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गुरुवार, 21 सितंबर 2017

ग्रन्थ/प्रेमचंद-साहित्य : नव-मूल्यांकन--04/ डॉ. रंजन ज़ैदी

ग्रन्थ/ प्रेमचंद-साहित्य : नव-मूल्यांकन--04/ डॉ. रंजन ज़ैदी
डॉ. रंजन ज़ैदी  : लेखक 
 प्रेमचंद पर विरोधियों  का आरोप था कि वह प्रोपेगंडा वृत्ति के साहित्यकार हैं.  मुसलमानों के लिए उनके दिल में  बहुत  जगह और  सम्मान है. उनके प्रति  सहानुभूति है. जबकि प्रेमचंद-साहित्य   ब्राह्महण देवी-देवताओं  की अक्सर  निंदा करते  रहते हैं.  उनके साहित्य  से साम्प्रदायिकता  का लावा उबलता रहता है. इससे  वर्गीय कट्टरतावाद  को बढ़ावा मिलता  है.*

   ऐसी  शिकायतें मूलतः वैष्णववादी आलोचकों को अधिक रहती थीं.  है. ऐसी खींचतान  और आरोप-प्रत्यारोप  उर्दू  साहित्य के आलोचकों के बीच के  एक वर्ग  की भी रही है.  इनमें एक वर्ग मार्क्सवादियों का भी था, जो अपने सिवा  किसी दूसरे वर्ग को प्रगतिशील विचारधारा का नहीं मानता  था. इसी तरह हिंदी में एक वर्ग संकीर्ण जातिवादी आलोचकों  का था.  प्रेमचंद को उस समय इस तरह के अनेक वर्गों  का सामना करना पड़ रहा  था।  इसके बावजूद कई वर्ग ऐसे थे जो उनकी विचारधारा के समर्थक भी थे और वाद-विवादों से मुक्त रहने में अपना भला भी देखते थे.  सुधारवादी विचारधारा का आलोचक वर्ग प्रेमचंद का  प्रशंसक  तो था किन्तु दूसरा वर्ग उन्हें युग का मसीहा समझने लग गया था.

     डॉ, नगेंद्र से जब मैंने कथाकार जगदीश चतुर्वेदी के घर पर  (हिंदी साहित्य के इतिहास का पुनर्मूल्यांकन पुनर्सम्पादन के कार्य के दौरान)  पूछा  कि क्या यह सही है कि वैष्णववादी आलोचकों में आप सहित पंडित रामकृष्ण शुक्ल 'शिलीमुख', ठाकुर श्रीनाथ सिंह पं. ज्योति प्रसाद  मिश्र  'निर्मल',  आचार्य नंददुलारे वाजपयी  जैसे प्रबुद्ध साहित्यकार शामिल थे?  उन्होंने कहा, 'तुम  डॉएहतिशाम  को भूल गए?  डॉ. एहतिशाम अहमद नदवी  नाम था उनका. वह तो  वैष्णववादी थे, फिर क्यों आलोचक थे?'

