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गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

ग़ज़ल/चाँद/रंजन जैदी

खिड़की खोले झाँक  रहा थाकबसे पीला-पीला चाँद.      दश्त में तारे शबनम-शबनमउसमें ही जा बैठा चाँद.     
चाँद की  किरनें   धीरे-धीरे,  नीम के पेड़पे जा बैठीं,   
दूर उफ़ुक़ में डूब रहा है, मुफलिस की उम्मीद का चाँद.    
इक-इक करके टूट गए सब, चूड़ी कंगन और अरमान                           लेकिन आस का बंधन बाकी, इकदिन दस्तक देगा चाँद.  
दर्द  के   झोंके  धीरे-धीरे  उसको  कुएं  तक ले आये,    
उसने झाँक के देखा ऐ दिल, पानी में बैठा था चाँद.
बादे-सबा खुशबू की छागल लेकर तू गुलशन में जा.
वक्ते-सहर जब लौटके आतू, साथ में लेकर आना चाँद.   
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मंगलवार, 2 अगस्त 2011

ग़ज़ल /रंजन जैदी

खेल गुड़ियों  का  हकीकत में बदल जायेगा, 
फिर कोई ख्वाब गमे-ज़ीस्त  में ढल जायेगा.   
बंद मुट्ठी से निकल आये जो सूरज बाहर,   
मोम का शह्र है, हर सिम्त पिघल जायेगा.   
देखते - देखते सब उड़ गईं चिड़िया यां  से,   
अब मेरा घर भी कड़ी धूप में जल जायेगा.   
एक मिटटी के प्याले की   तरह उम्र कटी,   
धूप  की  तरह  रहा  वक़्त निकल जायेगा.   
घर  की  दीवारें भी बोसीदः कफ़न ओढ़े हैं,   
अबकी तूफां मेरे ख्वाबों को निगल जायेगा.   
हमने मायूस कमंदों से   न    जोड़े   रिश्ते,    
हिज्र की रात का ये चाँद है,   ढल जायेगा.   
               
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रविवार, 31 जुलाई 2011

उर्दू उपन्यास के सौ साल/रंजन जैदी

उर्दू उपन्यास ने जबसे अपनी उम्र के १०० साल पूरे किये हैं, साहित्यकारों के बीच चर्चों के बाज़ार गर्म हैं.  मजनूँ गोरखपुरी के उपन्यासों को अब स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि उनके समस्त उर्दू उपन्यास हार्डी  के उपन्यासों का चरबा है. लेकिन मिर्ज़ा हादी रुसवा के उपन्यास उमराव जान अदा पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता, बल्कि कहा जा सकता है कि उनका उपन्यास उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के सामाजिक जीवन के यथार्थ की ऐसी मनोवैज्ञानिक प्रस्तुति रही है जिसने उपन्यास को एक मुकम्मल और पहले उपन्यास की हैसियत प्रदान कर दी. यह अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम बना जिसने सर सय्यद के तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आन्दोलन को एक भाषा और बोलने की शक्ति प्रदान की. इस आन्दोलन की शृंखला में रतन नाथ सरशार, ऐतिहासिक उपन्यास लिखने वाले उपन्यासकार अब्दुल हलीम शरर, और मुंशी प्रेमचंद अग्रिणी लेखकों  में गिने जाने लगे. १९४८ में फिक्र तौन्सवीं का छठा  दरिया भारत-पाक विभाजन के दौरान लिखी गयी उनकी एक ऐसी डायरी थी जिसमें रोज़ की सम्प्रदियिक हिंसा, गमन और हिन्दू-मुस्लिम दंगों का रोजनामचा दर्ज किया गया था. इसे मैंने पहली बार हिंदी में अनूदित कर हिंदी मासिक पत्रिका  गंगा (संपादक:कमलेश्वर) में दिया जिसे धारावाहिक रूप में प्रकाशित किया गया. अब्दुल्ला हुसैन का उपन्यास उदास नस्लें हालाँकि १९६२  में प्रकाश में आया था लेकिन उसमें अंग्रेजी साम्राज्य के षड्यंत्रों, अंग्रेजों के विरुद्ध आक्रोश, भारतीय आज़ादी के आन्दोलन की पृष्ठभूमि  और अनेक ऐसे आयामों का चित्रण प्रस्तुत किया गया है कि वह एक क्लासिक की हैसियत हासिल करने में कामियाब होता नज़र आता है. १९६९ में हयातुल्लाह अंसारी का एक वृहद उपन्यास लहू के फूल का प्रकाशन हुआ जो आज़ादी से पूर्व के हिन्दुतान में रह रहे दलितों की समस्याओं पर आधारित था. कुर्रतुल-एन हैदर का उपन्यास आग का दरिया एक कालजई उपन्यास सिद्ध हुआ. लेकिन इसके बावजूद कि वर्तमान उर्दू उपन्यास रचनात्मक दृष्टि, कंटेंट और अपनी यथार्थपरक विशेषताओं के रहते परिपक्व होते हुए भी इतना निजी और रियलिस्टिक होता जा रहा है कि हम पढ़ते-पढ़ते सीधे पात्र के साथ उसके बेडरूम तक जा पहुँचते हैं. यह अंग्रेजी संस्कृति तो हो सकती है, भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश कि संस्कृति नहीं हो सकती जो आज भी अपनी संस्कृति, इतिहास, परम्पराओं और मानवीय सरोकारों के साथ मानवीय संभावनाओं के बीच जीने में आनंद की अनुभूति  महसूस करते हैं.                      09415111271 http://alpst-literature.blogspot.com/

