यादों का ख़ज़ाना है मेरे पास : रंजन ज़ैदी
विश्वास नहीं होता कि श्याम निर्मम अब इस दुनिया में नहीं है। बात चले तो दूर तक चलती ही रहे। यादों का
ख़ज़ाना है मेरे पास। यहां केवल मैें नवगीत पर बात करना चाहूंगा क्योंकि श्याम निर्मम नवगीतकार था। इसी विषय पर उसने शोध किया था और हम जब भी नवगीत पर बात करते थे तो उसके तार भी काफ़ी दूर तक पहुंच जाते थे। उसे शायद मुझसे गीत और नवगीत पर बात करना अच्छा लगता था। इसी विषय पर मेरी उससे बहुत बार बातें हुई थीं। मेरी अपनी मान्यताएं थींए उसकी अपनी। फिर भी वह मुझे ध्यान से सुनता था और मैं उसे बेहद गम्भीरता के साथ सुनाता थाए उसकी कविताओं पर अपनी प्रतिक्रिया देता था और गीतों से प्रभावित होता था।
मैं उसे बताता थाए गीत रचना अपनी जगह है और रचना का आत्मप्रसार दूसरी जगह। जिन लोगों ने संवेद संकलन के लिए जीतोड़ मेहनत कीए उन लोगों के पास गीत थे ही नहीं। उनकी रचना.प्रक्रिया या रचना.शक्ति बहुत कमज़ोर थी। चाहे वह ठाकुर प्रसाद सिंह हों या शंभूनाथ सिंह या चाहे राजेंद्र प्रसाद सिंहए या रवींद्र भ्रमर। बात यह है कि नवगीत के उन्नायकए झंडाबरदारए पुरोहितए प्रणेताए नामकरण देने वाले या उसे आगे चलाने वाले तो बहुत थे लेकिन तब उनके पास नवगीत संकलन नाममात्र के ही थे और वे अपने को निरंतर दोहराते रहते थे। कमाल की बात यह है कि ऐसे लोगों ने किसी संवेद संकलन में आने का प्रयास भी नहीं कियाए क्या यह तुम्हें अजीब सी बात नहीं लगती है.
सच्चाई यह है कि नवगीत में लय.दोष बहुत हैं। छंद की महत्ता इस माने में बढ़ जाती है। हालांकि छंद चौथी स्थिति में आता है। पहले लय हैए फिर गति हैए फिर यति है। उसके बाद छंद की स्थिति है। यह स्थिति साहित्य में भी है और संगीत में भी। नवगीतकारों ने लय की गति को नहीं पकड़ा और न यह जाना कि गेय और अगेय गीत में लय को परिवर्तित करने वाले तत्व भी होते हैं। ऐसे गीतकारों ने गद्य को लय देने का प्रयास किया जो ठीक ऐसा ही था जैसे कोई पुराने मशहूर फ़िल्मी गीत का रीमेक तैयार कर दे। कुछ गीतकारों ने इस भ्रम को तोड़ने का प्रयास किया और वे प्रयास सराहे भी गये हैं।
मैंने कहा कि नवगीत के माध्यम से बहुत बड़ी क्रान्ति नहीं आई है साहित्य में। जिस तरह के लोगों ने आंखए कानए नाक बंद कर तब नवगीत लिखेए उसी तरह लोग आज भी नवगीत लिख रहे हैंए लेकिन कोई भी गीतए कविताए कहानी या कोई अन्य विधा जब अपने समय.काल के चक्र को पूरा कर लेती है या कर लेता है तो उसके बाद उसका दौर बदल जाता है।
मैंने कहा कि मिसाल के तौर पर जब हम पलटकर सन् 1974 के दौर की परिस्थितियों को देखते हैं तो पाते हैं कि उस दौर के नवगीतकारों ने तत्कालीन परिस्थितियों की ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया। उन दिनों के हमें जो नवगीत मिलते हैं, उनमें कुछ प्रेम की बात है, कुछ घर की तो कुछ प्रकृति की। लगता है मानो, कुछ कहने की जिजीविषा ही न बाकी रही हो। यह तो ऐसा था मानो खुद को कवि कहलाकर कुछ हासिल कर लेने का जबरन प्रयास हो। यह तो तुम भी जानते हो क्योंकि तुम भी एक कवि हो कि कविता स्वयं फूटती है, उसकी आमद होती है, नूजू़ल (अनुलोम) होता है उसका, है कि नहीं?