      मुझे पता  थाडॉ. नगेंद्र  प्रेमचंद के आलोचकों में माने जाते हैं. मैंने उनका एक निबंध प्रेमचंद : एक सर्वेक्षण  पढ़ा था. उसे डॉ.  मदान ने प्रेमचंद  प्रतिभा में प्रकाशित किया था. उस निबंध को पढ़कर मुझे लगा था कि प्रेमचंद  के  सम्बन्ध में उनकी स्थापना भ्रामक सी है. इस समय  भी उन्होंने  सम्बंधित विषय से किनारा काट लिया था. कुछ  इसी तरह वर्षों पहले डॉ. नामवर सिंह ने  मुझे जामिया मिलिया इस्लामिया में हिंदी प्रवक्ता पद के साक्षात्कार के समय हतप्रभ कर दिया था. एक दिन अपने ही चेंबर में उन्होंने  मुझे बताया  कि वह तो मुझे ही चाहते थे लेकिन  जामिया मिलिया का प्रशासन विभाग अड़ंगे डालने लगा था. मामला  शिया-सुन्नी का गया था. मैं नहीं जानता था कि यहां भी  नियुक्तियों में भेदभाव बरता जाता है. क्या ऐसा  भी होता है? सुनकर आश्चर्य हुआ था. मेरे  बड़े भाई वहीं  के छात्र रहे थे. मामू इतिहास के सीनियर प्रोफ़ेसर  हुआ करते थे. उनके  पुत्र  प्रोफ़ेसर मुशीरुलहसन तब ऐक्टिंग वीसी  थे.  उसी विश्वविद्यालय में तब हिंदी विभाग के हेड मुजीब रिज़वी (शिया) थे, पैनल में भी एक-दो शिया थे. यह दर्शन मेरी समझ में नहीं आया. बाद में अंदरखाने से निकली खबर से मालूम हुआ कि नियुक्ति नामवर सिंह  के भाई  काशीनाथ सिंह  के सिफारिशी  कैंडिडेट  की  हुई. डॉ. नामवर सिंह के विचारों से उगला  हुआ वह ज़हर मुझे आज तक  बेचैन रता रहता है.
      मनुष्य जब अपने किरदार, व्यवहार और अपनी योग्यता से बुलंदियां छूता है, तो देवताओं के भी सिंहासन  डोलने लगते हैं, वही मनुष्य जब गिरता है तो समाज की आँखों से भी गिर जाता है.  मनुष्य  तब बुलंदियों पर पहुँच जाने के उपरांत भी  न पूजा के  योग्य  रहता है और न ही नीचे गिर जाने पर  घृणा  के योग्य. प्रेमचंद  यह बात समझते थे. यदि वह ईमानदार न होते तो यथार्थवादी कथाकार भी नहीं हो सकते थे. यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ लोग इतिहास बनाते हैं, कुछ इतिहास पढ़ते हैं  लेकिन  ऐसे नायक समाज, देश  और दुनिया में फिर भी अलौकिक मानव  या देवता नहीं बन पाते  जिन्हें हम अपने समाज, देश और इतिहास में  किसी न किसी रूप में जन्म लेते और मरते देखते रहते हैं, सोचते हैं  इनमें अलौकिकता नज़र नहीं आती. इस सच्चाई से भी हम इंकार नहीं कर सकते कि सुनी हुई परंपरागत गाथा  को जब तुलसीदास रामचरित मानस में शब्दों से पिरीते हैं तो अलौकिक राम, लौकिक भगवान पुरुषोत्तम राम में परिवर्तित हो जाते हैं. ऐसे में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि  क़े किरदार सूरदास और कर्मभूमि के किरदार अमरकांत को आलोचक राष्ट्र-नायक कैसे  मान सकते थे. हाँ! मानते, यदि ये पात्र पौराणिक होते.
      बात समझ के दायरे में चुकी थी कि उपन्यास के माध्यम से प्रेमचंद के पात्र  आलोचकों की प्रकृति के अनुकूल नहीं हैं. इसलिए उन्होंने  पूस की रात में  हल्कू को खुले आकाश के नीचे  ला खड़ा किया. आलोचक  संवेदनशील हुए. होरी के प्रति सहानुभूति  दिखाई  किन्तु व्यवहार में वे उसकी मदद को नहीं आये. ही जी तोड़ मेहनत करने के बावजूद उसकी एक गाय की इच्छा को ही  वे पूरा कर सके. इसी तरह जाड़े  की  कड़कड़ाती सर्दी से खुद और जबरा को बचाने के लिए हल्कू एक कम्बल तक खरीद सका. हाँ!   लोगों को  हल्कू के जबरा कुत्ते से सहानुभूति अवश्य हुई क्योंकि वह जीवित था और नीलगायों के खेतों में घुसने पर भौंकने लगता था. उसे तो कोई भी ज़मींदार अपने खेतों की निगरानी के लिए रोटी के टुकड़ों पर रख सकता था, लेकिन हल्कू ?  वह तो मर चुका का था.