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

ख़ाली है अभी साग़र/ग़ज़ल خالی ہے ابھی ساغر / غزل -- رنجن زیدی

File Photo: (Late) Kamleshwer and Dr. Ranjan Zaidi
  خالی ہے ابھی ساغر، خالی میرا پیمانہ /
ساقي مجھے جینے دے، کر بند نہ مےكھانا /

کیوں مجھ سے یہ کہتا ہے، مےخانے سے اٹھ جاؤ،
میں تو نہ ملگي ہوں، میرے نہ ہے بتخانا /

اس وقت مجذن بھی مسجد میں نہیں ہوتا،
اے شیخ نہ گھبرا تو، لے تھام لے پیمانہ /

اک حسن -- مجسسم جب، شیشے میں نظر آیا،
آنکھیں ہوئیں تب هےرا، چھلكا میرا پیمانہ /

کیا وہ بھی زمانہ تھا، کیا شوكھيے -- مستی تھی،
آنکھوں سے چھلک جانا، پی -- پی بہک جانا /

کس طرح بھلا دوں میں، خوشبو سے بھری یادیں،
ہو رات کی تنہائی، اور چپکے سے آ جانا /

ماضی مجھے لوٹا دے، ہر گزرا ہوا لمحہ،
وہ حسن کے لشكارے، وہ مستيے -- رندانا /
-रंजन ज़ैदी  
   
ख़ाली है अभी साग़र, ख़ाली मेरा पैमाना/
साक़ी मुझे जीने दे, कर बंद न मैखाना/  
   
क्यों मुझसे ये कहता है, मैख़ाने से उठ जाओ,   
मैं तो न मलंगी हूँ, मेरे न है बुतख़ाना/  
   
इस वक़्त मुअज्ज़िन भी मस्जिद में नहीं होता,   
ऐ शेख न घबरा तू, ले थाम ले पैमाना/  
   
इक हुस्ने-मुजस्सिम जब, शीशे में नज़र आया,   
आँखें हुईं तब हैराँ, छलका मेरा पैमाना/   
   
क्या वो भी ज़माना था, क्या शोखिये-मस्ती थी,   
आँखों से छलक जाना, पी-पीके बहक जाना/  
   
किस तरह भुला दूं मैं, खुशबू से भरी यादें,   
हो रात की तन्हाई, और चुपके से आ जाना/   
   
माज़ी मुझे लौटा दे, हर बीता हुआ लम्हा,   
वो हुस्न के लश्कारे, वो मस्तिये-रिन्दाना /
   
