम हार्न की डायरी के पन्ने फिर फडफडाते हैं/ बेटी संभल / हत्यारे बढ़ते आरहे हैं/ बुलडोज़र गडगडाते  आ रहे हैं / इनकी  आवाजें दीवारे-गिरिया से बुलंद है/ इनकी अक्लें कुंद हैं / रेत के बगूले फडफडाते हैं / इस्राएली बुलडोज़र----/ अमरीकी लड़की की परवाह न कर / उसपर से गुज़रते हुए /  फिलिस्तीनियों की ओर बढ़ जाते हैंसंस्कृतियों का लहू / रेत से लिपट जाता है / ज़ुनैन-कैम्प चीखों से भर जाता है/ अमेरिकी लड़की / बुलडोज़र के नीचे से निकलकर / दौड़-दौड़कर /  औरतों, बच्चों और ज़ख़्मी बूढों को----/  बचाना चाहती है / प़र नहीं!/  उसके हाथों से सब कुछ फिसल जाता है / घायलों का लहू भी / रेत से लिपट जाता है./ बेबसी से वह चिल्लाती है  / तभी उसे / टाम-हार्न की डायरी नज़र आती है  / डायरी समझाती है--- / तुम मर चुकी हो / मेरी तरह कविता बन चुकी हो / ऊपर देखो / खूंखार परिंदों का झुण्ड आ रहा है / एक परिंदा तो तुम्हें खा  रहा है / अमेरिकी लड़की घुटनों के बल/ रेत में धंस जाती है / बेहद निराश और हताश हो  /  चिल्ला उठती है./  हिटलर के अट्टहास गूँज उठते है / गैस-चेंबर से निकल-निकलकर लाशें / चलती हुई/ करीब आकर उसे घेर लेती हैं/ ज़ुनैन-कैम्प प़र रेत की परतें / चढ़ जाती हैं / परिंदे! लाशों को खाकर लौट रहे हैं /  इस्राईली सैनिक--- जवान जिस्मों को टटोल रहे हैं /  ज़ुनैन-कैम्प की सभ्यता  / मिटती जयेगी / लायिसेंस्शुदा आतंकियों के हाथों / दुनिया भर में फैलती जाएगी / कभी हिटलर आयेगा तो कभी बुश / कभी ब्लेयर आयेगा तो कभी कोई और /सभ्यताओं के बगूले उठते / पिरामिड बनाते रहेंगे /   पुरातत्ववेत्ता आते / खुदाई करते रहेंगे /  सच को झूठ, झूठ  को सच बताते  रहेंगे/ अमेरिकी लड़की के हाथों से / सबकुछ फिसलता रहेगा / टाम-हार्न की डायरी का हर पन्ना / इसी तरह फडफडाता रहेगा.  

धूप की उम्र/2             
तुम नहीं जानते        
टाम हार्न डाल कौन था                            
वह न फिलिस्तीनी था, न अरब!  
वह न कौम का लीडर था,                                 न मीडिया-रिपोर्टर!             
वह फूलती साँसों के साथ,                                भाग रहा था------       
रफा के फिलिस्तीनी कैम्प के एक बच्चे को                    गोद में लिए हुए   
लाऊडस्पीकर पर चीखता हुआ    
आग मत बरसाओ    
यहूदियो! आग मत बरसाओ    
प्लीज़डोंट शूट!       
लेकिन वह लहू-लुहान होकर गिर पड़ा     
उसने आसमान पर देखा           
धूप की चादर ने उसे ढ़क लिया था          
वह उठा, बच्चे को गोद में लिए कैम्प पहुँचा            
वह फिर गिरा और माँ को आवाज़ दी        
माँ! मैंने दूध का हक अदा कर दिया     
अंग्रेजों को शर्मिंदा नहीं किया    
मैं जानता हूँ-----            
एक दिन कोई अँगरेज़ आएगा  
फिलिस्तीनियों को बतायेगा                               क़ि-धूप की उम्र नहीं होती है..                              धूप की उम्र नहीं होती है।                                                                                                        09415111271 alpst-literature
          




  

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

सरहदें/ रंजन जैदी

सरहदें हमें बताती हैं,    
हद में रहना अच्छा होता है.   
गुरुत्वाकर्षण की हदें जब भी नक्षत्र तोड़ता है    
खुद टूट कर बिखर जाता है.   
टूटने और बिखरने का दर्द,    
अपने पीछे छोड़ जाता है.    
ऐसा रात के सन्नाटे में आकाश प़र     
हम भी देखते हैं!    
अन्तरिक्ष भी बताता है    
उजाले में अखबार भी बताता  है.   
    
