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शुक्रवार, 3 मई 2024

दिल, दरिया -दरिया यरंजन जैदी -2

<> +91 9350 934 635 https://alpst-literature.blogspot.com, zaidi.ranjan20shayan@bloggar.com, पीछे से आगे .....2 “हाँ !” शराफत यार खां ने अपने ईज़ी-चेयर से उठते हुए बंदे हसन से कहा, तुम बाहर मत जाओ। चाय मेरे कमरे में पहुँचा दो। हमारे ये पेपर्स, डायरी और पेन वग़ैरह स्टडी में रख देना।.... और हाँ! मिसेज शबनम, कल संडे को बैठते हैं। आपकी कहानी पर मैं उपन्यास ज़रूर लिखूँगा। हालांकि यह मेरी फील्ड नहीं है। वेरी थीम फुल, कल मिलते हैं। मम्मी भी आ चुकी हैं। हाँ, बंगले के रिनोवेशन की बात तो रह ही गई।” शराफत यार ख़ान थके हुए स्वर में बड़बड़ाए ,“बेहुला भी भाग गया, कल ऑफिस-आवर्स में बड़े बाबू से कहूँगा, ऐड्मिन की फ़ाइल पुटअप करें ।” शबनम ने गर्दन को सीधी कर ढके हुए चेहरे को आकाश की ओर किया फिर गर्दन झुकाए हुए कहा, “मैं तो साहब आपके पास इसलिए आई थी कि अगर आप बड़े अस्पताल के डॉक्टर बाबू से सिफारिश कर देंगे तो मैं किडनी का इलाज उन्हीं से करवा लूँगी। दाईं तरफ के गुर्दे में अक्सर दर्द रहने लगा है। आप कहें तो मैं बाद में आ जाऊं। मुझे तो बहुत अच्छा लगा था जब आपने कहा था कि मैं तुम्हारी ज़िंदगी की कहानी लिखना चाहता हूँ। सर जी, मेरे शौहर डॉक्टर शाहिद भी आर्टिकल्स लिखते थे। वह भी मुझ पर लिखना चाहते थे लेकिन... हर कुएं से पानी नहीं निकलता है सर जी।आँख, आधे जिस्म का हिस्सा तो है लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर कान अच्छा सुनने की सलाहियत भी रखे। कलम में बहुत ताकत होती है मगर हर कलम आयत नहीं लिख सकती सर जी । आपने मेरे लिए कलम उठाया है, मेरे लिए मेरी उम्र का यह सबसे बड़ा इनाम है। मैं इसे हमेशा अहसान की शक्ल में याद रखूंगी। शायद इस उपकार का कोई बदल न हो, लेकिन यह उपकार एक क़र्ज़ के रूप में मेरे पास रहेगा। आप जरूर लिखिए सर जी, मैं अपनी ज़िंदगी का हर राज़ ईमानदारी से आप पर खोलकर रख दूँगी, कुछ भी नहीं छुपाऊंगी ...जब बहुत काफी समय हो तो आप बेझिझक मुझे आदेश देकर बुला लीजिएगा, मैं आ जाऊँगी। ग़रीब का व्यक्त उसकी तकदीर से तय होता है। क्या कोई तकदीर बदल सकता है। जो मेरे भाग्य में है वही मेरा वक्त है।” “ओ हो..... फिल्मी डायलॉग।” असलम ने कॉफी का प्याला लिया और उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा,“अभी मैं इमोशनल नहीं होना चाहता, हमें लगता है, मामला कुछ गंभीर है। हम टेनिस कोर्ट की तरफ जा रहे हैं हसन चा।” साथ ही कान के पास मुंह लाकर फुसफुसाते हुए कहा,“अगर इस बीच मेरी ‘डबल रोटी ’ आ जाए तो बता दीजिएगा कि हम रेलवे-क्लब में हैं।...ओके।” कहकर वह बाहर निकल गया। लेकिन शराफत यार ख़ान लान में ही बैठे शबनम की आपबीती सुन रहे थे । एक शौकिया लेखक होने के नाते उन्होंने तय कर लिया था कि वह शबनम के जीवन पर आधारित एक डायरी या उसकी जीवनी पर आधारित कहानी जरूर तहरीर करेंगे । उस रात उन्होंने फिर से टैब ऑन किया और लिखने बैठ गए..... मैं अपने आपसे पूछता हूँ कि शबनम की अंधेरी रात कभी समाप्त होगी भी या नहीं? र “बहुत अच्छा लगा साहब जी...... आपसे मिलने की बहुत दिनों से कोशिश कर रही थी। आप तो मेरी सोच से भी बहुत आगे के इंसान निकले। मैं आपको बताऊं सर जी, जब मैं छोटी थी तब कुछ न कुछ लिखा करती थी। चाक से लकीरें खींचती रहती थी पर उन बेनामों को कभी कोई नाम नहीं दे पाती थी। आप मुझ पर किताब लिखेंगे, यह तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था। थैंक यू सर......!” इसी बीच ड्यूटी गार्ड ने पार्क में आकर इत्तिला दी कि कोई दो आदमी शबनम माई से मिलने की राह देख रहे हैं। शबनम घबराकर खड़ी हो गई, “कककौन, कौन....?” उसने अपनी छड़ी इधर-उधर लहराई, “कौन हैं वो... ?” बहुआ बेहुरा ने पता कर सूचना दी, कोई कायमगंज के मोहिउद्दीन अंसारी और मथुरा के रिटायर्ड दरोगा चमन लाल पासी हैं। गार्ड ने कॉलोनी के अंदर आने की ‘परमिशन’ नहीं दी। “ठीक है, बेहुआ तुम साथ जाओ। इन्हें अकेले न छोड़ना।” शराफत यार ने कहा,” पता करो, क्या बात है। असलम भी शायद आज अलीगढ़ जाने वाले हैं। कितने दिनों से वह यूनिवर्सिटी भी नहीं गए