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| प्रताप सहगल ने सही कहा है कि…… |
बाईपास एक ऐसी जगह, जहां भैन के तीतरों का कल्चर है, जहां गोह पालने और उन्हें चोरी का हथियार बनाने वाले पम्पाड़ो के बीच कंजर रहते हैं, मैना, गूजर, कंजर, कुत्ता, बन्दर-बिल्ली के होने के अहसास से ही बाइपास गहरी नींद नहीं सो पाता है? जहाँ उडती चिड़ियाँ सबको दिखाई देती हैं, फंसती हुई कोई नहीं देख पाता। जहाँ का हर पात्र खुद एक सवाल की तरह दिखाई देता है, लेकिन वहस्वयं भी सवाल करता दिखाई देता है कि ज़िन्दगी हर क़दम पर एक बाइपास की इच्छा क्यों करती रहती है?
क्यों पुलिस-प्रशासन अपना रवैया नहीं बदल पाता, निर्दोषो का एनकाउन्टर कर देता है, रिश्वत खाता है? मुहावरों में जीता रहता है। उसका आम सिपाही भी भांग छानकर रोटी छीनता है, गांजा पीकर रेड डालता है, ज़रुरत पड़ने पर जूतियों में शराब भी पी लेता है, बैक लाइट भी ठोक लेता है, दुद मिट्ठा रोक के, पत्ती ठोक के ढाबे की चहा भी पी लेता है। ये सब बाइपास में होता है. प्रताप सहगल ने सही कहा है कि ‘बाइपास’ एक ऐसे बाइपास की जीवंत गाथा है, जहाँ से हम कई बार बस या कार से अपने गंतव्य की यात्रा को छोटा कर लेते हैं।'
इस उपन्यास में मलिक राजकुमार के उनके अपने अनुभव हैं। बृज का परिवेश, भाषा, मुहावरे, लोकोक्तियां, तीज-त्योहार, प्रेम, प्रकृति और जीवन का संघर्ष विद्यमान है। साथ ही तत्कालीन युवा राजनीती का संक्रमण भी। तुलना करें तो हमें आज भी कोई बड़ा बदलाव नज़र नहीं आता दिखाई देगा। यही इस उपन्यास की रचनात्मक पारदर्शिता है।
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