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| तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी |
- देश के करोड़ों लोगों की तरह तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी को भी भारत के मिज़ाइल मैन भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजेअब्दुल कलाम अच्छे लगते हैं। इसमें कोई गलत बात भी नहीं है। उनके हिसाब से राष्ट्रपति पद के लिए उनसे बड़ा उम्मीदवार दूसरा हो भी नहीं सकता। `
दुर्भाग्य यह है कि जब डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम 2002 को
राष्ट्रपति पद के चुनाव में एनडीए के उम्मीद्वार
के रूप में प्रस्तावित किया गया था, तब
वह भारतीय जनता पार्टी की प्रमुख पसंद थे,
लेकिन
आज ऐसा नहीं है।
तब यह एक राजनीतिक पत्ता था। यह राजनीतिक पत्ता
बीजेपी ने गुजरात के साम्प्रदायिक दंगों को निगाह में रखकर मुसलामानों के
ज़ख्मों पर मरहम का फाहा रखने के उद्देश्य से फेका
था और सत्ता के गलियारे का हर राजगीर जनता रहा है कि इस
खेल के पीछे श्री लालकृष्ण
आडवानी का दिमाग छुपा हुआ था.
क्योंकि गुजरात के मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी के
हर काले-सफ़ेद कामों के पीछे अडवानी का शुरू से ही आशीर्वाद रहा
है और ये आशीर्वाद तमाम नौटंकियों के बावजूद मोदी को आज
भी हासिल है। कारण यह है कि श्री आडवाणी,
मोदी
के विरुद्ध जाकर अपनी गांधीनगर जैसी आसान और सुरक्षित सीट को खतरे में नहीं डालना
चाहेंगे। वह जानते हैं कि यह सीट उनके बाद उनके परिवार
के भी काम आने वाली है।
कल 16 जून है, यानि कि
राष्ट्रपति पद अधिसूचना जारी होने का दिन। 30 जून, नामांकन
का अंतिम दिन।
श्री हामिद अंसारी कभी किसी भी पार्टी की पसंद
नहीं थे. उन्हें कांग्रेस के दिग्गज और सोनिया के नजदीकी नेता सलमान खुर्शीद के अनुरोध पर प्रतिक्रिया स्वरुप
कम्युनिस्ट पार्टी
के उम्मीदवार प्रगतिशील इतिहासकार प्रोफ़ेसर मुशीरुल हसन के मुकाबले लाया गया था। उस समय वह जामिया के वीसी थे और सलमान खुर्शीद उनके उत्कर्ष के
हित में नहीं थे। प्रोफ़ेसर मुशीरुल हसन को तत्कालीन शिक्षा मंत्री अर्जुन सिंह का आशीर्वाद प्राप्त था लेकिन अर्जुन
सिंह सोनिया खेमे से बाहर हो चुके थे। इसलिए जामिया मिलिया से ही श्री हामिद अंसारी (पिछड़ा वर्ग) को मुस्लिम
कार्ड के रूप में सोनिया जी के सामने ला खड़ा किया गया और उनका चयन हो गया। वर्तमान उपराष्ट्रपति श्री हामिद अंसारी आज अत्यंत मायूस हैं कि उनके लिए कोई लड़ाई
लड़ने वाला सामने नहीं आ
रहा है, सलमान खुर्शीद भी नहीं.
एनडीए ने न जाने क्या सोचकर उपराष्ट्रपति पद के लिए जसवंत
सिंह को आगे बढ़ा दिया. यह चुनाव यूपीए के
संभावित सदस्य वित्तमंत्री प्रणव दा के
लिए आसान नहीं होगा। 2007 में भी वह इस पद के लिए कांग्रेस
के प्रिय उम्मीदवारों में से थे लेकिन राष्ट्रपति पद पर क़ब्ज़ा दूसरे का हो गया। इस बार ममता बनर्जी तथा
प्रतिपक्ष के कथित सांसदों द्वारा प्रणव
दा के विरुद्ध राजनीतिक
वातावरण तैयार करने के लिए कांग्रेस को 1969
के चुनाव
जैसी रणनीति तैयार करनी होगी जिसमें राष्ट्रपति पद के लिए श्री विवि गिरी को
चुनाव
में खड़ा किया गया था।
राष्ट्रपति चुनाव की आंड में राष्ट्रीय राजधानी में इन
दिनों धड़ल्ले से सटोरिये भी सक्रिय हो उठे हैं। प्रणव दा पर 60 पैसे का दांव
लग चुका है और प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह
पर सबसे अधिक 7.50 पैसे . यानि डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम मात्र
4.50 पैसे पर स्थिर हो गए हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना
है
कि डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम अपने समय के सफल राष्ट्रपतियों में से एक रहे हैं, इसलिए
उन्हें पुनः इस दौड़ से बाहर हो
जाना चाहिए। हालांकि उन्होंने अपने बारे में अभी तक कोई विशेष प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है।
राष्ट्रपति पद के उम्मीद्वारों
में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की
पुनः वापसी की संभावनाओं से राष्ट्रपति भवन के अधिकारियों व
कर्मचारियों में हडकंप सा मच गया है। वे नहीं चाहते कि
उनकी
राष्ट्रपति भवन में पुनर्वापसी हो।
अन्ना हजारे को यह जानकर प्रसन्नता होगी कि डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के
समय में राष्ट्रपति भवन का मासिक खर्च घटकर एक तिहाई रह गया था और गैर ज़रूरी
खर्चों की कटौती कर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने
भ्रष्टाचार का दम घोट दिया था जिससे इस किले के भीतर कार्यरत अधिकारी व कर्मचारी घुटन का एहसास करने लगे थे। महामहिम ने कहा था, जब
दो कमरों में मनुष्य आराम से रह सकता है,
सादे
शाकाहारी भोजन कर अच्छा फील कर सकता है, और सादगी से
अपने अतिथियों का स्वागत कर का सकता है तो,
आडम्बर
क्यों?
लेकिन ऐसा राष्ट्रपति इस्तेमाल
की वस्तु तो बन सकता है, भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगा सकता,
यह बात तत्कालीन राष्ट्रपति भवन में तैनात वे
ईमानदार अधिकारी तो जानते हैं, जो राजनीति नहीं कर सकते. लेकिन
सत्ता के गलियारे की सियासत नहीं जानती जो कभी मुलायम
सिंह का इस्तेमाल करती है तो कभी बुद्धिजीवी जसवंत सिंह का। कभी सोमनाथ
चटर्जी का नाम लेकर उछल पड़ती है तो कभी किसी और का, लेकिन सियासी जादू
के पिटारे से जो कूदकर बाहर आता है,
वह
कोई
और होता है। हमें उसी पल का इंतजार करना चाहिए। http://alpst-politics.blogspot.com
