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पीछे से आगे .....2
“हाँ !” शराफत यार खां ने अपने ईज़ी-चेयर से उठते हुए बंदे हसन से कहा, तुम बाहर मत जाओ। चाय मेरे कमरे में पहुँचा दो। हमारे ये पेपर्स, डायरी और पेन वग़ैरह स्टडी में रख देना।.... और हाँ! मिसेज शबनम, कल संडे को बैठते हैं। आपकी कहानी पर मैं उपन्यास ज़रूर लिखूँगा। हालांकि यह मेरी फील्ड नहीं है। वेरी थीम फुल, कल मिलते हैं। मम्मी भी आ चुकी हैं। हाँ, बंगले के रिनोवेशन की बात तो रह ही गई।” शराफत यार ख़ान थके हुए स्वर में बड़बड़ाए ,“बेहुला भी भाग गया, कल ऑफिस-आवर्स में बड़े बाबू से कहूँगा, ऐड्मिन की फ़ाइल पुटअप करें ।”
शबनम ने गर्दन को सीधी कर ढके हुए चेहरे को आकाश की ओर किया फिर गर्दन झुकाए हुए कहा, “मैं तो साहब आपके पास इसलिए आई थी कि अगर आप बड़े अस्पताल के डॉक्टर बाबू से सिफारिश कर देंगे तो मैं किडनी का इलाज उन्हीं से करवा लूँगी। दाईं तरफ के गुर्दे में अक्सर दर्द रहने लगा है। आप कहें तो मैं बाद में आ जाऊं। मुझे तो बहुत अच्छा लगा था जब आपने कहा था कि मैं तुम्हारी ज़िंदगी की कहानी लिखना चाहता हूँ। सर जी, मेरे शौहर डॉक्टर शाहिद भी आर्टिकल्स लिखते थे। वह भी मुझ पर लिखना चाहते थे लेकिन... हर कुएं से पानी नहीं निकलता है सर जी।आँख, आधे जिस्म का हिस्सा तो है लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर कान अच्छा सुनने की सलाहियत भी रखे। कलम में बहुत ताकत होती है मगर हर कलम आयत नहीं लिख सकती सर जी । आपने मेरे लिए कलम उठाया है, मेरे लिए मेरी उम्र का यह सबसे बड़ा इनाम है। मैं इसे हमेशा अहसान की शक्ल में याद रखूंगी। शायद इस उपकार का कोई बदल न हो, लेकिन यह उपकार एक क़र्ज़ के रूप में मेरे पास रहेगा। आप जरूर लिखिए सर जी, मैं अपनी ज़िंदगी का हर राज़ ईमानदारी से आप पर खोलकर रख दूँगी, कुछ भी नहीं छुपाऊंगी ...जब बहुत काफी समय हो तो आप बेझिझक मुझे आदेश देकर बुला लीजिएगा, मैं आ जाऊँगी। ग़रीब का व्यक्त उसकी तकदीर से तय होता है। क्या कोई तकदीर बदल सकता है। जो मेरे भाग्य में है वही मेरा वक्त है।”
“ओ हो..... फिल्मी डायलॉग।” असलम ने कॉफी का प्याला लिया और उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा,“अभी मैं इमोशनल नहीं होना चाहता, हमें लगता है, मामला कुछ गंभीर है। हम टेनिस कोर्ट की तरफ जा रहे हैं हसन चा।” साथ ही कान के पास मुंह लाकर फुसफुसाते हुए कहा,“अगर इस बीच मेरी ‘डबल रोटी ’ आ जाए तो बता दीजिएगा कि हम रेलवे-क्लब में हैं।...ओके।” कहकर वह बाहर निकल गया।
लेकिन शराफत यार ख़ान लान में ही बैठे शबनम की आपबीती सुन रहे थे । एक शौकिया लेखक होने के नाते उन्होंने तय कर लिया था कि वह शबनम के जीवन पर आधारित एक डायरी या उसकी जीवनी पर आधारित कहानी जरूर तहरीर करेंगे । उस रात उन्होंने फिर से टैब ऑन किया और लिखने बैठ गए..... मैं अपने आपसे पूछता हूँ कि शबनम की अंधेरी रात कभी समाप्त होगी भी या नहीं?
