आग जिलाती है तो जलाती भी है/रंजन जैदी
भोपाल, एक एतिहासिक दर्पण। यानि : तस्वीर का एक पक्ष।
शीर्षक में है, एक हज़ार वर्ष का इतिहास. एक पाठक के रूप में मैं तलाशता रहा लेकिन समझ नहीं पाया कि इस पुस्तक में इतिहास जैसी क्या चीज़ है? हम इसे एक हज़ार वर्ष का दस्तावेज़ भी नहीं कह सकते लेकिन लिखने की जिजीविषा ने भोपाल की स्टीरियोग्राफी को लेखक ने ऐसे पेश किया है कि हम अधजले कंडे की राख की मोटी पर्त के नीचे की दबी आग की तपन को ज़रूर महसूस करने लग जाते है.
यानि, इस लेखक में लेखन की अपार संभावनाओं की आग दबी तो है लेकिन उसके पास न तो जंगल है और न ही आसपास खर-पतवार कि जो आग को पकड़कर एक ज्वालामुखी में तब्दील करा दे.
बात इतिहास की है तो कंडे की आग की संस्कृति अब नहीं रही है. नई पीढ़ी तो यह भी नहीं जानती कि आग से आग कैसे जलाई जाती है? महलों की मशाले किसे कहते हैं? महलों की सियासत फसीलों के अन्दर चिंगारियों से हरमसराओं में कैसी आग भड़का दी जाती थी. फौजे या पिंडारी जब आबादियों में हमले करते थे तो कितने घरों के चिराग बुझ जाया करते थे.
लेखक ने बुनकर की तरह 'सट नली सट तार, कब बुनें-कब जाएँ बज़ार' की जल्दबाजी में मोटी दरी तो बुन ली लेकिन वह उसे कालीन नहीं बना सका.
हिंदी में विभिन्न मतावलम्बियों द्वारा बहुत से एतिहासिक उपन्यास लिखे गये, इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर आलेख भी देखने को मिले, लेकिन राजा भोज की तस्वीर नहीं देखने को मिली।
लेखक बेहद संजीदगी के साथ बहुत बड़ा काम कर सकता था क्योंकि उसके पास साधन थे, उन महलसराओं के अफ्सानो की हकीकत की पड़ताल कर सकता था जो दीवारों और महराबों से आज भी महसूस होती है और लेखक ने खुद उनका बहुत जगहों पर ज़िक्र किया है. वे अफसाने मैं भी जानना चाहता हूँ.
हैरत है कि भोपाल जैसे शहर के लेखक और शायिर आज तक उन सिसकियाँ तक नहीं सुन पाए जिनका सतीश चतुर्वेदी ने अपनी इस किताब में ज़िक्र किया है. मेरी नज़र में यह किताब अपने आप में भोपाल के महलों में गश्त करते अफसानों का इनसाइकालोपीडिया है।
मैं इस किताब का बहुत सम्मान करता हूँ क्योंकि इसने मुझे उस सुरंग का रास्ता दिखाया है जो मुझे एक ऐसे कब्रिस्तान तक ले जाती है जहाँ ऐसे कंकालों का ढेर लगा हुआ है जो सच बोलते रहे होंगे, इश्क करते रहे होंगे, वतन की मुहब्बत में मिटते रहे होंगे, और महल की हरमसराओं की उन बेनामी औरतों से जिस्मानी ज़रूरतें पूरी करते रहे होंगे जिनके आक़ा आग लगाकर फिर कभी नहीं लौटे होंगे।
कमबख्त ये आग होती ही ऐसी है कि फासले से रहो तो झुलसाती है, छूने की कोशिश करो तो जलाती है, प्यार से देखो तो इबादत बन जाती है, नफरत करो तो घर फूँक देती है. बिफर जाये तो बस्तियों को भी राख में तब्दील कर देती है.
सतीश चतुर्वेदी चाहते तो १८५७ के विद्रोह की परतें खोल सकते थे लेकिन उनके कन्धों पर पुरस्कारों का इतना बोझ लदा हुआ है कि वह गर्दन उठाकर कुदसिया बेगम के ओरा से बाहर निकल ही नहीं पाए, हुस्न की आग में खुद भी जलकर राख हो गये….
Book : Bhopal, Ek Etihasik Darpan/Satish Chaturvedi, ISBN : 978-93-83001-42- 2 http://alpst-literature.blogspot.com/ +91 9350934635