   
                                                                                                         09415111271 http://alpst-literature.blogspot.com/

गुरुवार, 16 जून 2011

यादें: तेरे आँगन में

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लेखक: रंजन  जैदी 
उत्तर प्रदेश का एक जिला है सीतापुर और उसकी तहसील है सिधौली. इसी सिधौली का एक पुराना क़स्बा है बाड़ी. यानि, हिंदी के कवि नरोत्तम दास की जन्मस्थली. कभी ये लखनऊ के नवाब मीर वाजिद अली के शासनकाल में फौजी छावनी हुआ करती थी. मीर साहेबान सेना में रसलदार जैसे ओहदों पर पदासीन रहे थे. वहीं कसबे के बीचो-बीच सय्यदों का बाड़ा था जो अब बीचोबीच एक चौसर टीले में बदल चूका है. कभी जिसमें जिंदगी की हरारतें रक्स किया करती थीं और इस टीले पर जगर-मगर करती हवेलियों में मीर साहिबान के इज्ज़तदार संयुक्त परिवार रहा करते थे. उसी परिवार की उस पीढ़ी का मैं एक ऐसा चिराग था जो देश की आज़ादी के बाद उन खंडराती हवेली में रौशन हुआ और उम्र के 12 साल तक रहकर  वहां के घटाटोप तारीखी अंधेरों में टिमटिमाता रहा, फिर बेवतन हो गया. तब तक सय्यदबाड़े की रौनक पूरी तरह से ख़त्म हो चुकी थी. जो था, वो बस इतना कि बिखरे हुए अफसानों में लखौरी ईंटों के मलबे में लोनी चाटती बादशाहत दफ़्न हो चुकी थी और कहानियों के नुचे हुए पंख हिंदुस्तान के दूसरे शहरों और मुल्क के बटवारे के बाद बने नए मुल्क पाकिस्तान के शहरों में बस जाने वाले यहाँ के परिवार नए घरों में ले जा चुके थे ताकि बिन परिंदों के उन्हें अगली नस्लें अपनी किताबों में रख सकें. ऐसी हजारों हज़ार यादें मेरी कहानियों के किरदारों में इस तरह से आ बैठीं जैसे बेवतन महाजिर लावारिस मकानों प़र कब्ज़ा कर लेते हों. उम्र के १२ साल और होश आने के ५ साल, मेरी जिंदगी के कीमती साल रहे हैं. (मेरी दो कहानियां उसी पतझड़ का मर्सिया हैं). जैसा कि मैंने ऊपर बताया कि यह बस्ती, हिंदी के महान कवि नरोत्तम दास की जन्मस्थली भी है. मेरे बचपन के ५ साल उसी कवि के मंदिर के वरांडे में उनके दोहे गाते हुए गुज़रे. इसके लिये मैंने अपनी हवेली के भीतर की रिवायतें तोड़ दी थीं और एक ऐसी जुबान हवेली में ले आया था जिसे हमारे घर में गंवारू जुबान कहा जाता था. तब किसी ने सपना भी नहीं देखा था की एक दिन मैं इसी गंवारू ज़बान में पी एचडी करूंगा और इसी जुबान में कहानियां लिखूंगा, सहाफ़त करूंगा. नरोत्तम दास मेरी प्रेरणा रहे हैं, मेरा संबल भी. पिता डाक्टर थे, तो उनका सपना था कि मैं डाक्टर बनूँ. मैं डाक्टर बना, किन्तु लिटरेचर में. बहुद विरोध सहा. प़र तब संतोष हुआ जब मैंने अपने पिता को बड़ी गंभीरता के साथ कहानी 'मकान' को कमरा बंद कर पढ़ते देखा.क्योंकि ये कहानी सारिका में छपी थी और उन दिनों उसकी अंग्रेजी पत्रों में भी बहुत चर्चा हुई थी. खिड़की से झंकते हुए तब मैंने अपने पिता के चेहरे प़र जो संतोष और ख़ुशी देखी थी, उसे मैं आज तक नहीं भूल पाया. आज वह इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन जब वह मृत्यु से दो दिन पहले दिल्ली स्थित मेरे घर में आकर ठहरे तो मैं ख़ुशी से फूला नहीं समां रहा था. तब मैं नहीं समझ पाया था कि मेरे पिता ने मेरी हिंदी को स्वीकार कर लिया था और मेरे हाथ प़र जिंदगी की आखरी हिचकी लेना इसका सबूत है. काश] हिंदी भी मुस्लिम साहित्यकारों को स्वीकार करले....
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सोमवार, 13 जून 2011

दलित/ रंजन जैदी


दलित  
                                                   
अँधेरे में खरहरा सा   
स्वर करता वह
इतिहास में जीवित है
वर्तमान में नहीं        
वर्तमान अधीन है.     
       