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“बहुत अच्छा लगा साहब जी...... आपसे मिलने की बहुत दिनों से कोशिश कर रही थी। आप तो मेरी सोच से भी बहुत आगे के इंसान निकले। मैं आपको बताऊं सर जी, जब मैं छोटी थी तब कुछ न कुछ लिखा करती थी। चाक से लकीरें खींचती रहती थी पर उन बेनामों को कभी कोई नाम नहीं दे पाती थी। आप मुझ पर किताब लिखेंगे, यह तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था। थैंक यू सर......!”
इसी बीच ड्यूटी गार्ड ने पार्क में आकर इत्तिला दी कि कोई दो आदमी शबनम माई से मिलने की राह देख रहे हैं। शबनम घबराकर खड़ी हो गई, “कककौन, कौन....?” उसने अपनी छड़ी इधर-उधर लहराई, “कौन हैं वो... ?” बहुआ बेहुरा ने पता कर सूचना दी, कोई कायमगंज के मोहिउद्दीन अंसारी और मथुरा के रिटायर्ड दरोगा चमन लाल पासी हैं। गार्ड ने कॉलोनी के अंदर आने की ‘परमिशन’ नहीं दी।
“ठीक है, बेहुआ तुम साथ जाओ। इन्हें अकेले न छोड़ना।” शराफत यार ने कहा,” पता करो, क्या बात है। असलम भी शायद आज अलीगढ़ जाने वाले हैं। कितने दिनों से वह यूनिवर्सिटी भी नहीं गए हैं। कोविड के इस माहौल में हम नहीं चाहते कि अम्मी और खाला वग़ैरह घर से बाहर जाएं । असलम को भी वैसे रुक जाना चाहिए क्योंकि यूनिवर्सिटी को भी कोविड में बंद किया जा सकता है। लाक- डाउन तो सारी दुनियाँ में लागू हो चुका है। हमारे यहाँ भी होगा....। अम्मी और खाला को अब यही रुकना होगा। ठीक है, ओके....।”
इसी बीच मालगाड़ी के गुजरने का शोर देर तक वातावरण में गूँजता रहा ।
शबनम का शादी से पहले का नाम गुलफ़िशा था। गुलफ़िशा को उसके अपने क़ौल-कबीले के लोग गुल के नाम से भी पुकारते थे। उसके पिता जद्दन बाई के कोठे पर तबला वादक उस्ताद कल्लन खाँ के शिष्य अल्लाह रक्खे नाम से जाने जाते थे लेकिन शराब उनकी कमजोरी बन चुकी थी। जानकार बताते हैं कि जद्दन बाई एक अनुभवी और दूर-दृष्टि रखने वाली चतुर कोठेवाली थी। बड़े घरानों में उसकी आसान घुसपैठ थी। जद्दन बाई उस दिन से गुलफ़िशा पर नजर रखने लगी थी जिस दिन वह स्कूल से छुट्टी कर माँ की तलाश में जद्दन बाई के कोठे तक की सीढ़ियाँ तय कर बेझिझक उनकी मसनद पर बिना अनुमति के बैठ गई थी। तब सबकी सांसें अटककर रह गई थीं। हाय, जद्दन बाई की वारिस ?
