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सोमवार, 3 जून 2024

हिन्दी उपन्यास दिल , दरिया-दरिया कथाकार ; डॉ० जेड० ए० जैदी

हिन्दी उपन्यास दिल , दरिया-दरिया कथाकार ; डॉ० जेड० ए० जैदी (एक) सिधौली, उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर की एक तहसील है. इसका छोटा सा रेलवे स्टेशन है लेकिन उसका फैलता हुआ शहर अब सबसे खुद को जोड़ रहा है क्योंकि इस छोटे से शहर के रास्ते 'मिश्रिख' को भी अब छूने लगे हैं और बाड़ी जैसे ऐतिहासिक क़स्बे के अतिरिक्त देश के क्रांतिकारियों की पहचान 'काकोरी' को भी दुनिया से जोड़ रहे हैं. शराफत यार खां मूलतः कस्बा बाड़ी के पुराने जमीदारों के खानदान से संबंध रखते हैं। ज़मीदारी खत्म हो गई तो खानदान भी बिखर गए। नए आसमानों की तलाश में तप्ती हुई प्यासी संगलाख ज़मीनें लखौरी ईंटों के सपने नहीं दिखा सकीं और जो पीछे पुरानी इमारतों की बुनियादें बाकी बचीं, वे कमजोर होती चली गईं। कहते हैं कि एक ईंट गिरती है तो तीन दूसरी अपने आप भुरभुरी होने लगती हैं। समय उन्हें भुरभुराकर लोनी में बदल देता है। जब समय साथ छोड़ता है तो इमारतों के भी अंग-प्रत्यंग गिरते हुए लावारिस बन जाते हैं और पुराना मुहावरा है कि लावारिस मकान हो या मुहल्ले की विधवा, उसपर हर कोई अपना दावा पेश करने लग जाता है। बाड़ी की मस्जिद हो या कब्रिस्तान, कवि नरोत्तम दास का मंदिर हो या पुरातात्विक खंडहर, सबके दावेदार स्वतः ही मशरूम की तरह उग आए लोग, मकान, तिदरियाँ और हवेलियाँ सब अफ़साने बनकर खंडहरों में तब्दील होते चले गए। यहाँ भी बदलते वक्त के साथ लावारिस ज़मीनों पर कब्जों के करील उग-उग कर फैलते चले गए और खंडहरों पर पतावर के नए न सलीब पहचान की तरह पीढ़ियों के हस्ताक्षर बनते चले गए। शराफत यार ख़ान का खानदान इसी बाड़ी के सैय्यदों की निशानी है। उनका ननिहाल लखनऊ में है, वहीं वह पढ़े-लिखे भी। खाला-बी बाड़ी के सय्यद-बाड़े में ब्याही जरूर थीं, किन्तु मन बड़ी बहन के आँगन में ही डोलता रहता था। 15 साल छोटी थीं तो खानदान भर में वह छोटी खाला, छोटी फुप्पो, छोटी मुमानी और बस ऐसे ही रिश्तों का छोटापन उनके बेटे असलम ख़ान तक जा पहुँचा था । शराफत यार ख़ान बड़े थे, रिश्ते में बड़ी खाला के होनहार बेटे थे और लखनऊ में ही रहते थे किन्तु पढ़ाई-लिखाई में मुनीरा बेगम अपने बेटे के लिए एएमयू से बेहतर दूसरी जगह के महत्व को नहीं स्वीकारती थीं, कारण थे शराफत के अब्बाजान स्वर्गीय मीर अमीर हसन एडवोकेट, जिन्होंने मुस्लिम विश्वविद्यालय में न केवल वकालत पढ़ी थी, बल्कि वहाँ की कोर्ट के सदस्य भी रहे थे। आजादी के आंदोलन में उनकी भूमिका भी सराहनीय रही थी। आज अगर वह जीवित होते तो लिबरल मुसलमानों के एक बड़े नेता बनकर उनका प्रतिनिधित्व कर रहे होते। उनके बहुत से दोस्त पाकिस्तान चले गए किन्तु उन्होंने अपने ही मुल्क को अपना ‘देश’ समझा और यहीं की मिट्टी में वह अंततः दफ्न भी हो गए। छोटी-बी बाड़ी में ही रहीं। कसबाई मानसिकता ने उन्हें कभी चौखट लांघने नहीं दी। तब भी नहीं जब उनके पति की सांप्रदायिक दंगा-ग्रस्त कस्बे से मेरठ जाते हुए रास्ते में उन सहित तीन अन्य व्यक्तियों की चाकुओं से हत्या कर गई थी। तब उनके इकलौते पुत्र असलम ख़ान पाँच वर्ष के थे। बड़ी बेगम श्रीमती मुनीरा बेगम ने असलम खान को लखनऊ में ही रखना चाहा लेकिन ज़रीना बेगम की तनहाई को देख कर बहन ने एक पढ़ी-लिखी ट्रेंड लेडी अटेंडेंट तम्बोरा देवी को बाड़ी में जरूर रख दिया ताकि असलम खान की सही निगरानी और बेहतर तालीम पर निगाह रखी जा सके। तम्बोरा देवी कस्बा लहर पुर अर्थात लोहारी पुर से थीं। कहते हैं कि राजा चंद्र सेन गौड़ ने 1707 में मुस्लिम शासक को पराजित कर इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था । राजा टोडरमल इसी कस्बे के रहने वालों में थे। तम्बोरा देवी गौड़ के पूर्वजों मेँ कुछ लोग ग़ाज़ी ताहिर के नेतृत्व में पासियों के युद्ध के बाद 1707 में जब राजा चंद्र सेन गौड़ का शासन आया तो तम्बोरा देवी के पूर्वज अवध में जाकर बस गए थे क्योंकि तब तक अवध पर अकबर बादशाह का शासन कायम हो चुका था। तंबोरा देवी एक संस्कारित महिला थीं । वह मुनीरा बेगम के साथ समाज कल्याण संबंधी कार्यों से भी जुड़ी रहती थीं। उसने गौड़ मुस्लिम युवक से कभी प्रेम-विवाह किया किन्तु उसने मुंबई जाकर किसी अन्य महिला से विवाह कर लिया। इस घटना के बाद से उसने फिर कभी प्रेम विवाह को महत्व नहीं दिया। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्नातक थीं और बहुत ही सौम्य प्रकृति की गंभीर महिला भी। जब उसने समाज कल्याण स्वयंसेवी सामाजिक संस्था का बाड़ी में दफ्तर खोला तो उसने स्थानीय बच्चों की शिक्षा की ओर भी ध्यान दिया जिसमें इंग्लिश और मैथ्स को प्रथम प्राथमिकता दी गई थी। इससे स्थानीय बच्चे उसके ‘टिटोरियल क्लासेस’ में तेजी से आने लगे और सैय्यद बाड़ा का खंडहर फिर से आबाद होने लगा। असलम खान को तंबोरा देवी ने मानो गोद ही ले लिया था। समय ने भी तो उसकी ज़िंदगी को बदलकर रख दिया था। उसने असलम खान को न केवल पढ़ाया-लिखाया, बल्कि बेटे की तरह पाल-पोस कर उन्हें संस्कार दिए। उसे बड़ा होते देख तंबोरा देवी फूली न समाती। उसे देखते ही उसके पेट में ऐंठन सी महसूस होने लग जाती थी। अजीब सा लगाव होता जा रहा था, जैसे वह उसकी ही माँ हो। जब वह अलीगढ़ जाने वाला था और तम्बोरा देवी उसे सी-आफ करने सिधौली के स्टेशन पर गई हुई थीं तब वह बहुत भावुक होने लगी थीं। वह उसे अपलक देखती रहना चाहती थीं, लेकिन आँखें डबडबा जाती थीं। तभी वह समय भी आया जब अत्यंत भावुक होकर वह एकाएक असलम खान को सीने से लगाकर रो पड़ीं। असलम ख़ान ने उन्हें बहुत समझाया, परिपक्वता का प्रदर्शन कर उन्हें रोका नहीं, रोने दिया। हालांकि इस संवेदनशील वातावरण में वह स्वयं भी बहुत भावुक हो गया था। उसने कहा, "माँ, बस मेरे लिए दुआ कीजियेगा। यह न कहिएगा कि हम आईएएस बने,.आईपीएस बनें.और फिर बाद में फेल हो जाएं, जैसे भाई.....।” उसने हंसने का भी प्रयास किया ताकि मैडम का मन हल्का हो जाए लेकिन.... 'मम्मा! मैं जल्दी मिलने आऊँगा।” “असलम, आपने अभी क्या कहा? फिर से कहिए.....!” “कुछ ग़लत..... कह गया क्या मैं ?” देवी भरभराकर रो पड़ी थीं,” आपने हमें माँ कहा, ममा कहा?” “कह दीजिए कि नहीं हैं! जो हैं वही तो मुंह से निकला। अम्मी ने जन्म दिया ममा, लेकिन आपने तो पैरों पर खड़ा कर दिया, बोलना सिखा दिया, बता दिया कि दुनिया से कैसे टक्कर लें। आप माँ नहीं तो क्या हैं आप मेरी माँ ही रहेंगी। अम्मी अपनी जगह पर हैँ, आप अपनी जगह पर, अब जाएं?” “कहिए जल्दी आएंगे!” उस दिन असलम ने तंबोरा देवी की दोनों आँखों को चूमा था और अपनी भावुकता को काबू कर ट्रेन में बैठ गया था। लेकिन उसके जीवन के हर क्षण अविस्मरणीय थे। तंबोरा देवी ने तो देर तक आँखें ही नहीं खोलीं थीं कि कहीं असलम आँखों से ओझल न हो जाए लेकिन अंततः ट्रेन की सींटी ने तंबोरा देवी को आँखें खोलने पर मजबूर कर दिया था [शेष, अगले एपिसोड में....-/2] <> +91 9350 934 635

दिल, दरिया-दरिया / रंजन जैदी

https://alpst-literature.blogspot.com, zaidi.ranjan20shayan@bloggar.com, +91 9350 934635 https://alpst-literature.blogspot.com, सिधौली, उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर की एक तहसील है। इसका छोटा सा रेलवे स्टेशन है लेकिन फैलता हुआ शहर अब सबसे खुद को जोड़ता सा नज़र रहा है क्योंकि शहर के रास्ते 'मिश्रिख' को भी अब छूने लगे हैं और बाड़ी जैसे ऐतिहासिक क़स्बे के अतिरिक्त देश के क्रांतिकारियों की पहचान 'काकोरी' को भी दुनिया से जोड़ रहे हैं। कहा जाता है कि ‘बाड़ी’ गुर्जर प्रतिहार राजा राजपाल के राज्य का एक गाँव हुआ करता था। महमूद ग़ज़नवी की सेना से पराजित होकर जब प्रतिहार राजा अपनी राजधानी कन्नौज से भागकर इस क्षेत्र के एक ऐसे हरे-भरे भू-खण्ड में आकर बसा जहां की सीमाओं पर दरिया बहता था, पहाड़ियों पर रेहू फैला रहता था, और अवाम के लिए जल-जंगल जमीन की उपलब्धि प्रचुर मात्रा में हुआ करती थी, उसी बस्ती को ‘बाड़ी’ का नाम दे दिया गया था। इस संबंध में एक प्रचलित अवधारणा यह भी है कि बादशाह हुमायूँ के साहबज़ादे मुबारक शाह को शिकार का बहुत शौक था। जिस इलाके में वह अक्सर शिकार खेलने के लिए आता था, वह इसी इलाके में अवस्थित है। यह वही जगह थी जहां जंगल, पहाड़ और दरिया भी थे जिसमें एक दरिया गोमती भी है। उसे यह क्षेत्र इतना पसंद आया था कि उसने जंगल के बीच एक गाँव तक बसा दिया था । वास्तविकता यह थी कि उसे इस नए ठेठ गाँव की सादगी में बहुत शांति मिला करती थी। उसने इस घर को फूल-पत्तियों से सजवा दिया था। लोग इस घर को बाड़ी कहने लगे थे। बाड़ी अर्थात बग़ीचा। कालांतर में यही वह जंग का मैदान बना जिसमें 1886 में मौलवी अहमदुल्लाह शाह और अंग्रेजी सैनिकों के बीच भीषण युद्ध हुआ और अंग्रेजों को इस युद्ध में जीत मिली। कालांतर में अंग्रेज जनरल राइट ने इस क्षेत्र को अंग्रेजी सरकार का सदर मक़ाम घोषित कर दिया। शराफत यार खां मूलतः कस्बा बाड़ी के पुराने जमीदारों के खानदान से संबंध रखते हैं। ज़मीदारी खत्म हो गई तो खानदान भी बिखर गए। लखौरी ईंटों से बनी पुरानी इमारतों की बुनियादें भी कमजोर होती चली गईं। एक ईंट गिरती है तो तीन दूसरी अपने आप भुरभुरी होने लगती हैं। समय उन्हें भुरभुराकर लोनी में बदल देता है। जब समय साथ छोड़ता है तो इमारतों के भी अंग-प्रत्यंग गिरते हुए लावारिस हो जाते हैं और लावारिस मकान हो या मुहल्ले की विधवा, उसपर हर कोई अपना दावा करने लग जाता है। बाड़ी की मस्जिद हो या कब्रिस्तान, कवि नरोत्तम दास का मंदिर हो या पुरातात्विक खंडहर, सबके दावेदार स्वतः ही मशरूम की तरह उग आए लोग, मकान, तिदरियाँ और हवेलियाँ सब अफ़साने बनकर खंडहरों में तब्दील होते चले गए। यहाँ भी बदलते समय के साथ लावारिस ज़मीनों पर कब्जों के जाले स्वतः ही फैलते गए और खंडहरों पर नए मकान खड़े हो गए। शराफत यार ख़ान का खानदान इसी बाड़ी के सैय्यदों की निशानी है। उनका ननिहाल लखनऊ, बाराबंकी के कस्बा 'मुहम्मदपुर-बिशन पुर और ददिहाल सीतापुर, मुजफ्फर नगर और बारहाँ में हुआ करता था। अलीगढ़ में पढे-लिखे । खाला-बी बाड़ी के सय्यद-बाड़े में ब्याही जरूर थीं, किन्तु मन बड़ी बहन के आँगन में ही डोलता रहता था। 15 साल छोटी थीं तो खानदान भर में वह छोटी खाला, छोटी फुप्पो, छोटी मुमानी और बस ऐसे ही रिश्तों का छोटापन उनके बेटे असलम ख़ान तक जा पहुँचा था । शराफत यार ख़ान बड़े थे, रिश्ते में बड़ी खाला के होनहार बेटे थे और लखनऊ में ही रहते थे किन्तु पढ़ाई-लिखाई में अम्मा बीबी मुनीरा बेगम अपने बेटे के लिए एएमयू से बेहतर दूसरी जगह के महत्व को नहीं स्वीकारती थीं, कारण थे शराफत के अब्बाजान स्वर्गीय मीर अमीर हसन एडवोकेट, जिन्होंने मुस्लिम विश्वविद्यालय में न केवल वकालत पढ़ी थी, बल्कि वहाँ की कोर्ट के सदस्य भी रहे थे। आजादी के आंदोलन में उनकी भूमिका भी सराहनीय रही थी। आज अगर वह जीवित होते तो लिबरल मुसलमानों के बड़े नेता बनकर उनका प्रतिनिधित्व कर रहे होते। उनके बहुत से दोस्त पाकिस्तान चले गए किन्तु उन्होंने अपने ही मुल्क को अपना ‘देश’ समझा और यहीं की मिट्टी में वह अंततः ग्यारहवीं पीढ़ी तक दफ्न होते चलेगए। छोटी-बी बाड़ी में ही रहीं। खुले-खुले घर थे, लेकिन सईयदों में पुरुष नगण्य थे। छुट्टियों में आम चूसने, जामुन चुनने, कैथे जमा करने, कच्चे-पक्के अमरूद तोड़ने में मेहमान बच्चों को खूब मज़ा आता। युवा लड़के लोग तो दो कोस दूर दरिया के उसपार घने बेरी के जंगलों में बंदरों की तरह उछलते-कूदते नजर आते थे। उधर के आदिवासियों के एक गाँव में मनोहर का घर मिल जाता तो बस गाँव फूला न समाता। वह बाड़ी मिडिल स्कूल का स्टूडेंट था। असलम से मनोहर की गहरी छनती थी। मनोहर जबरदस्त तीरअंदाज़ था। उस उम्र में ही वह हवा की रफ्तार के हिसाब से शिकार को मार गिराता था, इसलिए दोनों शिकार पर चले जाया करते थे। खाला बी बस पान चबाती रहतीं थीं । लेकिन सारे नौकरों और नौकरानियों पर से निगाह नहीं हटती थी। त्योहार जैसा वातावरण बन जाता था। कसबाई मानसिकता के बीच रची-बसी खाला नौकरों को भी अपने ही परिवार का हिस्सा मानती थीं। मुहर्रम में सभी शरीक होते। दस मुहर्रम को बबस्ती में ताजिये निकलते। जलसे-जुलूस में बाहर से भी अंजुमनें आतीं, असलम के दोस्त ताजिये निकालते, मेले जैसा माहौल बन जाता। लेकिन किसी ने भी खाला को कभी चौखट लांघने नहीं दी। तब भी नहीं जब उनके पति की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। तब उनके इकलौते पुत्र असलम ख़ान पाँच वर्ष के थे। बड़ी बहन मुनीरा बेगम ने असलम खान को लखनऊ में ही रखना चाहा लेकिन ज़रीना बेगम की तनहाई देख कर बहन ने एक पढ़ी-लिखी ट्रेंड लेडी अटेंडेंट तम्बोरा देवी को बाड़ी में नियुक्त कर दिया ताकि असलम खान की सही निगरानी और बेहतर तालीम पर निगाह रखी जा सके। तम्बोरा देवी कस्बा लहर पुर अर्थात लोहारी पुर से थीं। राजा चंद्र सेन गौड़ ने 1707 में मुस्लिम शासक को पराजित कर इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था । राजा टोडरमल इसी कस्बे के रहने वालों में से थे। तम्बोरा देवी गौड़ के पूर्वजों मेँ कुछ लोग ग़ाज़ी ताहिर के नेतृत्व में पासियों के युद्ध के बाद 1707 में जब राजा चंद्र सेन गौड़ का शासन आया तब तम्बोरा देवी के पूर्वज अवध में जाकर बस गए थे क्योंकि तब तक अवध पर अकबर बादशाह का शासन हो चुका था। तंबोरा देवी एक संस्कारित महिला थीं । वह मुनीरा बेगम के साथ समाज कल्याण संबंधी कार्यों से भी जुड़ी रहती थीं। उन्होंने गौड़ मुस्लिम युवक से कभी प्रेम-विवाह किया था किन्तु उसने मुंबई जाकर किसी अन्य महिला से विवाह कर लिया। इस घटना के बाद से उन्होंने फिर कभी प्रेम विवाह को महत्व नहीं दिया। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्नातक थीं और बहुत ही सौम्य प्रकृति की गंभीर महिला भी। जब उनसे स्वयंसेवी समाज कल्याण सामाजिक संगठन का बाड़ी में दफ्तर खोला गया तो उन्होंने स्थानीय बच्चों की शिक्षा की ओर भी ध्यान दिया जिसमें इंग्लिश और मैथ्स को प्रथम प्राथमिकता दी गई थी। इससे स्थानीय बच्चे ‘टिटोरियल क्लासेस’ में तेजी से आने लगे और सैय्यद बाड़ा का खंडहर फिर से आबाद होने लगा। कालांतर में छुटानी मियां यानि असलम खान को तंबोरा देवी ने मानो गोद ही ले लिया था। समय ने भी तो उनकी ज़िंदगी को बदलकर रख दिया था। उन्होंने असलम खान को न केवल पढ़ाया-लिखाया, बल्कि बेटे की तरह पाल-पोस कर बड़ा होने तक हिन्दू-मुस्लिम संस्कृतियों के संस्कार भी दिए। उसे बड़ा होते देख तंबोरा देवी फूली न समाती। उसे देखते ही उसके पेट में मरोड़ सी महसूस होने लग जाती थी। अजीब सा लगाव होता जा रहा था। जैसे वह उन्हीं का बेटा हो। जब वह अलीगढ़ जाने वाला था और तम्बोरा देवी उसे सी-आफ करने सिधौली के स्टेशन पर गई हुई थीं तब वह बहुत भावुक होने लगी थीं। वह उसे अपलक देखती रहना चाहती थीं, लेकिन आँखें डबडबा जाती थीं। तभी वह समय भी आया जब अत्यंत भावुक होकर एकाएक असलम खान को सीने से लगाकर रो पड़ीं। असलम ख़ान ने उन्हें बहुत समझाया, परिपक्वता का प्रदर्शन कर उन्हें रोका नहीं, रोने दिया। हालांकि इस संवेदनशील वातावरण में वह स्वयं भी बहुत भावुक हो गया था। उसने कहा, "मैम, बस मेरे लिए दुआ कीजियेगा। यह न कहिएगा कि हम प्रशासनिक सेवा में तो पोज़िशन पा जाएं लेकिन बाद में कहीं फ़ेल हो जाएं, जैसे भाई.....।” उसने हंसने का भी प्रयास किया ताकि मैडम का मन हल्का हो जाए लेकिन.... ”मम्मा! मैं जल्दी मिलने आऊँगा।” “असलम, आपने अभी क्या कहा? फिर से कहिए.....!” “कुछ ग़लत..... कह गया क्या?” देवी भरभराकर रो पड़ी थीं, "आपने हमें ममा कहा?” “कह दीजिए कि नहीं हैं! जो हैं वही तो मुंह से निकला। अम्मी ने जन्म दिया ममा, लेकिन आपने तो पैरों पर खड़ा कर दिया, बोलना सिखा दिया, बता दिया कि दुनिया से कैसे टक्कर लें। आप ही मेरी ममा हैं, ममा ही रहेगी। अम्मी अपनी जगह पर हैँ, आप अपनी जगह, मुझे तो खुशी है कि मैं तीन माओं का बेटा हूँ। अब जाएं?” “कहिए जल्दी आएंगे!” उस दिन असलम ने तंबोरा देवी की दोनों आँखों को चूमा था और अपनी भावुकता को काबू कर ट्रेन में बैठ गया था। लेकिन उसके जीवन के हर क्षण अविस्मरणीय रहे थे। तंबोरा देवी ने तो देर तक आँखें ही नहीं खोलीं थीं। कहीं असलम चला न जाए लेकिन अंततः ट्रेन की सीटी ने तंबोरा देवी को आँखें खोलने पर मजबूर कर दिया था। मुक़ीमपुर में जहां ज़मीनें थीं, वहाँ की देख-रेख बंदे हसन के बूढ़े पिता सलीम मियां के ज़िम्मे थी। उनके लिए मुकीमपुर में सैय्यदों के पुरखों का बड़ा सा पैत्रिक मकान था और हरवाहा घसीटे का परिवार भी उसी मकान में रहता था। घसीटे ही तमाम खेतों की देख-रेख करता था। उसके दोनों बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और सभी तरह के खर्चों की जिम्मेदारी मुनीरा बेगम उठाती थीं वह चाहती थीं कि सभी बच्चे ऊंची शिक्षा प्राप्त करें, उनमें यह भावना न पनप पाए कि वे सैय्यदों के परिवार से अलग हैं। ज़रीना बेगम अर्थात छोटी-बी ने बाड़ी को तो तब छोड़ा जब उनके पास एक संदेश आया कि बीबी सय्यद-बाड़ा अब छोड़ दें, हम सबकी आँखों में आपकी हवेलियाँ और आपका रहन-सहन और आपकी बोली चुभती है। एहसास होता है कि हम अपने ही देश में अब भी मुग़लों के ग़ुलाम हैं। आप बुरे नहीं हो, किन्तु हम भी अच्छे नहीं हैं। आँखों में आपकी भव्यता और संस्कृति चुभती है। क्योंकि हमारे पास बहुत बड़ा दिल नहीं है। माना कि आपके सुपुत्र असलम खान हमारे बीच उठते-बैठते हैं, हमारे बच्चे उनके साथ खेलते-कूदते हैं, लेकिन कल हमारी किसी बेटी ने आपके युवराज को पसंद कर लिया तब बाड़ी की शांति भंग हो जाएगी। यहाँ कभी बड़े दंगे नहीं हुए हैं, यदि हाथ ग़लती से भी खुल गए तो यहाँ की पुरानी बड़ी मस्जिद भी नहीं रह पाएगी और न ही सैय्यद-बाड़े के खंडहर। यदि ऐसा हुआ तो यहाँ एक बड़े मंदिर की नीव जरूर पड़ जाएगी। अब फैसला आपके हाथ में है....।’ संदेश ने ज़रीना बेगम के होश उड़ाकर रख दिए। वह पसीने से नहा सी गईं। चक्कर आए और धम्म से फर्श पर वह गिर पड़ीं। ज़माना कितनी तेजी से आगे निकल गया है। कितनी जल्दी हम अपनों से दूर किए जा रहे हैं। कितनी गुइयाँ थीं हमारी जो हवेलियों के आँगनों में खेला करती थीं, ईद, बक़रीद, होली-दिवाली, सब साथ मनाते थे, हर रंग में हमारे बदन रंग जाते थे, हम कहीं भी जाते, हमारी आँखेँ वहीं रह जाती थीं। शादी के बाद भी वर्षों तक वह वहीं तो रहती रहीं। असलम स्थानीय लोगों से गहरे तक जुड़ने लगा था। तंबोरा देवी को यह पसंद नहीं था। वह जानती थीं कि आने वाला समय बहुत अच्छा नहीं होगा। आजादी के बाद से सुनियोजित ढंग से मुसलमानों पर अंकुश लगाए जाने लगे थे। उनके लिए अच्छी नौकरियां नहीं मिलने जा रही हैं। बच्चे पाकिस्तान जाना पसंद नहीं करते थे, दंगों की आग कहीं भी और कभी भी भड़क जाती थी। मुसलमानों के लिए अब न विधान सभा में जगहें थीं, और न ही लोक-सभा में। लोकतंत्र अब उनका नहीं रहा था। कोई भी आगे बढ़ना चाहता तो उसे गुंडे-मावाली मार देते, सियासत उन्हें आर्थिक रूप से पीछे धकेल देती, बैंक लोन नहीं देते, पड़ोसी कॉलोनी में मकान खरीदने नहीं देते, बच्चों को पार्क में खेलने नहीं दिया जाता, हर शनिवार-रविवार शाखा के बंदे बच्चों में आकर उनमें धीमा जहर भर देते, नान-मुस्लिम बच्चे से दूसरा बच्चा पूछता,’तू मुसलमान है?” मुसलमानों का बच्चा अपने मां बाप से पूछता,” यह हिन्दू-मुसलमान क्या होता है?’ चिंतातुर भविष्य मुसलमानों से पूछता, भारत में उसके 25 करोड़ मुसलमानों का भविष्य कैसा होने जा रहा है? असलम ख़ान स्वयं अक्सर चिंतित हो जाते थे। पता नहीं उनके मस्तिष्क में कैसे-कैसे सवाल उठने लगते थे। क्या देवी मैडम भी कभी इतना गिर कर सोचने लगेंगीं? लेकिन वह तो बढ़ती सांप्रदायिकता पर चिंतित हो जाती हैं, भावुक होकर रो पड़ती हैं। वह तो माँ से बढ़कर प्यार करती हैं। फिर, नफ़रत का ऐसा ज़हर कहाँ से आयातहोता जा रहा है? क्या भाई जो बहुत योग्य समझे जाते हैं, उन्हें जानबूझकर इंटरव्यू में फेल कर दिया जाता था? क्या उनका फ्रस्ट्रेशन भी यही रहा है? उफ़! यह मानसिकता देश को कितना खोखला कर देगी। इससे तो देश से बाहर ही जाना बेहतर है। लेकिन माँ, देवी मैम, खाला, बड़े भाई, दूसरे बहुत से अपनों को असलम क्या छोड़ सकेंगे ? भविष्य अंधेरे के गर्त में डूबता जा रहा है । ये सब क्या हो रहा है? अलीगढ़ से असलम ने काफी रात को देवी मैडम को फोन किया, वह अकस्मात हड़बड़ा गईं। इतनी रात को ? जवाब आया, “बस यूंही अपकी याद आ गई। पढ़ते-पढ़ते झपकी आ गई थी। सोचकर भी क्या करता ममा, पता नहीं इस डार्क-एज की क्या उम्र है! हर साथी भविष्य को लेकर परेशान है। मैं पहले ऐसा नहीं सोचता था मांम, अब सोचने लगा हूँ। दोस्त लोग अपने घर लखनऊ, बनारस, इलाहाबाद, अलीगढ़ दिल्ली और मुंबई जाते हैं। लौटकर वे भी अपनी कहानी सुनाते हैं, बड़े भाई शमशेर खान भी अक्सर बताया करते थे। अम्मी भी पुराने किस्से सुनाने लगती थीं कि सिर पर पिता का साया नहीं था। मुक़ीम पुर में खेती थी, उसे बटाई पर देदी जाती थी। यह सब तो मैं भी देखता था। मेरा भी मन होता कि दोस्तों-रिश्तेदारों के पास माल्टा चले जाएं, पर भाई इसकी इजाज़त नहीं देते थे। वह चाहते थे कि अलीगढ़ में पढ़ूँ , ला करूं , इधर-उधर भटकने से क्या फायदा। मन को अकेला छोड़कर बस यही सोचने लग जाता कि देवी मोम से तो कभी राय भी नहीं ली। ‘कहाँ जाएं मोम? बहुत डिप्रेशन में प्रवेश कर रहा हूँ मैं। ’ बड़ी खाला ने तो रास्ता निकाल लिया, ‘अलीगढ़ जाईए। शराफत यार ख़ान भी तो वहीं के पढ़े हुए हैं। सरकारी नौकरी में भी आ चुके हैं। छोटी (असलम की मम्मी जी) का क्या है, वह लखनऊ में हमारे साथ रहहेंगी। जब बाड़ी जाने का मन होगा, हम सब मिलकर चली जाया करेंगी, नहीं तो अपनी बाजी के साथ तो हैं ही। ‘सुझाव है पर ग़लत नहीं हैं। नतीजा सामने है, मैं एएमयू में पढ़ रहा हूँ और भाई (शराफत यार ख़ान) सिधौली स्टेशन के स्टेशन मास्टर हैं । स्टेशन का अच्छा-खासा स्टाफ है। नियुक्ति के बाद इस स्टेशन पर उनकी यह पहली सरकारी नौकरी है। कुछ दिन उन्हें जरूर लगा था कि जैसे किसी ज़मींदार को मज़दूरों और किसानों ने मोटे रस्से से बाँध कर एक जगह पर बिठा दिया है लेकिन फिर जैसे वह उसी स्टेशन का हिस्सा सा बन गए हैं। रफ़्ता-रफ़्ता स्टेशन से उनका भी लगाव बढ़ता जा रहा है । असलम ख़ान आते तो अम्मी छुट्टियों में खाला के साथ सिधौली आ जातीं और देवी मोम सहित सब लोग घूमने निकल जाते। अम्मी छुट्टियों में खाला के साथ सिधौली जरूर आतीं थीं। स्वयं सेवी संस्थाओं से जुड़ी रहने की वजह से वह संस्थाओं की योजनाओं में भी दिलचस्पी लेती रहती थीं। वह जिला सीतापुर की सभी तहसीलों, कस्बों और थानों में जाकर स्वयंसेवी सामाजिक संस्थाओं और संगठनों के कार्यक्रमों का निरीक्षण भी करती रहती कार्यों से संबधित सभाएं करतीं और सामाजिक योजनाओं के क्रियान्वयन में भी भाग लेती रहती थीं। शराफत यार ख़ान को भी घूमने का बचपन से शौक़ था, लेकिन अकादमिक शौक उनमें बड़े होकर ही पला-बढ़ा। नौकरी की तलाश ने तो उन्हें वर्षों तक उलझाए ही रक्खा था। दादा तहसीलदार रहे थे, तो बाबा (पिता) देश की आजादी के आंदोलन में फांसी पर चढ़ा दिए गए थे । अम्मी ने सरकार से कभी उनकी पेंशन नहीं मांगी । शराफत यार खान को उर्दू के जासूसी उपन्यासकार इब्ने सफ़ी ने पढ़ना सिखाया था। फिर वह अपने आप पढ़ने लगे थे। ऐतिहासिक उपन्यास उन्हें जहां भी और जिससे भी मिलते, वह खरीद लाते थे । बस, उन्हें पढ़ने का नशा सा था । अम्मी कहतीं, बेटा, सपोर्टिंग-बुक्स तो बाद में भी पढ़ सकते हैं, जो सब्जेक्ट है, उस पर ध्यान क्यों नहीं देते । लेकिन ख़ान तो अपनी ही दुनिया में रहने के अभ्यस्त थे। शायद इसीलिए वह आई.ए.एस.की परीक्षाओं में हर वर्ष बैठने के बावजूद किसी भी वर्ष सफल नहीं हुए। कभी रिटेन में रह जाते तो कभी इंटरव्यू में। तीसरी बार तो बीमार ही हो गए । पता नहीं कैसे वह रेलवे बोर्ड की परीक्षाओं को एक ही झटके में पास करते-करते सहायक स्टेशन मास्टर बन गए। अम्मी को तो आज भी विश्वास नहीं होता है कि शराफत को नौकरी मिल कैसे गई। .....और फिर इसी को उन्होंने अपना मुकद्दर समझ लिया। अम्मी ने कहा, जब घना अंधेरा हो तो एक महीन सी रोशनी भी मंजिल दिखा देती है। आप बहादुर बाप के होनहार बेटे हैं। होनहार बच्चे परछाइयों से नहीं डरा करते। जाइए बेटा, अल्लाह ने यह रास्ता खोला है तो इसे गले लगाइए..... और इस तरह शराफत यार ख़ान अपनी ट्रेनिंग पूरी कर अपने नियुक्ति-पत्र और बंदे हसन को साथ लेकर सिधौली स्टेशन की कुर्सी पर जाकर विराजमान हो गए । अम्मी इसलिए खुश हो गईं कि अब उनके खानदान में जल्द एक नई गृहस्थी का दरवाजा खुलने वाला है। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि सलामत यार ख़ान को घूमने का बहुत शौक था। इसीलिए जब भी उन्हें फुरसत मिलती, वह छुट्टियों में बंदे हसन को लेकर गंगा नदी के मैदानी इलाकों में फैले जंगलों को देखने निकल पड़ते। उन्हें ऋषियों-मुनियों, उनके शिष्यों और साधु-संतों की पावन-धरती पर पाँव रखना बहुत अच्छा लगता था। वह चाहते थे कि उन्हें विश्व-प्रसिद्ध ऋषि शुंग के विश्वविद्यालय तक पहुँचने का कोई मार्ग बता दे। निमिष नामक जंगल को देखने की रुचि इसलिए थी क्योंकि इसमें ही आदि-ऋषि वाल्मीकि, दधीचि, महर्षि व्यास के अतिरिक्त शृंग ऋषि द्वारा निर्मित महा-शिक्षा केंद्र की स्थापना की गई थी। यह क्षेत्र 184 कोस अर्थात 126 किमी. क्षेत्रफल में फैला हुआ है। इन्हीं जंगलों में उन्होंने हफ्ते-छमाही तक अपने बाल-सखा समान सेवादार बंदे हसन को सारथी के रूप में साथ लेकर नौकरी के दौरान ही घूमने-फिरने निकल पड़ते थे। उन्हें आश्चर्य हुआ कि जिला सीतापुर का इतिहास तो ईसा से भी पहले का है। वाल्मीकि रामायण के अध्ययन से पता चलता है कि दशरथ पुत्र राजा रामचंद्र का पहला अश्वमेध यज्ञ इसी नेमिश जंगल में सम्पन्न हुआ था। अर्जुन के पुत्र वर्द्ध वाहन से उनका युद्ध होना और युद्ध में वीरगति पाने का वर्णन भी किया गया है। इसी क्षेत्र में (बताया जाता है कि) वेदव्यास की रचनाओं का संकलन करना, उनका संपादन और पुराणों का मंथन भी यहीं किया गया था। इसलिए शराफत यार ख़ान बहुत रोमांचित थे। राम को लेकर इतनी बड़ी राजनीति इस देश में खेली गई? किसी ने एक बार भी नहीं बताया कि पांडव तो नेमिश के जंगल में आकर बस गए थे। वेदों की ऋचाओं का यहीं तो सृजन हुआ था, फिर अयोध्या की राजनीति पर इतना धमाल क्यों? मन खिन्न हुआ तो वह कभी मानपुर घूमने निकल पड़ते जहां से वह महाभारत काल का एक इतिहास आँखों से देख सकते थे। देखा तो पता चला कि कभी यह क्षेत्र तो राजा विराट के स्वामित्व में आता था, लगभग 3 मील दूर दक्षिण की ओर मौज़ा रनवा पारा का वह मैदान है जहां पांडव पिता-पुत्र अर्जुन और पुत्र वर्धवाहन के बीच परस्पर यद्ध हुआ था। इस युद्ध में पुत्र द्वारा पिता अर्जुन की हत्या कर दी गई थी। इस प्रकार शराफत यार ख़ान समय मिलते ही सफर पर निकाल लिया करते थे लेकिन फिर कोविड ने उनके पैरों में बेड़ियाँ डाल दीं। जब कोविड लागू हो गया तब ट्रेनें भी रोक दी गईं। अब न कोई ट्रेन आ रही थी, न ही जा रही थी। स्टेशन के बाहर पुलिस ने अपनी छोलदारी लगा दी थी। स्टेशन सन्नाटे में डूब गया था। कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं सीतापुर से लखनऊ के बीच के क्षेत्रों में फंसे हुए यात्रियों को निकाल रहे थे या फंसे हुओं को उनके इलाकों तक पहुँचा रहे थे। शराफत यार ख़ान ने भी अलीगढ़ से अपने भाई असलम ख़ान को बाड़ी भेजकर वहाँ से उनकी माँ खाला-बी को, मछःरेठा से अम्मी और उनकी किसी खास युवती को वहाँ से लाने के लिए भेज दिया। जिन्हें लाने में असलम ख़ान को पूरा दिन लग गया। अजनबी लड़की का नाम नेमत था । वह जैसे ही अम्मी के साये में डरती-कांपती बंगलों के अंदर दाखिल हुई, शराफत यार ख़ान देखते ही स्तब्ध हो गए। लेकिन सहर अम्मी की ओट में रेंगती हुई उनके अपने कमरे तक चली गई। उसने फिर भी कनखियों से शराफत यार ख़ान को नजर भर कर देख लिया था। लेकिन शराफत यार ख़ान उसे देखकर बहुत बेचैन हो गए थे। वह हवा के झोंके की तरह अम्मी के कमरे में आते ही मानो बरस से पड़े, अम्मी, यह..... यह लड़की आप जानती हैँ इस लड़की को? "जान जाऊँगी, जरा सांस लेने दीजिए बेटा । क्या है इसमें, सींगें निकल आई हैं, पैर तो पीछे मुड़े हुए नहीं लगते हैं। मुंह भी अबया से ढका हुआ है। मुझे तो....।" "मुझे तो नेमत साहिबा बहुत पसंद हैं भाई। मेरी अम्मी को भी। मैं उनसे पूछ चुका हूँ। कहाँ हैं वह....? आप इजाजत दें और खाला अम्मी आप राज़ी हो जाएं तो बस.... मेरा निकाह समझिए हो गया।" "अबे मुरझाए खरबूजे के अंदर फंसे बीज, इन्हें मैंने ही डब्ल्यू.