      कर्मभूमि के लिखने  तक प्रेमचंद समाज और समाजों की मानसिकता को पूरी तरह से समझ चुके थे.  वह  समझ चुके थे कि भारत का समाज सुविधा भोगी है. वह  दूसरों के पचड़ों में अपनी जान जोखिम में नहीं डालना चाहता है.. सोच के ऐसे ही विवर के बीच उन्हें ठाकुर श्रीनाथ सिंह का एक लेख पढ़ने को मिला, घृणा के प्रचारक प्रेमचंद।  दिसंबर 1933 (सरस्वती) के अंक में प्रेमचंद द्वारा लिखित कहानी सद्गति  की आलोचना की फुलझड़ियाँ छोड़ते हुए ठाकुर श्रीनाथ सिंह  ने प्रेमचंद पर आरोप लगाया था कि  यदि प्रेमचंद इस युग के प्रतिनिधि मान  लिए जाएँ तो अबसे 50 वर्ष बाद पाठक उनकी रचनाओं को पढ़कर 1932  के सामाजिक जीवन के बारे में क्या कहेंगे, यही कि उस समय हिन्दुओं खासकर ब्राहम्हणों का जीवन घृणा का जीवन था. वे  निंदनीय थे, ज़ालिम थे, निर्दयी थे, कट्टर थे, दयाहीन थे और पाखंडी भी.

      पं. ज्योति प्रसाद  मिश्र  'निर्मल' ने भी भारत  में एक लेख लिखा लेकिन आक्रमण कूटनीतिक था.  प्रेमचंद  चुप नहीं रहे, जवाब दिया,'हम कहते हैं कि यदि हममें इतनी शक्ति होती तो हम अपना सारा जीवन हिन्दू जाति को पुरोहितों, पुजारियों, पंडों और धर्मोपजीवी कीटाणुओं से मुक्त करने  में अर्पण कर देते। हिन्दू जाति का सबसे घृणित कोढ़, सबसे लज्जाजनक कलंक यही टके-पंथी दल हैं जो एक विशाल जोंक की तरह खून चूस रहा है. (अमृतराय, प्रेमचंद : क़लम का सिपाही, पृष्ठ : 530 -31 ) ग्रन्थ/प्रेमचंद-साहित्य : नव-मूल्यांकन--04/ डॉ. रंजन ज़ैदी_से साभार _________________________:-
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बुधवार, 13 सितंबर 2017

मुंशी प्रेमचंद : नव-मूल्यांकन--03/ डॉ. रंजन ज़ैदी

प्रकाश्य पुस्तक : 'काल-चक्र' की कड़ी -3  /डॉ. रंजन ज़ैदी
पुस्तक : काल-चक्र के लेखक: रंजन ज़ैदी 

      जैसा  कि  ऊपर कहा जा चुका है कि प्रेमचंद  का उपन्यास सुखदास  जार्ज इलियट के उपन्यास साइलस मार्नर का हिंदी रूपांतरण है लेकिन पढ़ने पर लगता है कि यह एक भारतीय परिदृश्य पर लिखी गई कृति है. बात यह है कि जार्ज इलियट और मुंशी प्रेमचंद  के व्यक्तित्व व कृतित्व में बहुत बड़ा अंतर नहीं था. दोनों की जड़ें ज़मीन में फैली थीं. दोनों का जन्म देहात में हुआ था, सोच एक जैसी थी. दोनों परिष्कृत साहित्य के कुशल अध्येता थे. भाषा पर अधिकार था. दोनों के नाम असली नहीं थे. विश्व साहित्य में दोनों अपने उप-नामों से ही जाने गए, प्रतिष्ठित हुए.

      इलियट को चर्च से और प्रेमचंद को मंदिरों से कोई विशेष लगाव नहीं था. लेकिन दोनों की अनास्था में भी आस्था का प्रदर्शन था. मानस के प्रति दोनों में गहरी सहानुभूति थी. अंतर मात्र इतना था कि इलियट की कृतियों का सफर गाँव  से शहर की तरफ जाता था और प्रेमचंद का शहर से गाँव की तरफ. जो नीति  के विरुद्ध था वह था प्रकृति के विरुद्ध कार्य करना. इसमें वे विनाश की सम्भावना अधिक देखते थे. दोनों अपने देसी दोस्तों से प्रभावित रहे थे. प्रेमचंद, दयाराम निगम से प्रभावित थे तो इलियट अपने अभिन्न मित्र जॉन  चैपमैन से. सभी सामान कलाप्रेमी थे.*   