धरती के कुछ ऐतिहासिक खड्ड    
खड्डों के विवर इसके गवाह हैं.    
गवाह हैं कुछ वैज्ञानिक भी    
पुच्छल-तारों  की धूलभरी रेखाएं    
हदें तोड़कर------    
पृथ्वी का भूगोल और उसका इतिहास
बनाती-बिगाडती आ रही हैं   
ब्रह्म्हांड के रहस्य का कौतूहल    
बढ़ाते आ रहे हैं, बताते आ रहे हैं कि---    
पृथ्वी की भी हदे हैं, ब्रह्म्हांड की भी सरहदें हैं.   
    
ब्रह्म्हांड की हदें अनंत हैं    
प्रकाश की किरणों प़र    
रंगों के रथ चलते हैं    
असंख्य ग्रहों के तम छटते हैं .    
यही उजास संभावनाएं जगाती है    
शायद कहीं, कोई हमसा वहां मिल जाए,    
हमें सरहदों का सही अर्थ बता जाए.   
    
हम तो स्वप्नजीवी हैं    
कल्पनाओं में ब्रह्म्हांड रचते है    
अन्य ग्रहों में भी वैज्ञानिक होंगे  
हाईड्रोजन-बम और सैनिक होंगे   
शासन, सत्ता, हिंसा, बलात्कार, भ्रष्टाचार, सभी-कुछ होगा    
निर्दोष तिल-तिल मरते होंगे    
दोषी मुक्त भाव से जीते होंगे.   
सबकी अपनी हदें होंगीं    
फिरभी हदें तोड़ते होंगें.   
    
काश कि कोई उड़नतश्तरी    
हमें मिल जाए!    
हमें पृथ्वी से चुरा ले जाए.    
मैं जानना चाहूँगा कि------    
तुम्हारे यहाँ भी क्या,    
हेरोशिमा-नागासाकी की बरसी मनाई जाती है?    
वेतनाम, इराक, अफगानिस्तान जैसे मुल्कों प़र   
अमेरिका जैसे देशों की मीज़ायिलें गिराई जाती है?
    
तुम्हारे यहाँ भी क्या    
फिलिस्तीनियों जैसी मजलूम कौमें रहती है?    
क्या वहां भी इस्राईल और अमेरिका जैसे देश बसते हैं?    
क्यां वहां भी ग्वेटेमाला जैसे कैदियों के कैम्प हैं?    
क्या अमेरिकी सैनिकों की बर्बरीयत से आहत!    
सियासी कैदी, मरकर तारे बन जाते है?    
कहीं आकाश प़र दिखाई देने वाले असंख्य तारे,    
अमरीकी जेलों में यातनाएं सहकर    
मर जाने वाले कैदी तो नहीं?   
    
कोई वैज्ञानिक नहीं बताता   
न ही कोई नुजूमी, ज्योतिषी, खगोलशास्त्री, सब मौन हैं,    
डरे-सहमे से हैं          
मोनिस्ट्री में साधनारत,    
गिरिजो, शिवालों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और दरगाहों में    
धर्म और संस्कृति के मन्त्रों का जाप करते हुए.   
    
मैं चाहता हूँ कि---        
ब्रह्म्हांड की सरहद नापूं    
अन्य ग्रहों के सैनिकों की संगीनों की नोकों प़र                                                                                                    लेटकर इतिहास रचाऊँ     
भीष्म पितामह बन जाऊं.                                                                                                                       09415111271 AlpsT-Litterature

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

दिल्ली का थीम-सांग / रंजन जैदी

रंजन जैदी
दिल्ली का यह थीम-सांग दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित और उप-राज्यपाल  श्री तेजेंद्र खन्ना के नाम-                                                        मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली.   
मेरी      दिल्ली  मेरी ताकत, मेरी पहचान है  तू.   
जिस्म  में  रूह  की   मानिंद   मेरी  जान है तू !  

मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली.मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली.    
   
कितने  तूफां से गुज़र आई है अपनी  दिल्ली,   
आँधियों से भी  न  घबराई है अपनी दिल्ली,    
लोग  आते  रहे  और कारवां  बनता  ही रहा,   
देखलो फिर से हसीं लायी  है अपनी  दिल्ली.  
 
मेरी दिल्ली, मेरी अज़मत, मेरा अभिमान है तू    
मेरी दिल्ली,  मेरी ताकत,  मेरी  पहचान है तू.   

मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली..मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली.  
    
