यह ब्लॉग खोजें

शनिवार, 27 नवंबर 2010

हम भी मुंह में ज़बान रखते हैं


आज़ादी के बाद हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों की निरंतर उपेक्षा की जाती रही है. मैंने तो अपनी बात  सद्यः प्रकाशित   पुस्तक 'हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान' की भूमिका  में लिख दी है.  शीर्षक है-हम भी मुंह में ज़बान रखते हैं. इस सम्पादित पुस्तक में दूसरे जाने-माने प्रबुद्ध, प्रतिष्ठित साहित्यकारों के आलेख भी हैं. हिंदी में मुस्लिम साहित्यकारों को लेकर आप क्या सोचते हैं? क्या हिंदी केवल किसी एक जाति, संप्रदाय, वर्ग, समूह या समुदाय की भाषा है? अपनी राय अवश्य लिखें>ranjanzaidi@yahoo.co.in  0941511127

[kkjs ikuh dh eNfy;ka------izfrf"Br dFkkdkj jatu tS+nh dk ;g uohre dgkuh laxzg gSA blls iwoZ 4 dgkuh laxg izdkf'kr gks pqds gSaA gj dgkuh vius vki esa lkekftd fonzwirkvksa ds rki ls bZekunkj vkSj fu"Bku vkneh ds gkf'k;s ij pys tkus ds nnZ dk eflZ;k gSA vfLrr~o dh yM+kbZ us tkus&vutkus igpku Hkjs ekuoh; thou dks fonzwirkvksa ls Hkj fn;k gSA blds ckotwn bl laxzg dh dgkfu;ka] buds ik=] le;&dky] ?kVuk,a gekjh ;knnk'r esa vklkuh ls txg cuk ysrh gSa] ;g fgUnh dFkk&lkfgR; txr ds fy, dgkuhdkj dk cgqr cM+k ;ksxnku ekuk tk;sxkA izfrf"Br fgUnh dfo] x+t+ydkj 'ksjtax xxZ us dHkh fdlh ikVhZ esa jatu t+Snh dks fgUnh lkfgR; dk vkfej [kku dgk FkkA eSa le>rk gwa fd ,d dFkkdkj ds :i esa bl dgkuhdkj dk dn cgqr Åapk gSA bldk izek.k gSa bl dgkuh laxzg dh dgkfu;kaA fo'okl u vk;s rks gkFk daxu dks vkjlh D;k] vki Lo;a i<+dj ns[k ysaA                                                &tuknZu feJ] ubZ fnYyhA       

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

26/11की रात..... बेशक वो रात खौफ की परछाइयों में थी/रंजन जैदी


बेशक वो रात खौफ की परछाइयों में थी, ऐसी अनोखी रात कि शीशे पिघल गए / हर चीख ज़ुल्मतों के खंडर में दुबक गयी, ऐसी घटायें आयीं कि रिश्ते सिमट गए / आसूदगी में डूबके तकिये लहू हुए, कितने ही ख्वाब खौफ में आसूदह हो गए / कितने ही  माहताब ज़मींदोज़ हो गए / बस आग थी धुंआ था धमाकों का शोर था, लम्हों की सिसकियों में न रिक्कत, न ज़ोर था / ऐसी अनोखी सूरते-हालात अल्लतश / कब ज़ीस्त आँख मूँद ले और सांस ले हबस / अपने उठाये हाथ दुआ मांगते थे सब, इन ज़ुल्मतों को चीरके तू भेज आफताब / ऐसी अँधेरी रात कभी फिर न आ सके, अल्लाह जालिमों के मज़ालिम का कर हिसाब.    09415111271 alpst-literature.com