      प्रेमचंद, इलियट से इस क़दर प्रभावित थे कि जब उन्होंने 'साइलस मार्नर उपन्यास पढ़ा तो उन्होंने उसका अनुवाद करने में देर नहीं की. अनुवाद पूरा करने तक उन्होंने अपने इर्द-गिर्द के माहौल को खालिस भारतीय बनाये रखा. जब सुखदा के नाम से यह उपन्यास प्रकाशित हुआ तो पाठक चकित हो गया. सबको लगा कि यह तो भारतीय परिवेश की एक सशक्त औपन्यासिक कृति है.

      विचारों में सामान विकासशीलता के होते  पात्रों को खुलें में सांस लेने की पूरी आज़ादी थी. सामान विशेषता ने ही दोनों को एक-दूसरे से प्रभावित किया था. इनके अतिरिक्त प्रेमचंद द्वारा ओपेंद्र नाथ अश्क को भेजे गए पत्र से पता चलता है कि वह  रोमाँ  रोलाँ  से भी कम प्रभावित नहीं थे. उनके अनुसार,'रोमान रोलाँ  का विवेकानंद ज़रूर पढ़ो.* हंस के मार्च 1934 की हंसवाणी में प्रेमचंद ने अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा कि 'उनके प्रसिद्ध  उपन्यास जान क्रिस्टोफर के विषय में तो हम कह सकते हैं कि एक कलाकार की आत्मा का इससे सुन्दर चित्र उपन्यास साहित्य में नहीं है.

      बड़ी अजीब बात है कि मुंशी प्रेमचंद ने कहीं भी फ़्रांसिसी साहित्यकार अनातोले फ़्रांस की प्रशंसा नहीं की है. हालाँकि उन्होंने  फ़्रांस की अमर कृति थायस का अहंकार रूपांतरित किया वह भी तब जब 1925 में रामचंद टंडन ने उनसे ऐसा करने के लिए कहा. लेकिन अपने सम्पादकीय में प्रेमचंद ने इस कृति और फ़्रांस के साहित्य की कहीं तक प्रशंसा अवश्य  की  यह बात और है कि उस सम्पादकीय में प्रेमचंद का साहित्यकार कहीं नज़र नहीं आता है. ठीक इसके उलट प्रेमचंद रूसी साहित्य की प्रशंसा किये नहीं थकते थे. एक जगह वह लिखते हैं, कहानी-उपन्यास में रूस का मुक़ाबला कोई देश नहीं कर सकता. चेखब छोटी कहानियों का बादशाह है. तुर्गनेव के क़लम में बड़ा दर्द है. गोर्की किसानों-मज़दूरों का अपना लेखक है. टॉलस्टाय सर्वोपरि है. उसकी हैसियत शहंशाह की सी है. 25 बरस पहले भी थी और आज भी है. टॉलस्टाय के आगे तुर्गनेव बौना है.* टॉलस्टाय के साहित्य ने प्रेमचंद को सोचने का एक नजरिया दिया था. बोल्शेविस्ट उसूलों ने प्रेमचंद को सहमति का अवसर दिया बताया कि किसान रूस का हो या भारत का, सरकार से अपने हक़ की मांग क्यों नहीं मनवा सकता? वह क्यों बग़ावत नहीं कर सकता है?