हैं। कोविड के इस माहौल में हम नहीं चाहते कि अम्मी और खाला वग़ैरह घर से बाहर जाएं । असलम को भी वैसे रुक जाना चाहिए क्योंकि यूनिवर्सिटी को भी कोविड में बंद किया जा सकता है। लाक- डाउन तो सारी दुनियाँ में लागू हो चुका है। हमारे यहाँ भी होगा....। अम्मी और खाला को अब यही रुकना होगा। ठीक है, ओके....।” इसी बीच मालगाड़ी के गुजरने का शोर देर तक वातावरण में गूँजता रहा । शबनम का शादी से पहले का नाम गुलफ़िशा था। गुलफ़िशा को उसके अपने क़ौल-कबीले के लोग गुल के नाम से भी पुकारते थे। उसके पिता जद्दन बाई के कोठे पर तबला वादक उस्ताद कल्लन खाँ के शिष्य अल्लाह रक्खे नाम से जाने जाते थे लेकिन शराब उनकी कमजोरी बन चुकी थी। जानकार बताते हैं कि जद्दन बाई एक अनुभवी और दूर-दृष्टि रखने वाली चतुर कोठेवाली थी। बड़े घरानों में उसकी आसान घुसपैठ थी। जद्दन बाई उस दिन से गुलफ़िशा पर नजर रखने लगी थी जिस दिन वह स्कूल से छुट्टी कर माँ की तलाश में जद्दन बाई के कोठे तक की सीढ़ियाँ तय कर बेझिझक उनकी मसनद पर बिना अनुमति के बैठ गई थी। तब सबकी सांसें अटककर रह गई थीं। हाय, जद्दन बाई की वारिस ? लेकिन कच्ची मिट्टी का वह सुंदर घड़ा उस दिन घड़ौंची से लुढ़क कर अचानक टूट गया जब जद्दन बाई के कान में वहाँ के दलाल मोहिउद्दीन ने यह खबर पहुंचाई कि इस इलाके की चमेली पर मुहल्ले के माफिया भाई ननकू शाह दीनू भाई मारवाड़ी की पैनी नजर है और वह गुलफ़िशा को दिल से अपनी बहू-बेगम बना चुके हैं और वह देख भी चुके हैं कि उनका फ़ारेन-रिटर्न डॉक्टर का बेटा जिस लड़की से शादी करना चाहता है, उसे वह अच्छी तरह से पसंद कर चुके है। वह, गुलफ़िशा के ऐसे हर शो में जाते रहते हैं जिसमें वह भाग लेने जाया करती है। गुलफ़िशा के पास सब कुछ था लेकिन दो चीजें नहीं थी। एक- माँ, जो बीमार रहती थी और वह हर नए दिन शरीर से कमजोर होती जा रही थी और दूसरा- ‘गुल’ का सौतेला बाप, जो शराब के नशे में अपनी ही बेटी के साथ शारीरिक संबंध बनाने पर तुला रहता था। शराब के नशे ने गुलफ़िशा ही से उसका पिता उससे छीन लिया था। वह उसकी बीमार माँ को बांधकर इतना मारता था कि उसकी सांसें टूटने लग जाती थीं। वह उसका दूसरा गुर्दा भी बेच देने की धमकी देता रहता था। वह चाहता था कि गुलफ़िशा को वह अच्छी कीमत पर फरोख्त करे लेकिन कथित डॉन का भय उससे यह काम नहीं करा पाता था। यह भय था कथित डॉन माफिया भाई ननकू शाह प्रदीप शाह मारवाड़ी का जिसका डॉक्टर बेटा गुलफ़िशा को दिल दे बैठा था। उधर शराबनोशी ने ही गुलफ़िशा की माँ मलाई बेगम की भी दाईं किडनी को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया था। रईसों की टोली के किसी एक रईस ने सुझाव दिया कि भाई ननकू शाह प्रदीप शाह मारवाड़ी से क्यों नहीं करवाते? वह तो किडनी विशेषज्ञ है। विदेशों तक में मशहूर हैं। उनके पिता के चेले-चपाटों की निगरानी में डॉक्टर अब्दुल शाहिद एण्ड ऐंगिल फार्मा में दिखाने भी ले गए, लेकिन....... । डॉक्टर अब्दुल शाहिद मारवाड़ी परिवार से था लेकिन उसका पिता पैसे को दांत से पकड़ता था। उसने पुत्र पर भी पैसा इस लिए लगाया था ताकि शाहिद का विवाह किसी बड़े ताजिर की लड़की से हो और उसके घर धन की वर्षा हो लेकिन असली जीवन में ऐसा कुछ नहीं हो सका। तब शाहिद का पिता भी नहीं जनता था कि उसके पुत्र के दिमाग़ में कौन सी खिचड़ी पक रही है। वह तो दिन-रात दुनिया के एक बड़े बाजार पर कब्जा कर लेने के स्वप्न देखा करता था। विकसित देशों के व्यापार पर हुक्मरानी करना यद्यपि आसान नहीं है, फिर भी उसके अनुसार असंभव भी नहीं है। वार्ड नंबर 12 के पेशेंट का नाम सतीश चंद्र नायक था। उसे मृत्यु से डर लगता था, लेकिन उसका डायलिसिस यहीं के ऑपरेशन थियेटर में हुआ था। सतीश चंद्र नायक ने एक बार गिड़गिड़ाते हए कहा था डॉक्टर शाहिद से कहा था,”म्हारे को इस पीड़ा से यदि तू मुक्त कर दे, ते मैं थारे को पूरा अस्पताल बनवाके गिफ्ट कर देवांगे .....।” गुलफ़िशा जब घर से अस्पताल लौटी तो वह जान गई कि उसका दिल उसके पास से अब जा चुका है। यह लगाव और तड़प गुलफ़िशा की धड़कनों की परिचायक है। दिल से कहूँ तो यह उसकी पहली पाकीज़ा मुहब्बत थी जिसने उसे रात भर सोने नहीं दिया था । मां ने पूछा भी था, “रात भर नहीं सोई। कहीं यह दिल.........?” स्वभावतः मुंह से सच बाहर आ गया, “ मुझे लगता है माँ, मैं बड़ी हो गई हूँ। अपने फैसले मैं खुद ले सकती हूँ। उसने भारी आवाज में कहा, ”मैं तेरे दलाल शौहर को एक दिन जरूर मार डालूंगी।’ गुलफ़िशा ने माँ को आगाह किया,’अपने सौतेले पति को समझा दे माँ कि वह एक वहशी दरिंदा जानवर है, वह बेरहमी से तेरे सिर के बाल पकड़कर तुझे खींचता है, मारता है और मैं यह सब नहीं देख सकती। शराब पीकर तेरे साथ बलात्कार करता है। वह तुझ पर दबाव डालता है कि मैं उसके साथ हर रात सोऊँ। यह कैसा बाप है माँ?” उसने घृणा से एक ओर थूकते हुए कहा, “मेरा असली बाप तो ऐसा कभी नहीं था। वह तो भूख-प्यास में भी हमारा था, हमारी माँ का शौहर था, जो अपनी बेटी को बाजार में बेचने का कभी ख्वाब तक नहीं देखना पसंद कर सकता था। लेकिन यह तो मुझे सीने से लगाकर अपने पास रातों को सुलाना चाहता है और सेक्स की मंडी में मेरा जिस्म बेचते रहना चाहता है। अब यह सब नहीं चल पाएगा माँ ।’ “चुप, हरामजादी कुतिया!’ अचानक बैक रूम का पर्दा उठाकर मुहिउद्दीन अपने तहबंद की गांठ लगाता हुआ कमरे में प्रविष्ट हुआ। वह दांत किटकिटाते हुए गुर्राया, उसने एक हाथ में छुरा पकड़ रखा था “बहुत बोलने लगी है। अभी तो मैंने तेरी मां का एक ही गुर्दा बेचा है, चीखी चिल्लाई तो दूसरा गुर्दा भी सचमुच शरीर से निकालकर अल्लाह को प्यारा कर दूंगा और तेरे पिंजर तक को बाजार में बेच दूंगा। मत मुझसे टकरा ! मैं बहुत खतरनाक आदमी हूँ....कह देता हूँ। यह मत समझ कि मैं पाशा भाई से डर जाऊंगा।” वह चीखता-चिल्लाता भीड़ को चीरता हुआ आँखों से ओझल हो गया। किसी ने पुलिस को 100 नंबर पर कॉल कर दी थी। वैन आई, पूछताछ की और रूटीन की औचरिकताएं दर्ज कर ट्रैफिक के रास्ते साफ कर दिए। लेकिन किसी ने यह खबर जरूर फैला दी कि मोहिउद्दीन गिरफ्तार हो गया है और वह पुलिस के संरक्षण में अस्पताल में दाखिल है। दिल गुदाज़ ने अपनी ज़िंदगी में पहली बार ऐसे हिंसक दृश्य का सामना किया था लेकिन वह डरी नहीं थी। जब उसने सारा किस्सा डॉक्टर अब्दुल शाहिद को सुनाया तो उसने तुरंत गुलफ़िशा के घर पर प्राइवेट सिक्योरिटी लगा दी और जब उसके तस्कर पिता को इसका इल्म हुआ तो उसने मुहिउद्दीन गैंग के कई गुंडों को उनके घरों से ही उठवा लिया। इसमें एक पात्र देर से जरूर आया लेकिन आया तो दिखता चला गया, वह था लंगड़ा तैमूर। उसने दूर से देखा कि उसकी गुलफ़िशा की जन्नतकदा में भीड़ है, पुलिस है, मूहिउद्दीन की चीखें हैं तो वह अपनी बैसाखी को ऐसे उठाने रखने लगा जैसे वह डल झील में अपने पिता के शिकारे को पानी में तैरा रहा हो। वह भीड़ को चीरता हुआ अंदर आया और दहाड़ने लगा, “रुक साले! कहाँ है तू, भड़वे के घूरे की सड़ी हुई खाद के कीड़े, तेरे ही छुरे से अपुन तेरा ही काम तमाम किए देता है । ठहर ...।” ***********

दिल,दरिया-दरिया -रंजन ज़ैदी

<> +91 9350 934 635 https://alpst-literature.blogspot.com, zaidi.ranjan20shayan@bloggar.com, दिल,दरिया-दरिया डॉ0 ज़ेड.ए.ज़ैदी रंजन ज़ैदी (एक) सिधौली, उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर की एक तहसील है. इसका छोटा सा रेलवे स्टेशन है लेकिन उसका फैलता हुआ शहर अब सबसे खुद को जोड़ रहा है क्योंकि इस छोटे से शहर के रास्ते 'मिश्रिख' को भी अब छूने लगे हैं और बाड़ी जैसे ऐतिहासिक क़स्बे के अतिरिक्त देश के क्रांतिकारियों की पहचान 'काकोरी' को भी दुनिया से जोड़ रहे हैं. शराफत यार खां मूलतः कस्बा बाड़ी के पुराने जमीदारों के खानदान से संबंध रखते हैं। ज़मीदारी खत्म हो गई तो खानदान भी बिखर गए। नए आसमानों की तलाश में तप्ती हुई प्यासी संगलाख ज़मीनें लखौरी ईंटों के सपने नहीं दिखा सकीं और जो पीछे पुरानी इमारतों की बुनियादें बाकी बचीं, वे कमजोर होती चली गईं। कहते हैं कि एक ईंट गिरती है तो तीन दूसरी अपने आप भुरभुरी होने लगती हैं। समय उन्हें भुरभुराकर लोनी में बदल देता है। जब समय साथ छोड़ता है तो इमारतों के भी अंग-प्रत्यंग गिरते हुए लावारिस बन जाते हैं और पुराना मुहावरा है कि लावारिस मकान हो या मुहल्ले की विधवा, उसपर हर कोई अपना दावा पेश करने लग जाता है। बाड़ी की मस्जिद हो या कब्रिस्तान, कवि नरोत्तम