टी सफर के दौरान पकड़ा था। तुम इनसे पूछ सकते हो।" "अच्छा, मैडम, आप हैं वो जिनका भाई साहब बहुत जिक्र करते रहते हैं? बिना टिकेट के सफर करती हैं, हैं ना?" "ओए, पके कैथे के खट्टे मुसलमान फ़रिश्ते, मैंने कब इनका जिक्र क्या?" "अरे, नहीं किया है तो हम करने लेंगेगे। आप बिल्कुल परेशान मत हों! जी,नेमत साहिबा। आप का जुर्माना हम भर देंगे।" "बंदे हसन, मेरी छड़ी देखो कहाँ है? मैं अभी तुम्हारे छोटे सरकार की खाल में 151 रुए का भूसा भरता हूँ....।" कहकर वह असलम के पीछे दौड़ पड़े लेकिन सामने अम्मी आ गयीं। __________ अपनी डायरी के पन्ने पर शराफत यार ख़ान ने लिखा कि 'सम्बन्ध तोड़ने से पहले एक बार बैठ कर संवाद कर लो, संवाद रिश्ते बनाते हैं।' तभी उसी समय एक साया सरकता हुआ सामने की खिड़की के कांच पर कुछ क्षणों तक रुक कर अंदर झाँकता है,फिर वह लुप्त हो जाता है। शराफत यार ख़ान रोमांचित होकर खड़े हो जाते हैं। एक सिहरन शरीर भर में तैर जाती है। ख़ान को संभलने में समय लगता है। वह बैठकर फिर लिखने लग जाते हैं, 'जीवन एक स्वप्न है, अनुभूति का भ्रम है. न वह है, न वह स्पर्श देगा, न उसका इतिहास है, न भूगोल. न वह अतीत है, न वर्तमान. वह पहाड़ों से उतरने वाली धूप है, वृक्षों से खेलती हवा की गति है, ग़ की तरफ खुलने वाली खिड़की के कांच अकेलेपन का अदृश्य-भय है और सूर्य के गिर्द घूमती हुई धरती का नाद, तुम किसे तलाश रहे हो?' शराफ़त यार खां, क़लम एक तरफ़ रख कर खिड़की के बाहर ट्यूब लाइट की रोशनी में भी अनार के वृक्ष को देखने लगते हैं। पहाड़ी मैना का जोड़ा सामने की शाख पर बैठा नींद का खुमार ले रहा था। अचानक परिंदों में शोर सा हुआ, परिंदों के शोर के बीच मन में गुदगुदी सी हुई। एक मैना आ गई, फिर दूसरी भी, टू फॉर ज्वॉय! सुबह-सुबह कौन सी ख़ुशी मिलने वाली है। यह असलम भी कहाँ-कहाँ से टोने-टोटके कान तक ले आता है। इसी समय सिग्नल होते ही रुकी हुई मालगाड़ी शोर के साथ स्टेशन के प्लेटफॉर्म की तरफ़ धड़धड़ाती हुई जाने लगी थी। परिंदे फिर लौट आए थे लेकिन शोर कम नहीं हुआ था। शराफ़त यार खां ने अंततः खिड़की का पर्दा डालने का मन बनाया। थकान, सिर-दर्द और तनाव अब सोने नहीं देंगे। आंतरिक मन में जिस तरह की उन्हें बेचैनी है, उनमें सोच के धागे भी एक-दूसरे में उलझते जाते हैं। कितना मुश्किल हो जाता है किसी दूसरे के बारे में गहराई से सोच लेना, उसे पढ़ लेना, उसके अंदर तक उतर जाना। ये लेखक, अदीब, वैज्ञानिक, दार्शनिक, विचारक और चिंतक लोग कितनी तरह की पीड़ाओं से साक्षात करते होंगे। क्या सचमुच हम शबनम की ज़िंदगी को उसके शब्दों के हर कोलाज को देख, पढ़ और सोच-समझ पाएंगे? जब उसकी बेनूर आँखों से आँसू ढुलका होगा, तब क्या हम उस एक बूंद में उसके खुद के ब्रह्मांड को देख पाए थे? पता नहीं हमारे डीएनए में लेखक बनने का कीड़ा कहाँ से आ गया? हमारी कहानी का तो यह चरित्र दर्द की तपती हुई ईंटों की मुकम्मल भट्टी है। जिसके हर पहलू में आग भरी हुई हैं। उसकी कहानी कहाँ से शुरू करें और कहा उसका अंत हो। शराफत यार ख़ान को लगा था कि वह सभी कुछ लिख सकते हैं लेकिन जब शबनम को उन्होंने उसकी यातना की अंधी गुफा में उतर कर देखा तो वह कांपकर रह गए। पता नहीं यह लेखक लोग कैसे इतना कुछ लिख लेते हैं? स्वयं में जी लेते हैं, यातनाओं को सह लेते हैं। कानों में शबनम के बयानों की दर्दनाक चीखें गूंजने लगती हैं। उसके अनुसार उसे किसी अस्थिर मजबूत तख्ते से कसकर बांध दिया गया था। उसके हथकड़ी लगे हाथ मेज पर चाबियों से कस दिए गए थे। एक निर्मम सा आदमी प्लास से उसके हाथ का नाखून खींचने की तैयारी कर रहा था । "मैंने कभी भी हेरोइन कॉक्सिन का इस्तेमाल नहीं किया है।" शबनम ने थरथराती आवाज में कहा,"मैं तो यह भी नहीं जानती कि कोको और मेरिजोना के पैकेट्स मेरे सूटकेस में कैसे पैक कर दिए गए। मैं कैसे बताऊं कि इतने ढेर से डॉलर्स मुझे किसको देने थे। यह सब जो मेरे सूटकेस से बरामद हुआ है, वह मेरे लिए खुद किसी आश्चर्य से कम नहीं है। आप लोग मेरे हसबैंड से बात कर सकते हैं।" जवाब मिला, "आपके पासपोर्ट में आपके तो हसबेन्ड का नाम ही नहीं है। अब आप कहेंगी कि....., छोड़िए! हमारी इन्क्वायरी से भी पता चला है कि अपकी कसटमाइज़-मैरिज नहीं हुई है......।" “मैं प्रेगनेंट हूँ!"वह भरभराकर रो पड़ी थी। "मैं झूठ कैसे बोल सकती हूँ! मेरे पेट में 6 माह का मेरा बच्चा है, आप लोग मेरा मेडिकल करा सकते हैं। बच्चे के डीएनए से भी पता चल जाएगा कि मैं ग़लत नहीं हूँ!"दिये। "जो पूछा जा रहा है, उसका जवाब दो! डरो मत, इंटरोगेशन में हमें ऐसा सब कुछ पूछना पड़ता है। तुम ग़लत नहीं होगी, मैं मान सकता हूँ। लेकिन तुम नहीं जानती कि तुम्हारे किट से....कॉक्सिन, कोको केक्स के कई स्लाइस मिले हैं जिनकी कीमत करोड़ों डालर्स में है। तुम्हें दिखाया भी गया है कि किस तरह बैग की प्लेटों पर ह्वाइट पाउडर को पेस्ट किया गया था।" किसी ने भारी आवाज में बताया।," यह बहुत बड़ा मामला है। हमें तुम्हारी बताई हुई सूचनाओं के माध्यम से टॉप-टॉम तक पहुंचना है। "शबनम एकाएक चकराकर गिर पड़ी। डॉक्टर ने निरीक्षण कर बताया,"इसे ऐड्मिट करना पड़ेगा।" "यह लड़की मछली का चारा है।" बैठक में किसी बड़े अफसर ने अपनी राय व्यक्त की। "लेकिन हम इसे शक के बिना भी नहीं छोड़ सकते। इसके बैग से ड्रग तो बरामद हुई है न! इतने भर में ही इसे 10 वर्ष की सजा होनी तय है। इसमें तो हम लोग कोई मदद नहीं कर सकते। हमें इस लड़की के सहयोग से नई योजना पर काम करना होगा। इसे हम छोड़ नहीं सकते लेकिन बड़े टारगेट के लिए इसका इस्तेमाल तो कर ही सकते हैं।" लेकिन शबनम को यह नहीं बताया गया कि कोई टारगेट ऐक्शन में सक्रिय हो चुका है । शबनम के लिए मारीशस में उस देश के नारकोटिक्स-सेल के सहयोग से एक ऊंची पहाड़ी पर सर्व सुविधा सम्पन्न बने बंगले का प्रबंध किया गया। इस टीम में महिलाएं भी थीं और पुरुष भी, सुरक्षा का एक मजबूत कवच इस बंगले पर 24 घंटे निगाह रखता था। बंगले में चिकित्सा का पूरा प्रबंध था और दो एम्बुलेंस हर समय एलर्ट में रहती थीं। इंटैलिजेंस का अपना अलग प्रबंध था और वह छोलदारियों में छुपकर बंगले पर निगाह रखते थे। शबनम के जख्मों का तेजी से इलाज किया जा रहा था ताकि उसे बंगले के बाहर भी लाया जा सके। शबनम इस हादसे से लगभग टूट सी गई थी, लेकिन वह अपने बच्चे के लिए अब जीना चाहत थी। हालांकि पुलिस कास्टडी में वह अपना नारीत्व तक ह्रास होने के निकट पहुँच चुकी थी। लेकिन एक रात उसे जेल की हवालात में कुछ ऐसा महसूस हुआ जैसे उसका बेबी उससे बातें कर रहा है। वह दीवानी सी हो गई। अपने पेट पर दोनों हाथ फिराने लागी, 'म..मे रा बच्चा, मेरी जान!" शबनम एकाएक फूट-फूटकर रोने लगी। वह किसी को क्या बता सकती थी, उसे तो खुद कुछ नहीं पता था। वह तो उन्हीं हिदायतों पर यात्रा कर रही थी, जिन हिदायतों की उसे ट्रेनिंग दी गई थी। वह दर्द से कराही, मुझे.... नहीं जीना है। बस, मेरे बच्चे को मरने से बचा लो कोई। लेडी ऑफिसर ने धीरे से कान में कहा, "तुम्हारी बेबी सुरक्षित है। उसे कुछ नहीं होगा। डॉक्टर निगरानी कर रहे हैं।” नर्सिंग होम में शबनम इतना सुनकर फिर अचेत हो गई थी। फिर एक समय ऐसा आया जब सभी लोग हताश और निराश हो गए। किसी ने कड़ककर कहा, इसको साउथ नेरोबी में लेजा कर फेंक दो। किसी महिला की आवाज सुनाई दी,’इंडिया में इसकी माँ भी है। शायद शबनम सहानुभूति पाने के उद्देश्य से कोई सूचना दे दे।’ लेकिन एकाएक शबनम को तन्हा छोड़कर टॉर्चर-रूम से सतर्कता विभाग के अधिकारी उसे अकेला छोड़कर बाहर निकल गए। नीग्रो महिलाएं उसे मूर्छित अवस्था में ही किसी अज्ञात स्थान पर लेकर चली गईं। डायरी कर शराफत यार ख़ान ने से भीगे रुमाल से आँखें पोंछीं, नींद का खुमार जाता रहा। अपने लिखे को उन्होंने खुद पढ़ा, जो कोरेक्शन थे दूर किये, पानी का गिलास खाली कर स्टडी के परदे सरकाए, खिड़कियां खोलीं, सुबह की ताजी हवा ने बदन को फूल की तरह तारों-ताज़ा कर दिया। सुबह हुई तो कांच के खुले शीशे के उस पार बाग़ में एकाएक तोते-तोतियों का बड़ा सा झुण्ड सब तरफ फैल गया था। सबके फैल जाने से इतना शोर होने लगा था कि खान बच्चों की तरह हंसने लगे थे। उन लम्हों में थकान जाती रही थी। सोचने लगे, वह भी यहाँ से निकलकर जंगल में जाकर बस सकते हैं। तोते के साथ किसी तोती को लेकर उड़ सकते हैं। अजीब सा कानों में ज़िंदगी का संगीत गूँजने लग जाता है ‘अल्लाह की कैसी भी मख्लूक हो, उसमें बदसूरती तो होती ही नहीं है। उसका हर कोण सौन्दर्य से भरा हुआ होता है..... खिड़की पर पर्दा डालकर खूँटी से तौलिया उतार कर शराफत यार ख़ान ने अपने मोबायल पर देखा कि शायद कोई फोन आया हो लेकिन किसी का भी फोन नहीं आया था। । खिड़की से अंदर झाँकने वाला शोर अब बाहर ही रह गया था। सामने दीवार पर टंगी घड़ी देखी। कोविड की आमदआमद के बीच बड़ी कठिकाई से एक ट्रेन 10 डाउन का समय अब ज़्यादा नहीं बचा था क्योंकि वह बहुत लेट हो चुकी थी। यह भी संभव है कि ट्रेन का स्थगन हो जाए लेकिन बंदे हसन से मालूम हो गया था कि फास्ट-पैसेंजर लेट चल रही है लेकिन आएगी जरूर। खान कंधे पर तौलिया डालकर वॉश-रूम की तरफ़ चले गए । कानों में पता नहीं कहाँ से बन्दे हसन की आवाज़ गूंजी कि 'भाई खां, यह एनआरसी बहुत खतरनाक चीज है क्या? मेरा साथी इस्माइल बोले तो, बता रहा था कि सरकार मुसलमान को मुलूक से बाहर भेजने वाली है, समुंदर में डुबो देगी, ऐसा होयेनगा क्या? हम करोड़ों मुस्लमान किदर को जायेंगा? आप यह नौकरी कैसे कर सकेंगा? बच्चे कैसे पढ़ सकेंगे? मियां, ये सब क्या हो रिया है? हमारे बाश्शा लोगां ने तो किसी हिन्दू को मुलक से नहीं निकाला! उन्ने तो शादियां कर रिश्ते मज़बूत किये थे... जवाब देव ना ख़ान ?" शराफत यार खां शावर खोलकर उसके नीचे आ गए थे। वह अपने समूचे वजूद के पोर-पोर को भिगोकर चेतन-अवचेतन से अपनी हर तरह की निगेटिविटी को धो देना चाहते थे, फिर जैसे साँस उखड़ने लगती है। वह जोर-ज़ोर से हाँपने लगते हैं। कानों में कहीं दूर से अम्मी की आवाज़ सुनाई देती है ,"बाश्शा खान! लक्ष्मी के घर चले जाइएगा, अपने किसी आदमी को भी भेज दीजिए। राशन-पानी मंगाना होगा। उनका बेटा लखनऊ गया हुआ है।...." नल से पानी गिरना बंद हो गया था। तभी बन्दे हसन ने आवाज़ लगाई, "भाई खां! अम्मा जी कल आएंगी क्या?' शराफत यार खां ने चौंक कर डांट लगाई,"अबे भूतनी के, नल का पानी क्यों बंद कर दिया?" जवाब मिला, 'लाईन में काम चल रहा है भाई खां, पानी की बाल्टी भरकर रख दी है। मैं दूध लेने जारिया हूँ.. बोले तो!.... " खां साहब ग़ुसलख़ाने में ही फट पड़े."