रंजन ज़ैदी की नई प्रकाश्य पुस्तक : 'काल-चक्र' से.
प्रेमचंद के पहले उपन्यास (धनपतराय उर्फ़ नवाबराय इलाहाबादी) किशना था. असरारे माबिद उनका दूसरा उपन्यास था. उनका हिंदी उपन्यास 'प्रेमा' एक मौलिक कृति है. यह कृति हम खुरमा व हम-सवाब का अनुवाद नहीं है क्योंकि इस उर्दू उपन्यास के पात्रों में नए पात्र जोड़े गए हैं जो मूल उर्दू उपन्यास में नहीं हैं. अनुवादक मूल कृति में परिवर्तन नहीं कर सकता है. इसे प्रेमचंद ने हिंदी में ही नए सिरे से लिखा है. इसी तरह प्रेमाश्रम और सेवासदन भी उर्दू पांडुलिपियों का अनुवाद नहीं हैं. वे हिंदी की मौलिक कृतियाँ हैं.
प्रेमचंद को अनूदित रचनाएँ पसंद थीं. विक्टर ह्यूगो के ला मिज़रेबल ग्रन्थ का वह अनुवाद करना चाहते थे (हालाँकि अपने समय के जासूसी कथाकार दुर्गा प्रसाद खत्री इस उपन्यास का 1914-15 में अभागे का भाग्य शीर्षक से अनुवाद कर चुके थे). इसके बावजूद उन्होंने निगम को एक पत्र लिखकर मालूम किया कि क्या किसी ने इसका उर्दू में अनुवाद किया है? उन्होंने अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए पत्र में लिखा कि वः इस काम में जुटना चाहते हैं. 'साल भर का काम है किसी भी तरह से पता लगाकर बताइये.*
साम्यवादी विचारधारा वाले रोमा रोलां की विचारधारा से भी प्रेमचंद बहुत प्रभावित थे. उसका विचार था कि हम क्रांति और प्रगति के साथ रहेंगे लेकिन आज़ाद मानव बनकर। उर्दू साहित्यकार रतनलाल सरशार से भी उनकी गहरी दोस्ती थी. उनके बारे में तो वह कहा करते थे कि सरशार से तो मुझे तृप्ति ही नहीं होती थी. उनकी सारी रचनाएँ मैंने पढ़ डालीं.* उन्होंने पाश्चात्य लेखकों में डिकेंस, इलियट, थैकरे, अनातोले फ़्रांस, गाल्सवर्दी, रोमाँ रोलां, चेखव, गोर्की, तुर्गनेव और टॉलस्टाय जैसे दिग्गज लेखकों की रचनाओं का गंभीरता से अध्ययन किया था. ये वे लेखक थे जिनके साहित्य का प्रेम चंद के साहित्य पर गहरा प्रभाव पड़ा था. प्रमाण के रूप में हम उपन्यास प्रेमाश्रम पर टॉलस्टॉय की रचना रिज़रेकशन को प्रस्तुत कर सकते हैं. कमाल की बात यह है कि प्रेमचंद ने तब तक रिज़रेकशन पढ़ी ही नहीं थी. वह अपने बयान में एक जगह कहते हैं कि बिना पढ़े ही यदि प्रेमाश्रम में रिज़रेकशन के भाव आ गए हैं तो यह मेरे लिए गौरव की बात है.' उन्होंने कहा कि 'मैं अपने प्लॉट जीवन से लेता हूँ, पुस्तकों से नहीं और जीवन
सारे संसार में एक है.*
इंद्रनाथ मदान के एक पत्र (दिसम्बर 26,1934) का उत्तर देते हुए प्रेमचंद स्वीकारते हैं कि उन पर टॉलस्टाय और विक्टर ह्यूगो का असर रहा है और रोमाँ रोलां का भी. उनका मानना था कि 'नोच-खसोट से कीर्ति नहीं मिलती. कीर्ति बहुत दुर्लभ वस्तु है और मैं इतना बड़ा मंद-बुद्धि नहीं हूँ कि इधर-उधर से तर्जुमे करके अपनई कीर्ति बढ़ाने का प्रयत्न करूँ.
