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रविवार, 31 जुलाई 2011

उर्दू उपन्यास के सौ साल/रंजन जैदी

उर्दू उपन्यास ने जबसे अपनी उम्र के १०० साल पूरे किये हैं, साहित्यकारों के बीच चर्चों के बाज़ार गर्म हैं.  मजनूँ गोरखपुरी के उपन्यासों को अब स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि उनके समस्त उर्दू उपन्यास हार्डी  के उपन्यासों का चरबा है. लेकिन मिर्ज़ा हादी रुसवा के उपन्यास उमराव जान अदा पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता, बल्कि कहा जा सकता है कि उनका उपन्यास उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के सामाजिक जीवन के यथार्थ की ऐसी मनोवैज्ञानिक प्रस्तुति रही है जिसने उपन्यास को एक मुकम्मल और पहले उपन्यास की हैसियत प्रदान कर दी. यह अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम बना जिसने सर सय्यद के तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आन्दोलन को एक भाषा और बोलने की शक्ति प्रदान की. इस आन्दोलन की शृंखला में रतन नाथ सरशार, ऐतिहासिक उपन्यास लिखने वाले उपन्यासकार अब्दुल हलीम शरर, और मुंशी प्रेमचंद अग्रिणी लेखकों  में गिने जाने लगे. १९४८ में फिक्र तौन्सवीं का छठा  दरिया भारत-पाक विभाजन के दौरान लिखी गयी उनकी एक ऐसी डायरी थी जिसमें रोज़ की सम्प्रदियिक हिंसा, गमन और हिन्दू-मुस्लिम दंगों का रोजनामचा दर्ज किया गया था. इसे मैंने पहली बार हिंदी में अनूदित कर हिंदी मासिक पत्रिका  गंगा (संपादक:कमलेश्वर) में दिया जिसे धारावाहिक रूप में प्रकाशित किया गया. अब्दुल्ला हुसैन का उपन्यास उदास नस्लें हालाँकि १९६२  में प्रकाश में आया था लेकिन उसमें अंग्रेजी साम्राज्य के षड्यंत्रों, अंग्रेजों के विरुद्ध आक्रोश, भारतीय आज़ादी के आन्दोलन की पृष्ठभूमि  और अनेक ऐसे आयामों का चित्रण प्रस्तुत किया गया है कि वह एक क्लासिक की हैसियत हासिल करने में कामियाब होता नज़र आता है. १९६९ में हयातुल्लाह अंसारी का एक वृहद उपन्यास लहू के फूल का प्रकाशन हुआ जो आज़ादी से पूर्व के हिन्दुतान में रह रहे दलितों की समस्याओं पर आधारित था. कुर्रतुल-एन हैदर का उपन्यास आग का दरिया एक कालजई उपन्यास सिद्ध हुआ. लेकिन इसके बावजूद कि वर्तमान उर्दू उपन्यास रचनात्मक दृष्टि, कंटेंट और अपनी यथार्थपरक विशेषताओं के रहते परिपक्व होते हुए भी इतना निजी और रियलिस्टिक होता जा रहा है कि हम पढ़ते-पढ़ते सीधे पात्र के साथ उसके बेडरूम तक जा पहुँचते हैं. यह अंग्रेजी संस्कृति तो हो सकती है, भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश कि संस्कृति नहीं हो सकती जो आज भी अपनी संस्कृति, इतिहास, परम्पराओं और मानवीय सरोकारों के साथ मानवीय संभावनाओं के बीच जीने में आनंद की अनुभूति  महसूस करते हैं.                      09415111271 http://alpst-literature.blogspot.com/

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

ख़ाली है अभी साग़र/ग़ज़ल خالی ہے ابھی ساغر / غزل -- رنجن زیدی

File Photo: (Late) Kamleshwer and Dr. Ranjan Zaidi
  خالی ہے ابھی ساغر، خالی میرا پیمانہ /
ساقي مجھے جینے دے، کر بند نہ مےكھانا /

کیوں مجھ سے یہ کہتا ہے، مےخانے سے اٹھ جاؤ،
میں تو نہ ملگي ہوں، میرے نہ ہے بتخانا /

اس وقت مجذن بھی مسجد میں نہیں ہوتا،
اے شیخ نہ گھبرا تو، لے تھام لے پیمانہ /

اک حسن -- مجسسم جب، شیشے میں نظر آیا،
آنکھیں ہوئیں تب هےرا، چھلكا میرا پیمانہ /

کیا وہ بھی زمانہ تھا، کیا شوكھيے -- مستی تھی،
آنکھوں سے چھلک جانا، پی -- پی بہک جانا /

کس طرح بھلا دوں میں، خوشبو سے بھری یادیں،
ہو رات کی تنہائی، اور چپکے سے آ جانا /

ماضی مجھے لوٹا دے، ہر گزرا ہوا لمحہ،
وہ حسن کے لشكارے، وہ مستيے -- رندانا /
-रंजन ज़ैदी  
   
ख़ाली है अभी साग़र, ख़ाली मेरा पैमाना/
साक़ी मुझे जीने दे, कर बंद न मैखाना/  
   
क्यों मुझसे ये कहता है, मैख़ाने से उठ जाओ,   
मैं तो न मलंगी हूँ, मेरे न है बुतख़ाना/  
   
इस वक़्त मुअज्ज़िन भी मस्जिद में नहीं होता,   
ऐ शेख न घबरा तू, ले थाम ले पैमाना/  
   
इक हुस्ने-मुजस्सिम जब, शीशे में नज़र आया,   
आँखें हुईं तब हैराँ, छलका मेरा पैमाना/   
   
क्या वो भी ज़माना था, क्या शोखिये-मस्ती थी,   
आँखों से छलक जाना, पी-पीके बहक जाना/  
   
किस तरह भुला दूं मैं, खुशबू से भरी यादें,   
हो रात की तन्हाई, और चुपके से आ जाना/   
   
माज़ी मुझे लौटा दे, हर बीता हुआ लम्हा,   
वो हुस्न के लश्कारे, वो मस्तिये-रिन्दाना /
   
   
                                                                                                         09415111271 http://alpst-literature.blogspot.com/

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