रविवार, 14 नवंबर 2010

'टोबाटेक सिंह' प़र फ़िल्में / रंजन जैदी

कालजयी  उर्दू कहानी टोबाटेक सिंह प़र अब  बालीवुड की नज़र दौड़ रही है. सादत हसन मंटो की यह कहानी भारत पाक विभाजन के बवंडर की एक अलमनाक दास्तान बयान करती है. इस कहानी प़र फिल्म बनाने का ख्याल सबसे पहले ब्रिटिश फिल्म निर्माता निर्देशक कीन मैक मोलिन के मस्तिष्क में आया था, जिसकी स्क्रिप्ट जाने-माने उर्दू साहित्यकार  तारिक अली ने तैयार कीथी और तीन महीने की लगातार शूटिंग कर इसे पूरा किया गया था. इस फिल्म का नाम पार्टीशन था. सन १९८७ में यह टेलीफिल्म पहली बार बीबीसी नेछोटे परदे  प़र रिलीज़ की. यह एक ऐसी फिल्म थी जिसे देखकर दर्शकों के दिल भर आये थे और हिजरत के अहसास ने हिंद-पाक महाजरीनों तथा शरणार्थियों के घाव ताज़े कर दिए थे. इस फिल्म में रंग-मंच के जाने-माने कलाकारों में रोशन सेठ, जोहरा सहगल, ज़िया मोहिउद्दीन, जान श्राप्नल और सईद मिर्ज़ा ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी. इसमें लाहोर पागलखाने का सेट लन्दन में ही लगाया गया था. आश्चर्य की बात यह है कि इस फिल्म के निर्देशक ने पकिस्तान की कभी यात्रा नहीं की थी और न ही इस फिल्म की शूटिंग के लिये यूनिट के किसी भी सदस्य को पाकिस्तान जाना पड़ा था.  सन १९९५ में इसी कहानी प़र दिल्ली दूरदर्शन की निदेशक मीरा की नज़र पड़ी और उन्होंने इसपर फिल्म बनाने का बीड़ा उठाया. इसके लिये उन्होंने पाकिस्तान से वहां के मशहूर अभिनेता शुजात हाशमी को भारत आने की दावत दी जिन्होंने आगे चलकर फिल्म में सरदार टोबाटेक सिंह की भूमिका निभाई. इस फिल्म को भी काफ़ी सराहा गया. फिर, २००५ में पाकिस्तान को इस कहानी प़र फिल्म बनाने का अंग्रेजी ख्याल आया. मंटो, विभाजन के दौरान पाकिस्तान चले गए थे. लेकिन उन्हें पकिस्तान रास नहीं आया था. इस अंग्रेजी फिल्म का निर्देशन लाहौर के कीन्ज़ कालेज की अफिया मिथाईल ने किया था. यह फिल्म सर्व-प्रथम २००५ में ही अमेरिका में दिखाई गयी, जिसमें बिशन सिंह की भूमिका अभिनेता अमीर राना ने निभाई थी.  ताज़ा खबर यह है कि मंटो की उर्दू कहानी टोबाटेक सिंह  प़र अब बालीवुड फिल्म बनाएगा. इन दिनों जानेमाने अभिनेता और निर्देशक आमिर खां अपनी टीम के साथ इसी कहानी प़र जोरशोर से काम में व्यस्त हैं. निश्चय ही यह एक बेहतर कदम होगा.        .              09415111271