चमकती जिल्द प़र     
अंधेरों की परतें और            
मरे हुए पशुओं की दुरगंध      
साबुन से भी नहीं  हटती-       
       
ठंडे कमरे की लकड़ी बन       
खुशबू के जंगल में     
खुद जलकर दहकाता है        
सांसों के सागर में     
वह डूबकर खुद भी    
कुलीन बन जाता है-   
 लेकिन मुट्ठी खुलते ही जुगनू/
उड़ जाता है   
गबरू घर लौट आता है
पत्नी] बच्चों के बीच   
नज़रे झुकाए हुए      
ग्लानि से भरा
चीत्कार उठता है       
-      
ऐसे] जैसे-----  
मानो उसके भीतर कोई अपना मर गया हो    
या उसके भीतर       
बीती सदियों का -कोई दुर्ग     
हरहराकर ढह गया हो.  
           
              -0-     
                                                                                                                                                09415111271

शनिवार, 11 जून 2011

PAPA/Arsila Zaidi

Arsila Zaidi
PAPA,
When i was born,
You were there to catch me when i fall, whenever and wherever.
When i said my first words,
You were there for me,
to teach me the whole dictionary if need be.
When i took my first steps,youere there to encourage me n.
When i had my first day at school,
you were there to give me advice and help me with my homework.
I might have not done what u asked me to do...
But i know you will be there for me through all these times and more, the good and bad.
So i just wrote this to say to u papa Ranjan Zaidi
'I LOVE YOU PAPA!!!'


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गुरुवार, 9 जून 2011

हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान / लेखक : डॉ. रंजन जैदी(समीक्षक:जनार्दन मिश्र)https://alpst-literature.blogspot.com/2011/06/sameekshakjanardan-mishra.html

 राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक  'संस्कृत के चार अध्याय' में लिखा है कि  भारत में हिन्दू-मुस्लमान सदियों से साथ-साथ रहते आ रहे हैं, पर एक- दूसरे के बारे में उन्हें सही जानकारी नहीं के बराबर है.  प्रतिष्ठित लेखक-कवि, संपादक  डॉ. रंजन जैदी के संपादन में प्रकाशित पुस्तक हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान राष्ट्रकवि के इस कथन की पुष्टि करता है. डॉ. जैदी की पुस्तक में उनकी भूमिका सय्याद मुझसे छीन मत मेरी ज़बान को लेकर स्वनाम-धन्य कुल १२ लेखकों के आलेख संकलित है. आश्चर्य की बात तो यह है कि अपने को हिंदी के अच्छे जानकार मानने वाले सरकारी एवं निजी संस्थानों में ऊंचे ओहदे पर कार्यरत अधिकाँश अधिकारीयों की जानकारियां इतनी अधूरी हैं कि उन्हें सही पता ही नहीं है कि हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का कितना बड़ा योगदान है. स्वनामधन्य हिन्दू आलोचकों ने भी इस तथ्य पर प्रकाश डालना उचित नहीं समझा. एक सच्चाई और भी है कि विभाजन की त्रासदी का प्रभाव हमारे तत्कालीन साहित्य पर भी पड़ा है. एक अरसे से हिदुओं द्वारा लिखे जा रहे साहित्य से मुस्लिम पात्र गायब होते जा रहे हैं, जबकि मुस्लिम साहित्यकारों के साहित्य से हिन्दू पात्र न तो आज़ादी से पहले गायब थे और न ही आज़ादी के बाद गायब हुए. उनके साहित्य, संस्कृत और समाज में पहले जैसा ही हिन्दुतान बना रहा. मुस्लिम परिवार में पैदा हुए सूफियों ने हुमायूँ पर फिकरे कसे तो वहीं मालिक मोहम्मद जायसी ने अलाउद्दीन खिलजी को भी नहीं बख्शा क्योंकि शासक वर्ग का एक ही धर्म होता है-शासन और सत्ता पर कब्ज़ा बनाय रखना. वो शासक चाहे मौर्या हो या अफगान, तुर्क हो या जाट, लोदी हो या गुर्जर, मुग़ल हो या राजपूत, ब्राह्मन हो या दलित. शासक अत्याचार करता है और शासित अत्याचार सहता है. जब कभी भी इन दोनों के बीच टकराव कि स्थिति जन्म लेती है तो क्रांति की परिस्थितियां तैयार हो जाती हैं. संकलन में एक आलेख बिलग्राम के मुस्लिम साहित्यकार में शेख शाह मुहम्मद फार्मली, मीर जलील सय्यद मुबारक,  सय्यद निज़ामुद्दीन मघनायक,  सय्यद बरकतुल्ला प्रेमी,  मीर गुलाम नबी रसलीन तथा सय्यद मुहम्मद आरिफ जान बिलग्रामी के नामों की विशेष चर्चा की गई है. ये बिलग्राम की धरती के  वे प्रतिभा-सम्पन्न मुस्लिम हिंदी भाषा के कवि थे जिन्होंने हिंदी साहित्य की निरंतर सेवा की. अब्दुल वाहिद और शाह मुहम्मद तो हुमायूँ एवं सम्राट अकबर के दरबार से सम्बद्ध थे. उनका अरबी, फारसी, तुर्की, संस्कृत तथा हिंदी भाषाओँ पर अच्छा   अधिकार था. अब्दुर रहमान पंजाब के प्रथम हिंदी मुस्लिम कवि हैं.  उनकी कृति सन्देश रासक को डॉ. हजारी प्रसाद द्वेदी ने अपभ्रंश का बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रन्थ माना है.  बाबा फरीद ने फारसी मुल्तानी और कुछ समय हिन्दवी (हिंदी) मे रचना  की.  एटा के पटियाली गाँव  में जन्मे हजरत  निजामुद्दीन औलिया के शिष्य हजरत अमीर खुसरो  ने  पटियाली में अपनी कविता की रचना की. अमीर खुसरो के ९९ ग्रंथों में से २२ का ही पता चलता है. वे फारसी के चोटी के कवि थे. उनकी भाषा में जहाँ  ब्रिज तथा संस्कृत के शब्दों का प्रयोग मिलता है, वहीं खड़ी बोली का शुद्ध रूप भी अच्छी तरह से देखने को मिलता है.अब्दुर रहीम खानखाना,तनसे, रसखान, सूज़न और ताज ,जसे सैकड़ों ऐसे नाम हैं जिनकी रचनाओं को हिंदी साहित्य से यदि निकल दिया जाये तो हिंदी का कलेवर ही नहीं, आत्मा भी सिकुड़ जाएगी. इस पुस्तक में कोई ऐसा लेख नहीं है जिसे संख्या-पूर्ति करने की दृष्टि से संकलित किया गया हो.  डॉ. परमानन्द पंचाल,डॉ. शैलेश जैदी, डॉ. हर्मेंद्र सिंह बेदी, डॉ. माजदा असद,  नूर नबी अब्बासी, डॉ. ॐ प्रकाश सिंघल, डॉ. इक़बाल अहमद, डॉ. नफीस अफरीदी,डॉ. कौसर यजदानी, डॉ. रवींद्र भ्रमर एवं श्री दुर्गा प्रसाद गुप्ता के साथ-साथ डॉ. रंजन जैदी ने मुस्लिम साहित्यकारों का हिंदी साहित्य में योगदान विषय को रेखांकित  करने  वाले अपने अलग-अलग लेखो के माध्यम से विषय के साथ न्याय किया है. समग्रता में मूल्याकन किया जाये तो यह पुस्तक पाले हुए भ्रम का निवारण करती है आम पाठकों के साथ-साथ विद्वत-जनों एवं शोधार्थियों के लिए  भी यह पुस्तक विशेष रूप से पठनीय है.             पुस्तक : मुस्लिम साहित्यकारों का हिंदी में योगदान, संपादक; डॉ रंजन जैदी; प्रकाशक :  श्री नटराज प्रकाशन, ए-५०७/१२, करतार नगर,बाबा श्यामगिरी मार्ग, साऊथ गामडी एक्सटेंशन, दिल्ली-५३, पृष्ठ:१५९; मूल्य :  रूपये ३००.०० 09415111271 AlpsT-Litterature