      रूस में किसानों को जगाने के लिए टॉलस्टाय सक्रिय थे, गोर्की और चेखब थे, तुर्गनेव थे लेकिन भारत में प्रेमचंद सरीखे कितने कथाकार थे? लेखन का कार्य तो आज भी लोग कर रहे हैं, लेकिन आज भारत में किसान आत्महत्याएं कर रहा है, अपनी फसलों को सड़ने के लिए फ़ेंक रहा है, उसका भविष्य अंधकारमय हो चुका  है. आज साहित्य में कोई प्रेमचंद नहीं रहा है जो किसानो के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर उनके लिए इंक़लाब की पृष्ठभूमि तैयार करे.
      आज भी प्रेमचंद अकेले हैं. जो लोग हैं, वे पुरस्कारों के लिए दौड़ रहे हैं, फेसबुक पर आत्मप्रचार कर रहे हैं. किसान हथेलियों में मुंह छुपाकर भरभराकर बेआवाज़ सुबुक रहा है कि कोई उसका रोना न सुन ले. प्रेमचंद ने अपने समय में  धरती की गंध सूंघ ली थी और पूस की एक रात को इतना तवील बना दिया था कि उस समय के किसानों की मिटटी आजतक आंसुओं से भीगती रहती है. कोई है जो उठकर इंक़लाब का नारा बुलंद  करे, धरती पुत्रों को उनका हक़ दिला सके?
[क्रमशः जारी/-4] 
    
* मदनगोपाल, मुंशी प्रेमचंद , एशिया पब्लिशिंग हॉउस ,1964 पृ. 165
* प्रेमचंद  चिट्ठी-पत्री भाग-2 , पृ.236 
* अमृतराय :प्रेमचंद:क़लम का सिपाही, पृ.516    
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मंगलवार, 12 सितंबर 2017

मुंशी प्रेमचंद : नव-मूल्यांकन--02/ डॉ. रंजन ज़ैदी

रंजन ज़ैदी की नई प्रकाश्य पुस्तक : 'काल-चक्र' से.

प्रेमचंद के पहले उपन्यास  (धनपतराय उर्फ़ नवाबराय इलाहाबादी) किशना था. असरारे माबिद  उनका दूसरा उपन्यास था. उनका हिंदी उपन्यास 'प्रेमा' एक मौलिक कृति है. यह कृति हम खुरमा व हम-सवाब का अनुवाद नहीं है क्योंकि इस उर्दू उपन्यास के पात्रों  में नए पात्र जोड़े गए हैं जो मूल उर्दू उपन्यास में नहीं हैं. अनुवादक मूल कृति में परिवर्तन नहीं कर सकता है. इसे प्रेमचंद ने हिंदी में ही नए सिरे से लिखा है. इसी तरह प्रेमाश्रम और सेवासदन भी उर्दू पांडुलिपियों का अनुवाद नहीं हैं. वे हिंदी की मौलिक कृतियाँ हैं.
   
      प्रेमचंद को अनूदित रचनाएँ पसंद थीं. विक्टर ह्यूगो के ला मिज़रेबल ग्रन्थ  का वह अनुवाद करना चाहते थे (हालाँकि अपने समय के जासूसी कथाकार दुर्गा प्रसाद खत्री  इस उपन्यास का 1914-15 में अभागे का भाग्य शीर्षक से अनुवाद कर चुके थे). इसके बावजूद उन्होंने  निगम को एक पत्र लिखकर मालूम किया कि  क्या किसी ने इसका उर्दू में अनुवाद किया है? उन्होंने अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए पत्र में लिखा कि वः इस काम में जुटना चाहते हैं. 'साल भर का काम है  किसी भी तरह से पता लगाकर बताइये.*

       साम्यवादी विचारधारा वाले रोमा रोलां  की विचारधारा से भी प्रेमचंद  बहुत प्रभावित थे. उसका विचार था कि हम क्रांति और प्रगति के साथ रहेंगे लेकिन आज़ाद मानव बनकर। उर्दू साहित्यकार  रतनलाल सरशार से भी उनकी गहरी दोस्ती थी. उनके बारे में तो वह कहा करते थे कि सरशार से तो मुझे तृप्ति ही नहीं होती थी. उनकी सारी रचनाएँ मैंने पढ़ डालीं.* उन्होंने पाश्चात्य लेखकों में डिकेंस, इलियट, थैकरे, अनातोले फ़्रांस, गाल्सवर्दी, रोमाँ रोलां, चेखव, गोर्की, तुर्गनेव और टॉलस्टाय जैसे दिग्गज लेखकों की रचनाओं का गंभीरता से अध्ययन  किया था. ये वे लेखक थे जिनके साहित्य का प्रेम चंद के साहित्य पर गहरा प्रभाव पड़ा था. प्रमाण के रूप में हम उपन्यास प्रेमाश्रम पर टॉलस्टॉय  की रचना रिज़रेकशन को प्रस्तुत कर सकते हैं. कमाल  की बात यह है कि प्रेमचंद  ने तब तक रिज़रेकशन पढ़ी ही नहीं थी. वह अपने बयान में एक जगह कहते हैं कि बिना पढ़े ही यदि प्रेमाश्रम में रिज़रेकशन के भाव आ गए हैं तो यह मेरे लिए गौरव की बात है.'  उन्होंने कहा कि 'मैं अपने प्लॉट जीवन से लेता हूँ, पुस्तकों से नहीं और जीवन