शनिवार, 6 नवंबर 2010

आओ शहद करलें / रंजन जैदी

कैफेटेरिया के एक कोने में वह मेरे सामने बैठी थी. हम दोनों के बीच गहरी ख़ामोशी छाई हुई थी. दोनों एक-दूसरे प़र अपनी निगाहें टिकाये हुए थे. जब बेयरे ने आकर पूछा कि, "कुछ और साब...?", तो मैं चौंक कर उसकी ओर उन्मुख हो गया. मैंने कहा, "हाँ, दो हॉट काफ़ी और कुछ स्नैक्स भी ...!" मैं जानता था कि दिव्या को काफ़ी पीने का बहुत शौक है,और वह पुनः काफ़ी पीने में संकोच से काम नहीं लेगी. भले ही दो साल गुज़र गए हों, आदतों में भी कुछ बदलाव अगया हो, प़र मुझे विश्वास  था कि काफ़ी के शौक को दिव्या ने इन दो सालों में भी नहीं छोड़ा होगा. मेरा अंदाज़ा सही निकला . उसने स्वतः ही गर्दन झुका ली थी. दरअसल, हम दोनों ही कैफेटेरिया में कुछ देर और बैठना चाहते थे. बहुत कुछ कहना और सुनना चाहते थे. मैंने महसूस किया कि दिव्या के भीतर कहीं कोई उथल-पुथल मची हुई है और उसका हाल उस मल्लाह की तरह है जो तूफ़ान में अपनी किश्ती को भंवर से निकालने की कोशिश कर रहा हो. वह गिलास के कगारों को पकड़े पेपरवेट की तरह गिलास को मेज़ प़र लगातार घुमा रही थी. मैं उसके भीतर की उथल-पुथल को जानना चाहता था. मैंने पूछा, "क्या बात है, कुछ बताओगी नहीं?" सुनकर उसने गर्दन ऊपर उठाकर मुझे टटोलती नज़रों से देखा. कहा, "रग्घू! मैं तुम्हारे पास लौटना चाहती हूँ. लेकिन मेरी प्रेजेट पोजीशन ऐसी है कि शायद तुम.....?" उसने फिर गर्दन झुका ली थी. मैंने पूछा, "क्यों, तुम्हें लगता है कि अब तुम जोब्लेस हो तो मैं...." "नहीं-नहीं रग्घू! यह बात नहीं है." "तो फिर क्या बात है?" "बात यह है कि...कि मैंप्रिगनेंट हूँ....!" उसने निगाह झुका कर कहा कि वह तीन महीनों से गर्भवती है. मुझे ऐसा लगा जैसे समुद्र की एक मोटी सी लहर पूरी ताक़त के साथ मेरे जिस्म से आ टकराई हो और मेरा समूचा वजूद इस टक्कर से थरथरा उठा हो. मैं सामने आईने में पसीने से भीगते अपने  चेहरे  को स्पष्ट रूप से देख रहा था. दिव्या की आंखे मेरे चेहरे प़र टिकी हुई थीं. बेयरा काफ़ी ले आया था. बेयरे के जाते ही दिव्या ने कहा,"सुनकर अच्छा नहीं लगा न? कोई बात नहीं. मैं अभी पेईंग-गेस्ट हूँ. सड़क प़र नहीं आई हूँ. तुम अपने पहले जैसे रूटीन लाईफ को डिस्टर्ब मत होने दो. मैं मैनेज कर लूंगी. वो तो बस...यूँही जो दिल में था, तुमसे कह दिया. वह भी इसलिए कि आज बरसों बाद मुझसे बात करने के लिये तुमने वक्त निकाला है. डोंट वरी, मैं मैनेज कर लूंगी." उसके पूर्ववत अहम् की अनुभूति कर मुझे ऐसा लगा, मानो मेरे गले में छिले हुए बहुत से फफोले  उभर  आये हों. मैं उसे भिंची-भिंची नज़रों से अपलक देखने लगा था. उसने मोबाईल आन कर उसकी घड़ी में समय देखा. फिर, कोई नंबर डायल करने लगी. इसी बीच मेरे मोबायल प़र मेरी निजी सचिव का फोन अगया था. मैंने कहा कि मैं इस समय दिव्या के साथ हूँ. बाद में बात करूंगा लेकिन दिव्या, बात करते-करते लाबी की तरफ निकल गयी थी. टिशु-पेपर से मुंह साफ़ कर मैंने काफ़ी का सिप लिया और लाबी की तरफ देखने लगा जहाँ ग्लास के उसपार दिव्या किसी से मोबाईल प़र हंस-हंस कर बातें कर रही थी. अजीब लड़की है यह दिव्या भी. शायद मैं इसे कभी नहीं समझ पाऊँगा. हर बार यह मुझे सरपरायिज़ देती आई है.  पहली बार जब हम मिले थे तो उसने अचानक मुझसे पूछा था,"विल यू मैरी विद मी?"  और शादी के बाद, "मैं प्रिकाशंस  में बिलीव करती हूँ, मुझे जल्दी प्रिगनेंसी नहीं चाहिए." अब इतने सालों बाद मिली है तो इस खबर के साथ कि वह प्रिगनेंट है. पता नहीं, इसके पेट में किसका वंश पनप रहा है लेकिन कह रही है कि वह अब फिर मेरे पास लौट आना चाहती है. जब लौटना ही था तो गयी ही क्यों थी? मैंने तो नहीं कहा था कि वह घर छोड़ दे. शादी के बाद औरत मकान को घर बनाती है, दिव्या ने क्या किया? कानों में माँ की आवाज़ गूंजी,"बेटा, दुल्हिन को भी समय दिया कर.वह अकेले बहुत घबराती है. कहीं घुमाने लेजा इसे. इसकी भी दिलजोई कर. इसकी आँखों में बहुत सूनापन देख रही हूँ मैं. मेरी बात समझ रहा है न?" मैं ने काफ़ी का कप ठीक वैसे ही ख़ाली कर दिया  जैसे मैं थकहारकर रात को दिव्या को एक घूँट में सिपकर पी जाया करता था. लेकिन मैं नींद में  महसूस करता कि उसकी उंगलियाँ मेरे जिस्म की नाज़ुक जगहों प़र रेंग रही हैं, उसका हिलोरें लेता बदन मेरे बदन से भीगी-भीगी सांसों के साथ शरारते कर रहा है. मैंने यह सब महसूसते हुए भी उसकी सरगोशियों को सुनने की कभी कोशिश नहीं की. वह अक्सर जगती थी, मैं हर रात सोता था. मैं ऐसा क्यों करता था, यह बात मुझे मालूम थी, लेकिन दिव्या नहीं जानती थी. एक दिन उसने साफ शब्दों में कह दिया, "मैं जा रही हूँ. मैं इस तरह तुम्हारे साथ नहीं रह सकती. हाँ! मैंने माँ जी को कुछ नहीं बताया है. बताना भी नहीं चाहती...." और वह सचमुच एक दिन मेरे घर से चली गयी. मैंने भी उसे नहीं तलाशा. पूरे दो साल गुज़र गए. आज फिर दिव्या के अचानक फोन ने मुझे आश्चर्य में डाल दिया था, "तुम्हें याद है रग्घू, कल मेरी मैरिजनिवर्सरी है. मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ. मैं नौकरी भी छोड़ रही हूँ, एक सर्परयिज़  देना है". और इस फोन के बाद आज दिव्या मेरे सामने थी, एक नए सर्परायिज़ के साथ. वह लाबी से अपनी जगह प़र लौट आई थी. बता रही थी,"तुम्हारी माता जी का फोन था. मैंने उन्हें समाचार दे दिया है. वह बहुत खुश हैं. मैं कल अपने घर में शिफ्ट हो जाऊँगी. अगर तुम्हें एतराज़ हो तो....मैं अपना इरादा बदल सकती हूँ. ...चला जाए?" रात, जब मैं घर के बिस्तर प़र पहुंचा तो कानों में दिव्या के शब्द गूंजने लगे,"मैंने माँ जी को कुछ नहीं बताया है. बताना भी नहीं चाहती.... मैं कल अपने घर में शिफ्ट हो जाऊँगी. अगर तुम्हें एतराज़ हो तो......"                 .     ...  .         09415111271 AlpsT-Litterature