लेकिन कच्ची मिट्टी का वह सुंदर घड़ा उस दिन घड़ौंची से लुढ़क कर अचानक टूट गया जब जद्दन बाई के कान में वहाँ के दलाल मोहिउद्दीन ने यह खबर पहुंचाई कि इस इलाके की चमेली पर मुहल्ले के माफिया भाई ननकू शाह दीनू भाई मारवाड़ी की पैनी नजर है और वह गुलफ़िशा को दिल से अपनी बहू-बेगम बना चुके हैं और वह देख भी चुके हैं कि उनका फ़ारेन-रिटर्न डॉक्टर का बेटा जिस लड़की से शादी करना चाहता है, उसे वह अच्छी तरह से पसंद कर चुके है। वह, गुलफ़िशा के ऐसे हर शो में जाते रहते हैं जिसमें वह भाग लेने जाया करती है।
गुलफ़िशा के पास सब कुछ था लेकिन दो चीजें नहीं थी। एक- माँ, जो बीमार रहती थी और वह हर नए दिन शरीर से कमजोर होती जा रही थी और दूसरा- ‘गुल’ का सौतेला बाप, जो शराब के नशे में अपनी ही बेटी के साथ शारीरिक संबंध बनाने पर तुला रहता था। शराब के नशे ने गुलफ़िशा ही से उसका पिता उससे छीन लिया था। वह उसकी बीमार माँ को बांधकर इतना मारता था कि उसकी सांसें टूटने लग जाती थीं। वह उसका दूसरा गुर्दा भी बेच देने की धमकी देता रहता था। वह चाहता था कि गुलफ़िशा को वह अच्छी कीमत पर फरोख्त करे लेकिन कथित डॉन का भय उससे यह काम नहीं करा पाता था। यह भय था कथित डॉन माफिया भाई ननकू शाह प्रदीप शाह मारवाड़ी का जिसका डॉक्टर बेटा गुलफ़िशा को दिल दे बैठा था।
उधर शराबनोशी ने ही गुलफ़िशा की माँ मलाई बेगम की भी दाईं किडनी को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया था। रईसों की टोली के किसी एक रईस ने सुझाव दिया कि भाई ननकू शाह प्रदीप शाह मारवाड़ी से क्यों नहीं करवाते? वह तो किडनी विशेषज्ञ है। विदेशों तक में मशहूर हैं। उनके पिता के चेले-चपाटों की निगरानी में डॉक्टर अब्दुल शाहिद एण्ड ऐंगिल फार्मा में दिखाने भी ले गए, लेकिन....... ।
डॉक्टर अब्दुल शाहिद मारवाड़ी परिवार से था लेकिन उसका पिता पैसे को दांत से पकड़ता था। उसने पुत्र पर भी पैसा इस लिए लगाया था ताकि शाहिद का विवाह किसी बड़े ताजिर की लड़की से हो और उसके घर धन की वर्षा हो लेकिन असली जीवन में ऐसा कुछ नहीं हो सका। तब शाहिद का पिता भी नहीं जनता था कि उसके पुत्र के दिमाग़ में कौन सी खिचड़ी पक रही है। वह तो दिन-रात दुनिया के एक बड़े बाजार पर कब्जा कर लेने के स्वप्न देखा करता था। विकसित देशों के व्यापार पर हुक्मरानी करना यद्यपि आसान नहीं है, फिर भी उसके अनुसार असंभव भी नहीं है।
वार्ड नंबर 12 के पेशेंट का नाम सतीश चंद्र नायक था। उसे मृत्यु से डर लगता था, लेकिन उसका डायलिसिस यहीं के ऑपरेशन थियेटर में हुआ था। सतीश चंद्र नायक ने एक बार गिड़गिड़ाते हए कहा था डॉक्टर शाहिद से कहा था,”म्हारे को इस पीड़ा से यदि तू मुक्त कर दे, ते मैं थारे को पूरा अस्पताल बनवाके गिफ्ट कर देवांगे .....।”
गुलफ़िशा जब घर से अस्पताल लौटी तो वह जान गई कि उसका दिल उसके पास से अब जा चुका है। यह लगाव और तड़प गुलफ़िशा की धड़कनों की परिचायक है। दिल से कहूँ तो यह उसकी पहली पाकीज़ा मुहब्बत थी जिसने उसे रात भर सोने नहीं दिया था । मां ने पूछा भी था, “रात भर नहीं सोई। कहीं यह दिल.........?”