कारण यह है कि वो चाहे कविता हो या गद्य, चाहे और ज़िन्दगी का कोई क्रियाकलाप, लय के बिना कोई भी क्रिया संभव नहीं है। हर ध्वनि की एक रफ़्तार होती है। रमेश रंजक को भी मेरी इस बात से गुरेज़ नहीं था। हर रफ़्तार की एक परख। पारखी हिलते हुए हाथ की गति और घ्वनि को पहचान लेता है। इसी में लय की भी पहचान छुपी होती है। कोई मुझसे पूछे कि रेखांकन क्या हैघ् तो मेरा जवाब होगा कि रेखांकन लय की एक धारा है जिसकी एक लकीर में गांधी जी जन्म ले लेते हैं और वही लकीर गीत के बोल को काट देती है। मेरी मान्यता यह है कि लय का अपना अलग अस्तित्व होता है। लय का इस्तेमाल जो जितना करेगा, वह उतना ही बड़ा कलाकार या फ़नकार बन जायेगा।
श्याम निर्मम ने रामवतार त्यागी का हवाला दिया। कहा कि उन्होंने तो गीत को सिर्फ़ छंदों में सजाई आदमी की शब्दशः तस्वीर बताया था। आप कहते हैं कि......., मैंने कहा, देखो! मेरा नज़रिया एकदम अलग है। ऐसा नहीं है कि तुमने जो कुछ कह दिया, लिख दिया, वह नवगीत हो गया। 1974 के बाद से गीत में बदलाव आया जो धीरे-धीरे कालांतर में जनोन्मुखी हो गया। विचार करें तो हम पाएंगे कि तब देश का जनमानस एक तरह के परिवर्तन की मांग करने लगा था. नवगीत उस आन्दोलन की अभिव्यक्ति बन गया और रूपकों व प्रतीकों की एक घुमावदार शैली का सहारा लेकर मार्चिंग-सांग मे तब्दील हो गया।
तब की रचनाओं को पढ़कर देखो, लगेगा कि तत्कालीन युग करवट बदल रहा है। यह अहसास ग़लत भी नहीं है। जयप्रकाश नारायण एक तरह के राजनीतिक आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे। उसका प्रभाव समाज और राजनीति पर साफ़ दिखाई देता नज़र आता है। आदमी को उसकी परिस्थितियों ने सड़क पर ला खड़ा किया था।
ऐसे में कथित नवगीतकार प्रेम, प्रकृति और घर की बात कर पलायन का रास्ता अपना रहा था। यह बात अजीब-सी नहीं लगती है.
हां! यह बात सच है कि बदलते समय के साथ तब गीत भी बदलाव की मांग करता दिखाई देता है और फिर हम देखते हैं कि हुआ भी यही. गीत जन्मोन्मुखी होकर 1973 के उत्तरार्द्ध तक जन-गीत में बदल गया। इसलिए मैं मानता हूं कि नवगीत चाहे कहीं से भी आया हो, लेकिन उसका अंतिम दौर 1973 तक ही रहा है। जब मैं सोन मछरिया मन बसी पढ़ता हूं या तुम्हारी कविताओं पर नज़र डालता हूं तो अंतर साफ नज़र आने लग जाता है। तुम भी परिवेशगत परम्परा के दबाओं से मुक्त नहीं हो पाये हो। जहां बचने की कोशिश दिखती है वहीं, गीत की मौखिक परम्परा का दबाव सामने आ जाता है। अच्छी बात यह है कि तुम्हारे गीतों में जहां एक ओर उत्तर छायावादी कवियों की गेय परम्परा दिखाई देती है, रमेश रंजक के गीतों में भी यह बात थी. वहीं गीत अपने सौंदर्य-बोध की समझ को भी उजागर करते प्रतीत होते हैं।
याद आने को बहुत कुछ है। तब मुझे पता ही नहीं था कि श्याम निर्मम से हम अब कभी नहीं मिल पाएंगे। मृत्यु से कुछ ही दिन पहले हम अहिन्दी भाषी पुरस्कार चयन समिति की राष्ट्रीय बैठक में साथ थे। उसकी संयोजिका डॉ. अर्चना त्रिपाठी थीं. (आज हमारे बीच वह भी नहीं हैं.) हमने बैठक के बाद श्याम निर्मम से उसके गीत सुने थे। साथ ही डा0 अर्चना त्रिपाठी के घर पहुंचकर चाय पी थी. वहीं पर मैंने भाई डॉ. विनोद (डा0 अर्चना त्रिपाठी के पति) के सानिध्य में भावी योजनाओं पर बातें कीं, वापसी पर यूपी गेट तक श्याम निर्मम मेरी गाड़ी में मेरे साथ आया, फिर अपने एक रिश्तेदार के साथ घर चला गया और मैं उसी शाम की फ़्लैट से दार्जलिंग चला गया।
15 दिन बाद लौटा तो पता चला कि श्याम निर्मम अब इस दुनिया से मुक्त हो चुका है। इस ख़बर ने मेरे अस्तित्व को झिंझोड़कर रख दिया था। आज भी अचेतन में मेैं उसका मोबाइल नम्बर डायल करने लग जाता हूं, फिर ख़्याल आता है कि वह कहां है, गीत में, नवगीत में, प्रीत के संगीत में , जाने कहाँ?
