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रविवार, 26 सितंबर 2010

अल्लाह इस पीढ़ी को किसी की नज़र न लगे/ranjan zaidi


नामवर सिंह मुझे हमेशा से प्रभावित करते रहे हैं. मेरा जब पहला हिंदी कहानी संग्रह पर्त-दर-पर्त नवें दशक के शुरूआती दौर में प्रकाशित हुआ तो वह नामवर जी को ही समर्पित था. नामवर जी राही मासूम रज़ा के गहरे मित्र रहे हैं और मैं उनके उपन्यासों प़र शोध कर चुका हूँ.मेरे, राही मासूम रज़ा और नामवर जी के बीच की मज़बूत कड़ी थे उर्दू के जाने-माने शायर और मेरे परमप्रिय  हितैषी डॉ. अजमल अजमली. आज वह भी इस दुनिया में नहीं हैं. उन दिनों मैं नामवर जी से आये-दिन JNU में  मिलने जाया करता था. फिर व्यस्तताओं ने मुझे ऐसा जकड़ा कि अपनों से धीरे-धीरे कहीं तक दूर होता चला गया. गोष्ठियों-संगोष्ठियों में नामवर जी से मुलाकात हो जाती. अच्छा लगता. उन्हें देखकर यही दुआ निकलती कि अल्लाह इस पीढ़ी को किसी की नज़र न लगे. नामवर जी और राजेंद्र यादव, कृष्णा सोबती, अमरकांत, रवीन्द्र कालिया सरीखी अनेक साहित्यिक विभूतियाँ हमारे बीच हैं और हम उनके साथ संम्वाद कर सकते हैं, किन्तु हमारे बाद की पीढ़ी को क्या यह अवसर मिल पायेगा? हमें इनपर गर्व करना चाहिए कि ये हमारे दौर में है, हमने अबतक बहुत से लोगों को खो दिया है. अभी पता चला कि कन्हय्या लाल नंदन भी नहीं रहे. ऐसे बहुत से लोग जो हमें अज़ीज़ थे, हमारे रहबर थे, बाबा नागार्जुन, नगेन्द्र, विष्णु प्रभाकर, शमशेर, रमाकांत, कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी,  और राजेंद्र अवस्थी, सरीखे कितने ही लोग, देखते-देखते हमारे बीच से चले गए. हमारे बाद की पीढ़ी के लिये ये लोग इतिहास बन जायेंगे.(गंगा प्रसाद विमल जानते हैं कि हमलोगों का अवस्थी जी के साथ कितना गहरा नाता रहा है.)  लेकिन उनके साहित्यिक योगदान का आजतक ठीक से आकलन तक नहीं किया गया.). मुझे याद है मेरे नूर काव्य-संग्रह के विमोचन के समय  मनोहर श्याम जोशी ने कहा था कि यदि हिंदी साहित्य को जिंदा रखना है तो हमें मुस्लिम साहित्यकारों का हिंदी साहित्य में स्वागत करना होगा और उस पीढ़ी को सम्मान देना होगा जिसने हिंदी साहित्य को तमाम विवादों के बावजूद उसे संवृद्ध किया है. नामवर जी किसी भी खेमे से क्यों न जुड़े रहे हों, उन्हें देखकर हमें उनमें ठेठ बनारसीपन की अनुभूति होती रही है, जैसी मैं मनोहर श्याम जोशी में लखनवीपन की अनुभूति करता था. आज नामवर जी बहुत याद आये तो नज़्म के रूप मैं जज़्बात कुछ् यूँ उबल पड़े-- मैं खुशनसीब हूँ, तुमको मैं देख सकता हूँ, वो बदनसीब हैं जिनको तुम्हारी कद्र नहीं / अज़ीम लोग ज़माने मे कम ही आते है, तुम इक  अज़ीम फ़साना हो दौर-ए-इसयाँ का / मैं चाहता हूँ कि जिंदा रहो हजारों बरस, तुम्हारे इल्म के चर्चे हमेशा होते रहें / ज़िहानतों  के समंदर कभी न सूखें  कहीं, दिए  जो  तुमने  जलाए, हमेशा  जलते  रहें / अदब  का  नूर, हमारा गुरूर तुमसे है,हमारी इल्मे-बसीरत, शऊर तुमसे है / मेरी दुआ है कि तुमको मिले हयात-ए-अदब, तुम्हारा नाम रहे ता-अबद कि ता-अबद.  
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शनिवार, 25 सितंबर 2010