कितने मौसम मेरी  दिल्ली में समां  जाते  हैं,   
कुछ तो झोंके मेरे गुलशन को जला  जाते  हैं,   
फिर भी दिल्ली तेरी गलियों में अज़आँ होती है,   
शंख   के   नाद   फ़ज़ाओं  को   जगा  जाते  हैं.     

मेरे नानक  की दुआओं का गुलिस्तान है तू,   
मेरी  दिल्ली, मेरी ताक़त, मेरी पहचान है तू  
  
मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली...मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली.    
हर नयी सुब्ह तेरी शाम की   अंगड़ाई  है,   
तेरी  रफ़्तार   में,   गुफ़्तार में गहराई   है,   
गोद में तेरे समां जाती है दुनिया की ख़ुशी,   
तू   नए  दौर  की  झंकार  है,  शहनाई  है.   

इक नए  हिंद की  तकदीर  का ऐलान है तू.   
मेरी दिल्ली मेरी ताक़त, मेरी पहचान है तू.   

मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली.  
   
खेल ही खेल में अब आओ मुहब्बत कर लें,   
सारी दुनिया को अहिंसा का सबक हम दे दें,   
जीत और हार  तो इस खेल  की  चौगानें हैं,   
खेल के नाम पे दुश्मन को भी अपना कर लें    

मेरे भारत के हसीं ख्वाब का  गुलदान  है तू,   
मेरी दिल्ली, मेरी ताक़त, मेरी  पहचान है
तू.     
मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली....मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली.      
09415111271 AlpsT-Litterature                                                                                                    

alpst-literature: व्याकुलता/रंजन जैदी

alpst-literature: व्याकुलता/रंजन जैदी: "हमने समंदर की ख़ामोशी देखी / लहरों का मौन-वृत्त भी / दूर क्षितिज में----/ आकाश को झुक कर / धरती के माथे को चूमते देखा / फिर भी तुम-----/ ..." 09415111271 AlpsT-Litterature

alpst-literature: तुम नहीं जानते!..../ranjan zaidi

alpst-literature: तुम नहीं जानते!..../ranjan zaidi: "तुम नहीं जानते! / तुम्हारे भीतर भी एक ब्रह्म्हांड है / एक पृथ्वी है / नदियों का जल है / विशाल स..." 09415111271 AlpsT-Litterature

तुम नहीं जानते!..../ranjan zaidi

तुम नहीं जानते! / तुम्हारे भीतर भी एक ब्रह्म्हांड है / एक पृथ्वी है / नदियों का जल है / विशाल सागर है / शिराओं में लहू बहता है / ह्रदय  में ज्वार उठता है./ तुम नहीं जानते!......./ बरगद ने देखे हैं महाप्रलय के दृश्य / शादाब्दियों ने नदियों में तलवारें धोयी हैं / स्पार्टा का युद्ध /जलता हुआ रोम / और हड़प्पा के गाँव / नीड़ की खिडकियों से सब देखती हुई / करोड़ों बार चिड़ियाँ रोई हैं / मगर-----/ उन्हें आजतक कोई चुप नहीं करा पाया / न राम / न ईसा / न बुद्ध / न मुहम्मद / न सुकरात / न नानक! / जल-समाधि, सूली, निर्वाण, मृत्यु, आत्म-हत्या, विष और....../ ज्योति से ज्योति समाने की नियति! /  तुम नहीं जानते.../  कौन, किसको, कब बचा पाया?/ ये सब ब्रह्म्हांड में होता रहा है / ऐसा आगे भी होता रहेगा /क्योंकि पृथ्वी आधारहीन है/ज़मीन होते हुए भी बेज़मीन है./ तुम नहीं जानते..../ कहते हैं कि जो ज़मीन से उखड़ जाते हैं, / वे देर-सवेर सूख जाते हैं / सूरज से उखड़े हम युग तक भूल गए हैं / तीन युगों के त्रिशंकु में अटक गए हैं./ तुम नहीं जानते.../ कब तुम्हारे भीतर के ब्रह्म्हांड में / लाल सिपाही बाण चला दें / आग लगा दें / बाँध उड़ा दें / बेखम्भे की इस पृथ्वी को / महाप्रलय में गेंद बना कर / हवा बना दें / तुमको आगे आना होगा /  एक नया इतिहास रचाना होगा.../ तुम नहीं जानते / तुम्हारे भीतर भी एक ब्रह्म्हांड है.                      09415111271 AlpsT-Litterature

