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शनिवार, 6 नवंबर 2010

आओ शहद करलें / रंजन जैदी

कैफेटेरिया के एक कोने में वह मेरे सामने बैठी थी. हम दोनों के बीच गहरी ख़ामोशी छाई हुई थी. दोनों एक-दूसरे प़र अपनी निगाहें टिकाये हुए थे. जब बेयरे ने आकर पूछा कि, "कुछ और साब...?", तो मैं चौंक कर उसकी ओर उन्मुख हो गया. मैंने कहा, "हाँ, दो हॉट काफ़ी और कुछ स्नैक्स भी ...!" मैं जानता था कि दिव्या को काफ़ी पीने का बहुत शौक है,और वह पुनः काफ़ी पीने में संकोच से काम नहीं लेगी. भले ही दो साल गुज़र गए हों, आदतों में भी कुछ बदलाव अगया हो, प़र मुझे विश्वास  था कि काफ़ी के शौक को दिव्या ने इन दो सालों में भी नहीं छोड़ा होगा. मेरा अंदाज़ा सही निकला . उसने स्वतः ही गर्दन झुका ली थी. दरअसल, हम दोनों ही कैफेटेरिया में कुछ देर और बैठना चाहते थे. बहुत कुछ कहना और सुनना चाहते थे. मैंने महसूस किया कि दिव्या के भीतर कहीं कोई उथल-पुथल मची हुई है और उसका हाल उस मल्लाह की तरह है जो तूफ़ान में अपनी किश्ती को भंवर से निकालने की कोशिश कर रहा हो. वह गिलास के कगारों को पकड़े पेपरवेट की तरह गिलास को मेज़ प़र लगातार घुमा रही थी. मैं उसके भीतर की उथल-पुथल को जानना चाहता था. मैंने पूछा, "क्या बात है, कुछ बताओगी नहीं?" सुनकर उसने गर्दन ऊपर उठाकर मुझे टटोलती नज़रों से देखा. कहा, "रग्घू! मैं तुम्हारे पास लौटना चाहती हूँ. लेकिन मेरी प्रेजेट पोजीशन ऐसी है कि शायद तुम.....?" उसने फिर गर्दन झुका ली थी. मैंने पूछा, "क्यों, तुम्हें लगता है कि अब तुम जोब्लेस हो तो मैं...." "नहीं-नहीं रग्घू! यह बात नहीं है." "तो फिर क्या बात है?" "बात यह है कि...कि मैंप्रिगनेंट हूँ....!" उसने निगाह झुका कर कहा कि वह तीन महीनों से गर्भवती है. मुझे ऐसा लगा जैसे समुद्र की एक मोटी सी लहर पूरी ताक़त के साथ मेरे जिस्म से आ टकराई हो और मेरा समूचा वजूद इस टक्कर से थरथरा उठा हो. मैं सामने आईने में पसीने से भीगते अपने  चेहरे  को स्पष्ट रूप से देख रहा था. दिव्या की आंखे मेरे चेहरे प़र टिकी हुई थीं. बेयरा काफ़ी ले आया था. बेयरे के जाते ही दिव्या ने कहा,"सुनकर अच्छा नहीं लगा न? कोई बात नहीं. मैं अभी पेईंग-गेस्ट हूँ. सड़क प़र नहीं आई हूँ. तुम अपने पहले जैसे रूटीन लाईफ को डिस्टर्ब मत होने दो. मैं मैनेज कर लूंगी. वो तो बस...यूँही जो दिल में था, तुमसे कह दिया. वह भी इसलिए कि आज बरसों बाद मुझसे बात करने के लिये तुमने वक्त निकाला है. डोंट वरी, मैं मैनेज कर लूंगी." उसके पूर्ववत अहम् की अनुभूति कर मुझे ऐसा लगा, मानो मेरे गले में छिले हुए बहुत से फफोले  उभर  आये हों. मैं उसे भिंची-भिंची नज़रों से अपलक देखने लगा था. उसने मोबाईल आन कर उसकी घड़ी में समय देखा. फिर, कोई नंबर डायल करने लगी. इसी बीच मेरे मोबायल प़र मेरी निजी सचिव का फोन अगया था. मैंने कहा कि मैं इस समय दिव्या के साथ हूँ. बाद में बात करूंगा लेकिन दिव्या, बात करते-करते लाबी की तरफ निकल गयी थी. टिशु-पेपर से मुंह साफ़ कर मैंने काफ़ी का सिप लिया और लाबी की तरफ देखने लगा जहाँ ग्लास के उसपार दिव्या किसी से मोबाईल प़र हंस-हंस कर बातें कर रही थी. अजीब लड़की है यह दिव्या भी. शायद मैं इसे कभी नहीं समझ पाऊँगा. हर बार यह मुझे सरपरायिज़ देती आई है.  