सारे संसार में एक है.*

      इंद्रनाथ मदान के एक पत्र (दिसम्बर 26,1934) का उत्तर देते हुए प्रेमचंद स्वीकारते हैं कि उन पर टॉलस्टाय और  विक्टर ह्यूगो का असर रहा है और रोमाँ  रोलां का भी. उनका मानना था कि 'नोच-खसोट से कीर्ति नहीं मिलती. कीर्ति बहुत दुर्लभ वस्तु है और मैं इतना बड़ा मंद-बुद्धि नहीं हूँ कि  इधर-उधर से तर्जुमे करके अपनई कीर्ति बढ़ाने का प्रयत्न करूँ.
  
      यह बात तो स्वीकार करनी चाहिए कि प्रेमचंद के वैचारिक नज़रिये में जो विश्वास पाया जाता है और मज़बूत पकड़ भी, वह  पाश्चात्य साहित्य के गहन अध्यन के कारण  ही मुमकिन है. आरोप-प्रत्यारोप तो होते ही रहेंगे. अपने समय के विवादित साहित्यकार श्रीअवध उपाध्याय ने सरस्वती पत्रिका में प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि को थैकरे कृत उपन्यास वैनिटी फ़ेयर का चरबा* बताया. यह एक गंभीर आरोप था. श्रीअवध उपाध्याय के इस सनसनीखेज़ धमाके से प्रेमचंद आहत हो गए लेकिन उनके आत्मविश्वास ने उनका साथ नहीं छोड़ा। प्रेमचंद ने खंडन में कहा, 'यह संभव ही नहीं है. थैकरे का उपन्यास  वैनिटी फ़ेयर  एक सामाजिक उपन्यास है जबकि रंगभूमि मुख्यतः एक राजनीतिक उपन्यास है. प्रेमचंद ने सुझाव दिया कि साहित्यकार बड़े साहित्यकारों की कृतियों का अध्ययन करें क्योंकि हमारे बीच  चार्ल्स डिकेंस तो हैं, किन्तु कोई थैकरे, चार्ल्स मीड, मेरी कार्ली और जार्ज इलियट नहीं है.

      प्रेमचंद  दुनिया के साहित्य में यूँही बड़े नहीं हुए, वह थैकरे से भी बड़े महान  साहित्यकार इसलिए हुए कि थैकरे के उपन्यासों के पात्र समाज के उच्च-वर्ग  व उच्च मध्यवर्ग की आवाज़ बनते थे जबकि प्रेमचंद के लेखन में निम्न-वर्ग से सम्बंधित सामाजिक समस्याओं का एक सैलाब था, आंदोलन की भावी रूपरेखा थी, एक तरह का सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक इंक़लाब था जिसने प्रेमचंद को बेहद बुलंदियों तक पहुंचा दिया.     
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*अमृतराय. प्रेमचंद क़लम का सिपाही, पृष्ठ 19 
*प्रेमचंद कुछ विचार , सरस्वती प्रेस, बनारस, 1957 पृ.71
*अमृतराय, प्रेमचंद क़लम का सिपाही, पृष्ठ 385
*अमृतराय, प्रेमचंद क़लम का सिपाही, पृष्ठ 338
*सरस्वती जुलाई, 1926 से दिसम्बर 1926 तक के अंक. 

[क्रमशः /जारी-3] 
  
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