यह बात तो स्वीकार करनी चाहिए कि प्रेमचंद के वैचारिक नज़रिये में जो विश्वास पाया जाता है और मज़बूत पकड़ भी, वह पाश्चात्य साहित्य के गहन अध्यन के कारण ही मुमकिन है. आरोप-प्रत्यारोप तो होते ही रहेंगे. अपने समय के विवादित साहित्यकार श्रीअवध उपाध्याय ने सरस्वती पत्रिका में प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि को थैकरे कृत उपन्यास वैनिटी फ़ेयर का चरबा* बताया. यह एक गंभीर आरोप था. श्रीअवध उपाध्याय के इस सनसनीखेज़ धमाके से प्रेमचंद आहत हो गए लेकिन उनके आत्मविश्वास ने उनका साथ नहीं छोड़ा। प्रेमचंद ने खंडन में कहा, 'यह संभव ही नहीं है. थैकरे का उपन्यास वैनिटी फ़ेयर एक सामाजिक उपन्यास है जबकि रंगभूमि मुख्यतः एक राजनीतिक उपन्यास है. प्रेमचंद ने सुझाव दिया कि साहित्यकार बड़े साहित्यकारों की कृतियों का अध्ययन करें क्योंकि हमारे बीच चार्ल्स डिकेंस तो हैं, किन्तु कोई थैकरे, चार्ल्स मीड, मेरी कार्ली और जार्ज इलियट नहीं है.
प्रेमचंद दुनिया के साहित्य में यूँही बड़े नहीं हुए, वह थैकरे से भी बड़े महान साहित्यकार इसलिए हुए कि थैकरे के उपन्यासों के पात्र समाज के उच्च-वर्ग व उच्च मध्यवर्ग की आवाज़ बनते थे जबकि प्रेमचंद के लेखन में निम्न-वर्ग से सम्बंधित सामाजिक समस्याओं का एक सैलाब था, आंदोलन की भावी रूपरेखा थी, एक तरह का सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक इंक़लाब था जिसने प्रेमचंद को बेहद बुलंदियों तक पहुंचा दिया.
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*अमृतराय. प्रेमचंद क़लम का सिपाही, पृष्ठ 19
*प्रेमचंद कुछ विचार , सरस्वती प्रेस, बनारस, 1957 पृ.71
*अमृतराय, प्रेमचंद क़लम का सिपाही, पृष्ठ 385
*अमृतराय, प्रेमचंद क़लम का सिपाही, पृष्ठ 338
*सरस्वती जुलाई, 1926 से दिसम्बर 1926 तक के अंक.
[क्रमशः /जारी-3]
+91 9350 934 635 https://alpst-literature.blogspot.com, zaidi.ranjan20shayan@bloggar.com,
प्रेमचंद के पहले उपन्यास (धनपतराय उर्फ़ नवाबराय इलाहाबादी) किशना था. असरारे माबिद उनका दूसरा उपन्यास था. उनका हिंदी उपन्यास 'प्रेमा' एक मौलिक कृति है. यह कृति हम खुरमा व हम-सवाब का अनुवाद नहीं है क्योंकि इस उर्दू उपन्यास के पात्रों में नए पात्र जोड़े गए हैं जो मूल उर्दू उपन्यास में नहीं हैं. अनुवादक मूल कृति में परिवर्तन नहीं कर सकता है. इसे प्रेमचंद ने हिंदी में ही नए सिरे से लिखा है. इसी तरह प्रेमाश्रम और सेवासदन भी उर्दू पांडुलिपियों का अनुवाद नहीं हैं. वे हिंदी की मौलिक कृतियाँ हैं.