दास का मंदिर हो या पुरातात्विक खंडहर, सबके दावेदार स्वतः ही मशरूम की तरह उग आए लोग, मकान, तिदरियाँ और हवेलियाँ सब अफ़साने बनकर खंडहरों में तब्दील होते चले गए। यहाँ भी बदलते वक्त के साथ लावारिस ज़मीनों पर कब्जों के करील उग-उग कर फैलते चले गए और खंडहरों पर पतावर के नए न सलीब पहचान की तरह पीढ़ियों के हस्ताक्षर बनते चले गए। शराफत यार ख़ान का खानदान इसी बाड़ी के सैय्यदों की निशानी है। उनका ननिहाल लखनऊ में है, वहीं वह पढ़े-लिखे भी। खाला-बी बाड़ी के सय्यद-बाड़े में ब्याही जरूर थीं, किन्तु मन बड़ी बहन के आँगन में ही डोलता रहता था। 15 साल छोटी थीं तो खानदान भर में वह छोटी खाला, छोटी फुप्पो, छोटी मुमानी और बस ऐसे ही रिश्तों का छोटापन उनके बेटे असलम ख़ान तक जा पहुँचा था । शराफत यार ख़ान बड़े थे, रिश्ते में बड़ी खाला के होनहार बेटे थे और लखनऊ में ही रहते थे किन्तु पढ़ाई-लिखाई में मुनीरा बेगम अपने बेटे के लिए एएमयू से बेहतर दूसरी जगह के महत्व को नहीं स्वीकारती थीं, कारण थे शराफत के अब्बाजान स्वर्गीय मीर अमीर हसन एडवोकेट, जिन्होंने मुस्लिम विश्वविद्यालय में न केवल वकालत पढ़ी थी, बल्कि वहाँ की कोर्ट के सदस्य भी रहे थे। आजादी के आंदोलन में उनकी भूमिका भी सराहनीय रही थी। आज अगर वह जीवित होते तो लिबरल मुसलमानों के एक बड़े नेता बनकर उनका प्रतिनिधित्व कर रहे होते। उनके बहुत से दोस्त पाकिस्तान चले गए किन्तु उन्होंने अपने ही मुल्क को अपना ‘देश’ समझा और यहीं की मिट्टी में वह अंततः दफ्न भी हो गए। छोटी-बी बाड़ी में ही रहीं। कसबाई मानसिकता ने उन्हें कभी चौखट लांघने नहीं दी। तब भी नहीं जब उनके पति की सांप्रदायिक दंगा-ग्रस्त कस्बे से मेरठ जाते हुए रास्ते में उन सहित तीन अन्य व्यक्तियों की चाकुओं से हत्या कर गई थी। तब उनके इकलौते पुत्र असलम ख़ान पाँच वर्ष के थे। बड़ी बेगम श्रीमती मुनीरा बेगम ने असलम खान को लखनऊ में ही रखना चाहा लेकिन ज़रीना बेगम की तनहाई को देख कर बहन ने एक पढ़ी-लिखी ट्रेंड लेडी अटेंडेंट तम्बोरा देवी को बाड़ी में जरूर रख दिया ताकि असलम खान की सही निगरानी और बेहतर तालीम पर निगाह रखी जा सके। तम्बोरा देवी कस्बा लहर पुर अर्थात लोहारी पुर से थीं। कहते हैं कि राजा चंद्र सेन गौड़ ने 1707 में मुस्लिम शासक को पराजित कर इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था । राजा टोडरमल इसी कस्बे के रहने वालों में थे। तम्बोरा देवी गौड़ के पूर्वजों मेँ कुछ लोग ग़ाज़ी ताहिर के नेतृत्व में पासियों के युद्ध के बाद 1707 में जब राजा चंद्र सेन गौड़ का शासन आया तो तम्बोरा देवी के पूर्वज अवध में जाकर बस गए थे क्योंकि तब तक अवध पर अकबर बादशाह का शासन कायम हो चुका था। तंबोरा देवी एक संस्कारित महिला थीं । वह मुनीरा बेगम के साथ समाज कल्याण संबंधी कार्यों से भी जुड़ी रहती थीं। उसने गौड़ मुस्लिम युवक से कभी प्रेम-विवाह किया किन्तु उसने मुंबई जाकर किसी अन्य महिला से विवाह कर लिया। इस घटना के बाद से उसने फिर कभी प्रेम विवाह को महत्व नहीं दिया। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्नातक थीं और बहुत ही सौम्य प्रकृति की गंभीर महिला भी। जब उसने समाज कल्याण स्वयंसेवी सामाजिक संस्था का बाड़ी में दफ्तर खोला तो उसने स्थानीय बच्चों की शिक्षा की ओर भी ध्यान दिया जिसमें इंग्लिश और मैथ्स को प्रथम प्राथमिकता दी गई थी। इससे स्थानीय बच्चे उसके ‘टिटोरियल क्लासेस’ में तेजी से आने लगे और सैय्यद बाड़ा का खंडहर फिर से आबाद होने लगा। असलम खान को तंबोरा देवी ने मानो गोद ही ले लिया था। समय ने भी तो उसकी ज़िंदगी को बदलकर रख दिया था। उसने असलम खान को न केवल पढ़ाया-लिखाया, बल्कि बेटे की तरह पाल-पोस कर उन्हें संस्कार दिए। उसे बड़ा होते देख तंबोरा देवी फूली न समाती। उसे देखते ही उसके पेट में ऐंठन सी महसूस होने लग जाती थी। अजीब सा लगाव होता जा रहा था, जैसे वह उसकी ही माँ हो। जब वह अलीगढ़ जाने वाला था और तम्बोरा देवी उसे सी-आफ करने सिधौली के स्टेशन पर गई हुई थीं तब वह बहुत भावुक होने लगी थीं। वह उसे अपलक देखती रहना चाहती थीं, लेकिन आँखें डबडबा जाती थीं। तभी वह समय भी आया जब अत्यंत भावुक होकर वह एकाएक असलम खान को सीने से लगाकर रो पड़ीं। असलम ख़ान ने उन्हें बहुत समझाया, परिपक्वता का प्रदर्शन कर उन्हें रोका नहीं, रोने दिया। हालांकि इस संवेदनशील वातावरण में वह स्वयं भी बहुत भावुक हो गया था। उसने कहा, "माँ, बस मेरे लिए दुआ कीजियेगा। यह न कहिएगा कि हम आईएएस बने,.