.सर्व हित सुखाय / जनार्दन मिश्र

हम दो मित्रों के बीच /चल रही थी बातचीत/कैसे दो पत्थरों के बीच/उग आई लहलहाती हुई घास/सूखे मन को भी सर्व हित सुखाय  सहलाकर/अपने जैसे / हरा-भरा कर देती है/ ऐसे में मित्र ने एक चुहिया को/ इंगित करते  हुए कहा/मित्र! देखो/कितनी सुन्दर/गोल-मटोल/थुलथुली सी यह चुहिया/ कंप्यूटर के तार प़र/उछल-कूद मचा रही है/अपनी बातों को आगे बढ़ाते हुए कहा/यह सब-----/ मुझे बहुत अच्छा लगता है/किसी गिलहरी को/अपने दोनों हाथ सरीखे पैरों से पकड़कर/किसी फल या दाने को कुतरना/इस डाल से उस डाल प़र फुदकना/हरी-भरी घास प़र/छलांगें लगाते हुए/ किसी हिरण को देखना/एक दिन तो सुबह-सुबह बेटे ने कहा/पिता जी! देखिये न/बाथरूम में एक काक्रोच/कितना अलमस्त बैठा है/ वाकई मैंने देखा तो...../पाया कि, / इस क्रूर दुनिया के/ घात-प्रतिघात से / निरापद---- / वह ऐसे बैठा है / मानो कोई तपस्वी / मैंने कहा, बेटा!/ इसे भूल से भी मत मारना / न परिवार के किसी सदस्य को बताना / आज से तुम भी जान लो कि / यह दुनिया----/ सबके लिये है./     09415111271 AlpsT-Litterature

<a =" "></a> हिन्दी उपन्यास दिल , दरिया-दरिया कथाकार ; डॉ० जेड० ए० जैदी

हिन्दी उपन्यास दिल , दरिया-दरिया कथाकार ; डॉ० जेड० ए० जैदी (एक) सिधौली, उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर की एक तहसील है. इसका छोट...

इस्मत चुगताई /Ismat Apa/Ranjan Zaidi इस्मत चुगताई यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि उर्दू साहित्य की

मेरी ब्लॉग सूची