प्रेमचंद को अनूदित रचनाएँ पसंद थीं. विक्टर ह्यूगो के ला मिज़रेबल ग्रन्थ का वह अनुवाद करना चाहते थे (हालाँकि अपने समय के जासूसी कथाकार दुर्गा प्रसाद खत्री इस उपन्यास का 1914-15 में अभागे का भाग्य शीर्षक से अनुवाद कर चुके थे). इसके बावजूद उन्होंने निगम को एक पत्र लिखकर मालूम किया कि क्या किसी ने इसका उर्दू में अनुवाद किया है? उन्होंने अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए पत्र में लिखा कि वः इस काम में जुटना चाहते हैं. 'साल भर का काम है किसी भी तरह से पता लगाकर बताइये.*
साम्यवादी विचारधारा वाले रोमा रोलां की विचारधारा से भी प्रेमचंद बहुत प्रभावित थे. उसका विचार था कि हम क्रांति और प्रगति के साथ रहेंगे लेकिन आज़ाद मानव बनकर। उर्दू साहित्यकार रतनलाल सरशार से भी उनकी गहरी दोस्ती थी. उनके बारे में तो वह कहा करते थे कि सरशार से तो मुझे तृप्ति ही नहीं होती थी. उनकी सारी रचनाएँ मैंने पढ़ डालीं.* उन्होंने पाश्चात्य लेखकों में डिकेंस, इलियट, थैकरे, अनातोले फ़्रांस, गाल्सवर्दी, रोमाँ रोलां, चेखव, गोर्की, तुर्गनेव और टॉलस्टाय जैसे दिग्गज लेखकों की रचनाओं का गंभीरता से अध्ययन किया था. ये वे लेखक थे जिनके साहित्य का प्रेम चंद के साहित्य पर गहरा प्रभाव पड़ा था. प्रमाण के रूप में हम उपन्यास प्रेमाश्रम पर टॉलस्टॉय की रचना रिज़रेकशन को प्रस्तुत कर सकते हैं. कमाल की बात यह है कि प्रेमचंद ने तब तक रिज़रेकशन पढ़ी ही नहीं थी. वह अपने बयान में एक जगह कहते हैं कि बिना पढ़े ही यदि प्रेमाश्रम में रिज़रेकशन के भाव आ गए हैं तो यह मेरे लिए गौरव की बात है.' उन्होंने कहा कि 'मैं अपने प्लॉट जीवन से लेता हूँ, पुस्तकों से नहीं और जीवन
सारे संसार में एक है.*
इंद्रनाथ मदान के एक पत्र (दिसम्बर 26,1934) का उत्तर देते हुए प्रेमचंद स्वीकारते हैं कि उन पर टॉलस्टाय और विक्टर ह्यूगो का असर रहा है और रोमाँ रोलां का भी. उनका मानना था कि 'नोच-खसोट से कीर्ति नहीं मिलती. कीर्ति बहुत दुर्लभ वस्तु है और मैं इतना बड़ा मंद-बुद्धि नहीं हूँ कि इधर-उधर से तर्जुमे करके अपनई कीर्ति बढ़ाने का प्रयत्न करूँ.
यह बात तो स्वीकार करनी चाहिए कि प्रेमचंद के वैचारिक नज़रिये में जो विश्वास पाया जाता है और मज़बूत पकड़ भी, वह पाश्चात्य साहित्य के गहन अध्यन के कारण ही मुमकिन है. आरोप-प्रत्यारोप तो होते ही रहेंगे. अपने समय के विवादित साहित्यकार श्रीअवध उपाध्याय ने सरस्वती पत्रिका में प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि को थैकरे कृत उपन्यास वैनिटी फ़ेयर का चरबा* बताया. यह एक गंभीर आरोप था. श्रीअवध उपाध्याय के इस सनसनीखेज़ धमाके से प्रेमचंद आहत हो गए लेकिन उनके आत्मविश्वास ने उनका साथ नहीं छोड़ा। प्रेमचंद ने खंडन में कहा, 'यह संभव ही नहीं है. थैकरे का उपन्यास वैनिटी फ़ेयर एक सामाजिक उपन्यास है जबकि रंगभूमि मुख्यतः एक राजनीतिक उपन्यास है. प्रेमचंद ने सुझाव दिया कि साहित्यकार बड़े साहित्यकारों की कृतियों का अध्ययन करें क्योंकि हमारे बीच चार्ल्स डिकेंस तो हैं, किन्तु कोई थैकरे, चार्ल्स मीड, मेरी कार्ली और जार्ज इलियट नहीं है.
प्रेमचंद दुनिया के साहित्य में यूँही बड़े नहीं हुए, वह थैकरे से भी बड़े महान साहित्यकार इसलिए हुए कि थैकरे के उपन्यासों के पात्र समाज के उच्च-वर्ग व उच्च मध्यवर्ग की आवाज़ बनते थे जबकि प्रेमचंद के लेखन में निम्न-वर्ग से सम्बंधित सामाजिक समस्याओं का एक सैलाब था, आंदोलन की भावी रूपरेखा थी, एक तरह का सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक इंक़लाब था जिसने प्रेमचंद को बेहद बुलंदियों तक पहुंचा दिया.
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*अमृतराय. प्रेमचंद क़लम का सिपाही, पृष्ठ 19
*प्रेमचंद कुछ विचार , सरस्वती प्रेस, बनारस, 1957 पृ.71
*अमृतराय, प्रेमचंद क़लम का सिपाही, पृष्ठ 385
*अमृतराय, प्रेमचंद क़लम का सिपाही, पृष्ठ 338
*सरस्वती जुलाई, 1926 से दिसम्बर 1926 तक के अंक.
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