आईपीएस बनें.और फिर बाद में फेल हो जाएं, जैसे भाई.....।” उसने हंसने का भी प्रयास किया ताकि मैडम का मन हल्का हो जाए लेकिन.... 'मम्मा! मैं जल्दी मिलने आऊँगा।” “असलम, आपने अभी क्या कहा? फिर से कहिए.....!” “कुछ ग़लत..... कह गया क्या मैं ?” देवी भरभराकर रो पड़ी थीं,” आपने हमें माँ कहा, ममा कहा?” “कह दीजिए कि नहीं हैं! जो हैं वही तो मुंह से निकला। अम्मी ने जन्म दिया ममा, लेकिन आपने तो पैरों पर खड़ा कर दिया, बोलना सिखा दिया, बता दिया कि दुनिया से कैसे टक्कर लें। आप माँ नहीं तो क्या हैं आप मेरी माँ ही रहेंगी। अम्मी अपनी जगह पर हैँ, आप अपनी जगह पर, अब जाएं?” “कहिए जल्दी आएंगे!” उस दिन असलम ने तंबोरा देवी की दोनों आँखों को चूमा था और अपनी भावुकता को काबू कर ट्रेन में बैठ गया था। लेकिन उसके जीवन के हर क्षण अविस्मरणीय थे। तंबोरा देवी ने तो देर तक आँखें ही नहीं खोलीं थीं कि कहीं असलम आँखों से ओझल न हो जाए लेकिन अंततः ट्रेन की सींटी ने तंबोरा देवी को आँखें खोलने पर मजबूर कर दिया था। मुक़ीमपुर में जहां ज़मीनें थीं, वहाँ की देख-रेख बंदे हसन के बूढ़े पिता सलीम मियां के ज़िम्मे थी। उनके लिए मुकीमपुर में सैय्यदों के पुरखों का बड़ा सा पैतृक मकान था और हरवाहा घसीटे का परिवार भी उसी मकान में रहता था। घसीटे ही तमाम खेतों की देख-रेख करता था। उसके दोनों बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और सभी तरह के खर्चों की जिम्मेदारी मुनीरा बेगम उठाती थीं। वह चाहती थीं कि सभी बच्चे ऊंची शिक्षा प्राप्त करें, इनमें कोई भेद नजर न आए। पढ़ाई जरूरी है। व्यवस्था कभी नहीं चाहेगी कि ग़रीबों के बच्चे उन इंसटीट्यूशन्स में शिक्षा ग्रहण करें जिसमें एलीट अपने भविष्य का निर्माण करते हैं। देश के निर्माण के लिए इस तरह की कमजोर दीवार गिरनी ही चाहिए। समान शिक्षा, समान विकास, समान सुविधाएं, समान आर्थिक, सामाजिक और भविष्य। यही सोच देश को महान बनाती है लेकिन रास्ते इतने आसान नहीं हैं। समान सामाजिक विकास को नए सिरे से परिभाषित किया जाना जरूरी है ताकि ग़रीबी-अमीरी का अंतर जन्म ही न ले सके। ज़रीना बेगम अर्थात छोटी-बी ने बाड़ी को तो तब छोड़ा जब उनके पास एक संदेश आया कि बीबी 'सैय्यद-बाड़े' में अब आप जितने भी लोग बचे हैं, उसे छोड़ दें, हम सबकी आँखों में आपकी हवेलियाँ और आपके रहन-सहन और आपकी बोली चुभती है। इसमें हम अपने अपमान को महसूस करते हैं कि हम अपने ही देश में अब भी मुग़लों के ग़ुलाम हैं। आप बुरे नहीं हो, किन्तु हम भी अच्छे नहीं हैं। आँखों में अपकी भाषा और अभिजात-संस्कृति चुभती है। क्योंकि हमारे पास बहुत बड़ा दिल नहीं है, न ही समय है। समय तेजी से गुजर रहा है। इसी 'समय' के बीच हम अपने गली-गलियारे शुद्ध करेंगे, कसाई-बाड़े को रसोई तक नहीं पहुँचने देंगे। दुर्भाग्य से यदि कल हमारी किसी विद्रोही बेटी ने आपके युवराज को पसंद कर लिया या हमारे बेटे ने हमारी माई की रसोई में आपकी बेटी की महावर को पहुँचा दिया तो बाड़ी की शांति भंग हो जाएगी। यहाँ कभी बड़े दंगे नहीं हुए हैं, यदि हाथ ग़लती से भी खुल गए तो यहाँ की पुरानी मस्जिद भी नहीं रह पाएगी और न ही सैय्यद-बाड़े के खंडहर। यदि ऐसा हुआ तो यहाँ एक बड़े मंदिर की नीव जरूर पड़ जाएगी। अब फैसला आपके हाथ में है....।’ संदेश ने ज़रीना बेगम के होश उड़ाकर रख दिए। वह पसीने से नहा सी गईं। चक्कर आए और धम्म से फर्श पर गिर पड़ीं। ज़माना कितनी तेजी से आगे निकल गया है। कितनी जल्दी हम अपनों से दूर किए जा रहे हैं। कितनी गुइयाँ थीं हमारी जो हवेलियों के आँगनों में खेला करती थीं, ईद, बक़रीद, होली-दिवाली, सब साथ मनाते थे, हर रंग में हमारे बदन रंग जाते थे, हम कहीं भी जाते, हमारी आँखेँ वहीं रह जाती थीं। शादी के बाद भी वर्षों तक वह वहीं तो रहती रहीं। असलम स्थानीय लोगों से गहरे तक जुड़ने लगा था। तंबोरा देवी को यह पसंद नहीं था। वह जानती थीं कि आने वाला समय बहुत अच्छा नहीं होगा। आजादी के बाद से सुनियोजित ढंग से मुसलमानों पर अंकुश लगाए जाने लगे थे। उनके लिए अच्छी नौकरियां नहीं मिलने जा रही हैं। बच्चे पाकिस्तान जाना पसंद नहीं करते थे, दंगों की आग कहीं भी और कभी भी भड़क जाती थी। मुसलमानों के लिए अब न विधान सभा में जगहें थीं, और न ही लोक सभा में। लोकतंत्र अब उनका नहीं रहा था। कोई भी आगे बढ़ना चाहता तो उसे गुंडे-मावाली लीनचिंग की आँड़ लेकर मार देते, जीवित रहते तो सियासत उन्हें आर्थिक रूप से पीछे धकेल देती, बैंक लोन नहीं देते, पड़ोसी कॉलोनी में मकान खरीदने नहीं देते, बच्चों को पार्क में खेलने नहीं दिया जाता, हर शनिवार-रविवार शाखा के बंदे बच्चों में आकर उनमें धीमा जहर भर देते, नान-मुस्लिम बच्चे से दूसरा बच्चा पूछता,’तू मुसलमान है?” मुसलमानों का बच्चा अपने मां बाप से पूछता,” यह हिन्दू-मुसलमान क्या होता है?’ चिंतातुर भविष्य मुसलमानों से पूछता, भारत में उसके 25 करोड़ मुसलमानों का भविष्य अब कैसा होने जा रहा है? असलम ख़ान, अपने अभिन्न-मित्रों और साथियों के बीच सामाजिक व राजनीतिक व्यवहार से स्वयं ही अक्सर चिंतित हो जाते थे। अपने बदलते समाजीकरण के रहते पता नहीं उनके मस्तिष्क में कैसे-कैसे सवाल उठने लगते थे। क्या देवी मैम इतना नीचे उतर कर सोच सकती हैं? शायद नहीं, वह तो बेचारी अत्यंत भावुक होकर रो पड़ती हैं। वह तो मैम हैं, माँ से बढ़कर प्यार करती हैं। फिर, नफ़रत का ऐसा ज़हर कहाँ से आयात हो रहा है? क्या भाई जो बहुत योग्य समझे जाते हैं, उन्हें जानबूझकर सरकारी संस्थानों के साक्षात्कारों में फेल कर दिया जाता था? क्या उनका फ्रस्ट्रेशन भी यही रहा है? यह मानसिकता देश को कितना खोखला कर देगी। इससे तो देश से बाहर ही जाना बेहतर है। लेकिन क्या वहाँ कोई बेहतर व्यवस्था काम कर रही है? क्या वहाँ अतिवाद, अंधवाद और अधिनायकवाद नहीं है? कुरान तो वहाँ भी जला दिये जाते हैं? माँ, देवी मैम, खाला, बड़े भाई, दूसरे बहुत से अपनों को असलम क्या छोड़ सकेंगे ? भविष्य अंधेरे के गर्त में डूबता दिख रहा है । 56 मुस्लिम देश क्या एक ही बांसुरी बजाते हैं? क्या पाकिस्तान की मुस्लिम सरकार ने लाखों बांग्लादेशी मुसलमानों का कत्ल नहीं किया? क्या पाकिस्तान ने अपने दसियों हजार नागरिकों को प्रताड़ित कर जेलों में नही ठूंसा? हजारों-लाखों पख्तून युवक आज भी लापता हैं, बेगुनाह जेलों में हैं, बलात्कार, शारीरिक प्रताड़ना, बेगुनाह लोगों को दंडित करते रहना, चादर-चारदीवारी की पवित्रता को रौंदते रहना, क्या लाखों बेगुनाह अफ़ग़ानों और पख्तूनों का कत्ल पाकिस्तान के कथित स्याहपोश लोकतंत्र ने नहीं किया? वहाँ लोकतंत्र का उपहास नहीं उड़ाया? चुनाव में धांधली, बहुमत को सिरे से नकार कर भ्रष्ट नेताओं को सत्ता सौंप देना, पार्टी का झंडा छीन लेना क्या ये सब मानवीय उपक्रम हैं? ऐसा किस कानून में मान्य है? अलीगढ़ से असलम ने काफी रात को देवी मैम को फोन किया, वह अकस्मात हड़बड़ा गईं। इतनी रात को ? जवाब आया, “बस यूंही अपकी याद आ गई। पढ़ते-पढ़ते झपकी आ गई थी। सोचकर भी क्या करता ममा, पता नहीं इस डार्क-एज की क्या उम्र है? हर साथी भविष्य को लेकर परेशान है। मैं पहले ऐसा नहीं सोचता था मम्मा, अब सोचने लगा हूँ। दोस्त लोग अपने घर लखनऊ, बनारस, इलाहाबाद, अलीगढ़ दिल्ली और मुंबई जाते हैं। लौटकर वे भी अपनी कहानी सुनाते हैं, बड़े भाई शमशेर खान भी अक्सर बताया करते थे। अम्मी भी पुराने किस्से सुनाने लगती थीं कि सिर पर पिता का साया नहीं था। मुक़ीम पुर में खेती थी, उसे बटाई पर देदी जाती थी। यह सब तो मैं भी देखता था। मेरा भी मन होता था कि दोस्तों-रिश्तेदारों के पास इंग्लैंड, केलीफॉर्निया या ईरान या माल्टा या कर्बला चले जाएं, अपने बुजुर्गों की कब्रों से लिपट कर शिकायत करें कि आप लोगों ने अपनी नस्लों को यह कैसी उजड़ी हुई रियासत सौंपी है जो हमें चैन से मरने भी नही दे रही है। पर भाई ऐसे सवालों को जिंदा ही कहाँ रहने देते हैं। इसकी इजाज़त ही नहीं देते हैं कि हम अपनी आवाज बुलंद करें। हाँ! वह चाहते थे कि अलीगढ़ में पढ़ूँ, वहाँ से ला करूं , इधर-उधर भटकने से फायदा भी क्या है । मन को अकेला छोड़कर बस यही सोचने लग जाता था कि मां जो सोचती हैं, पता नहीं उसमें यथार्थ कितना है, अम्मी कुछ सोचती भी हैं या नही, ‘कहाँ जाएं माँ, बहुत डिप्रेशन में जी रहा हूँ मैं..।’ ’बड़ी खाला यानि मुनीरा बेगम ने तो रास्ता पहले ही निकाल दिया था, ‘अलीगढ़ जाओ। शराफत यार ख़ान भी तो वहीं के पढ़े हुए हैं। सरकारी नौकरी में भी आ चुके हैं। छोटी खाला जरीना बेगम से कहा, ‘क्या है, वह लखनऊ में हमारे साथ रहेगी। जब बाड़ी जाने का मन होगा, चली जाएंगी, नहीं तो अपनी बाजी के साथ तो हैं ही। ‘सुझाव ग़लत नहीं हैं। मैं तो एएमयू से कहीं जाने वाला नहीं हूँ। वहीं पढ़ूँगा, ट्रेन से आता-जाता रहूँगा.....।’ शराफत यार खान के पास रिहाईश के नाम पर रेलवे कॉलोनी में एक सरकारी बंगला है। बड़े से बाग में आड़ू, जामुन, आम, अनार, कैथा, इमली शहतूत और अमरूद के अनेक बड़े और पुराने वृक्ष हैं। उनमें बैठने के लिए लोहे की बेंचें हैं और वर्क-आउट के यंत्र भी। सूरज निकलने से पहले ही परिंदों के शोर के साथ ही बाग में चहल-पहल शुरू हो जाती है। इस ग़ैर-सार्वजनिक पार्क के द्वार उन्हीं स्थानीय सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों और स्कूल-कालेज के बच्चों के लिए अधिकृत रूप से खोले जाते हैं जो इसकी सदस्यता लिए हुए होते हैं। ग़ैर रेलवे कर्मचारियों के लिए अधिकृत टिकेट खरीदकर प्रवेश करना होता है। सुबह होते ही लोग स्वीमिंग-पूल और जिम में आने लगते हैं। बैठने और टहलने के लिए नर्म, खुशबूदार फूलों से लदा हुआ घास का फर्श है जिसपर कॉलोनी के बच्चे, जवान, लड़कियां बड़ी-बूढ़ी स्त्रियां और बच्चे आदि सभी लोग एक-दूसरे के साथ दौड़ते-भागते, उठते-बैठते और खेलते-कूदते नजर आते हैं। लेकिन अब सबको मास्क लगाना आवश्यक हो गया है। हो सकता है पार्क की एक्टिविटी पर भी निकट भविष्य में अनुशासनात्मक पाबंदियाँ लगा दी जाएं। शराफत यार खान अपने बंगले में बंदे हसन के साथ रहते हैं। बंदे हसन को मूलतः उनके पारिवारका खादिम समझा जा सकता है। शराफत यार खान की अभी शादी नहीं हुई है। उनकी माता जी को अधिकतर लोग बाजी बेगम कहकर संबोधित करते हैं। वह एक समाजसेवी महिला हैं। उत्तर प्रदेश की अनेक महिला स्वयं सेवी सामाजिक संस्थाओं और उनसे संबंधित अनेक विकास समितियों से जुड़ी रहती हैं। समाज में उनका काफी मान-सम्मान है और सियासत में सदैव उन पर दबाव बना रहता है कि वह भारतीय मुस्लिम महिला समाज और उनकी विभिन्न समितियों के कल्याण के लिये राजनीति में प्रवेश करें, शोषित, पीड़ित और रोजगार से त्रस्त महिलाओं का विकास करें, उनकी बदहाली पर हूकूमत के एवानों में फ़रियाद ले जाएं, सत्ता-पक्ष को दिखाएं कि वही मुस्लिम पिछड़े वर्गों की महिलाएं किन परिस्थितियों में जीती हैं और उन पर किस प्रकार का अत्याचार किया जाता है। चाहे महिलाओं का शारीरिक शोषण हो या हिंसा। उनके विचार से महिलाओं की समस्याएं हिन्दू-मुस्लिम खानों में बँटी हुई ही नहीं हाँ। लेकिन बाजी बेगम को राजनीति से कोई लगाव नहीं था। हाँ! वह चाहती जरूर है कि ग़रीब बच्चे स्कूलों में जाकर पढ़ें, उन्हें पौष्टिक भोजन मिले और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं प्राप्त हों और राशन के लिए उन्हें लाईन न लगानी पड़े, न ही उनके बच्चे भूख-प्यास के लिए भिखारी बनें। निश्चय ही वह अपने प्रदेश की एक जानी-मानी सोशल-एक्टिविस्ट हैं जिनकी पूरे सीतापुर में न केवल इज्जत है बल्कि जिले भर में महिलाओं के अधिकार की उनकी लड़ाई किसी से भी छुपी हुई नहीं है। परिवार में वह अपने पुत्र और भांजे को बहुत प्यार करती हैं, चाहती हैं कि शराफत यार खां की अब शादी हो लेकिन साहब बहादुर इस डर से शादी नहीं करते हैं कि कहीं अम्मी तन्हा न रह जाएं। वह अपनी माँ से बहुत प्यार करते हैं और अम्मी सारी कायनात से मोहब्बत करती हैं। इन दिनों महमूदाबाद में जिला महिला समिति का तीन दिवसीय वार्षिक सम्मेलन में वह अपने घर लखनऊ से चलकर थाना हरगाँव के पुराने जमींदार के वंशज नवाब पीरज़ादा नसरुद्दीन जलाली नक़्शबंदी की पौत्र बहु बेगम सुल्ताना खुरासानी के टीले वाली हवेली में अवस्थित हैं। सूचना है कि अब वह वार्षिक सम्मेलन की समाप्ति पर इसी सप्ताह सिधौली पहुंचने वाली हैं। हाथ में लंबी टॉर्च लिए हुए जब लाइनमैन बहुआ बेहुरा