स्वभावतः मुंह से सच बाहर आ गया, “ मुझे लगता है माँ, मैं बड़ी हो गई हूँ। अपने फैसले मैं खुद ले सकती हूँ। उसने भारी आवाज में कहा, ”मैं तेरे दलाल शौहर को एक दिन जरूर मार डालूंगी।’ गुलफ़िशा ने माँ को आगाह किया,’अपने सौतेले पति को समझा दे माँ कि वह एक वहशी दरिंदा जानवर है, वह बेरहमी से तेरे सिर के बाल पकड़कर तुझे खींचता है, मारता है और मैं यह सब नहीं देख सकती। शराब पीकर तेरे साथ बलात्कार करता है। वह तुझ पर दबाव डालता है कि मैं उसके साथ हर रात सोऊँ। यह कैसा बाप है माँ?” उसने घृणा से एक ओर थूकते हुए कहा, “मेरा असली बाप तो ऐसा कभी नहीं था। वह तो भूख-प्यास में भी हमारा था, हमारी माँ का शौहर था, जो अपनी बेटी को बाजार में बेचने का कभी ख्वाब तक नहीं देखना पसंद कर सकता था। लेकिन यह तो मुझे सीने से लगाकर अपने पास रातों को सुलाना चाहता है और सेक्स की मंडी में मेरा जिस्म बेचते रहना चाहता है। अब यह सब नहीं चल पाएगा माँ ।’
“चुप, हरामजादी कुतिया!’ अचानक बैक रूम का पर्दा उठाकर मुहिउद्दीन अपने तहबंद की गांठ लगाता हुआ कमरे में प्रविष्ट हुआ। वह दांत किटकिटाते हुए गुर्राया, उसने एक हाथ में छुरा पकड़ रखा था “बहुत बोलने लगी है। अभी तो मैंने तेरी मां का एक ही गुर्दा बेचा है, चीखी चिल्लाई तो दूसरा गुर्दा भी सचमुच शरीर से निकालकर अल्लाह को प्यारा कर दूंगा और तेरे पिंजर तक को बाजार में बेच दूंगा। मत मुझसे टकरा ! मैं बहुत खतरनाक आदमी हूँ....कह देता हूँ। यह मत समझ कि मैं पाशा भाई से डर जाऊंगा।” वह चीखता-चिल्लाता भीड़ को चीरता हुआ आँखों से ओझल हो गया।
किसी ने पुलिस को 100 नंबर पर कॉल कर दी थी। वैन आई, पूछताछ की और रूटीन की औचरिकताएं दर्ज कर ट्रैफिक के रास्ते साफ कर दिए। लेकिन किसी ने यह खबर जरूर फैला दी कि मोहिउद्दीन गिरफ्तार हो गया है और वह पुलिस के संरक्षण में अस्पताल में दाखिल है। दिल गुदाज़ ने अपनी ज़िंदगी में पहली बार ऐसे हिंसक दृश्य का सामना किया था लेकिन वह डरी नहीं थी। जब उसने सारा किस्सा डॉक्टर अब्दुल शाहिद को सुनाया तो उसने तुरंत गुलफ़िशा के घर पर प्राइवेट सिक्योरिटी लगा दी और जब उसके तस्कर पिता को इसका इल्म हुआ तो उसने मुहिउद्दीन गैंग के कई गुंडों को उनके घरों से ही उठवा लिया।
इसमें एक पात्र देर से जरूर आया लेकिन आया तो दिखता चला गया, वह था लंगड़ा तैमूर। उसने दूर से देखा कि उसकी गुलफ़िशा की जन्नतकदा में भीड़ है, पुलिस है, मूहिउद्दीन की चीखें हैं तो वह अपनी बैसाखी को ऐसे उठाने रखने लगा जैसे वह डल झील में अपने पिता के शिकारे को पानी में तैरा रहा हो। वह भीड़ को चीरता हुआ अंदर आया और दहाड़ने लगा, “रुक साले! कहाँ है तू, भड़वे के घूरे की सड़ी हुई खाद के कीड़े, तेरे ही छुरे से अपुन तेरा ही काम तमाम किए देता है । ठहर ...।”
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