साभार: वेबसाईट 'अनहद साहित्य' से। https://anhadsahitya@gmail.com/
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विश्वास नहीं होता कि श्याम निर्मम अब इस दुनिया में नहीं है। बात चले तो दूर तक चलती ही रहे। यादों का
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| लेखक रंजन ज़ैदी की यादें |
मैं उसे बताता थाए गीत रचना अपनी जगह है और रचना का आत्मप्रसार दूसरी जगह। जिन लोगों ने संवेद संकलन के लिए जीतोड़ मेहनत कीए उन लोगों के पास गीत थे ही नहीं। उनकी रचना.प्रक्रिया या रचना.शक्ति बहुत कमज़ोर थी। चाहे वह ठाकुर प्रसाद सिंह हों या शंभूनाथ सिंह या चाहे राजेंद्र प्रसाद सिंहए या रवींद्र भ्रमर। बात यह है कि नवगीत के उन्नायकए झंडाबरदारए पुरोहितए प्रणेताए नामकरण देने वाले या उसे आगे चलाने वाले तो बहुत थे लेकिन तब उनके पास नवगीत संकलन नाममात्र के ही थे और वे अपने को निरंतर दोहराते रहते थे। कमाल की बात यह है कि ऐसे लोगों ने किसी संवेद संकलन में आने का प्रयास भी नहीं कियाए क्या यह तुम्हें अजीब सी बात नहीं लगती है.
सच्चाई यह है कि नवगीत में लय.दोष बहुत हैं। छंद की महत्ता इस माने में बढ़ जाती है। हालांकि छंद चौथी स्थिति में आता है। पहले लय हैए फिर गति हैए फिर यति है। उसके बाद छंद की स्थिति है। यह स्थिति साहित्य में भी है और संगीत में भी। नवगीतकारों ने लय की गति को नहीं पकड़ा और न यह जाना कि गेय और अगेय गीत में लय को परिवर्तित करने वाले तत्व भी होते हैं। ऐसे गीतकारों ने गद्य को लय देने का प्रयास किया जो ठीक ऐसा ही था जैसे कोई पुराने मशहूर फ़िल्मी गीत का रीमेक तैयार कर दे। कुछ गीतकारों ने इस भ्रम को तोड़ने का प्रयास किया और वे प्रयास सराहे भी गये हैं।
मैंने कहा कि नवगीत के माध्यम से बहुत बड़ी क्रान्ति नहीं आई है साहित्य में। जिस तरह के लोगों ने आंखए कानए नाक बंद कर तब नवगीत लिखेए उसी तरह लोग आज भी नवगीत लिख रहे हैंए लेकिन कोई भी गीतए कविताए कहानी या कोई अन्य विधा जब अपने समय.काल के चक्र को पूरा कर लेती है या कर लेता है तो उसके बाद उसका दौर बदल जाता है।
मैंने कहा कि मिसाल के तौर पर जब हम पलटकर सन् 1974 के दौर की परिस्थितियों को देखते हैं तो पाते हैं कि उस दौर के नवगीतकारों ने तत्कालीन परिस्थितियों की ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया। उन दिनों के हमें जो नवगीत मिलते हैं, उनमें कुछ प्रेम की बात है, कुछ घर की तो कुछ प्रकृति की। लगता है मानो, कुछ कहने की जिजीविषा ही न बाकी रही हो। यह तो ऐसा था मानो खुद को कवि कहलाकर कुछ हासिल कर लेने का जबरन प्रयास हो। यह तो तुम भी जानते हो क्योंकि तुम भी एक कवि हो कि कविता स्वयं फूटती है, उसकी आमद होती है, नूजू़ल (अनुलोम) होता है उसका, है कि नहीं?