अबे चुप! बीमार मुर्गी की नाजायज़ औलाद के गंदे अंडे. कमरे से बाहर जा, जल्दी से लक्ष्मी आंटी के घर पूछ के आ, बल्लभ भाई आये कि नहीं, तू यहां से भाग जल्दी से. ट्रेन का टाईम भी हो गया है।" अंदर की खीज होंठों पर आ गई थी। ‘काम करेगा नहीं, सियासत पहले करा लो। गधा, इतनी भी अक्ल नहीं है कि 20-25 करोड़ मुसलमान कैसे निकाल दिए जाएंगे? कोई विरोध नहीं करना चाहता है क्योंकि इस मुल्क की बढ़ती खुशहाली पर दुश्मन निगाह रखता है। वह खुद एक बर्बाद मुल्क है, इसे भी चाहता है कि बर्बाद करे। यहाँ का हिन्दू क्यों चाहेगा कि भारत में अव्यवस्था फैले। मुट्ठी भर बाजरा कबूतर खाते हैं, ताकि वे गर्म रहें, शांत-प्रिय आदमी तो उसके आंटे से भी मिठाई के लड्डू बना लेता है। इस देश का आम आदमी तो परिंदों तक को पालता है, मुसलमानों की बात तो करना ही बेकार है। सियासत की बातें सियासी लोग करें, हमें तो अपना स्टेशन और अपनी ट्रेन देखनी है। सही कहावत है, बीतता हुआ समय आवारा हाथी की तरह होता है जो अपने लिए एक छत वाला घर भी नहीं निर्मित करा सकता है जबकि एक दो वर्ष की उम्र पाने वाली चींटी अपने लिए मज़बूत और लम्बी बांबियां बनाकर अगली नस्लों को सौंप जाती है। रहस्यों से लिपटी दादी के अनुभवों का खज़ाना उसके अपने पास अवश्य था और न दिखाई देने वाली दूर-दृष्टि भी उसके सिवा अन्यों के पास थी। कहते हैं कि सादा और सूफी ज़िन्दगी जीने वाले शराफत यार खां को भी दादी की चौपाल में बैठने से कोई एतराज़ या परहेज़ नहीं रहता था क्योंकि उनके अनुसार वहां से उन्हें अपनी मिटटी की ही खुशबू का अहसास होता था। एक सुबह लखनऊ मेल से आई एक्सप्रेस ट्रेन से सिधौली के प्लेटफार्म पर हिजाब में छुपी एक लड़की उतरी, (जिसके पास टिकट नहीं था) उस दिन लाईन-मैन बउवा बेहुरा की गेट पर डियूटी लगी हुई थी. टीटी की अनुपस्थिति और असिस्टेंट स्टेशन मास्टर शराफ़त यार ख़ान के मौखिक आदेश पर टिकट चेक करने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था के अंतर्गत बहुवा बेहुरा को गेट पर लगाया गया था। हिजाब में छुपी वह लड़की डियूटी-रूम में ले आई गयी, तो वहां ख़ान साहब को उसने अत्यंत व्यस्तता की हालत में देखा। स्टेशन मास्टर को कोविड फीवर था, इसलिए वह छुट्टियों पर थे। ट्रेन के छूटने की सूचना प्रसारित होने लगी थी। गार्ड और दूसरा स्टाफ अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर बाहर जा चुके थे। लड़की बेंच पर बैठी अपने दिल की धड़कनें गिन रही थी। देर बाद सीनियर लाइन-मैन बउवा बेहुरा बेंच पर बैठी लड़की के पास आकर कान में बोला, "यहीं बैठो! साहब अभी बिज़ी है। मैँ अभी गाड़ी छोड़कर आता हूँ। याद रहे, तुम बिना टिकिट सफर पर थीं। भागना मत, कानूनी मामला है।" रेंगते समय के साथ लग रहा था, प्लेटफॉर्म पर पैसेंजर रफ्ता-रफ्ता कम होते जा रहे थे। धीरे-धीरे 'चाय-चाय',समोसा....' का शोर भी कम होता जा रहा था। तिपाई पर बैठी लड़की फ्रेश-रूम के बहाने कई बार बाहर गई, फिर लौट आई। दो-तीन बार वह लेडीज़ रिटायरिंग रूम में भी गई। एक बेगम साहिबा को अपनी निजी गाड़ी और ड्राईवर का इंतजार था। उन्होंने टोककर पूछा भी लेकिन उसने उन्हें कुछ नहीं बताया, वह बेचैनी में आकर बेंच पर बैठती, फिर चली जाती। उसने अफसरों को व्यस्त देखकर प्लेटफॉर्म का एक चक्कर भी लगाया। पता चला, पैसेंजर कम होते जा रहे हैं। लाइन-मैन बउवा बेहुरा भी शंटिंग की तरफ़ निकल गया था क्योंकि लख़नऊ पैसेंजर प्लेटफॉर्म नंबर-3 पर आने वाली थी लेकिन इस समय वह एक घंटा लेट थी। वह लड़की भी ईमानदारी से शराफ़त यार ख़ान के ऑफिस में बार-बार लौट आती। सुबह-सुबह रेलवे स्टॉफ भी लड़की की तरफ़ ध्यान नहीं दे पा रहा था। हालाँकि दो एक टीटी, टीसी, खुद गार्ड, रेलवे के दूसरे मुलाज़िम साहब के रूम में आते-जाते एक उड़ती नज़र उस पर भी ज़रूर डालते थे लेकिन गहमागहमी में किसी का भी ध्यान उस अनजान लड़की पर नहीं गया। सबको लपरवाह पाकर लड़की बड़ी होशियारी से दबे पाँव चलकर ऑफिस से बाहर निकल गई और तेज़ क़दमों से चलती हुई प्लेट-फॉर्म के अंतिम छोर तक पहुँच कर सीमेंट की बनी उस बेंच पर बैठ गई जो एक पियाऊ के पास बनाई गई थी। हालाँकि बेंच पर उस समय दो सैनिक, एक महिला और एक किशोर बालक पहले से ही बैठे हुए थे. लड़की ने पियाऊ से पानी पिया, मुंह हाथ धोये और कृत्रिम मुस्कान बिखेरती हुई हाथ-मुंह-साफ करने लगी। अब तक सूरज निकल आया था। अनेक चिंताओं के कारण लड़की अंदर से बहुत डरी हुई लग रही था । उसकी फिसलती हुई निगाहें इर्द-गिर्द हर उस व्यक्ति को टटोल रही थी जिस पर उसका संदेह मज़बूत हो सकता था। कहीं कोई पकड़ने आ गया तो? दूर से भी कोई आता दिखता तो लड़की को लगता, बउवा बेहुरा लौट आया है लेकिन पास आने पर वह व्यक्ति बउवा बेहुरा नहीं, कोई और निकलता था। धूप फैल गई थी. कोई मालगाड़ी गुजरने वाली थी। लड़की एकाएक घबराकर खड़ी हो गई। महिला ने पूछा,'क्या जा रही हो?' हकलाते हुए उसने कहा, "हहहहहाँ! जा रही हूँ. वो...वो सामने....!" सामने से रेलवे ऑफिसर शराफत यार खां अपनी डियूटी पूरी कर कॉलोनी की तरफ ही लौट रहे थे। लड़की डरकर पहले उनके साथ हो ली। उसे लगा, अब पकड़ी जाएगी। रेलवे ट्रैक से उतरकर जब वह अपनी कॉलोनी की ओर मुड़ने वाले थे तो एकाएक वह रुक गए, उन्हें लगा, कोई उनके पीछे-पीछे चल रहा है। मुड़कर देखा, अबाया से ढकी एक लड़की बराबर चलने की कोशिश कर रही है । उन्होंने सीशम के पुराने वृक्ष के नीचे रुक कर लड़की को ऊपर से नीचे तक देखा, पूछा,'कोई बात है क्या? बहुत घबराई हुई हैं आप !" "जी सर! आप मुझे पुलिस के हवाले मत कीजियेगा, टिकट न लेना मेरी मजबूरी थी। " होठों पर जीभ फिराते हुए उसने एक साँस में कह दिया,"मेरे पास पैसे नहीं थे। मैँ घर से भागकर यहां तक आई हूँ। पुलिस मुझे फिर मेरे सो-काल्ड बाप के दोज़ख में पहुंचा देगी। प्लीज़ मुझे जेल में मत भेजिएगा ...।" "ओह!" शराफत यार खां फिर चलने लगे थे । लड़की भी उनके साथ चलते-चलते रेलवे कॉलोनी के फाटक तक पहुँच गई। "मैँ कुछ समझ नहीं पाया। " उन्होंने कहा,"आप घबराइए नहीं। हम आपको न तो पुलिस के हवाले कर रहे हैं और न ही जेल भेज रहे हैं। मैं आपकी ईमानदारी की प्रशंसा करता हूँ। बताएं, मैं अब आपके लिए क्या कर सकता हूं? अभी आप जाकर महिला रिटायरिंग-रूम में बैठें। अटेंडेंट को मैं फोन किए देता हूँ। आप से वह टिकेट की बात नहीं करेगा। वहां आप को किसी भी तरह की असुविधा नहीं होगी। लेकिन बिना टिकेट के आप सीतापुर से आ रही हैं। यह तो जुर्म है। देखता हूँ मैं कि क्या कर सकता हूँ। आप रिटायरिंग-रूम में जाकर बैठें, मैं आपको कुछ देर में बुलवाता हूँ।” “आप मुझे पुलिस के हवाले तो नहीं करेंगे?” “एक मालगाड़ी की क्रासिंग है, हम घर जाकर कुछ देर आराम करना चाहते हैं। फ्रेश होकर आते हैं, आप जाकर आराम करें, आपने तो कुछ खाया-पिया भी नहीं होगा। हम अटेंडेंट को फोन पर हिदायत दिए देते हैं।” “आप तो यहीं रहते होंगे। क्या मैं कुछ देर के लिए आपके साथ आपके घर नहीं रुक सकती ? आप ग़लत न समझें, मैं कोई ऐसी-वैसी लड़की नहीं हूँ सर।” “सब ठीक है लेकिन हम सरकारी अफसर हैं, सरकार के नौकर हैं, समझती क्यों नहीं हैं। हमें अपनी नौकरी बचानी मुश्किल हो जाएगी। आप जवान हैं, खूबसूरत है। लड़की है। हमारा नाम पंकज अवस्थी नहीं है। शराफत यार ख़ान है, समझती हैं? बहुत मुश्किल से नौकरी मिली है, हालांकि यह मेरा निजी मामला है, आपसे नहीं कहना चाहिए था, फिर भी कह रहे हैं ताकि आप मेरी पोजीशन को समझें। आप रिटाइरिंग में जाइए। वहाँ आपको कोई परेशानी नहीं होगी। हमें सोचने दीजिए कि हम अपकी किस तरह से मदद कर सकते हैं। ” “मैं आपको आपके घर में डिस्टर्ब नहीं करूंगी। मैं मौला की कसम खा कर कह रही हूँ ।’ “आप समझती क्यों नहीं हैं, मैं एक जिम्मेदार ऑफिसर हूँ। चलिए, चलिए हमारे साथ!” “आप डरिए नहीं! खुदा की कसम, आपको हम कुछ नहीं होने देंगे, अम्मी, भाभी, बाजी...... सबको हम मना लेंगे। जरूरत पड़ी तो हम जान तक दे देंगे।” “हम अकेले रहते हैं। बताया है न! यहीं पास रेलवे कॉलोनी में, इसलिए डर रहे हैं। हम शादी-शुदा नहीं हैं। हमें अपकी जान की जरूरत नहीं है। अब आप चलती हैं या हम जाएं... ।” “वह तो सब ठीक है ... लेकिन मैं कोई ऐसी वैसी नहीं हूँ. पढ़ी-लिखी हूँ। बस, मुझे उस दोज़ख से बाहर निकलना था। सोचिए! अपकी बेटी या बहन या बी-लविड को गुंडे घेर लें, उठाकर ले जाने की कोशिश करें, तब आप उसे जाने देंगे?” "नहीं!" खान के होंठ स्वतः ही फड़कने लगे, अजीब जबरदस्ती है। "अब आप चलेंगी या हम जाएं ?" एकाएक शराफत यार ख़ान चलते-चलते रुक जाते हैं। सिर के भीतर दिमाग़ में एक तूफान सा महसूस होने लगता है। वह अपलक लड़की को देखने लगते हैं। सारा बदन पसीने से शराबोर हो जाता है। रेल की पटरियों में कुछ हलचल होती है। फिर तेज रोशनी का फव्वारा दोनों पर गिरता है। लखनऊ जाने वाली पैसेंजर धड़धड़ाती हुई बहुत पास से गुजरकर हवा के ठंडे झोंके देती हुई प्लेटफ़ॉर्म की ओर चली जाती है। शराफत यार ख़ान और अजनबी लड़की अब भी आउटर पर मूर्तिवत खड़े एक-दूसरे को हाली रोशनी में भी देख रहे होते हैं । कानों में लड़की चीख रही थी, ‘बचाओ ! बचाओ, मेरा यह सौतेला बाप एक दिन मुझे भी बर्बाद कर देगा....।’ जब शराफत यार ख़ान अपने सरकारी बंगले के दरवाज़े पर पहुंचे तो एकाएक लड़खड़ा गए। बंदे हसन ने लपक कर साहब को संभाला। उन्हें उनके कमरे में पहुंचाया। लड़की ड्राइंगरूम में ही रुक गई। बंदे हसन लौटे तो चिंतित लड़की ने पूछा ,"साहब कैसे हैं, क्या हो गया था उन्हे? तबीयत ठीक है ना…..ऑफिस में तो सही-सही थे। डॉक्टर को तो नहीं बुलाना है। मेरा मोबाइल कहीं गिर गया है, उसमें डॉक्टर के नंबर थे।" "वैसे आप कौन है बीबी, मैंने पहले नहीं देखा, इसलिए पूछा.... ?" “मैं.....लड़की हूँ। फर्स्ट क्लास की पैसेंजर हूँ, वेटिंग रूम में रुकी हुई हूँ। टाइम था, इधर आ गई। कोई परेशानी..... । सर अंदर गए हैं, उनके साथ ही लौटना है मुझे । कितने सवाल करते हैं आप। जैसे मैं कोई बिना टिकेट के........। ” “आप बैठे, आपका घर है। पानी लाता हूँ।” बंदे हसन ने शांत मुद्रा में कहा और पानी लेने चला गया। “इसे घर कहते हैं, यह तो पूरा अंग्रेजों के जमाने का बंग्ला है।” लड़की आपने आप से बातें करने लगी,"सरकारी ऑफिसर भी लग्जरी लाइफ जीते हैं। क्या शानदार बांग्ला है। “अरे!....,मैडम जी?” बंदे हसन ने झिझकते हुए पूछा, "पानी लीजिए। आप कौन हैंमैडम? साहब तो कमर सीधी कर रहे हैं। आप सोफ़े पर बैठें, चाय लाऊँ?"” “मैं..... कौन हूँ, यहाँ क्यों हूँ? सवाल तो जेनुईन है। कौन हैं हम? हाँ! पानी.......?” बंदे हसन हक्का-बक्का। ‘ये क्या मामला है? यह लड़की?’ गिलास से पानी छलका तो बंदे हसन चौंक गए। “उफ़!” लीजिए मैडम जी,पानी!” इसी समय ट्रैक सूट पहने असलम और ऊपरी फ्लोर पर रहने वाले बड़े बाबू की मोटी बिटिया कौसर अंसारी, दोनों ने अंदर आते ही एक साथ लड़की को देखा तो हतप्रभ रह गए। ‘यह कौन है?’ ‘भाई तो लड़कियों से भागते हैं, फिर?’ वह मन में बड़बड़ाया। “आप यहाँ, म.....म... म... म.... मैं असलम, शराफत भाई का छ.. छ.. छोटा पैकेट। जिनका यह बंग्ला है। हम तो एएमयू में पढ़ते हैं। और आप ......? आप तो एएमयू में बिल्कुल बढ़ती नहीं होंगीं मिस मलाया...।” “मैं कोई मलाया, श्रीलंका या मलेशिया की नहीं हूँ....। मैं..... नेमत नियाजी हूँ।" बिना हकलाए हुए नेमत ने जवाब दिया। “मैं? एक सिम्पल पढ़ी-लिखी लड़की हूँ...... लड़की। आप हमें ‘नेमत’ भी कह सकते हैं। ट्रेन में डब्ल्यू टी सफर कर रही थी। ग़लती से यहाँ उतर गई। आपके स्टेशन मास्टर बड़े खुर्रांट हैं, जेल भेजने पर तुले हुए हैं, अब मेरे पास तो पैसे हैं नहीं...। आप लोग खुद बताइए, कहाँ से दें पैसे? जब हैं ही नहीं। भाग कर तो घर से निकली थी, मेरा बाप क्रिमिनल है। मेरी इज्जत लूटना चाहता है। बाप, समझ रहे हैं आप।?” “बाप? इज्जत लूट सकता है?” उसने हास्यास्पद मुद्रा में कौसर की ओर देखकर धीरे से पूछा,“बाप, कुछ हाई डोज़ का मामला नहीं लगता मोंटी ?” “यार, मैं तो कुछ समझ नही पा रही हूँ।” “अरे तो क्या हुआ, पेनाल्टी कितनी है, मैं भरे देता हूँ ?” कौसर ने असलम से चिपककर चुटकी ली और दांत पीसती हुई गुर्राई, “ऊँहूँ, बड़ी मुहब्बत आ गई है। अलीगढ़ साथ लेते जाओ। मैं दूसरी ट्रेन से चली जाऊँगी।” “आप.परेशान न हो, मैं.... मैं रिटायरींग रूम में ही रुकी हुई हूँ । वहाँ से सुबह जाऊँगी। यहाँ तो मैं यूं ही आ गई थी। सर के साथ, बस यूं ही ...... । उनका सरकारी बांग्ला दखने। बाहर से बहुत ब्यूटीफुल है। अंबियन्स भी अच्छी। है। आप लोग भी बहुत अच्छे हैं। खासकर असलम साहब, यही नाम बताया था न आपने।” “अच्छा, मैंने अपना नाम बताया था, मुझे तो याद नहीं। जरूर बताया होगा।” असलम ने घबराते हुए कहा,“आप बैठिए।” “नहीं, चलती हूँ। रिटाइरिंग रूम में लौटना है। अटेंडेंट ने जल्दी लौटने के लिए कहा था,चलती हूँ। लगता है सर, सोकर अभी नहीं उठे हैं। ओके।” उसने उड़ती हुई निगाह सब तरफ डाली लेकिन शराफत यार ख़ान नजर नहीं आए। उसने गेट पार करते हुए भी एक नजर बंगले के गेट की ओर डाली लेकिन मायूस होकर वह लौट गई। “घबराइए नहीं, बस हम आ ही रहे हैं। हमें भी स्टेशन ऑफ़िस पहुंचना है।” शराफत यार ख़ान ने अंदर से बाहर आते हुए कहा,“चलते हैं आपके साथ। आपके रिज़रवेशन की प्रॉब्लेम भी साल्व किए देते हैं।” लेकिन सब आश्चर्यचकित थे कि वह किससे बातें कर रहे हैं?” "भाई, आप जिस लड़की के बारे मेँ जिक्र कर रहे हैं, वह लड़की तो जा चुकी है।” "अरे, वैसे भी उस लड़की से हम ग़ैर जरूरी बातें क्या करते, सोचा आप लोग तो हैं ही। कोई नहीं, स्टेशन पर पहुंचकर उसको ऑफिस में बुलवा लेंगे। वह बिना टिकट सफर पर थी। देखते हैं, उसके बारे में ऑफिस क्या कर सकता है।" उन्होंने सबको आश्चर्यजनक स्थिति में डालते हुए कहा,'आते हैं!' इतना कहकर ही वह बंगले से बाहर निकल गए। उनके जाते ही सबके मुंह आश्चर्य से खुले के खुले रह गए थे। असलम ने कहा,'यह हुई न बात। भाई ले उड़े परिंदे को। और......मैं जी हुज़ूरी ही करता रह गया। हमारी किस्मत में तो बस, बाजरे की रोटी और दही का पानी ही बदा है। क्यों कौसर, ग़लत कहा हमने?" कौसर ने तड़ से जवाब दिया,'नाउज़बिल्लाः!