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रविवार, 30 जनवरी 2011

मेरा मिज़ाज भी अब/रंजन जैदी

मेरा मिज़ाज भी अब मौसमों के साथ नहीं
मेरा मिज़ाज भी अब मौसमों के साथ नहीं, नहीं हैं दोस्त, मेरी वहशतों के साथ नहीं./   गमे-हयात के किस्से सुनाएँ क्या लोगों,ज़माना आज भी रुसवाइयों के साथ नहीं./   मेरी ज़मीं का मुक़द्दर है रोज़ो-शब् जलना, यही है दर्द कि सूरज शबों के साथ नहीं./  मेरा कुसूर, मेरे कुछ गुनाह गिनवादो, या ये कहो कि, मैं अब  पस्तियों के साथ नहीं./ शजर उदास, उदासी से भर गए दरिया, अजब है वक़्त परिंदे सबों के साथ नहीं.  09415111271 http://alpst-litterature.com/

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