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

alpst-literature: तपिश/रंजन जैदी

alpst-literature: तपिश/रंजन जैदी: "तुम्हारे और मेरे बीच/आंसूं हैं/चमकती धूप भी/न बादल हैं/न झोंके बादे -इसियाँ के/तुम्हे मालूम है..." 09415111271 AlpsT-Litterature

तपिश/रंजन जैदी

तुम्हारे और मेरे बीच/आंसूं हैं/चमकती धूप भी/न बादल हैं/न झोंके  बादे -इसियाँ के/तुम्हे मालूम है/सूरज के बदन से फूटती/आतिशीं रेखाओं जैसा हूँ / तुम्हारी बंद पलकों प़र/उन्हीं रेखाओं से लिखता रहा हूँ/आओ फिर से इन लबों प़र/उम्र के अंगार रख दें/या किसी रूई का फाहा बन/सिमट जाओ टपकती चन्द बूंदों से/चलो मैं फिर उतर जाऊं / समंदर सीप खोले है / चलो फिर से / किसी मोती का सपना देख ले हम-तुम / न जाने कब सुनामी रात की बाँहों में आजाये / न जाने कब रगों का खूं / उबल कर ज़ह्र बन जाए / न जाने कब फ़रिश्ता मौत का सामान ले आये/चलो जिस्मों का अब ये फासला / मिलकर मिटा दें हम/चलो शबनम भरी इस रात में/फिर मुस्कुरा लें हम.    09415111271 AlpsT-Litterature

तुम्हीं बताओ ऐसा क्यों होता है? ranjan zaidi

तुम्हीं बताओ ऐसा क्यों होता है?/अच्छी सोच के चौबारे में, लोग सियासत की बिसात बिछाते हैं, बगीचे की स्थायित्व के लिये, फूल बाज़ार में खुद को बेच आते हैं, तुम्हीं बताओ ऐसा क्यों होता है?/क्यों समंदर की तह में, हम मोती तलाशते हैं, सीप की पीड़ा से अनिभिज्ञ रह जाते  हैं, आस्था और विश्वास के गलीचे प़र, पान की पीक थूक जाते हैं, तुम्हीं बताओ ऐसा क्यों होता है?/ प्रकृति जंगल जलाती है तो उगाती भी है, मानस ऐसा क्यों नहीं करता, धरती की अग्नि पर्वत देती है, मानस विनाश! स्त्री की चौखट, स्वप्निल कीलों से जड़ी प्रतीक्षारत, कि वह आयेगा, प़र वह  नहीं आता, क्यों पथराई ऑंखें जीती रहती हैं, फिर तन मिटटी हो जाता है. तुम्हीं बताओ ऐसा क्यों होता है?      09415111271 AlpsT-Litterature

सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

व्याकुलता/रंजन जैदी

हमने समंदर की ख़ामोशी देखी / लहरों का मौन-वृत्त भी / दूर क्षितिज में----/ आकाश को झुक कर / धरती के माथे को चूमते देखा / फिर भी तुम-----/  खामोश हाशिये प़र चट्टान बनी /  मुद्दत से इस इंतज़ार में हो/ कि---- / आसमान प़र चाँद निकलेगा./ लहरें उछाल मारती हुई / तुहारे पांव का स्पर्श करेंगीं /रूह को सरशार करती हुई तुमसे / संवाद करेंगीं./ लेकिन सोचो, गौर से सोचो / धरती के जन्म की भी कुंडली होती है /  उसका भी भूगोल होता है /  धरती से जब कोई पर्वत उठ कर / चाँद छूने का यत्न करता है / तो------ / अनेक सदियाँ टूट जाती हैं.                            09415111271 AlpsT-literature.com

ऐ अज़ीम अरनिमाल, तू ही बता.../रंजन जैदी

मैंने झेलम के बहते हुए दरिया से पूछा--    
ऑक और चिनार के दरख्तों से पूछा,    
सरहदों की जमी हुई बर्फ से पूछा,     
कल्हण की विधवाओं से पूछा,    
इस गाँव में कोई पुरुष क्यों नहीं है?   
मैंने छति संगपुरा की हरबंस कौर को देखा,    
नींद ने दो वर्षों से दस्तक नहीं दी थी.    
नन्हीं फ़ातिमा भी बैसाखियों प़र जी रही थी,    
वानी हर दस्तक प़र दुबक जाता है,    
यतीमखाने के बच्चे भी पटाखों की आवाज़ों प़र,             
चीखते हुए सिर पीटने लग जाते हैं.   
    