पहली बार जब हम मिले थे तो उसने अचानक मुझसे पूछा था,"विल यू मैरी विद मी?"  और शादी के बाद, "मैं प्रिकाशंस  में बिलीव करती हूँ, मुझे जल्दी प्रिगनेंसी नहीं चाहिए." अब इतने सालों बाद मिली है तो इस खबर के साथ कि वह प्रिगनेंट है. पता नहीं, इसके पेट में किसका वंश पनप रहा है लेकिन कह रही है कि वह अब फिर मेरे पास लौट आना चाहती है. जब लौटना ही था तो गयी ही क्यों थी? मैंने तो नहीं कहा था कि वह घर छोड़ दे. शादी के बाद औरत मकान को घर बनाती है, दिव्या ने क्या किया? कानों में माँ की आवाज़ गूंजी,"बेटा, दुल्हिन को भी समय दिया कर.वह अकेले बहुत घबराती है. कहीं घुमाने लेजा इसे. इसकी भी दिलजोई कर. इसकी आँखों में बहुत सूनापन देख रही हूँ मैं. मेरी बात समझ रहा है न?" मैं ने काफ़ी का कप ठीक वैसे ही ख़ाली कर दिया  जैसे मैं थकहारकर रात को दिव्या को एक घूँट में सिपकर पी जाया करता था. लेकिन मैं नींद में  महसूस करता कि उसकी उंगलियाँ मेरे जिस्म की नाज़ुक जगहों प़र रेंग रही हैं, उसका हिलोरें लेता बदन मेरे बदन से भीगी-भीगी सांसों के साथ शरारते कर रहा है. मैंने यह सब महसूसते हुए भी उसकी सरगोशियों को सुनने की कभी कोशिश नहीं की. वह अक्सर जगती थी, मैं हर रात सोता था. मैं ऐसा क्यों करता था, यह बात मुझे मालूम थी, लेकिन दिव्या नहीं जानती थी. एक दिन उसने साफ शब्दों में कह दिया, "मैं जा रही हूँ. मैं इस तरह तुम्हारे साथ नहीं रह सकती. हाँ! मैंने माँ जी को कुछ नहीं बताया है. बताना भी नहीं चाहती...." और वह सचमुच एक दिन मेरे घर से चली गयी. मैंने भी उसे नहीं तलाशा. पूरे दो साल गुज़र गए. आज फिर दिव्या के अचानक फोन ने मुझे आश्चर्य में डाल दिया था, "तुम्हें याद है रग्घू, कल मेरी मैरिजनिवर्सरी है. मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ. मैं नौकरी भी छोड़ रही हूँ, एक सर्परयिज़  देना है". और इस फोन के बाद आज दिव्या मेरे सामने थी, एक नए सर्परायिज़ के साथ. वह लाबी से अपनी जगह प़र लौट आई थी. बता रही थी,"तुम्हारी माता जी का फोन था. मैंने उन्हें समाचार दे दिया है. वह बहुत खुश हैं. मैं कल अपने घर में शिफ्ट हो जाऊँगी. अगर तुम्हें एतराज़ हो तो....मैं अपना इरादा बदल सकती हूँ. ...चला जाए?" रात, जब मैं घर के बिस्तर प़र पहुंचा तो कानों में दिव्या के शब्द गूंजने लगे,"मैंने माँ जी को कुछ नहीं बताया है. बताना भी नहीं चाहती.... मैं कल अपने घर में शिफ्ट हो जाऊँगी. अगर तुम्हें एतराज़ हो तो......"                 .     ...  .         09415111271 AlpsT-Litterature

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