एक चिट्ठी पाक प्रेमिका को.../रंजन जैदी

यह नज़्म मैंने  तब लिखी थी जब मैं जवान और खूबसूरत था और AMU  में MA का  Student हुआ करता था. उन्हीं दिनों पकिस्तान की एक खूबसूरत अमीरज़ादी हिन्दुस्तान आई तो उससे बेसाख्ता इश्क हो गया. यह मेरा पहला-पहला इश्क था. वह भी मुझसे बहुत प्यार करने लगी. तब हम दोनों नहीं जानते थे कि हम दो मुल्क हैं और हमारे बीच सरहदे हायल है. वीजा ख़त्म होने प़र वह मायूस होकर पाकिस्तान लौट गयी. फिर उसने मुझे पकिस्तान से ख़त लिखने शुरू  किये और बुलाया. अफ़सोस कि उसकी यह ख्वाहिश मैं पूरी नहीं कर सका. वक्त गुज़रता रहा. उसकी मुहब्बत बढती रही. और भी ग़म थे ज़माने में मुहब्बत के सिवा - का मतलब सामने था. इल्म की सरहदें लांघता हुआ दिल्ली आ गया. सहाफ़त (हिंदी पत्रकारिता और लेखन)  के पेशे में आते ही मुझपर भारत-पाक विभाजन की त्रासदी का खुलासा हुआ, और मेरे पाकिस्तानी महबूब की मंज़िल उसकी शादी तक पहुँच गयी. उसका शौहर उसे ब्याह कर अमेरिका  लेकर चला  गया.  अब वह अपने बच्चों की वफ़ादार माँ है. पता नहीं कब से , दुनिया के मुल्कों की सरहदें कितने-कितने  दिलों को मजरूह (ज़ख़्मी)करती आ रही हैं. ये ख़त मेरे महबूब की  शादी से कुछ  वक्त पहले का है. यह ख़त मुझे उसतक पहुँचाने की कभी हिम्मत नहीं हुई, लेकिन जब उसने यह नज़्म रेडियो (विदेश प्रसारण) प़र सुनी तो उसने फोन प़र इसकी इत्तिला दी. मुझे उसकी सिसकियाँ आज भी याद हैं.  जब मेरा  नूर काव्य-संग्रह तैयार हुआ तो मैंने  इस नज़्म को भी उसमें शामिल कर लिया. बरसों बाद इधर  न्यू जरसी   (अमेरिका) से जब मेरे एक अज़ीज़ नौजवान दोस्त (जो वहां एक बड़े ओहदे प़र है)  निशांत  गुप्ता का मेल आया जिसने स्टुडेंट लाइफ में इस नज़्म को पढ़ रखा था (मेल में उसने इस नज़्म का ज़िक्र किया था ) और इसे फिर से पढ़ने की ख्वाहिश ज़ाहिर की थी  तब मुझे लगा मानो मैं फिर से माज़ी (अतीत)की गुंजान वादियों में लौट गया हूँ.  तब मुझे फिर से बहुत कुछ याद आगया था. वह नज़्म मैंने उसे मेल कर दिया, अपने पाठकों के लिये भी वही नज़्म प्रस्तुत है ----- ऐ मेरे हमदमो-हमराज़, फलां इब्ने-फलां, तूने लिक्खा है कि फिलफौर चले आओ यहाँ, कैसे आ जाऊं  मेरे पांव में ज़ंजीरें हैं, मुझसे वाबस्ता मेरे ख्वाब की ताबीरें हैं, सरहदों प़र भी सियासत के कड़े पहरे हैं, खार्ज़ारों में जड़े खौफज़दः चेहरे हैं, मैं परिन्दः भी नहीं हूँ कि जो उड़ कर आऊँ, अजनबी देस की धरती पे तुझे छू पाऊँ./ दिल की गहराई से तू मेरी हकीकत सुन ले, मेरे अफ़कार से गुलहाय-अकीदत चुन ले, मुझसे मुमकिन नहीं गुलशन में बहारों से गुरेज़, यानी फूलों से मुहब्बत करूं खारों से गुरेज़, खार