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

मुख्तलिफ (विभिन्न) अशआर/ranjan zaidi

आंसू बहुत हैं आँख में, प़र डर मुझे है ये/गर पड़ गया अकाल तो हम क्या करेंगे तब? / वो तमाम लोग जो हसीन है, तेरी हर नज़र का यकीन हैं / मेरी आँख उनसे है ला-बलद, तेरी बज़्म का ये कमाल है. / न तो ज़िन्दगी को कोई खो सका, न ही ज़िन्दगी को कोई पा सका , ये तो महज़ एक ख़याल है, कि मैं हूँ जहाने-दराज़ में.  / तू मेरे जिस्म की ख्वाहिश में यहाँ  तक पहुंचा / कम-से-कम अब तो मुझे चैन से रहने दे यहाँ.  / इन्तजारे-शबे-हिज्राँ भी अजब है यारब / इश्क में इतनी सजा क्यों तू दिया करता है ? उम्रे-रफ्ता पे भरोसा नहीं करना हरगिज़ / सीढियां  चढ़के चलो चाँद पे हम हो आएं. /वक़्त था जब मुझे कुछ लोग समझते थे चाँद , अब कमंदों से भी काबू में  नहीं आता चाँद.                            

कौन  हो  तुम/  जो  अभी  ख्वाब  से  जागी  भी  नहीं/और  हैरत  से  मेरी  सिम्त/   नज़र  गडाए हुए/कितनी  हैरान -परीशान/  मुझे  तकती हुई/अपनी  किस्मत  को  अंगूठी  में  सजा  लेती  हो/अपने  चेहरे   पे  कोई  लट  भी  गिरा  लेती  हो/ क्या  कहूं  वक़्त  हूँ /हर  कोई  मुझे  छल  जाता  है/  हर  जवां-साल  मेरे  गम  को/  बढ़ा  जाता है/ मैं  ज़माना  हूँ/ज़माने  की  हवा  देता  हूँ/  मैं  भी पत्थर  हूँ/  खुदाओं में बदल जाता हूँ.
बड़े गौर से किसी चीज़ को, खुले लब की तिश्नगी लिये, मेरे दोस्त किसकी तलाश है, दबे सुर में कहके देख लो ,मेरे दोनों कान हैं खुले हुए./ कोई था कभी जो मिला मुझे, वो अजीब सर्द रात थी / न तो उसने दिल की बात की, न ही मेरे लब-कुशा हुए / यूँही वक़्त बीतता गया, इसी तरह देखते हुए./न वो रात लौट के आ सकी, न ही उससे फिर मिले कभी/ मेरे दिल में अब भी मलाल है, कि उसे गले न लगा सके./
आओ ईरान  की  वादी  में  चलो हो आएं,  लोग कहते हैं कि काशान में है हुस्न बहुत. /तू न कर फिक्र खुदा तुझपे मेहरबां होगा, जो भी होगा वो तेरे वास्ते अच्छा होगा/ वो सितारा जो फलक प़र तेरी तकदीर का है, जल्द मुट्ठी में तेरे आके चमक जायेगा. इतना मायूस न हो, इतना मायूस न हो../     इस नए ज़ख्म की तारीख़ का क्या ज़िक्र करूं,

कोई आवाज़ थी जो टूट के टकराई थी.
तू मुझे शौके-दराज़ी की दुआ देता है,
वो तो खुशबू थी, दबे पाँव चली आई थी.
अब मैं समझा ग़म-ए-दौराँ में अना का मतलब,
ख़ुदकुशी क़ब्ल वो बच्चों को भी ले आई थी.


