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शुक्रवार, 14 मई 2010

बुढापे के कन्धों पर/ranjan zaidi

मैं बच्चों के साथ/खेलना चाहता हूँ/ लेकिन मेरे बच्चे/मुझे खेलने नहीं देते./मुझे खेलता देख/उनकी आँखें लाल हो जाती है./होंठों पर बेआवाज़ थरथराते शब्दों का / तांता लग जाता है/ मुट्ठियाँ भींचे, पाँव पटकते वे/ अपनी माँ पर जाकर बरस पड़ते हैं/भला ये भी उम्र है खेलने की/लड़कियों के बीच चुहलें करने की/उनसे कहें कि वह छत से नीचें आएं/पूजा की वेदी पर बैठकर/ईश्वेर से ध्यान लगाएं/उन्हें खेलता देख/मुझे शर्म आती है/सुनकर बच्चों की माँ सन्न रह जाती है/समय बदल गया है/यही बच्चे पहले खेलने के लिये मुझे उकसाते थे/घोड़ा और खच्चर बनाते थे/चाहते थे कि मैं उछलूँ ,कूदूं/उछल-उछलकर चाँद को छूलूं/तब मैं बुखार में भी तपकर/उनकी इच्छाओं को पूरा करता था/ उनकी नादान हरकतों पर/नाटकीय अट्टहास लगाता था/गृहस्ती में फँसी, थकी-हारी पत्नी को इन्हीं दृश्यों में/अपने भविष्य का सुख नज़र आता था/आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं/आज हम पति-पत्नी/फिर से जीना चाहते हैं/खुले वातावरण में सांस लेना चाहते हैं/चाँद की ऊंचाइयां नाप लेना चाहते हैं/अपनी ही शरारतों पर/हँसना चाहते हैं/मगर सारे दृश्य-परिदृश्य बदल चुके हैं/उम्र के झुर्रियोंदार सांचे में/ बीते लम्हों के खिलौने/एक-एककर ढल चुके हैं/कारण सब जानते हैं/कुछ मन ही मन कलपते हैं/कुछ हँसते रहने का अभिनय करते हैं/क्योंकि......./बुढापे के कन्धों पर/कांक्रीट की संस्कृति उग आई है/महान परम्पराएं/लोहे की सरियों के जाल में फंसकर/शाफ्ट के मल्गुन्जे अंधेरों में/नयी उम्र की कच्ची परछाइयों के साथ/जीने की आदत डाल रही हैं/बच्चों को मआल,फास्फूड,पब/तेज़ चौंधियाती रोशनियों/और न्योंसाइनों की संस्कृति/रास आ गयी है/रिश्तों के जंगल पथरा  गए हैं/गमलों में मूल्यविहीन पौधों  के बीच/नागफनी उग आये हैं/ऐसे में हताशा ने/मुझे भाग्यवादी बना दिया है/मेरी पत्नी को बिस्तर से लगा दिया है/समय का चक्र चलायमान है/शाएद यही विधि का विधान है. 09415111271 AlpsT-Litterature

गुरुवार, 13 मई 2010

उमर खय्याम...umar khayyam/ranjan zaidi

हुस्न और इश्क की शाएरी में उमर खय्याम...की शाएरी को कालजयी साहित्य में शुमार किया जाता है. हुस्न और इश्क के बीच संवाद में प्रेमी अपनी प्रेमिका से कहता है, तुम इतनी  खूबसूरत हो जैसे उमर खाय्य्यम की कोई रुबाई. खय्याम का असली नाम गयासुद्दीन अबुल फ़तेह उमर बिन इब्राहीम उमर खय्याम था. खय्याम का अर्थ होता है खेमे (टेंट) लगाने का कारोबार करने वाला. अद्भुत बात यह है कि खय्याम ने अपनी पूरी उम्र में अपने पैतृक व्यवसाव को हाथ तक नहीं लगाया. उनके जन्म को लेकर अनेक भ्रांतियां है. लेकिन स्रोतों से पता चलता है कि खय्याम का जन्म सन  १०१९ के आस-पास ईरान स्थित निशापुर में हुआ था. हालाँकि पश्चिमी देशों के अनेक लेखकों का मानना है कि खय्याम का जन्म १८ मई १०४८ के आसपास हुआ था. यदि हम उस काल के शाही शासनकाल में झांक कर देखें तो उमर खय्याम के ही समकालीन और साथ के पढ़े हुए मित्रों में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के फारसी साहित्य के विद्वान दार्शनिक तूसी तत्कालीन सल्जूकी राजशाही के शीर्ष  पद (प्रधानमंत्री) प़र आसीन थे. इसी प्रकार खय्याम के एक विद्वान मित्र और थे जिनका  नाम था....हसन बिन सब्बाह. इस प्रकार अपने समय के ये तीनों विद्वान जाने-माने गुरू इमाम मूफिक के मदरसे में एक साथ पढ़ा करते थे. कहते हैं कि तूसी की प्रेरणा और आर्थिक रूप से निश्चिन्त हो जाने के उपरांत ही उमर खय्याम ने निशापुर आकर अंतर्राष्ट्रीय ख्यातार्जित पुस्तक जबरो-मुकाबला और इल्मुल-मसाहत-वाल्मकात  जैसी पुस्तकों की रचना की जिससे तत्कालीन ईरान में उन्हें अपने समय का महान दार्शनिक विद्वान  बू अली सीना सानी समझा जाने लगा. अपने मित्र की योग्यता और शोहरत की चर्चा जब तूसी ने अपने बादशाह सुल्तान मलिक शाह सल्जूकी (१०९२-१०७२) के सामने की तो बादशाह ने बिना देर किये उमर खय्याम को तलब कर अपने बहुत बड़े कैलेंडर विभाग का अध्यक्ष बना दिया. यह एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी थी. यहीं प़र रह कर उमर खय्याम ने एक ऐसे आधुनिक कैलेण्डर की ईजाद की कि आजतक बड़े से बड़ा विद्वान भी  न तो कोई ऐसे कैलेण्डर का विकल्प तलाशकर पाया और न ही कोई उसकी काट ही पेश कर सका. आज भी लोग नहीं जानते कि जिस सन-ईसवी के कैलेडर को वह अपने घर में सम्मान देकर दीवार प़र टांगते हैं, उसका जनक उमर खय्याम है. इसलिए यूरोप के लोग उमर खय्याम को आज भी पश्चिम का दूत कहते हैं. वास्तविकता यह है कि उमर खय्याम अपने समय का महान दार्शनिक, ज्योतिषी, कवि, खगोलविद और प्रगतिशील साहित्यकार था. कहते हैं कि विद्वान का शरीर आग में जले या दफ़्न हो, उसके इल्म का चिराग हर युग में जलता रहता है. इसी लिये उमर खय्याम के इल्म का चिराग आज भी रोशन है.     

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