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गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

तुम नहीं जानते!..../ranjan zaidi

तुम नहीं जानते! / तुम्हारे भीतर भी एक ब्रह्म्हांड है / एक पृथ्वी है / नदियों का जल है / विशाल सागर है / शिराओं में लहू बहता है / ह्रदय  में ज्वार उठता है./ तुम नहीं जानते!......./ बरगद ने देखे हैं महाप्रलय के दृश्य / शादाब्दियों ने नदियों में तलवारें धोयी हैं / स्पार्टा का युद्ध /जलता हुआ रोम / और हड़प्पा के गाँव / नीड़ की खिडकियों से सब देखती हुई / करोड़ों बार चिड़ियाँ रोई हैं / मगर-----/ उन्हें आजतक कोई चुप नहीं करा पाया / न राम / न ईसा / न बुद्ध / न मुहम्मद / न सुकरात / न नानक! / जल-समाधि, सूली, निर्वाण, मृत्यु, आत्म-हत्या, विष और....../ ज्योति से ज्योति समाने की नियति! /  तुम नहीं जानते.../  कौन, किसको, कब बचा पाया?/ ये सब ब्रह्म्हांड में होता रहा है / ऐसा आगे भी होता रहेगा /क्योंकि पृथ्वी आधारहीन है/ज़मीन होते हुए भी बेज़मीन है./ तुम नहीं जानते..../ कहते हैं कि जो ज़मीन से उखड़ जाते हैं, / वे देर-सवेर सूख जाते हैं / सूरज से उखड़े हम युग तक भूल गए हैं / तीन युगों के त्रिशंकु में अटक गए हैं./ तुम नहीं जानते.../ कब तुम्हारे भीतर के ब्रह्म्हांड में / लाल सिपाही बाण चला दें / आग लगा दें / बाँध उड़ा दें / बेखम्भे की इस पृथ्वी को / महाप्रलय में गेंद बना कर / हवा बना दें / तुमको आगे आना होगा /  एक नया इतिहास रचाना होगा.../ तुम नहीं जानते / तुम्हारे भीतर भी एक ब्रह्म्हांड है.                      09415111271 AlpsT-Litterature

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