اس نئے زخم کی تاریخ کا کیا ذکر کروں



، کوئی آواز تھی جو ٹوٹ کے ٹكراي تھی


. تو مجھے شوكے -- درازی کی دعا دیتا ہ


وہ تو خوشبو تھی، دبے پاؤں چلی آئی تھی.


اب میں سمجھا غم -- اے -- دورا میں انا کا مطلب،


خودکشی قبل وہ بچوں کو بھی لے آئی تھی.



रविवार, 30 जनवरी 2011

मेरा मिज़ाज भी अब/रंजन जैदी

मेरा मिज़ाज भी अब मौसमों के साथ नहीं
मेरा मिज़ाज भी अब मौसमों के साथ नहीं, नहीं हैं दोस्त, मेरी वहशतों के साथ नहीं./   गमे-हयात के किस्से सुनाएँ क्या लोगों,ज़माना आज भी रुसवाइयों के साथ नहीं./   मेरी ज़मीं का मुक़द्दर है रोज़ो-शब् जलना, यही है दर्द कि सूरज शबों के साथ नहीं./  मेरा कुसूर, मेरे कुछ गुनाह गिनवादो, या ये कहो कि, मैं अब  पस्तियों के साथ नहीं./ शजर उदास, उदासी से भर गए दरिया, अजब है वक़्त परिंदे सबों के साथ नहीं.  09415111271 http://alpst-litterature.com/

रविवार, 16 जनवरी 2011

रचनाकार की चुनौतियां / रंजन जैदी

शरीर के अंगों में आँख देखने वाली एक स्वचालित इन्द्रिय है. कैमरे के शरीर प़र जड़ी आँख को चालक द्वारा चलाना पड़ता है. इसकी प्रगति और विकास के बढ़ते चरण में हम देखते हैं कि आँख चीज़ों को व्यू-फाइंडर के ज़रिये फिल्म प़र उतारती है. किन्तु इस आँख को संचालित करने वाली आँख न केवल देखती है बल्कि देखे हुए दृश्यों को भीतर की ओर स्थित डार्क-रूम में धकेल देती है, जहाँ दृश्य विभिन्न प्रक्रियाओं से गुज़रकर  अपना सही आकार लेकर अपने ही स्थान प़र स्टिल हो जाती है. दोनों की अलग-अलग प्रक्रियाएं है किन्तु इसके बावजूद चालित आंख का कैमरे की आँख से गहरा सम्बन्ध रहता है. मिसाल के तौर प़र हमारी आंख किसी दृश्य को देखती है और उसी दृश्य को कैमरे की आँख  भी देखती है. कैमरे की आँख उसी दृश्य को अपनी नज़र से देखकर बेहद सुन्दर होने का संकेत हमारी आंख को भेजती है. हमारी आँख अब इस संकेत की सत्यता जांचने के अपने अनेक  स्नायुतन्त्रों का सहारा लेती है और जब हर जगह से क्लियरेंस मिल जाती है तो हम अत्यंत उत्सुक, उत्तेजित और भावुक होकर शटर दबा देते हैं. नकारात्मक स्थिति में कृति अनुकृति में बदल जाती है. यानी जब वस्तुएं कला रूप में ढलती हैं तो वे वही नहीं रह जातीं जो दिखाई देती हैं बल्कि उनके वे पक्ष भी दिखाई देने लगते हैं जो सामान्य-रूप से अदृश्य होते हैं. ऐसी स्थिति में परख और पहचान का रिश्ता छायाकार अथवा सृजनशील लेखक से गहरा हो जाता  है. यहीं प़र रचनाकार के समक्ष अनेक चुनौतियां भी आ खड़ी होती हैं. इनसे निपटना ही सृजनशील रचनाकार की मूल कसौटी बन जाती है.        09415111271 alpsT-litterature

<a =" "></a> हिन्दी उपन्यास दिल , दरिया-दरिया कथाकार ; डॉ० जेड० ए० जैदी

हिन्दी उपन्यास दिल , दरिया-दरिया कथाकार ; डॉ० जेड० ए० जैदी (एक) सिधौली, उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर की एक तहसील है. इसका छोट...

इस्मत चुगताई /Ismat Apa/Ranjan Zaidi इस्मत चुगताई यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि उर्दू साहित्य की

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