बंगले पर आया तो बंदे हसन ने अकारण हँसते हुए उसने व्यंग्य की मुद्रा में कहा, “देर से बैठी हैं, उन्हें भी उनसे मिलने का इंतजार है। आए हो तो पूछे लेते हैं, चाय पियोगे? माई से भी पूछ के अत हूँ... .......?” ‘इतना गरमा दियो है त चा काहे छोड़ देब। पीयब! और जरूर पियाब….” बहुआ बेहुरा कंधे पर अँगौछा डालकर बाहर लान की तरफ निकल गया, लेकिन वह फिर लौट आया और किचिन में ही चाय के सुड़के लगता हुआ बातों में व्यस्त हो गया। “बंदे भैया, बाग में फल-फलारी बहुत उतरत है। कच्चे अमरूद बच्चा लोग पत्थर फेंक-फेंक कर सब बेकार किए दे रहे हैं। थोड़ा, ध्यान देव। ! तो सो रही होंगी ? बंगले का रंग-रोगन होना है। साहब को बोल देना। बड़े साब तो अब उसमें आवेंगे नहीं! वह तो ‘परमोसन’ के बाद सीतापुर चले गए। बंगले में तो अब साहब को ही रहना है। ऊपर मियां जी, मेरा मतलब बड़े बाबू जी शिफ्ट भी हो चुके हैं। आँगन में जामुन और आम बहुत उतरत है,साहब जी को बता देना ।” इसी समय बांस फटकाती हुई शबनम माई वरांडे की ओर आकर गिलास चौखट पर रखकर बांस को खड़काया,‘बेहुआ बेहुरा खड़ा है, इसे काम-धाम की जरूरत तो है नहीं,बस, बाग़ के फल चाहिए। क्यों है ना.? बेहुआ बेहुरा ने एक नजर शबनम पर डाली, नाराजगी की तेवरियाँ स्वतः ही तन गईं, फिर निगाह सामने से आ रहे शराफत यार खां के चेहरे पर जा टिकीं लेकिन सतर्क होकर उसने अपनी बातें जारी रखीं, कहा “मैं तो पहले वाले साहब जी की मालकिन ठकुराइन बीवी से अनार ले जाता था। घर वाली बीमार रहती है ना! आड़ू को तो बच्चा लोग कच्चा -पक्का ही तोड़ लेते हैं ... । बस, इस बार पपीता और आम अच्छा उतरेगा। एक-एक नग ढाई-ढाई सौ ग्राम सोने जैसा है, खाद-पानी खूब डालता हूँ साहब जी !” शराफत यार खां वरांडे में बिछी ईज़ी चेयर पर जाकर बैठ जाते हैं,”शबनम जी, मैं अपकी ही डायरी पढ़ रहा था। आप तो बहुत अच्छा लिखती रही हैं। अब तो....!” “जी साब, बस यूं ही कभी-कभार लिख लेती थी, डायरी की तरह। अब तो आवाजों के सहारे दुनिया को देखना पड़ता है, फिर वह हादसा भी हो गया.... और..... “क्या हो गया था शबनम जी.... ?” इसी समय मालगाड़ी का एंजिन धमाके के साथ बोगी से आार जुड़ गया था। कोयले के एंजिन की धधड़ाहट से सारी कालों थरथर उठी थी। कई कई परिंदे चीखते हुए बाग से बाहर निकल गए। फिर किसी ट्रेन को लेकर स्टेशन से ख़ान को फोन आने लगे। ट्रेनों का सिलसिला सा शुरू गया था। शराफत यार खां आराम की मुद्रा में थे लेकिन लगातार मोबाइल से असलम भी अपने और बेगम बाजी के सिधौली पहुँचने के संदेश दे रहा था, कह रही थीं। बंदे भाई, शबनम बीबी को डॉक्टर नागर के पास ले जा कर इनका चेकअप करवा दीजिए। इनका लंच भी साथ ले लीजिएगा। आज डॉक्टर से उनका चेकअप जरूरी है। जी, शबनम जी। और कुछ.....। । शबनम.... ।” इसी समय मोबाइल से पता चला कि क्रूज-रेंजर कॉलोनी के गेट से अंदर आ चुकी है।‘माई-गेट’ ऐप ने बताया कि मम्मी जी पहुंच चुकी हैं। गेट की ओर खुलने वाली खिड़की से कौसर ने देखा, बड़बड़ाई, मम्मी जी, असलम, मेरी जान, ये.. ये यह... यह लड़की कौन है? और हाँ, यह एंटी जी....” बस इतना देखते ही कौसर सीढ़ियों की तरफ दौड़ पड़ी । सीढ़ियाँ उतरकर वह जैसे ही वह बग़ल वाले गेट की ओर मुड़ी कि बेगम सुल्ताना खुरासानी से जबरदस्त टक्कर हो गई। “ ऐ वक्त की मारी मुई मुरदार, मुझसे ही टकराना था। जनमजली, आँखें पटम हो गईं क्या?” बेगम सुल्ताना खुरासानी गिरते गिरते बचीं। यदि असलम बेगम साहिबा को पीछे से न संभाल लेता तो कयामत दूर न रह पाती । बेगम साहिबा बहुत गुस्से में नजर आ रही थीं, “खुदा की मार हो, ऐसी जवानी किस काम की, न तन का होश, न मन का होश..। मोटापा ऐसा कि ट्रक भी चूर-चूर हो जाए....चलो बेटा, अंदर....चलें। सैंडिल का तला ही तोड़ डाला है, कंबखातमारी ने। जरा मुझे बटन, कौन थी वह.... ऐसी कंबख्तियों को लड़के भी कहाँ से मिलते होंगे। चलिए असलम, अंदर चलिए। “ बेहूरा और बंदे हसन चाय छोड़कर बाहर की तरफ आ गए थे। सबको सामान उठाकर अंदर ले जाने की जल्दी थी। शबनम ने ऐसी गाली-गलौज देखकर यहाँ से निकल लेना ही बेहतर समझा और बांस के बेद को खड़खड़ाती हुई वह रेंगती हुई वहाँ से बाहर निकल गई।

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