मुअम्मर क़ज़ाफी की पुस्तक 'ग्रीन बुक' से लगभग सभी लोग परिचित होंगे लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि क़ज़ाफी एक अच्छे कथाकार भी थे.
उनकी अरबी भाषा में लिखी गई कहानियों और उनके सियासी आलेखों का एक संकलन 'जहन्नुम की तरफ फरार' 1999
में लन्दन से प्रकशित हुआ था.
'शहर' शीर्षक से लिखी गई उनकी कहानी दुनिया के किसी भी महानगर में रहने वाले शहरियों की बेबसी का आईना है.
1986 में अमेरिका के राष्ट्रपति रेगन की सेना ने क़ज़ाफी की हत्या करने के इरादे से तेराबलस पर बमबारी की जिसमें क़ज़ाफी की बेटी सहित सैकड़ों बेक़सूर लोग मारे गए. शायद इस घटना से प्रभावित होकर उन्होंने 'मृत्यु' शीर्षक से अरबी भाषा में एक कहानी लिखी-
'मृत्यु स्त्री है या पुरुष, यह बात तो खुदा ही जानता है.हालाँकि यह बात और है कि इस्लाम से पहले अरबी शायिर तराफा बिनलअब्द के लिए मृत्यु एक पुरुष है जबकि हमारे ज़माने का शायिर 'निज़ार क़ाबानी' मात्र इस कारण से मृत्यु को स्त्री के रूप में लेता है कि उसके बेटे तौफ़ीक़ को उससे छीनकर अपने साथ ले गई.
मृत्यु यदि पुल्लिंग है तो हमें जीवन की अंतिम सांस तक उसका सामना करना चाहिए। यदि वह स्त्रीलिंग है तो हमें ससम्मान उसके आगे खुद को समर्पित कर देना चाहिए।
अभी तक इस कहानी में मेरे पिता ने मृत्यु का सामना किया और पराजय स्वीकार नहीं की. इस नाते मैं मृत्यु को पुल्लिंग की श्रेणी में रखता हूँ. लेकिन मेरे अनुभव ने मेरे चिंतन को बदल दिया है.
८ मई, १९८५ को मेरे पिता ने मृत्यु के आगे समर्पण कर दिया और तनिक भी विरोध न कर हाथ तक नहीं उठाया। उसने मृत्यु से संघर्ष तक नहीं किया।
उसके समर्पण से लगा कि मृत्यु पुल्लिंग नहीं, स्त्रीलिंग है. उसकी मृत्यु में समर्पण की ऐसी सुकून भरी भावना थी मानो वह किसी स्त्री की गोद में बेख़ौफ़ सो गया हो.
यदि तुम लम्बी उम्र के इच्छुक हो तो मेरे पिता की तरह जीवन भर मृत्यु से संघर्ष कारना होगा जिसने १०० वर्षों तक मृत्यु से संघर्ष किया। हालाँकि उसमें इस बीच आत्महत्या कर लेने का भी ख्याल आता रहा.
१० साल की उम्र में उसने ऐसा करना भी चाहा। फिर वह समझ गया कि मृत्यु शाश्वत है. इससे तो व्यक्ति मुक्ति पा ही नहीं सकता लेकिन जीवन से भागकर किसी भी देश में व्यक्ति खुद को नहीं रख पायेगा।
इसलिए उसे स्त्री के रूप में स्वीकार कर उसका सम्मान करें लेकिन अगर जम्हूरिया लीबिया या लैटिन की औरत खुद को कमजोर कर नाज़ो-अंदाज़ के साथ विलासिता का परिचायक बन पुरुष के पुरुषत्व को कपुरुष बनाने में लग जाये, उसे गुदगुदाए तो वह मृत्यु से पराजित हो जायेगा और हमलावर जिस्म की आज़ादी को समाप्त कर उसे अपने अधीन कर लेगा . (समाप्त)
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