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| लेखक: रंजन जैदी |
उत्तर प्रदेश का एक जिला है सीतापुर और उसकी तहसील है सिधौली. इसी सिधौली का एक पुराना क़स्बा है बाड़ी. यानि, हिंदी के कवि नरोत्तम दास की जन्मस्थली. कभी ये लखनऊ के नवाब मीर वाजिद अली के शासनकाल में फौजी छावनी हुआ करती थी. मीर साहेबान सेना में रसलदार जैसे ओहदों पर पदासीन रहे थे. वहीं कसबे के बीचो-बीच सय्यदों का बाड़ा था जो अब बीचोबीच एक चौसर टीले में बदल चूका है. कभी जिसमें जिंदगी की हरारतें रक्स किया करती थीं और इस टीले पर जगर-मगर करती हवेलियों में मीर साहिबान के इज्ज़तदार संयुक्त परिवार रहा करते थे. उसी परिवार की उस पीढ़ी का मैं एक ऐसा चिराग था जो देश की आज़ादी के बाद उन खंडराती हवेली में रौशन हुआ और उम्र के 12 साल तक रहकर वहां के घटाटोप तारीखी अंधेरों में टिमटिमाता रहा, फिर बेवतन हो गया. तब तक सय्यदबाड़े की रौनक पूरी तरह से ख़त्म हो चुकी थी. जो था, वो बस इतना कि बिखरे हुए अफसानों में लखौरी ईंटों के मलबे में लोनी चाटती बादशाहत दफ़्न हो चुकी थी और कहानियों के नुचे हुए पंख हिंदुस्तान के दूसरे शहरों और मुल्क के बटवारे के बाद बने नए मुल्क पाकिस्तान के शहरों में बस जाने वाले यहाँ के परिवार नए घरों में ले जा चुके थे ताकि बिन परिंदों के उन्हें अगली नस्लें अपनी किताबों में रख सकें. ऐसी हजारों हज़ार यादें मेरी कहानियों के किरदारों में इस तरह से आ बैठीं जैसे बेवतन महाजिर लावारिस मकानों प़र कब्ज़ा कर लेते हों. उम्र के १२ साल और होश आने के ५ साल, मेरी जिंदगी के कीमती साल रहे हैं. (मेरी दो कहानियां उसी पतझड़ का मर्सिया हैं). जैसा कि मैंने ऊपर बताया कि यह बस्ती, हिंदी के महान कवि नरोत्तम दास की जन्मस्थली भी है. मेरे बचपन के ५ साल उसी कवि के मंदिर के वरांडे में उनके दोहे गाते हुए गुज़रे. इसके लिये मैंने अपनी हवेली के भीतर की रिवायतें तोड़ दी थीं और एक ऐसी जुबान हवेली में ले आया था जिसे हमारे घर में गंवारू जुबान कहा जाता था. तब किसी ने सपना भी नहीं देखा था की एक दिन मैं इसी गंवारू ज़बान में पी एचडी करूंगा और इसी जुबान में कहानियां लिखूंगा, सहाफ़त करूंगा. नरोत्तम दास मेरी प्रेरणा रहे हैं, मेरा संबल भी. पिता डाक्टर थे, तो उनका सपना था कि मैं डाक्टर बनूँ. मैं डाक्टर बना, किन्तु लिटरेचर में. बहुद विरोध सहा. प़र तब संतोष हुआ जब मैंने अपने पिता को बड़ी गंभीरता के साथ कहानी 'मकान' को कमरा बंद कर पढ़ते देखा.क्योंकि ये कहानी सारिका में छपी थी और उन दिनों उसकी अंग्रेजी पत्रों में भी बहुत चर्चा हुई थी. खिड़की से झंकते हुए तब मैंने अपने पिता के चेहरे प़र जो संतोष और ख़ुशी देखी थी, उसे मैं आज तक नहीं भूल पाया. आज वह इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन जब वह मृत्यु से दो दिन पहले दिल्ली स्थित मेरे घर में आकर ठहरे तो मैं ख़ुशी से फूला नहीं समां रहा था. तब मैं नहीं समझ पाया था कि मेरे पिता ने मेरी हिंदी को स्वीकार कर लिया था और मेरे हाथ प़र जिंदगी की आखरी हिचकी लेना इसका सबूत है. काश] हिंदी भी मुस्लिम साहित्यकारों को स्वीकार करले....
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