आप तो कुरानी आयात की तरह हैं, आपके लिए अल्लाह आसमान से मनसल्वा उतार सकता है। ऊपर चलिए, मेरी अम्मी ने आपके लिए मनसल्वा तैय्यार किया हुआ है। जबरदस्त माशक़ा चल रहा है।" "यह कहिए कि बकरीद के क़त्लगाह में कुर्बानी का बकरा तलाश लिया गया है। आप तो माशाल्लाह! वैसे भी कुर्बानी का बकरा हैं।" "एक अपकी मम्मी हैं,जिनका मैं कुर्बानी का बकरा हूँ। दूसरी तरफ हमारी और माएं जो हैं, हमारी बलाएं लेती रहती हैं। हम नहीं जानते कि हमारी अम्मी, खाला-बी और मेरी मिंटयोर-मम्मी सब लोगों से इतना प्यार कैसे कर लेती हैं। उनमें इतना प्यार कैसे भरा रहता है। कॉलोनी के लोग मम्मी और शबनम माई को एक साथ आश्चर्य से देखते हैं। चीमेगोइयां भी होती हैं। बिक्रम बेहूरा बड़े साहबों को बताता है कि इस महिला का पूरा मुंह जला हुआ है। पता नहीं, शायद बदन भी जला हो। लेकिन यह तो हर किसी से बात भी नहीं करती, किसी से कभी कुछ मांगते हुए तो शायद ही किसी ने देखा हो। वर्षों से यह इसी प्लेटफॉर्म पर दिखती रही है। पीछे जो झुग्गी बस्ती है और जिसे हम सब इंदिरा कालोनी कहते हैं,उसी में यह रहती है लेकिन सही मानो में तो यह प्लेटफ़ॉर्म ही इसका घर है। हर ट्रेन से उतरने वाले लोगों में वह न मालूम किसके आने का इंतज़ार करती है। उसकी जिस्मानी आंखेँ न जाने किसको तलाशती रहती हैं। एक बार एक लड़की जैसे ही उसके पास आकर खड़ी हुई, वह उसके हाथ-पैर और चेहरे के चिन्हों को टटोलने लगी। कमाल है, उस लड़की ने भी उसे नहीं टोका बल्कि उसके साथ महिला विश्राम कक्ष में काफी समय बिताया। अटेंडेंट ने बताया कि उसने लड़की की कुछ आर्थिक मदद भी की थी। लेकिन वह कौन है, कोई नहीं जानता। यह भी नहीं पता कि बाड़ी बेगम साहिबा के पास माई क्यों आती है? लंगड़ा तैमूर कालोनी का गेट पारकर इधर नहीं आ सकता है, बाग के कुत्ते इस पर दौड़ पड़ते हैं। वैसे तो गेट पर सरकारी सिक्योरिटी गार्ड रहते हैं, चेक-पोस्ट भी है उनकी ड्यूटी के दौरान अनुमति के बग़ैर न तो कोई अंदर से बाहर और न कोई बाहर से अंदर आ सकता है। स्टेशन पर आने-जाने वाली ट्रेनें लगातार आती-जाती रहती हैं। इधर देर से कोई ट्रेन नहीं आई थी लेकिन जब स्टेशन के कर्मचारी ने घंटी बजानी शुरू की तो प्लेटफ़ॉर्म पर एकाएक मानो ज़िंदगी फिर से लौट आई हो, “चाय... चाय, गरम समोसे।” “लखनऊ तिल की रेवड़ियाँ .....” “कंपुरिया हलवाई का पेड़ा।” “भेल-पूरी…” पानी..... पानी। " इस हालचल के दौरान रेलवे-कर्मचारी भी हरकत में आ गए। देखते-ही देखते टिकट की खिड़की से लगकर एक छोटी सी लाइन भी खिंचती चली गई। पूछताछ की खिड़की पर भी यात्री दिखने लगे। वेटिंग लाउंज में मुसाफिरों के बोरिया-बिस्तर संभलने लगे। निराशा में आशा की किरण फूट पड़ी थी । ट्रेन को सीतापुर से चलकर लखनऊ पहुंचना था। ऐसे ही एक दूसरी ट्रेन लखनऊ से चलकर सीतापुर जाने वाली है और दोनों ही ट्रेन अपने-अपने प्लेटफ़ॉर्म नंबर पर आकर रुकेंगी। महानगरों से निकाले जा रहे मुसाफिरों का तांता लगने वाला है। सरों पर सामान लादे, भूखे-प्यासे, बच्चों की उँगलियाँ पकड़े मजदूर, कारीगर, निम्न मध्य-वर्गीय नागरिक, किसान और कर्मचारी आदि पीड़ित यात्री स्टेशन पर फैलते जा रहे थे और रफ़्ता-रफ़्ता गहमगहमी बढ़ती जा रही थी। रेलवे-कर्मी माल बाबू के साथ माल के डिब्बे का लगेज माल-ऑफिस के सामने रख गया था, यहीं से कुली माल ढो कर लगेज डिब्बे में चढ़ाते हैं। वह वहाँ से लौट कर आने के बाद अपने सहायक स्टेशन मास्टर के कमरे में गया तो वहाँ सारे तार-बेतार की मशीनें धड़ाधड़ अपनी सर्विस में सक्रिय हो चुकी थीं। उनके बीच बड़े बाबू के टेलीफोन का शोर,“दया राम....., घंटी दे। गाड़ी इटौजा छोड़ चुकी है। बिक्रम बेहुरा को फ्लैग दे आ, उसे सिग्नल की तरफ जाना है। हेलो! स्टेशन सिधौली...गाड़ी आ रही है, गेट नंबर..... हैलो, गेट लॉक!” इस तरह स्टेशन के फर्स्ट आउटर को पार कर रही एक्सप्रेस प्लेटफ़ॉर्म पर अपने कई सहयोगी अधिकारियों के साथ शराफ़त यार ख़ान, कमरे से निकलकर बाहर आए तो रेलवे पुलिस अधिकारी, टीटी, टीसी सहित कई छोटे-बड़े अन्य रेलवे अधिकारी भी उनके साथ हो लिए। देखते-देखते गेट पर सभी लोग सतर्क हो गए थे। दूर सामने से अब ट्रेन का इंजन साफ़ आता दिखाई देने लगा था। ट्रेन माध्यम गति से प्लेटफ़ॉर्म के निकट पहुंचते ही आगे बढ़ती आ रही थी। बड़े बाबू ने फिर अपने ऑपरेटिंग रूम से दया राम को आवाज दी, बाहर से कोई दौड़कर अंदर आया, किसी ने बताया,“वह तो अभी आउटर पर होगा, शायद गार्ड बाबू के पास।” प्लेटफ़ॉर्म पर रफ़्ता-रफ़्ता गहमा-गहमी बढ़ती जा रही थी। समस्त अधिकारी मुख्य-द्वार के पास आकर खड़े हो जाते हैं। अब तक यात्री गेट से बाहर निकलने लगे थे। गेट पर टिकट कलेक्टर कलेक्शन कर रहा था। रेलवे पुलिस ने जिन दो चोरों और गिरहकटों को इटोंजा में दबोचा था, उसे उसी स्टेशन पर उतारकर रेलवे पुलिस ने अपने स्थानीय अधिकारी के सिपुर्द कर अगले कदमों की ओर अभी बढ़े ही थे कि एक सशस्त्र सहायक टोली नायक ने झपटकर दो व्यक्तियों को संदेह के लाभ में दबोच लिया। वे मुंह पर मास्क लगाए हुए नहीं थे लेकिन अंततः वे भीड़ का लाभ लेकर भागने में सफल हो गए। प्लेटफ़ॉर्म के पियाऊ पर माई मुंह नीचे झुकाए बैठी हुई थी। वैसे भी वह चेहरे को रोज ढक कर ही रखती थी। उससे एक फुट के फासले पर लंगड़ा तैमूर भी बैठा हुआ था। अकारण उसे छेड़ता हुआ वह उस पर व्यंग्य कसता और किसी मालिक की तरह रोआब जमाता रोज की तरह उस समय भी भाषण के घूंट पिला रहा था, “जला चेहरा सामने रखा कर, ऐसे में दयावान अधिक दयालु होकर बड़ा दान दे देते हैं। वैसे भी डेंगू का समय है... ।” “डेंगू नहीं! कोविड ....” “हाँ वोई। वोई कह दिया था मैं। मैं तेरी तरह पढा-लिखा भिखारी नहीं है। औरत कैसी भी हो, दया की पात्र तो वह बन ही जाती है लेकिन तू तो राजा विक्रम के महल की महारानी है। ठीक कै रिया हूँ। भीख मांगना थारे भाग्य में नहीं था और न है, वो तो म्हारे भाग्य में है।” “कितना अंट-शंट बोलता रहता है तू! सब कुछ जानते हुए भी। मैं कोई न जन्मजात भिखारी हूँ और न तेरी तरह लंगड़ा। कितना समझाऊँ तुझे? कहते हुए भी बुरा लगता है। तुझे तो मैं भूखा नहीं रखती ना, सब कुछ तो खिलाती हूँ....? मैं तो अपने जीवन के अंधकार में यहाँ किसी रोशनी की तलाश में आकर बैठती हूँ...। मैं यहाँ आकर अपने अतीत में जीने लग जाती हूँ। शायद कभी इसी प्लेटफ़ॉर्म पर वह रोशनी मेरे भीतर की अंधी आँखों को चकाचौंध कर दे.... मेरे समूचे वजूद के हर अंधेरे कोने से फूट पड़े....” सिधौली स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर सीनियर ऑफिसर शराफ़त यार ख़ां अपने मातहतों के साथ आफिस के सामने ही खड़े नजर आए। उनके सामने से ही मुसाफिरों की दौड़ती-भागती भीड़ गुज़र रही थी। उनमें बिना मास्क लगाए भीख माँगता हुआ एक ही व्यक्ति था, वह था लंगड़ा तैमूर। उसे देखते ही पुलिस के एक कांस्टेबिल ने दौड़कर उसे झपट लिया और बेंत से धप मार दी। वह लंगड़ा तो पहले से ही था, बेत खाने के बाद लँगड़ाता हुआ अभी भागना ही चाह रहा था कि उसे पुलिस ने पकड़कर अधिकारियों के सामने ला खड़ा किया। उसने गिड़गिड़ाना शुरू किया,”माई-बाप! मैं ऐसा-वैसा भिखारी नहीं हूँ।” “किसने कहा? तू तो वीआईपी है, तू ही बता फिर कैसा है?” पुलिस अफसर ने उसे छेड़ा । “पुलिस का खबरी भी है मैं। आज ही खबर दी है अपुन ने। गुल्लू और बस्ती जेल से छूट कर आज इधर टेसन पर देखे गए हैं। जो नहीं जनता है, जान ले.....मैं बताता है, ये दोनों माई बर्निंग केस के मुलजिम हैं जिन्हें बरसों से पुलिस को तलाश है लेकिन कोई ताकतवर इन्हें फरार करा देता है। यह जमानत पर बाहर आए हैं, और माई के लिए नई मुसीबत लेकर आए हैं, वे मेरे को भी मार देंगे! शबनम बघई केस में समझौता हो गया है, शबनम ने आत्महत्या कर ली है और उसका बयान बदल दिया गया है ।” “अबे तू क्या है? क्या बक रहा है....इसे अंदर ले जा भाई! बहुत खतरनाक लगता है... ”। इंस्पेक्टर ने उसे ज़ोर की फटकार सुनाई, “चोप! साले मादर...बिना देखे ।” “क्या हुआ .....?” शराफत यार ख़ान ने गरदन घुमाकर लंगड़े तैमूर को देखकर पूछा, “कोई खास खबर है क्या? वैसे इंस्पेक्टर, उसकी बात तो हम भी नहीं समझते। पता नहीं कहाँ-कहाँ की कौड़ी ले आता है। लेकिन कुछ ऐसा है जरूर जो यह कहना चाहता है एसपी वानखेड़े को उसकी बात सुननी चाहिए। मेरी कल उनसे फोन पर बात होगी तो इस विषय पर भी डिस्कस करूंगा।” “साब! बहुत बार डांट लगा चुके हैं, अब तो जुर्माना लगाना पड़ेगा।” ऑफिसर ने खीजते हुए कहा,” खुले में भीख माँगता है। बोगियों में भी घुस जाता है। कोविड का ज़माना है साब जी, मास्क तक नहीं पहनता...।” पुलिस अधिकारी ने रिपोर्ट की। “क्यों बे, ये सब क्या शिकायत कर रहे हैं? और तू आयें-बाएं शाएं हांक रहा है।” शराफत यार ख़ान ने भी डांट लगाई कहा,“बुरी बात है। हमारे बाप की उम्र के हो, कुछ अपना खुद भी ख्याल रखो !” पुलिस को सलाह देते हुए कहा,“छोड़ दो इसे, ठीक से चल तो पाता नहीं है, जाने दो!......, ” फोन पर बात करने से पहले शराफत यार ख़ान ने अधकारी से इशारा करते हुए कहा,“ यह चोरी-वोरी नहीं करता है। बहुत पुराना खबरी है, मैंने भी सुना है। जाने दो..जा बे , भाग!” “भाग साले....,.” पुलिस अधिकारी ने धमकाया, बोगियों में गया तो तेरी कोख में पूरा डंडा डाल दूंगा।” इसी समय हाथ में लंबी टॉर्च लिए हुए लाइनमैन बहुआ बेहुरा आ गया, “साब! मम्मी जी कब आ रही हैं? बंगले का रंग-रोगन होना है। बड़े साब तो अब उसमें आवेंगे नहीं! वह तो ‘परमोसन’ के बाद सीतापुर चले गए। बंगले में तो अब आपको ही रहना है। ऊपर मियां जी, मेरा मतलब बड़े बाबू शिफ्ट भी हो चुके हैं। आँगन में जामुन और आम बहुत उतरता है साब जी। हम तो पहले वाले साहब जी की मालकिन ठकुराइन बीबी से अनार ले जाते थे। घर वाली बीमार रहती है ना! आड़ू को तो बच्चा लोग कच्चा -पक्का ही तोड़ लेते हैं ... । बस, पपीता इस बार अच्छा उतरेगा। पानी-वानी खूब डालता हूँ साहब!” “हाँ ! उस बंगले का रिनोवेशन होना है...।” शराफत यार ख़ान ने कहा,“बड़े बाबू को बुलाओ! कहो, ऐड्मिन की फ़ाइल पुटप करें ।” कुर्सी से पीठ टिकाकर उन्होंने सामने पड़ी बेंच पर माई को देखा,”जी! बताइए.... लंच का वक्त है। आप कुछ लेना चाहेंगी ?” “वह साहब, मैं यह कह रही थी कि आप बड़े अस्पताल के डॉक्टर साहब से सिफारिश कर देंगे तो मैं पथरी का इलाज उन्हीं से करवा लूँगी। एक गुर्दा रह गया है, उसमें भी डॉक्टर पथरी बताता है।” “एक मिनट!” शराफत यार ख़ान लंच शुरू करने से पहले ही चौंक पड़े,”आपने कहा कि आपकी बस एक ही किडनी है..... क्यों, दूसरी ?” “उसी में तो मेरी ज़िंदगी की कहानी दबी हुई है।” वह दरवाज़े की ओर देखते हुए चुप हो गई। बिक्रम बेहुरा कमरे में दाखिल हुआ था,“साब जी, मालगाड़ी रुकेगी या...” इससे पहले साहब को, फिर माई को अचकचाई निगाह से देखा, बोला,” आप लंच ले लें, मैं छोटे बाबू से मालूम कर लेता हूँ।” कहकर वह चला गया था। इसी समय फिर घंटी बजी तो शराफत यार ख़ान ने कहा,“मैं लंच लूँ या छोड़ दूँ! मेरे भाई, मालगाड़ी को क्लियरेन्स दें, उसका नेक्स्ट हाल्ट डाली गंज है। ओके!” कुछ क्षण रुक कर साहब ने संवाद जारी रखा,“हाँ! आप क्या...क्या बता रही थीं, आप की दूसरी किडनी....?” वह बताने ही जा रही थी कि स्वचालित दरवाज़े का पट थोड़ा खुला, एक व्यक्ति ने गर्दन अंदर कर झाँकते हुए पहले शराफत यार ख़ान को देखा फिर बेंच पर माई को। उसने शराफत यार ख़ान को “सलाम अलै कुम” भी कहा तो माई के कान खड़े हो गए। वह होंठों ही होंठों में बड़बड़ाई, “गुलूबट ...यहाँ ?” फिर आगंतुक धीरे से दरवाजा भेड़ कर बाहर चला गया। माई, स्टेशन के सामने सती माँ दरबारी देवी के मंदिर से लगी कल्याणी बस्ती के कोने में झुग्गी नंबर-2 में रहती थी लेकिन उसका अधिकतर समय स्टेशन के गार्ड बाबू के कमरे की बग़ल में स्थित गूलर के वृक्ष के नीचे बने चबूतरे पर ही बीतता था। ईज़ीनग से घिरे इस चबूतरे पर कभी पवित्रा देवी घड़े और मटके रखे प्यासे मुसाफिरों को पानी पिलाया करती थी। जब पहली बार माई बुखार की हालत में सिधौली के स्टेशन पर उतरी और भय व आतंक के वशीभूत फटे बांस की खपच्ची से रास्ता टटोलती हुई पियाऊ से टकराई तो पवित्रा देवी ने लपक कर उसे संभाल लिया। इसी झुक जाने वाले सजदे ने माता पवित्रा देवी को पहली बार अनायास देवी को माता माई कहा और तभी से वह स्वयं भी माई हो गई। यहीं से उसने अन्नपूर्णा के रूप में पवित्रा देवी की गोद में अपनी माँ की गर्मी महसूस की और उसे ही सारे राज़ बताकर निश्चिंत हो गई। लेकिन दुर्भाग्य से एक दिन उसकी अन्नपूर्णा भी इस दुनिया से चली गई। तब से माई एक झुग्गी और प्लेटफ़ॉर्म के एक प्याऊ की मिल्कियत के साथ अन्नपूर्णा के कहे शब्दों को पवित्र ग्रंथ मानकर जीती आ रही है कि हर बुरे शब्द को अपनी स्मृति से निकाल फेंक क्योंकि वह कांच के टुकड़े की तरह होता है। यदि वह अंदर रह गया तो चुभता रहेगा, सक्रिय हो गया तो घाव बनाने लगेगा। बस, उम्मीद का हाथ मत छोड़ बच्चे, तू भी अन्नपूर्णा है....उस किरण की प्रतीक्षा कर जो तेरे अंधकार को प्रकाश से भर देगी। ‘कोविड तो बढ़ता ही जा रहा है साहब । ‘लॉकडाउन’ की अपनी अलग समस्या है। क्या होगा साहिब जी?” आवाज ट्रेन के सायरन में दब गई। सिग्नल हो जाने के कारण अब वह ट्रेन चल पड़ी थी। आज शराफत यार ख़ान को कुछ अजाने में ही असहजता का अनुभव हो रहा था। लड़की के पास टिकट नहीं था। पता नहीं उसने श्रीमती बेगम बिलकीस बानो को यह बात बताई कि नहीं लेकिन शुक्र है कि उसने श्रीमती बेगम बिलकीस बानो से अपनी कोई और कहानी न बताकर उनके मानवीय पहलू से प्रभावित होकर फ़ेवर हासिल कर लिया हो और उन परिस्थियों में उनके साथ जाना बेहतर समझ लिया हो। मतलब साफ़ है कि उसके हालात सामान्य नहीं थे और वह यहाँ से भी निकल लेना चाहती थी, लेकिन पता नहीं मुझपर कब, किसका भूत सवार हो जाता है। मैंने सुना ही नहीं, यह तो कोई बात नहीं हुई, मुझे सुनना चाहिए था। अम्मी जब यह सारी बातें सुनेंगीं तो कितनी डांट लगाएंगी। बंदे-हसन सही कहता है कि उन्हें हमदर्द का ‘खमीर-ए-आबे रेशम’ जरूर लेना चाहिए। इस उम्र में ऐसी याददाश्त, तौबा ? स्टेशन के स्पीकर पर अनाउंस हो रहा था कि यात्री-गण अनावश्यक यात्रा से बचें, कोविड से खुद को सुरक्षित रक्खें। जगह-जगह थूकने से संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। हर यात्री को मास्क लगाना आवश्यक है। जो नहीं लगाएगा वह अपराध की श्रेणी में माना जाएगा। सरकारी घोषणा के अंतर्गत....। प्लेट-फ़ॉर्म पर मानो घबराहट दौड़ने लगी थी । हर कोई दौड़ने-भागने और एक-दूसरे से टकराने लगा था। भीड़ बढ़ती जा रही थी। रोगी स्टेशन से निकल रहे थे और ट्रेनें जहां थीं, वहीं रोक दी गई थीं। यात्री सरों पर सामान लादे दौड़ लगा रहे थे। खाँस-खकार, रोग-शैय्या....। मृत्यु-भय .....