कारण यह है कि वो चाहे कविता हो या गद्य, चाहे और ज़िन्दगी का कोई क्रियाकलाप, लय के बिना कोई भी क्रिया संभव नहीं है। हर ध्वनि की एक रफ़्तार होती है। रमेश रंजक को भी मेरी इस बात से गुरेज़ नहीं था। हर रफ़्तार की एक परख। पारखी हिलते हुए हाथ की गति और घ्वनि को पहचान लेता है। इसी में लय की भी पहचान छुपी होती है। कोई मुझसे पूछे कि रेखांकन क्या हैघ् तो मेरा जवाब होगा कि रेखांकन लय की एक धारा है जिसकी एक लकीर में गांधी जी जन्म ले लेते हैं और वही लकीर गीत के बोल को काट देती है। मेरी मान्यता यह है कि लय का अपना अलग अस्तित्व होता है। लय का इस्तेमाल जो जितना करेगा, वह उतना ही बड़ा कलाकार या फ़नकार बन जायेगा।
श्याम निर्मम ने रामवतार त्यागी का हवाला दिया। कहा कि उन्होंने तो गीत को सिर्फ़ छंदों में सजाई आदमी की शब्दशः तस्वीर बताया था। आप कहते हैं कि......., मैंने कहा, देखो! मेरा नज़रिया एकदम अलग है। ऐसा नहीं है कि तुमने जो कुछ कह दिया, लिख दिया, वह नवगीत हो गया। 1974 के बाद से गीत में बदलाव आया जो धीरे-धीरे कालांतर में जनोन्मुखी हो गया। विचार करें तो हम पाएंगे कि तब देश का जनमानस एक तरह के परिवर्तन की मांग करने लगा था. नवगीत उस आन्दोलन की अभिव्यक्ति बन गया और रूपकों व प्रतीकों की एक घुमावदार शैली का सहारा लेकर मार्चिंग-सांग मे तब्दील हो गया।
तब की रचनाओं को पढ़कर देखो, लगेगा कि तत्कालीन युग करवट बदल रहा है। यह अहसास ग़लत भी नहीं है। जयप्रकाश नारायण एक तरह के राजनीतिक आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे। उसका प्रभाव समाज और राजनीति पर साफ़ दिखाई देता नज़र आता है। आदमी को उसकी परिस्थितियों ने सड़क पर ला खड़ा किया था।
ऐसे में कथित नवगीतकार प्रेम, प्रकृति और घर की बात कर पलायन का रास्ता अपना रहा था। यह बात अजीब-सी नहीं लगती है.
हां! यह बात सच है कि बदलते समय के साथ तब गीत भी बदलाव की मांग करता दिखाई देता है और फिर हम देखते हैं कि हुआ भी यही. गीत जन्मोन्मुखी होकर 1973 के उत्तरार्द्ध तक जन-गीत में बदल गया। इसलिए मैं मानता हूं कि नवगीत चाहे कहीं से भी आया हो, लेकिन उसका अंतिम दौर 1973 तक ही रहा है। जब मैं सोन मछरिया मन बसी पढ़ता हूं या तुम्हारी कविताओं पर नज़र डालता हूं तो अंतर साफ नज़र आने लग जाता है। तुम भी परिवेशगत परम्परा के दबाओं से मुक्त नहीं हो पाये हो। जहां बचने की कोशिश दिखती है वहीं, गीत की मौखिक परम्परा का दबाव सामने आ जाता है। अच्छी बात यह है कि तुम्हारे गीतों में जहां एक ओर उत्तर छायावादी कवियों की गेय परम्परा दिखाई देती है, रमेश रंजक के गीतों में भी यह बात थी. वहीं गीत अपने सौंदर्य-बोध की समझ को भी उजागर करते प्रतीत होते हैं।
याद आने को बहुत कुछ है। तब मुझे पता ही नहीं था कि श्याम निर्मम से हम अब कभी नहीं मिल पाएंगे। मृत्यु से कुछ ही दिन पहले हम अहिन्दी भाषी पुरस्कार चयन समिति की राष्ट्रीय बैठक में साथ थे। उसकी संयोजिका डॉ. अर्चना त्रिपाठी थीं. (आज हमारे बीच वह भी नहीं हैं.) हमने बैठक के बाद श्याम निर्मम से उसके गीत सुने थे। साथ ही डा0 अर्चना त्रिपाठी के घर पहुंचकर चाय पी थी. वहीं पर मैंने भाई डॉ. विनोद (डा0 अर्चना त्रिपाठी के पति) के सानिध्य में भावी योजनाओं पर बातें कीं, वापसी पर यूपी गेट तक श्याम निर्मम मेरी गाड़ी में मेरे साथ आया, फिर अपने एक रिश्तेदार के साथ घर चला गया और मैं उसी शाम की फ़्लैट से दार्जलिंग चला गया।
15 दिन बाद लौटा तो पता चला कि श्याम निर्मम अब इस दुनिया से मुक्त हो चुका है। इस ख़बर ने मेरे अस्तित्व को झिंझोड़कर रख दिया था। आज भी अचेतन में मेैं उसका मोबाइल नम्बर डायल करने लग जाता हूं, फिर ख़्याल आता है कि वह कहां है, गीत में, नवगीत में, प्रीत के संगीत में , जाने कहाँ?
साभार: वेबसाईट 'अनहद साहित्य' से। https://anhadsahitya@gmail.com/
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