ऐ अज़ीम झेलम के पानियों में रहने वाले देवता बता,                         
क्या राजा विनय दत्ता के raaj में भी,    
बच्चे खेलने को तरसते थे? 
क्या शंकराचार्य-पर्वत प़र बनी उनकी झोपड़ी,     
आतंकियों का ठिकाना बन गयी है?   
हब्बा खातून के मुहब्बत भरे गीत,     
अब वादी में क्यों नहीं गूंजा करते?   
    
ऐ झेलम! तू तो सदियों से देख रहा है,    
कश्मीर और कश्मीरियत से परिचित है,    
धान के खेतों के उस पार----    
वानी की छोटी बहन /                                                                                       घुटी-घुटी आवाज़ों में चीख रही है,    
उसकी बारीक चीखों की गर्मी से,    
वादी की बर्फ पिघल रही  है.    
और कश्मीर सुलग रहा  है.                                                                         ऐ अज़ीम अरनिमाल---                                        कश्मीरियों को रास्ता दिखा ! /                                                              रास्ता   बता---                                                             कि मंज़िल कहाँ है?     
                                      

रविवार, 17 अक्टूबर 2010

आओ लिख दूं.../रंजन जैदी

                              
आओ लिख दूं...!        
गुलाब की पंखड़ियों प़र तुम्हारा नाम.           
और उन्हें रख दूं --    
किताब के पन्नों के बीच,       
फिर भूकंप आ जाए,  
फिर सदी गुज़र जाए.          
सभ्यता के नए अध्याय के लिये,       
सत्य का अन्वेषक,     
पुरातत्वविद,   
गड़े खजाने की तरह एक दिन,          
किताब के बोसीदा पन्नों को देख कर,           
उनमें चिपकी पंखुड़ियां पाकर,            
उनपर तुम्हारा नाम पढ़कर,    
शोध करेगा,    
प्रबंध लिखेगा,
पुरस्कार के लिये दौड़ें लगाएगा.        
वह बताएगा कि यह नाम,      
लाखों साल पहले,       
सभ्यता-काल की हरखू बाई का है.  
नहीं---- जोधाबाई का है,        
नहीं-नहीं,        
मीराबाई का है,           
नहीं तो मिर्ज़ा हादी रुसवा की                                              उमराव जान का है.
लेकिन सत्य का अन्वेषक पुरातत्वविद,        
यह नहीं जान पायेगा कि तुम,          
एक गरीब मजदूर की बेटी थीं,          
अभावों में पली-बढ़ी थीं,          
आँखों में आसमान छूने के सपने थे.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                         09415111271 AlpsT-Litterature

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

तलाश/ रंजन जैदी


जंगल-जंगल  तुमको ढूंढा,  तुम  पानी  में  बैठे  थे / जब  बारिश  का  मौसम  आया,  तब  तुम  मुझको  आये  नज़र. / जीवन  कश्ती, जिस्म  समंदर,  आओ  जीवन  पार  करें / आओ  फिर  तस्वीर  बनाएं, साँसों  से  कोलाज़  भरें./  इस  दुनिया  में  इतना  कुछ  है,  इतने  रंग  कि  हैराँ  हूँ,  तुम  तो  एक  मुकम्मल  दुनिया,  कौन  से  इसमें  रंग  भरें. / आड़ी-तिरछी  रेखाओं  में,  हमने  सड़कें  ढूंढी  थीं,  कितने  ख्वाब  सजाये  मिलकर, और  लकीरों  के  जंगल   में , महल -दुमहले  ढूंढें  हमने. / लेकिन   जिस्म  पसीना  बनकर,  नदियों  से  जा  मिलता  था, नदियाँ  रेत  बहाती  रहतीं, और  मुकद्दर  बन  जाती  थीं / हर  चौराहा  जंगल -जंगल, हर  मैदान  में  दलदल-दलदल, खुश्क  ज़मीं  को  आओ  तलाशें, फिर  से  इसमें  फूल  खिलाएं, शाएद दुनिया बस जाए! 

09415111271 AlpsT-Literature

<a =" "></a> हिन्दी उपन्यास दिल , दरिया-दरिया कथाकार ; डॉ० जेड० ए० जैदी

हिन्दी उपन्यास दिल , दरिया-दरिया कथाकार ; डॉ० जेड० ए० जैदी (एक) सिधौली, उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर की एक तहसील है. इसका छोट...

इस्मत चुगताई /Ismat Apa/Ranjan Zaidi इस्मत चुगताई यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि उर्दू साहित्य की

मेरी ब्लॉग सूची