यह कोविड कहाँ से आ गया भाई? इसका इंजेक्शन कहाँ मिलेगा? यह डोलो टैबलेट कहां से मिलेगी? अरे उधर देखो......कैसे साँसे ले रहा है? यह चीख-पुकार की आवाज़ कहाँ से आ रही है? क्या कोई यात्री मर गया है? गश्ती पुलिस के वॉलिंटियर चौकस थे, हर एक पर उनकी तेज नजर थी। यह अचानक एक साथ तबाही का दृश्य कैसा था। बाबा भुजक्कड नाथ पियाऊ के पास पीपल के नीचे बैठे सत्संग लगाये थे। उधर दो रेलवे पुलिस के जवान पास में ही भीख मांगने वाले भिखारी तैमूर लंगड़े पर लठियाँ बरसाते हुए उसे स्टेशन से भगा रहे थे। माई को भी डर लगने लगा था । अगर ब्लैक-आउट हो जाता तो हर ओर अंधेरा छा जाता। पुलिस कड़क आवाज में माई को हड़काती, 'अपनी बस्ती में जा माई। भाग जा, पाबंदी लगने वाली है। सरकार ऐक्शन ले सकती है।' पुलिस भी बहुत घबराई हुई थी। 'जा माई, निकल ले । पियाऊ में ताला डाल दे! तुझे तो वैसे भी कुछ दिखाई नहीं देता है ।' झुग्गी में प्रवेश कर माई ने अंतस की आवाज में महसूस कर लिया था कि लंगड़ा तैमूर झुग्गी में मौजूद है। वह अपनी खाट पर लेटा हुआ रेलवे पुलिस को गालियां देने में व्यस्त था, ‘देख लेगा मैं सबको। पुलिस ने पिछाड़ी सुजा दी है अपुन की। मेरे को चोर बोला। एक-एक को देख लेगा मैं...।” “क्या देखेगा, किसको देखेगा? इतनी उम्र से तू देख ही तो रहा है। पहले भी पुलिस मारती थी, आज भी तू पिट रहा है। कभी तुझमें कोई बदलाव आया? फोकट की ज़िंदगी जीने की आदत बन गई है। इतनी उम्र में तो एक खोखे का मुंसिपालटी से लाइसेंस अपने नाम करा सकता था। मैं ने भी स्टेशन पर जगह अपने नाम कराई कि नहीं? क्या हुआ, पुण्य का काम है । प्यासे को पानी पिलाती है मैं। एक कोठरी तो है। बड़े साब कह रहे थे कि माई, फलों की टोकरी रख ले, कुछ पैसे आते रहेंगे। एक लड़के के साथ चाय-पानी का काम भी खोल सकती है। तुझे तो मैं यहाँ नहीं रख सकती। यहाँ भी बैठकर भीख मांगेगा।”. “पैसे देता हूँ पुलिस को, माइंचों।” लंगड़ा तैमूर ग़ुस्से में खाट पर उठकर बैठ गया था, “मुफत में टेशन पर भीख नहीं माँगता। ऊपर तक देता है मैं ..... हाँ! तेरी तरह मुफ़तखोर नही है मैं ।” कानों में बगल के मंदिर का घंटा गूंजा तो तैमूर ने दोनों कान पकड़कर आँखें मूँद लीं । “रोटी खाई! दूँ निकाल कर?” माई ने ज़ख्मी चोटों को गर्म पानी से सेंकते हुए कहा,”बहुत बोलता है तू, इसलिए पिटता है । रोटी खाकर सो जाना। मुझे साहब के यहाँ भी जाना था, मूई कोरोना के कारण वहाँ भी नहीं गई। बेगम साहिबा आने वाली थीं, शायद आ गई हों । किसी ने गेट पर नहीं रोका तो मैं मिलने कल जा सकती हूँ। अब तू भी सो जा...।”. यात्रियों के लिए परेशानियाँ बढ़ती जा रही थीं। खबरों के बीच शराफत यार ख़ान को अपनी माँ और मौसियों का खयाल आ गया, ”कौन?” जवाब आया, मैडम बिलकीस बानो शावर लेने गई हैं। हाफ एंड हावर के बाद फोन कर लीजिए। आप अपना नाम बताएंगे? मुझे डायरी करना होगा।” “शराफत यार ख़ान ! आंटी को बता दीजिए ।” इससे पहले कि उधर से कुछ कहा जाता, ख़ान ने संपर्क ही काट दिया। वह समझ गए, 'यह लड़की, (कानों में आवाज आई, मछरेठा गई है। मैडम बेगम बिलकीस बानो के साथ। उनका ड्राईवर लेने नहीं आया था। तब वह इसी लड़की के साथ यहाँ के तहसीलदार सतीश कुमार सिंह साहब की कार से अपने घर गई हैं। उस लड़की का नाम जो दर्ज हुआ था वह था नेमत....?' ख़ान साहब के होंठ थरथराए, नेमत नियाज,ी कितना खूबसूरत नाम है। वह खुद भी तो कितनी खूबसूरत थी। कहाँ हो ? मुझे क्या होता जा रहा है? मैं तो कभी ऐसा न था । रात से मैं सोया नहीं हूँ। तुम जैसी खूबसूरत लड़कियां डब्लू टी कैसे सफर कर सकती हैं? मेरे पास आई थीं, ठहर जातीं। हम बहुत बड़े बेवकूफ हैं। घर आई ‘लक्ष्मी’ से ही पीछा छुड़ा लिया। उफ़! इसी समय मोबाइल का नंबर बजने लगा, ‘अरे, इस नंबर पर तो नेमत का नाम है। यानि उसने हमें अपने नंबर से डायल किया है? वह भी आंटी के फोन से.... हैलो!” “मैं डब्ल्यू टी नहीं हूँ। बेगम साहिबा से पैसे लेकर प्लेटफ़ॉर्म का टिकेट ले चुकी हूँ।” किलकारी करती हुई नेमत ने शराफत यार ख़ान से छेड़खानी की,”अब अपकी नौकरी खतरे में नहीं है। बेगम साहब ने मुझे 'खरचा- पान'ी दे दिया है। मैं डब्ल्यू टी नहीं हूँ।” “ओह! तो आप हैं.... मिस डब्ल्यू टी”। “ मैडम जी से अभी बात कराती हूँ। ” “मैं थोड़ा घबरा जाता हूँ। बहुत मुश्किल से नौकरी मिली है। मैं इसे नहीं छोड़ सकता ।” “मेरा नाम नेमत नियाजी है। आपके दिल की तरह साफ़-शफ़फाफ़ ! यह ज़िंदगी भी तो आप की ही है। आप न बचाते तो मैं कहाँ होती? बचाया है तो अब आपको संभालना भी होगा।” यह क्या हो गया है मुझे? मैं कैसे नेमत की तरफ खिंचता चला जा रहा हूँ? वह क्यों मेरी आँखों में बस्ती जा रही है? कहाँ से आई है यह परी पैकर? ए अल्लाह! रहम कर। कहीं मैं इसके इश्क में गिरफ्तार न हो जाऊं। इन्हीं उधेड़बुन में शराफत यार खान की आँखों में एक तरह का खुमार पैदा होने लगा। बाहर से बंदे हसन खबर लाया था कि ऐप ‘माई-गेट’ से खबर है कि माई मिलना चाहती है। शराफत यार खान तो खुमार में उनींदे से होते जा रहे थे। कोई अजनबी, पिछली दो रातों से उनके अस्तित्व को झिंझोड़ रही है। उसे उन्होंने अकेला कैसे छोड़ दिया? पहले घर लौटते समय उनसे प्लेटफ़ॉर्म के बाहर मिली थी और बिना टिकेट के सफर करती रही थी। और अब वह मेरी कल्पनाओं में, मेरे तसव्वुर में, मेरे वजूद के हर गोशे में दरिया की तरह बहती रहतीी है। उसे लगा, वह बग़ल में खड़ी है। वह पार्क में ख़ान के साथ ही टहल रही है। वह ढेला उठाकर आम को तोड़ रही है, वह नर्म घास पर दौड़ने लगी है, वह इमली तोड़ लेना चाहती है लेकिन इमली उसके हाथ से दूर है, वह आदेश दे रही है, मुझे गोद में लेकर उठाइए..... ऐसे, तोड़ ली इमली! और फिर हर तरफ घुँघरू बिखर गए हों। बहुत से घुँघरू बजने लगे हों, दिल के तार झनझना उठे हों। वह भाग रही है, आई लव यू शराफ़त ......? मुझे छुओ! आई लव यू..... !” “लव यू बेबी!” पता नहीं कब वह अपनी कुर्सी पर ही बैठे-बैठे, आँखें मूँदे बड़बड़ाने लगे थे, “लव यू बेबी!।” स्टेशन के सहकर्मी एक-दूसरे को आश्चर्य से देखते हुए सब मुस्करा रहे थे। महिलाएं झेंप रही थीं। लेकिन किसी ने उन्हें इस ख्वाब से जगाना उचित नहीं समझा । कमरा लोगों से भर गया। फिर बड़े बाबू आ गए। हिलाडुला कर शराफत यार ख़ान को उनके स्वप्न से उबारा, वह हड़बड़ाकर उठे तो सबको आश्चर्य से देखने लगे, "क्या हो गया था मुझे?” “बड़े बाबू कहते हैं, “लवेरिया!” इसके बाद देर तक शराफत यार ख़ान के ऑफिस रूम में ठहाके बिखरते रहे। कोरोना के भय ने सबको डरा दिया था। ट्रेनें न केवल लेट थीं बल्कि बहुत सी कैंसिल भी होती जा रही थीं। यात्रियों का जमगठा बढ़ता जा रहा था। खबर के अनुसार ‘नेमत’, यानि वह अजनबी लड़की जिसने शराफत यार खान की नींदें हराम कर दी थीं, वह इस समय सीतापुर के ही कस्बा मछरेठा में स्थित स्वर्गीय मौलवी अहमदुल्लाह शाह के टीले वाली हवेली में बेगम बिलकीस बानो के साथ सकुशल मौजूद है और बहुत खुश है। बेगम बिलकीस बानो नक़्शबंदी घराने की वारिस थीं। यूं तो यह हवेली इतिहास पुरुष एक स्वतंत्रता सेनानी क्रांतिकारी मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने अपने जीवनकाल में बनवाई थी लेकिन उन्हें इसमें रहना कभी नसीब नहीं हुआ था और वह 1857 के विप्लव के जमाने में ही 16 अप्रैल, 1857 को शहीद हो गए। स्वतंत्रता संग्राम के सैनिक क्रांतिकारियों के साथ उनकी यह लड़ाई सिधौली, (सीतापुर) के कस्बा बाड़ीऔर मुकिम पुर गाव के करीब तत्कालीन ब्रिटिश हमलावर सेना की एक टुकड़ी के साथ हुई थी। तब घाघरा नदी तक सैनिक क्रांतिकारियों का पूरा कब्जा था। इस युद्ध में राजा लोन सिंह, फिरोज शाह और बख्शी हरी प्रसाद सिंह भी शहीद हुए थे। यह युद्ध फैलते हुए खैराबाद तक जा पहुँचा था जहां अंग्रेज़ी सेना के ब्रिगेडियर जनरल बाकर के लिए नई कुमुक पहुंची तो देशी क्रांतिकारियों के हौसले पस्त होने लगे लेकिन फिर उन्हें भी राजा हरी प्रसाद सिंह, लोन सिंह और ख़ान बहादुर ख़ान के दस हजार घुड़-सवार, पैदल फौज और दस हजार पैदल सैनिकों की कुमुक मिल गई और जंग का नक्शा बदल गया लेकिन कुछ कायस्थ वारियरों और इलाकाई जमींदारों के धोखा देने के कारण राजा हरी प्रसाद के आदेश पर याक़ूब ख़ान, लक्कड़ शाह और घुममन सिंह के साथ खैराबाद में फिर युद्ध जीतने का प्रयास किया लेकिन मछरेठा में अंततः स्वतंत्रता सेनानी शहीद हो गए। बिसवा में फिरोज शाह भी अपने 15 सैनिकों के साथ घाघरा पार करते हुए शहीद हो गये और राजा हरी प्रसाद बेगम हज़रत महल के साथ नेपाल की तरफ चला गया। बिना समय गंवाए शराफ़त यार खान ने अलीगढ़ से अपने कज़िन (मौसेरे भाई) असलम ख़ान से वाट्सऐप पर बातें करते हुए सिधौली पहुँचने का अनुरोध किया और तदुपरांत असलम ने भी इसे बड़े भाई का आदेश मानकर कुछ ही समय में अपना किट लेकर बाईक पर सवार हो गया, लेकिन रास्ते भर दिल में एक ही संदेह कुलबुलाता रहा कि शहरयार भाई को ऐसी क्या इमरजेंसी आ गई...कि वाट्सऐप पर भी नहीं बताया, बस कह दिया, ‘आ जाओ!’ असलम ने भी चलने से पहले संदेश प्रेषित कर दिया…, ठीक है, आ रिया हूँ भाई......।’ सब तरफ अंधेरा था। पावर-स्टेशन का कोई बड़ा ब्रेक-थ्रो हो सकता है, लेकिन रेलवे कालोनी का तो अपना जेनरेटर भी है। शायद कोई और तकनीकी मामला हो सकता है। व्यवस्था के सौ लफड़े होते हैं। लाइट तो आ ही जाएगी। पहले वह आँगन में चहलकदमी करते रहे, घुप अंधेरा। बस, आकाश पर तारों का जाल फैला हुआ था। आँगन में अनार के दरख्त पर कोई परिंदा फड़फड़ा कर कानों के पास से गुजरकर अँधेरों में ग़ायब हो गया। एक बिल्ली की आंखेँ चमकीं फिर मियाऊँ की आवाज आई। वह कूदकर अमरूद के दरख्त पर पहुंची और सन्नाटे में किसी परिंदे की चीखें कानों के परदों को चीरने लगीं लेकिन फिर एकाएक सन्नाटा छा गया। शराफत यार ख़ान की घबराहट और बढ़ गई। ग्राउन्ड-फ्लोर के अपने एल-शेप बंगलो के पीछे की खिड़की के उस पार से गुजरने वाला ट्रैफिक भी इस समय कुछ कम हो चुका था। गाड़ियों की रोशनियों से अंधेरे ह्यूले थरथराने लगे थे। शराफत यार ख़ान एमर्जेंसी लाइट ऑन कर सड़क से लगी खिड़की की ही तरफ आकर खड़े हो गए। सामने नौ फुट की चौड़ाई वाली सड़क पर अभी भी इक्का-दुक्का गाड़ियां आ जा रही थीं। उससे टिककर वह सामने देखने लगे लेकिन उनका ध्यान अपने भाई असलम की ही तरफ था कि अब असलम शाहजहांपुर से आगे बाईपास से निकल गया होगा। उसे बहुत तेज बाइक नहीं चलानी चाहिए। अल्लाह उसे साथ खैरियत के यहाँ तक ले आए। इसी समय छज्जे से अंधेरे में ही कौसर की आवाज़ सुनाई देती है।’ “भाई जान, खाला नहीं आईं?” “क्यों? आने वाली हैं क्या?” शराफ़त यार ख़ान चौंक गए। “आपकी नाक पर तो अंधेरे में भी मक्खी बैठी रहती है।’ कौसर एकदम खिलखिलाकर हंस पड़ी,” इकदम बारिश के भीगे पौधे की तरह जड़ों से उखड़ जाते हैं भाईजान? एक बात बताएं, आप जब पैदा हुए थे तब आपने बिना सांस लिए दाई से कितने थप्पड़ खाए थे?” “बदतमीज़! घर में कोई बड़ा नहीं है क्या?” “छोटा भी नहीं है भाईजान । रात भर लाइट नहीं आई तो मैं कैसे रहूंगी। अकेले में मुझे बहुत डर लगता है। आप भी यहीं आ जाइए, साथ ही खाना खाएंगे। मेरे घर के सब लोग तो चालीसवें में अलादातपुर फुप्पो के यहां गए हुए हैं। सुना है, कोई कह रहा था, असलम भाई ने एएमयू में दाखिला ले लिया है। यह खबर सुनकर मैं तो बहुत ही खुश हो गई हूँ। अभी फोन पर आप उन्हीं से बातें कर रहे थे। आ रहे हैं क्या वह....?” “क्यों, नई डेटिंग है? ” “हाय अल्लाह, आप कैसे हैं भाई जान, खाला आयेंगी तो पूछूँगी कि पहली पान की पीक आपके मुंह में किसने डाली थी, किसी शादीशुदा बाजी ने या कुँवारी बिब्बो ने? कसम से भाईजान, शुक्र मनाइए कि मैंने आपकी रैगिंग नहीं की, लेकिन असलम भाई की रैगिंग मैं जरूर करूंगी।” इसी समय लाईट आ गई, इसका शोर भी सुनाई देने लगा, शराफ़त यार ख़ान ने निगाह ऊपर उठाई तो देखा, खिड़की की चौखट से चिपकी कौसर अंसारी कमर तक नीचे लटकी हुई थी। वह लगातार हँसे जा रही थी,”भाईजान, आज मैंने पाए बनाए थे। मैं पाए बहुत अच्छे बनाती हूँ, खुदा की कसम । लेकर आएं?, दुत्कारेंगे तो नहीं?’ शराफत यार ख़ान कौसर अंसारी की शरारत पर हँसकर कमरे में लौट आए और मुसकुराते हुए एमर्जेंसी लाइट आफ़ कर दी। माँ के फोन का नंबर डायल किया और जब उन्होंने जवाब में अजनबी आवाजें सुनीं तो पूछा,’आप ...! लखनऊ में नहीं हैं क्या... ? कहाँ हैं?” “नहीं! मैं मछरेठा में हूँ, आपकी चहीती खाला नवाबज़ादी बेगम बिलकीस बानो की हवेली में। आज यहाँ ‘ब्लॉक वुमन-चेतना-मंच’ की तरफ से सीएए और एनआरसी को लेकर ब्लॉक-समिति की इमरजेंसी बैठक बुलाई गई थी, उसमें शामिल होने के लिए लखनऊ से मैं भी आ गई थी। एक राज़ की बात बताऊँ... बेटा? यहाँ मैंने आपके लिए एक खूबसूरत लड़की देखी है, सुभान-अल्लाह! क्या हुस्न-ए-जमाल है, क्या लहजा लबे-शीरीं है । बस! अब आगे इंतजार नहीं। आपकी मुंह बोली खाला यानी हमारी बेगम बिलकीस बानो बाजी को भी वह बहुत पसंद आई है। हमें अल्लाह पर भरोसा है, बेगम बाजी की पसंद आप दोनों भाइयों को भी पसंद आएगी, इंशाल्लाह!” “आप...आप... आप क्या कह रही हैं अ म्मी? हम नहीं समझे! हमें पता करना था कि एक लड़की, उसका नाम नेमत है, वह खाला बेगम के घर पर ही है। आप जब आएं तो उसे अपने साथ ला सकती हैं। उसका यहाँ आना ज़रूरी ही नहीं, बहुत जरूरी है। वैसे भी आप लखनऊ तो जाएंगी नहीं, इधर ही आ जाइए। बंदे हसन, असलम के साथ गाड़ी लेकर सुबह यहाँ से रवाना हो जाएंगे। कोरोना का जोर अब और बढ़ चुका है, बहुत केयर करने की जरूरत है। आप अपना ख्याल रखिएगा।” घंटी बजी तो बंदे हसन ने जाकर बाहर पहले तो लड़की को ऊपर से नीचे तक देखा, सकुचाए, फिर पूछा, “घर में बेगम साहिबा नहीं हैं ! कल-परसों आएंगी। साहब अपनी स्टडी में हैं। अप लोग नए आए हो? बड़े बाबू की बेटी हो? चाय के लिए दूध अगर खत्म हो गया हो तो बताएं बीबी, चाहिए क्या? आप यहीं रुकें, मैं लेकर आता हूँ।’ इसके साथ ही दरवाजे के दोनों पट खोल दिए गए। दरवाजे के बीचो-बीच कौसर अंसारी दोनों हाथों पर शीशे के मर्तबान में कुछ लिए हुए खड़ी दिखाई दी। उसने बड़बड़ाते हुए कहा,”इस घर का तो आवे का आवा ही बिगड़ा हुआ है। अजीब बत्त्तमीज़ लोग हैं।’ बंदे हसन की उपेक्षा करते हुए कौसर अंसारी ने रसोई में खुद जाकर मर्तबान रख दिया। जब वह जाने के लिए मुड़ी तो उसने हँसते हुए पूछा, ‘आप साहब को जाकर इत्तिला देंगे या मैं ही उनके कमरे में जाकर इत्तिला दूँ कि इस मर्तबान में लज़ीज़ पाए हैं।’ दांत पीसते हुए वह शराफत यार ख़ान को नजर गड़ाकर देखने लगी। कुछ क्षणोपरांत ख़ान ने कहा, “पाए में लाल मिर्चें तो डाली ही होंगीं। फिर भी आपके बनाए हुए पाए हम जरूर खाएंगे और असलम मियां भी। हो सकता है, वह आने ही वाले हों। हाँ! बंदे हसन भाई, यह बीबी बड़े बाबू की बेटी हैं, अभी हाल में शिफ्ट हुए हैं। आप जाकर ढाबे से दस-15 तंदूरी रोटियाँ लेते आइए, हमें अब भूख लग रही है।” “पाए मेरे नहीं भाईजान, बकरे के हैं।” कौसर ने ग़लती सुधारते हुए जवाब दिया। लेकिन ठीक इसी समय मालूम हुआ कि बाहर आड़ू के बाग में शोर मचाती हुई असलम की बाईक का शोर कुछ लम्हों तक गूंजते रहने के बाद धुआँ फैलाकर शांत हो जाता है लेकिन दीवानगी में “ सांलेकुम असलम भाई !” कहती हुई कौसर बग़ल की सीढ़ियों पर चढ़ती हुई खनखनाती हंसी के साथ एकाएक ग़ायब हो जाती है। कौसर अंसारी के इस ‘सांलेकुम’ ने असलम को एक ही सांस में न केवल आश्चर्यचकित कर दिया था, बल्कि एक महीन मुस्कान से उनकी मुलाकात भी करा दी थी, ”मोटी!” उस रात शायद कोई नहीं सोया था, न इधर शराफत यार ख़ान और न उधर असलम ख़ान। शराफत यार ख़ान ‘सहर’ को देखने के लिए लगातार बेचैन होते जा रहे थे और नींद कोसों दूर होती जा रही थी। उनकी ज़िंदगी में ऐसे लम्हे पहले कभी नहीं आए थे। कभी उन्हें किसी लड़की ने अपनी तरफ आकर्षित नहीं किया था। सब कहते थे, शराफ़त की ज़िंदगी में औरत है ही नहीं। शादी की लकीर पर सांप बैठ गया है। वह इंसान नहीं, एक देवमालाई महाकाती किताब है जिसमें देव हैं, दानव हैं, राक्षस हैं और बदसूरत कुटनियाँ हैं। परियाँ तो शाराफ़त यार ख़ान के पास से होकर गुजर जाती हैं, देखती ही नहीं। लेकिन कौन बताए की शराफत यार खान के सीने में भी एक धड़कता हुआ दिल है। उनका दिल भी चाहता है कि कोई उनसे प्यार करे, उनके होंठों पर किसी कोमलांगी के होंठ चस्पा हों, दिल धड़कें और दोनों गहरे समंदर में डूब जाएं। एक बार स्टेशन पर एक लड़की ने पूछा, “मेरे साथ डेटिंग करेंगे?” चौंककर शराफत यार ख़ान ने झिझकते हुए पूछा था, “क्यों?” लड़की ने जवाब दिया, “यूं ही, आप मुझे अच्छे लगे, मैं कर्नल मैक मोहन सरीन की बेटी हूँ। हॉर्स-राइडिंग मेरा पैशन है। नौजवान मेरे साथ डेटिंग के सपने देखते हैं लेकिन मैं आपको इनवाईट कर रही हूँ। यह मेरा पैशन है....।” यहाँ पर शराफ़त यार खान एकाएक सकपका गए। उन्होंने लड़की को तो जवाब नहीं दिया, उलटे टिकट जरूर मांग लिया। लड़की का चेहरा इतना सुनते ही लाल हो गया, उसने अपने बाडीगार्ड को आवाज दी, ’साहब को मेरा आईडी चेक करा दो ....” इतना कहकर वह तीर की तरह स्टेशन से बाहर निकल गई। उसने एक बार भी मुड़कर नहीं देखा बल्कि एयर-फोर्स की सी ड्रेस पहने ड्राइवर के साथ एक बेशकीमती कार में जाकर बैठ गई और ड्राइवर से दहाड़कर बोली, “बास्टर्ड ......।” “जी मैम !” ड्राईवर ने गाड़ी स्टार्ट कर दी। असलम ने करवट लेकर भाई को देखा, वह जग रहे थे। माथा छुआ, तप रहा था। सोचा, कहीं कोविड का असर तो नहीं हो रहा है। भाई सोये भी नहीं हैं। वह हड़बड़ाकर उठ बैठा,“पानी दूँ भाई?” लेकिन भाई को शायद नींद आ गई थी। असलम ने अंगड़ाई ली और वरांडे में निकल आया। वरांडे में गमले फूलों से भरे हुए थे, आधी रात की महक रगों में बहने लगी थी। अनार के पेड़ पर कई अनार ग़िलाफ़ से ढके हुए थे। शायद पूर्णिमा के कारण चंद्रमा पूरे आकाश को अपने प्रकाश से दमका रहा था, खुशबू और रोशनी ने अजीब सी जादुई ठंडक उसके जिस्म की रगों में पहुँचा दी थी। असलम अकारण आँगन में टहलने लगा, उसकी आँखों से नीद ग़ायब हो चुकी थी। रास्ते की थकन अभी भी जिस्म में बाकी थी। शायद वह सो भी जाता लेकिन कौसर की दिलफ़रेब मुस्कुराहट ने उसे अजाने में कहीं बेचैन कर दिया था। नल से टिककर आकाश को देखने लगा। इतनी रात आँगन में पूरे चाँद के नीचे उसकी दूधिया चाँदनी में वह रोमांच से भरता जा रहा था। ढाई बज रहे थे, आँगन में खुलने वाली ऊपरी मंजिल की खिड़की से असलम को एक चेहरा झाँकता हुआ महसूस हुआ। उसके समूचे जिस्म में इस चेहरे से एकाएक सिहरन सी दौड़ जाती है। “भूतनी .. ”..! असलम डरकर भागने को हुआ कि कौसर खिड़की से आधी नीचे लटक सी जाती है। उसने फुसफुसाते हुए धीरे से कहा,“ज़ीने का दरवाजा मैंने खोल दिया है, आज मेरे यहाँ कोई नहीं है। मुझे अकेले डर लग रहा है। आ जाओ.....अच्छा रहेगा। .चुपचाप, दबे पाँव, बाहर कुत्ते बहुत हैं। आओ, बहुत सी बातें करेंगे!” असलम का गला खुश्क हो गया था। उसे प्यास लगने लगी थी लेकिन वह अपने पसीने को भी खुश्क नहीं कर पा रहा था । एकाएक एक द्वंद्व युद्ध छिड़ गया था। क्या करूं भाई ? पता नहीं क्या हो गया है मुझे? इस मोटी की वजह से कहीं कुछ ग़लत तो नही होने वाला है? शाहिद के साथ भी तो एक रात एक लड़की उसके कमरे में रुक गई थी, फिर वह आती रही, फिर उसने उससे शादी कर ली। लेकिन कौसर से वह शादी तक की बात नहीं सोच सकता। अभी तो वह खुद अपने पैरों पर नहीं खड़ा ।” लेकिन कौसर ने दबे पांव नीचे उतरकर पूरी हिम्मत के साथ दरवाजे में ताला लगाया और असलम को खींचती हुई ऊपर अपने घर की सीढ़ियों तक आ गई और पूरी सतर्कता से ऊपर अपने कमरे के दरवाजे बंद कर लिए। बाहर सड़क के कुत्तों के भौंकने की शुरुआत हो चुकी थी। कहीं करीब से गार्ड की व्हिसिल भी सुनाई दी, शायद गार्ड को कुछ संदेह हुआ था, वह शहरयार के क्वार्टर के पास आकर ऊपर टार्च की रोशनी फेंकी लेकिन कहीं कुछ दिखाई नहीं दिया। फिर कुछ ऐसा हुआ कि कुत्तों का भौंकना भी बंद हो गया। —------------- पता नहीं शबनम की किस आँख से आज एक बूंद आँसू का ढुलका था कि शराफ़त यार खां का समूचा वजूद लरज़ उठा था। शबनम ने शायद शुरू में बताया था कि उसकी आँखें जला दी गई थीं, क्योंकि यह सौन्दर्य का प्रतीक हुआ करती थीं। उसकी आँखों में समंदर की लहरें उठा करती थीं। अपनी आँखों में अपने सामने वाले की आँखें डुबोती तो फ़ौलाद भी पिघल जाया करता था। फिर उसकी आँखों को स्वयं उसने अपने आप से जला डाला और बता दिया कि यह दुनिया देखने के योग्य नहीं है, यह एक एल्लीयूज़न है, नज़र का धोखा है। जो नहीं है, वही दिखाई देता है, जो है, वही ‘डार्क एण्ड डीप’ व्यंग्य यानि ‘सटायर’ है। शबनम की बायोग्राफी लिखना वास्तव में इतना आसान नहीं है जितना शराफत यार ख़ान समझ बैठे थे। उनके हिसाब से शबनम तो दर्द की तड़प, उसकी आग में दहकती हुई ईंटों की एक भट्टी है जो मात्र दहकते हुए शोलों को ही जन्म दे सकती है। शराफ़त यार खां को लिखने से पहले लगता रहा था कि वह सब लिख सकते हैं लेकिन जब शबनम को उन्होंने उसकी यातना की अंधी गुफा में उतर कर देखा तो वह कांप गए। पता नहीं यह लेखक लोग कैसे इतना कुछ लिख लेते हैं? स्वयं में जी लेते हैं, यातनाओं को सह लेते हैं। शबनम की तो अभी हमने पूरी कहानी भी नहीं सुनी है और कांप रहे हैं, कल्पना करें कि ये यातनाएं हमारी कल्पनाओं से भी परे हों, तब? वह कब पात्र बन जाती है, कब अभिनेत्री । कब बेटी में बदल जाती है, तो कब मां के रूप में ढल जाती है। उन जैसे नौसिखिया लेखक भला इतने पात्रों में एक साथ कैसे खुद को ढाल सकते हैं? लगता है जैसे नालंदा स्वयं चलकर अपनी शिष्या को दीक्षा देने आ गई है, कश्मीर के सूफी ख्वाजा सफ़ी मुग़लों के युग को फलाँगकर ‘कुंवां खेड़ा’ में आ गए हैं । जैसे 1813 से 1832 का युग पुनः लौट आया है । “माँ अपनी कूट भाषा में सीख देती थी,‘शराब की हर बूंद में आग होती है मेरी बच्ची। मृत्यु से पूर्व तेरे शराबी पिता को उसकी शराब धीरे-धीरे खुद उसे ही पीने लगी थी। मैं जानती हूँ, वह शराबी कभी नहीं बन पाया था, शायद शराब से उसे कोई लगाव भी कभी नहीं रहा था लेकिन परिस्थितियों की शराब ने उसके गले के नीचे स्वयं शराब के घूंट उंडेल दिये थे । इसीलिए वह नशे में ही अपनी ही परछाईं को पकड़ने की कोशिश करने लगता था, वह कहता था, ‘मैं उन सबको मार डालूँगा जो औरतों के जिस्मों को रौंदकर ताकतवर बनना चाहते हैं। यह रोशनीऔर यह ताकत धूप में मुझसे भी बड़ी हो जाती है.....मैं इसे साये में डुबो दूंगा। फिर हताश होकर वह हांफते हुए मुझसे ही पूछने लग जाता था, ‘मेरा साया अपने-आप मुझसे कैसे बड़ा हो जाता है? बड़ा होने काअहंकार क्यों है इसे?” मेरी दादी समझाती कि ‘तेरा बाबा न तो बुज़दिल है और न ही कमजोर है। लेकिन उसने खुद को अपनी ही निगाह से गिरा दिया है। बेटा, जो खुद में उलझ जाते हैं, दूसरों के आगे झुक जाते हैं, ताकतवर से डर जाते हैं, वह देर-सवेर मर जाते हैं, तो वह कमबख्त रूह के साथ तो मर गया, लेकिन शरीर के साथ मरा नहीं। मर जाता तो एक बार कोख ढाड़ें मारकर चुप हो जाती । लेकिन खुद दादी मर गई। अब मैं बची हूँ, तो मैं भी मर जाऊँगी! बहुत से लोग रोज मर जाते हैं, जंग में, दंगों में, दुश्मनी में, ईर्ष्या में, ग़रीबी में, बीमारी, बेकारी-बेरोजगारी में, जख्मी बच्चे जब बच जाते हैं, तो धरती की भी छाती फट जाती है। तब अस्तित्व की जंग उन बच्चों को लड़नी पड़ती है जो बस चीख सकते हैं, छटपटा सकते हैं, भूख से तड़प सकते हैं। ऐसे बच्चे किसके आंचल में पनाह तलाशते होंगे ? ऐसे में अपने अब्बा को तू कैसे पुकारेगी बेटा कि ‘अब्बा, मुझे बचाओ! मुझे भूख लगी है। मैं प्यासी हूँ या यह गंदा आदमी मेरे साथ गंदा काम करना चाहता है, या अजनबी सौतेली माँ जो औरत ही है लेकिन पीट-पीटकर मुझसे काम ले रही है.... ’ तब क्या तेरा वह शराबी चाचा जिसकी नजर हर समय तेरी अपनी बेटी पर लगी रहती है, हमारे न होने पर वह खुद को बचा पाएगी ? पूरी ज़िंदगी आग में जलते रहना कितना मुश्किल होता है बच्चे, तू अभी नहीं समझ पाएगी! मैं चाहती हूँ कि तू मेरे जीवन में ही सब कुछ समझ ले, जान ले। दुनिया को पहचान ले.....।” “क्या बताएं बड़े साहब!” शबनम अपने आंचल से अपनी सूखी और तेज़ाब से जली हुई आँखों को रह रहकर साफ करने लग जाती थी। ठीक से उसके शब्द भी पूरे नहीं हो पाते थे, वह सुबकने लगती थी । उसके रोने और सुबक-सुबक कर सिसकियाँ भरने से एक ऐसी आवाज़ जन्म लेती थी मानो पहाड़ के बरसाती नाले से रेंगता हुआ झरना नीचे गिरकर आँसुओं में बदलने लगता हो। “साहब!” एक गहरा सांस छोड़कर शबनम ने कहा,“ज़िंदगी के कितने खतरनाक दर्रों से होकर मैं यहाँ तक पहुंची हूँ, वह भी बिना आँखों के, कहना आसान नहीं है। अब्बा का दर्द और उनकी हताशा, मजबूरी और बेबसी मैं जानती हूँ। वह तो किसी से कुछ कह ही नहीं सकते थे। कंधे पर लिए-लिए वह मुझे आढ़तियों की भीड़ में मूँगफलियों के छिलके भरे बोरे ढोते थे। अपनी मान-मर्यादा को परंपराओं की स्याह डिबिया में बंद कर सुबह अंधेरे मुंह शहर के भड़भूजे से भुने चने लेकर घर-घर आवाज़ें लगाते हुए मेरी मां की हथेली पर अपनी कमाई लाकर रख देते थे। फिर, मोती मस्जिद मे जाकर सुबह-शाम नामाजें पढ़ना, दीनी किताबों में डूब जाना, मजलिसें होतीं तो इमामबाड़े में चले जाना, हर जुमेरात को रसूले-मकबूल,(स.