मैं बच्चों के साथ/खेलना चाहता हूँ/ लेकिन मेरे बच्चे/मुझे खेलने नहीं देते./मुझे खेलता देख/उनकी आँखें लाल हो जाती है./होंठों पर बेआवाज़ थरथराते शब्दों का / तांता लग जाता है/ मुट्ठियाँ भींचे, पाँव पटकते वे/ अपनी माँ पर जाकर बरस पड़ते हैं/
भला ये भी उम्र है खेलने की/लड़कियों के बीच चुहलें करने की/उनसे कहें कि वह छत से नीचें आएं/पूजा की वेदी पर बैठकर/ईश्वेर से ध्यान लगाएं/उन्हें खेलता देख/मुझे शर्म आती है/सुनकर बच्चों की माँ सन्न रह जाती है/
समय बदल गया है/यही बच्चे पहले खेलने के लिये मुझे उकसाते थे/घोड़ा और खच्चर बनाते थे/चाहते थे कि मैं उछलूँ ,कूदूं/उछल-उछलकर चाँद को छूलूं/
तब मैं बुखार में भी तपकर/उनकी इच्छाओं को पूरा करता था/ उनकी नादान हरकतों पर/नाटकीय अट्टहास लगाता था/गृहस्ती में फँसी, थकी-हारी पत्नी को इन्हीं दृश्यों में/अपने भविष्य का सुख नज़र आता था/
आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं/आज हम पति-पत्नी/फिर से जीना चाहते हैं/खुले वातावरण में सांस लेना चाहते हैं/चाँद की ऊंचाइयां नाप लेना चाहते हैं/अपनी ही शरारतों पर/हँसना चाहते हैं/
मगर सारे दृश्य-परिदृश्य बदल चुके हैं/उम्र के झुर्रियोंदार सांचे में/ बीते लम्हों के खिलौने/एक-एककर ढल चुके हैं/कारण सब जानते हैं/कुछ मन ही मन कलपते हैं/कुछ हँसते रहने का अभिनय करते हैं/क्योंकि......./
बुढापे के कन्धों पर/कांक्रीट की संस्कृति उग आई है/महान परम्पराएं/लोहे की सरियों के जाल में फंसकर/शाफ्ट के मल्गुन्जे अंधेरों में/नयी उम्र की कच्ची परछाइयों के साथ/जीने की आदत डाल रही हैं/बच्चों को मआल,फास्फूड,पब/तेज़ चौंधियाती रोशनियों/और न्योंसाइनों की संस्कृति/रास आ गयी है/
रिश्तों के जंगल पथरा गए हैं/गमलों में मूल्यविहीन पौधों के बीच/नागफनी उग आये हैं/ऐसे में हताशा ने/मुझे भाग्यवादी बना दिया है/मेरी पत्नी को बिस्तर से लगा दिया है/
समय का चक्र चलायमान है/शाएद यही विधि का विधान है.
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