व.) और मौला अली व शहीदाने-कर्बला की रूहों की नज़र दिलवाना या मुहल्ले की पुरानी मोती मस्जिद के इमाम मौलाना बाकरखानी तबर्रुकी की उपस्थिति में सदक़ा उतरवाना नियम सा बन गया था। वह आए-दिन मोती-मस्जिद में जाते तो नमाज़ के लिए थे लेकिन फिर वहीं सो भी जाते थे। मेरे अब्बा, बस चुप रहते थे, पता नहीं, यह बाबा लोग कुछ कह क्यों नहीं पाते? सारा दर्द अकेले ही पीते क्यों रहते हैं। फिर, एक दिन एक हादसे में वह सचमुच गूंगे होकर अल्लाह को प्यारे हो गए। उस समय भी लंगड़ा तैमूर मुझे सांत्वना देने के लिए मेरे पास ही मंडराता रहा था। वह पुलिस से कभी भी पिट सकता था, पुलिस स्टेशन जा सकता था, पिटपिटा कर फिर बाहर आ सकता था। कितनी ज़िल्लतों से भरी ज़िंदगी थी उसकी। ढाबे का मालिक उसे छेड़ता “ओए लंगड़े, मंडी की छोरी थारी घरारी ना बनने वारी है। यहाँ से काम छोड़ेगा तो भीख मांगेगा एक दिन... छोरी को कां लेजावेगा? किस-किस से बचाएगा? म्हारे कांटे लगे हैं क्या?” “मैं तब छोटी जरूर थी साब जी, लेकिन समझ में सब आता था । चाय के ढाबे पर जब तैमूर को कोई लंगड़ा कहकर आवाज देता था तब भी मुझे दर्द होता था । हालांकि मैं खुद उसे इसी नाम से पुकारती थी। ‘तैमूर लंगड़ा’ तब वह 10-12 साल का रहा होगा हुकूम। उसकी एक टांग सूख गई थी। तैमूर ने मुझे खुद बताया था कि उसे बचपन में किसी बच्चा चोर ने कहीं से उठाकर भिखारियों के गैंग में लाकर बेच दिया था। उसकी टांग को घुटने से ऊपर रस्सियों से बांधकर टांग में बहने वाले बहते खून को रोक दिया गया था ताकि टांग सूख जाए और वह दया का पात्र बन जाए। वह पैदायशी लंगड़ा नहीं था। भीख मांगना अब उसका नसीब है। उसे बचपन से साये की तरह मेरे साथ रहना पड़ता रहा है लेकिन मेरे अब्बा को वह भी मौत से नहीं बचा पाया। जब नशे में मेरे सौतेले पिता ने मां को शारीरिक प्रताड़ना और यतनाएं देनी शुरू कीं तो मेरा खून खौलने लगा। एक दिन मैंने उसे बेलन से मारा भी, लेकिन जब नशे में अपने एक दलाल साथी के साथ उसने मेरे ही घर पर उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया तो मैं सदमे में बेहोश हो गई। होश आया तो देखा, वह मेरी बीमार माँ के मुंह पर घूंसे बरसा रहा था, लेकिन कहीं से भी कोई मदद नहीं आ रही थी जैसे सब तरफ पत्थर ही पत्थर बिखर गए हों। मन हुआ कि भारी पत्थर से दुश्मन का सिर कुचल दें, लेकिन नहीं कुचल पाई। माँ ने बड़ी मुश्किल से कहा, “यहाँ से भाग जा.....।” कोई मुझे काबू में लेना चाहता था लेकिन मेरी माँ ने उसकी कमर कस रखी थी और वह अजनबी मुझे पकड़ लेना चाहता था। यदि तब तैमूर न आ गया होता तो वे लोग मुझे दबोचकर ले जाने में कामयाब हो जाते। यदि उस दिन तैमूर ने अपनी बैसाखियों से अपहरण कर्ताओं के सिर फाड़ न दिए होते तो इस समय मैं आपके सामने न होती। माँ ने ही फिर अपना दुख भूल कर मुझे समझाया था, ‘निकल जा यहाँ से बच्चे । अपनी दुनिया कहीं और जाकर बसा ले ! मैं तो हार चुकी बेटा। यह सराए औरतों के जिस्मों का कसाई-बाड़ा है। यहाँ छातियाँ भी सफेद हो जाती हैं। तू अब सयानी हो रही है, शोर-शराबा करने लगी है। मत किया कर। बस अच्छे दिनों के लिए अपने को बचाये रख। तेरे अच्छे दिन जरूर आएंगे, मैं नहीं जानती क्योंकि मेरे अच्छे दिन कभी नहीं आए। बहुत सी अभागिनों की ज़िंदगी में तो दिन ही नहीं आते, अंधेरे ही अंधेरे रहते हैं, अंधेरे ही बसते हैं। यहाँ से तो रोज मंडी में सुबह-शाम लड़कियां खरीदी और बेची जाती हैं। मैं भी तो कभी यहाँ के बाजार में ही बेची गई थी। ये बातें तू नहीं समझ पाई तो हम क्या करें । ऐसा होना उस समय तब एक आम और बड़ी बात हुआ करती थी। बदलते समय के साथ ‘सराय नौ’ और आस-पास के चकले अब तक काल-गर्ल्स के अड्डों में तब्दील हो चुके हैं । मुझे याद है, अब्बा, अकेले में मेरे कान में यही फुसफुसाते रहते थे कि सस्ता ही सही, “मकान तो यहाँ से बदलना ही पड़ेगा बच्चे । अब आप भी तो बड़ी हो रही हैं ।“ मेरी माँ की जड़ें इसी बाजार में थीं तो मैं भी वहीं पली-बढ़ी किन्तु अब्बा कहा करते थे कि वह नवाब खानदान से थे, माँ से इश्क हुआ तो उन्हीं के पास आकर बस गए। अब इश्क से रोटी तो नहीं मिल सकती, रोटी तो हर एक को चाहिए ही । रोटी का अपना स्वभाव होता है हुकुम ! उसी के हिसाब से वह अपनी इज्जत करवाती है। वह जानती है कि उसके लिए कुत्ते भी ग़ुलाम बन सकते हैं और आदमी भी। रोटी की जरूरत इंसान को भी है और कुत्तों को भी। रोटी के लिए ‘बदरे मुनीर’ (शबनम की माँ) को भी चौक बजाजे में आना पड़ा और ‘सराय नौ’ में धंधा करना पड़ा। अब्बा इसी ग़म में अल्लाह को प्यारे हो गए। कहते हैं जब अब्बा का इंतकाल हुआ था, तब वह तीन दिनों से भूखे थे। लंगड़े तैमूर ने उन्हे ढाबे से कई बार रोटियाँ लाकर दीं, वह तो बस सिजदे में ही अल्लाह से फ़रियाद करते रहे। एक दिन अल्लाह ने सुन लिया और सिजदा कुबूल हो गया। अल्लाह तौबा, वह उस दिन फाके के साथ ही सजदे की हालत में ही दुनिया से चले गए। अब्बा जब तक पढ़ा सके, मुझे अंग्रेजी पढ़ाते रहे थे, थोड़ी-थोड़ी फ्रेंच भी। लेकिन उनके बाद सौतेले पिता ने मुझे कमसिनी में ही लगभग स्कूल से निकाल कर मिठाई भंडार के मालिक लाला अशर्फी लाल रस्तोगी के यहाँ डेली-वेजेस पर लाला के हाथों बेच देता था । हालांकि मुझे पता नहीं था कि कोई आदमी या औरत या लड़की आदमी के ही हाथों में उसे कैसे बेचता होगा? वह कोई आटा,चावल-दाल तो होता नहीं है? कुछ धुंधला-धुंधला सा अभी भी याद है मुझे। उस दिन लाला बहुत खुश था। हँसता तो उसकी थुल-थुल तोंद के साथ उसका समूचा शरीर हिलने लग जाता था। मुझे उसने पहली ही रात अपने सीने से लगाकर करीब ढाई सौ ग्राम मेरी चुमकारियाँ ले ली थीं बाद में खर्राटे भारता हुआ वह सो गया था। मैं उन दिनों घर के हालत बुरे होने के कारण अक्सर भूखी भी रह जाती थी। उस शाम भी मैं भूखी थी। दो दिन से ठीक से कुछ खाया नहीं था। फिर, दुकान में खाने के नाम पर इतनी मिठाई सी आ गई कि आँखों में स्वतः ही खुमार आ गया और मैं सो गई । लेकिन लाला ने बीच रात में मुझे जगा दिया और बड़े ही फूहड़ ढंग से मुझे चूमने-चाटने लगा। तब मुझे उस लाला से बहुत घिन सी महसूस हुई थी। जब मैं लाला के बहुत कहने पर अपनी चड्डी उतारने को राज़ी नहीं हुई तो उसने मुझे धमकाया कि वह मेरे शराबी बाप से सारी रकम वापस ले लेगा। इतना सुनकर मैं सचमुच डर गई। अपने सौतेले पिता से मैं वैसे भी बहुत डरी सहमी रहती थी। वह वैसे ही बहुत जालिम किस्म का आदमी था। लाला ने पुचकारते हुए मुझे कलाकंद खाने को दिया। समोसे भी दिये, नमकीन भी। तब भी मैं भूखी थी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि भूख से चड्डी का क्या रिश्ता हो सकता है? मुझे यह भी याद है, अब्बा की मौत के बाद मेरा सौतेला पिता शराब की बोतल और कुछ रुपये के लिए मुझे अपने साथ लाला की मिठाई की दुकान पर ले जाया करता था। वह मुझे लाला के अनुरोध पर समोसे खिलाता, मिठाई भी। भूखी होती तो उसके यहाँ मैं अकेले भी पहुंच जाती। कभी-कभी तैमूर भी साथ हो जाता था । एक दिन मैंने देखा कि मेरे सौतेले पिता को लाला ने दुकान के अंदर बुलाकर बहुत से रुपये दिए हैं, थैले में शराब की बोतल भी रख दी है । उस समय मेरा सौतेला पिता बहुत खुश नजर आ रहा था। तब मैं समझ नहीं पाई थी कि सौतेले पिता बेटियों को भी लालाओं के हाथ बेच दिया करते होंगे । एक साँझ, मेरे सौतेले पिता ने कहा, लाला अशर्फी लाल की दुकान से एक किलो मिठाई ले आ। पैसे मैं दे आया हूँ। मन ने भी कुछ नहीं कहा, क्योंकि दो-तीन डॉक्टर मां के चेकअप के लिए घर आने वाले थे। इससे अधिक मुझे कुछ नहीं मालूम था। मैं मिठाई लेने लाला के यहाँ पहुँच गयी। मुझे देख कर लाला फूला नहीं समा रहा था। एक साँझ लाला ने मुझे रोक लिया। उसने कहा,‘अंदर आकर कुछ मेरी मदद कर दे, मैंने मुट्ठी भर पगार एडवांस में तेरे कथित पिता को दे दी है। अब तू मेरे लिए काम कर। तेरी माँ बीमार है, दवा-दारू के लिए पैसों की जरूरत तो होगी ही। ऐसे में मैं बहुत दुखी हो जाता हूँ। मेरी तो मजबूरी है। ‘कारीगर जगराता के चक्कर में अपने घर जा चुके हैं । इसलिए तुझ से कह रहा हूँ। यहीं पढ़ाई भी कर सकती है, मैं नहीं रोकूँगा। मुझे तो पढ़ने-लिखने का कभी बहुत शौक हुआ करता था। गौ-हत्या आंदोलन में मैं अटल बिहारी वाजपेई के साथ रेली में था। पिता जी जीवित होते तो मैं आज मंत्री होता। पढ़ने-लिखने वाले बच्चे मुझे मिठाई की तरह लगते हैं।’ मैं उसकी चालों को तब तक नहीं जानती थी। संयोग से तैमूर उधर से गुजरा तो उसकी नजर मुझपर पड़ गई। मुझे लाला के पास देखकर वह कुछ चौंका भी था । लेकिन फिर भी वह बिना कुछ देखे या कहे बाजार की भीड़ में कहीं आगे जाकर ग़ायब हो गया । फिर काम करने के बहाने लाला ने मुझे अंततः अंदर बुला लिया, और मैं मूर्ख, उसकी खुशामद पर दुकान के अंदर चली भी गई। मुझे याद है, लाला ने मेरे कान में कहा था,‘जितनी मिठाई खा सकती है, खा ले। पर मेरे साथ आज दुकान के अंदर ही काम करना होगा। कारीगर वास्तव में घर चले गए थे । दीपावली भी सिर पर है। ओवरटाइम के पैसे मैं तुझे अलग से दूंगा। शटर गिराकर लाला ने मुझे अंदर गल्ले पर ही बिठा दिया, बोला ‘तू कल से बस ग्राहकों से पैसे ही वसूलती रहा कर।’ मैंने देखा, गल्ला नोटों से भरा हुआ था। इतने रुपये देख कर मेरे पसीने छूट गए थे । मैं जानती थी कि लाला ने गल्ले में से ही सौतेले पिता को अच्छे-खासे बड़े नोट निकालकर दिए थे और मिठाई के दो पैकेट भी। लाला ने हँसते हुए मज़ाक के मूड में कहा, ‘आज तो तुझे यहीं रहकर रातभर मिठाई खानी है, है ना? यहीं पर सो भी जाना। पीछे सोने और नहाने का कमरा है। आराम वाला बिस्तर भी है। उधर से ही सुबह खिड़की से बाहर निकल जाना, किसी को पता भी नहीं चलेगा। तुझे जितना पैसा चाहिए, निकालकर रख लेना, काम आएगा। अब तो तू मेरी ही है। ले ले ! मेरे पास पैसा बहुत है, तू राजी हो जाएगी तो सोने से तुझे लाद दूंगा। बोल, रुकेगी.यहाँ?’’ “मैं तो यहाँ नहीं सोऊँगी।” मैंने कमरा देखकर कहा,”यहाँ, कड़वे तेल की गंध आती है। मेरे सौतेले बाप ने मुझे यहाँ देख लिया तो वह मार डालेगा। ऐसे में मैं माँ से क्या कहूँगी…?’’ “अब तू लोगों से कुछ नहीं कहेगी। मैंने तेरे नए अब्बा से तेरा सौदा कर लिया है। वह भरपूर पैसे ले जा चुका है। अब तो वह आएगा भी नहीं। तुझे किसी से कुछ कहने की जरूरत नहीं है। समाज में मेरी भी इज्जत है। तू खा-पी ले। फिर आराम से अंदर बिस्तर पर चलकर सोएंगे, मैं भी बहुत थक गया हूँ। बस, मेरा शरीर थोड़ा दबा देना।’ मैंने उससे पूछा, ‘मैं यहाँ अकेली हूँ। तैमूर को बुला लूँ?’ उसने आँखें दिखाते हुए मुझे धमकाया,”भिखारी है वह, पुलिस बुला लूँगा। भिखारियों के गैंग होते हैं।’ मैं सहम गई। मैंने धीरे से कहा, ‘तुम मेरे साथ गंदी बात तो नहीं करोगे?’’ वह मुझे एक टक देखने लगा। उसने मुझपर झुकते हुए कहा,”गंदी बात क्या होती है, जानती है क्या?“ मैंने वैसी ही सहमी आवाज में कहा,”एक बार मेरे सौतेले पिता ने नींद में मेरे कपड़े उतार दिए थे और जब मेरी चड्डी उतारने लगे थे तो मैं जग गई थी। माँ ने तब डांट लगाई थी, ‘भाग यहाँ से। अब मैं इस आदमी के साथ तुझे लेटते हुए कभी न देखूँ। यह तो कमीना दलाल है, बत्तमीज़ है, तुझे कहीं भी जाकर बेच सकता है....। अब कभी उसके साथ लेटी तो तेरे नीचे लुकरी लगा दूँगी। जा भाग, बस!” “ “मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा। बदन में दर्द है तो दबाना पड़ेगा ही। इसके पैसे दे चुका हूँ। बस, रोज की तरह दो चम्मच शहद लूँगा। तुझे शहद पसंद आए तो तू भी पी सकती है, मैं मना नहीं करूंगा। तुझसे मलाई की मालिश कराऊँगा। बस! दोनों सो जाएंगे। लेकिन उस शहद से मैं पता नहीं कैसे एक ताकतवर जवान लड़की जैसी बन गई थी। फिर वह अपने शू शू कैप पर मलाई रख कर बोला,‘एकदम से नहीं, इस पर टांगें इधर-उधर करके धीरे-धीरे बैठो। जल्दी नहीं है। धीरे-धीरे.....,चीखना बिल्कुल नहीं! बाहर, गोरखा ड्यूटी पर है। पुलिस की टुकड़ी भी हो सकती है। धीरे-धीरे ‘इस पर’ बैठना शुरू कर.......।’ जिस वातावरण में मैं पल-बढ़ रही थी, वहाँ वैसे भी हम बच्चे लोग बहुत कुछ जान-पहचान लेते थे । तब मैं 8/10 साल की थी। गुप्तांगों से ठीक-ठाक परिचित थी। नशीली दवा के कारण बैठने से जो दर्द जन्म ले रहा था, उसके और नीचे खून की धारियाँ बनने से मैं नशे में भी कुछ कर नहीं पा रही थी। पीड़ा हुई तो मैंने कुछ कहना चाहा मगर पुराने रिकार्ड की टूटी हुई सुई की तरह ग्रामोफोन से जो आवाज निकली उसने मुझे कुछ लम्हों बाद बेहोश कर दिया था। मैं अवचेतन में बेजान सी लेटी वो सब करती रही होंगी जो वह करता रहा होगा। सब दुख-दर्द सहते हुए अवचेतन में मैं समय के साथ धड़कती रही। सुबह का पहला पहर कब आया, पता ही नहीं चला, आखिरी पहर कब हुई,पता चल गया। वह जो करता रहा मैं नशे में सहती रही। रात भर उसका तमाशा चलता रहा। वह पागलों की तरह सोता, जागता, उठता, बैठता मुझे नोचता, झिंझोड़ता, मुझसे खेलता हुआ अंततः हांफते हुए लुढ़क गया। मैं भी नशे से मुक्त, संज्ञाशून्य होकर खुद को ठगा सा महसूस करते हुए बेड पर बैठी न जाने क्या-क्या सोचती रही। मैंने उसकी दुकान में गूँजते हुए खर्राटों की भी परवाह नहीं की। उस रात धीरे-धीरे मुझे होश आने पर पहली बार महसूस हुआ कि मैं समय से पहले ही जवान हो गई हूँ। तभी बाहर से शायद किसी चौकीदार ने लाला को आवाज दी, “लाला जी, अंदर कोई है क्या?” “नहीं, कोई नहीं। सोने दे बहादुर, यहीं रुक गया था, नींद में हूँ....। चूहे होंगे....।” और वह फिर खर्राटे भरते हुए सो गया। मैं वॉशरूम में देर तक लाला के जागने और यहाँ से खुद बाहर निकलने के बारे में सोचती रही। फिर नहा-धोकर कपड़े बदले जो उसकी अलमारी में पहले से रखे हुए थे। मेरी नाप की जींस भी थीं और टॉप भी। मैं इसे मात्र संयोग ही मान सकती थी। हो सकता है ये कपड़े लाला की पोती या बेटी के रहे हों। मैंने सोचा, लाला के मोबायल से माँ को ही फोन करके देख लें कि तबीयत कैसी है। पता भी कर लें कि तैमूर का फोन बंद क्यों है। पता चला कि माँ नर्सिंग होम में ऐड्मिट हैं। रात तबीयत खराब हो गई थी। जवाब देने वाला कोई नहीं था। 10-15 मिनट में माँ का फोन भी आ गया, ”कुछ नही बेटा, डॉक्टर साहब आ गए थे। वह आज ही बाहर से आए हैं। बस, फौरन ले गए मुझे। वहीं हूँ मैं। तुझे बहुत पूछ रहे थे वह। कहाँ है तू ....? इतनी सुबह! तैमूर का भी कल से पता नहीं है। आएगा तो मैं उसे भी बता दूँगी। सब ठीक है ना?“ “ठीक है.... हाँ माँ ! माँ, देखती हूँ, कोई है.....।’ लाला एकाएक घबराकर उठ बैठा।,”कौन है? किसका फोन था? तेरे पास फोन भी है? किसी ने फुसफुसाते हुए किसी दूसरे से कहा, “मार साले को। बहुत सवाल कर रहा है,गोद दे। बचने न पाए।” कुछ लोग दुकान को लूटने लगे थे। लेकिन अंदर के धुंधलके में एक बलिष्ठ नकाबपोश बड़ी सतर्कता के साथ मूर्छित लड़की को कंधे पर डालकर पीछे के रास्ते से निकलकर ले जाने में सफल हो गया। जिस समय यह वारदात हो रही थी, रीगल बिल्डिंग के पीछे वाली सड़क पर एक सियाह लंबी कार खड़ी किसी के इंतजार में थी। सुबह का धुंधलका अब छँटने लगा था। काले रंग की जीप में लड़की को ले जाकर जिन लोगों ने सामान की तरह पिछली सीट पर लिटा दिया था, वह व्यवहार अत्यंत अमानवीय था। लेकिन दूसरे ही क्षण कार वहाँ से एकाएक पूरी रफ्तार पकड़कर लापता हो चुकी थी। अब तक सड़क पर इलाके के लोग अपने घरों से टहलने, दौड़ने और सैर करने के लिए निकल चुके थे। सुबह की इस उजास में कचरा बीनने वाले भी सड़कों पर आ चुके थे और गश्ती पुलिस की टुकड़ी भी शिफ्ट बदलने की तैयारी में नालों के पास नजर आने लगी थी।

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