दे मुझको मगर ये गुले-सद-चाक न दे, मैं हूँ हिंदी तू मुझे मश्विराए-पाक न दे, इतनी निस्बत भी अगर है तो यही क्या कम है, तुझको ग़म सिर्फ मेरा, मुझको वतन का गम है./ तू अगर चाहे मेरे मुल्क में आ सकती है, शम्मा-इलहाक़ के सहरा में जला सकती है, तू अगर आये तो मैं दिल को मना सकता हूँ, खूं में डूबे हुए माज़ी को भुला सकता हूँ, मैं परिन्दः भी नहीं हूँ कि जो उड़ कर आऊँ...कैसे आजाऊं मेरे पांव में ज़ंजीरें हैं./..बनायीं मेंह ने दीवार प़र लकीरे कुछ, खबर न थी कि लकीरों में तुझको पाऊंगा,यूँ ज़ख्म-खुर्दः किसी मुल्क की तरह ऐ दोस्त, अजीयतों की तवारीख में तलाशूंगा/ तो मैंने तेरी कलाई में चूड़ियाँ डालीं, बड़े शऊर से मेहदी का रंग उसको दिया, मैं तेरी मांग सजाने लगा सितारों से, दुल्हन के रूप में घंटों मैं तुझको देखा किया, तभी लबों पे तेरी थर्थराह्तें कौन्धीं, कहा, न आज भी दीवार लांघ पाऊंगी, तू जितना चाहे सजा ले संवार ले मुझको, मैं चाहकर भी लकीरें मिटा न पाऊंगी. कैसे आजाऊँ मेरे पांव में ज़ंजीरें हैं. मुझसे वाबस्ता मेरे ख्वाब की ताबीरें हैं  ../ अकबराबाद के पुर-नूर नज़ारों की कसम, और कश्मीर के गुलपोश बहारों की कसम, मादरे-हिंद के महके हुए गेसू की क़सम, जिससे दुनिया है मुअत्तर उसी खुशबू की कसम, सुब्ह को सुब्ह-ए-बनारस मुझे याद आएगी, शाम को शाम-ए-अवध और भी तड़पायेगी, हिंद है सुब्ह-ए-चमन और मैं हूँ बादे-नसीम, हिंद महका हुआ इक फूल है, मैं उसकी शमीम. मुझसे कहता है तू हमदम कि वतन छोड़ के आ, एक बुलबुल से ये कहता है चमन छोड़ के आ...........,कैसे आ जाऊं  मेरे पांव में ज़ंजीरें हैं, मुझसे वाबस्ता मेरे ख्वाब की ताबीरें हैं.   09415111271 AlpsT-Litterature

बुधवार, 22 सितंबर 2010

शनिवार, 18 सितंबर 2010

शेखर जोशी को चंद्रयान पुरस्कार-२०१०


कोलकाता. हिंदी के लब्ध-प्रतिष्ठित कथाकार शेखर जोशी को मानिक दफ्तरी ज्ञानविभा ट्रस्ट के प्रथम चंद्रयान पुरस्कार-२०१० से सम्मानित किया गया है. ट्रस्ट की ओर से शेखर जोशी को मानदेय के रूप में ३१,०००=०० भेंट किये गए. पुरस्कार समोराह कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद् में आयोजित किया गया.
शेखर जोशी का जन्म सितम्बर १९३२ में अल्मोड़ा जनपद के ओजिया गाँव में हुआ था. प्रारंभिक शिक्षा अजमेर और देहरादून में हुयी. कथा लेखन को दायित्वपूर्ण कर्म मानने वाले जोशी हिंदी के सुपरिचित कथाकार हैं. उन्हें उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार और साहित्य भूषण पहल सम्मान से पहले ही सम्मानित किया जा चुका है. उनकी कहानियों का विभिन्न भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, चेक, रूसी, पोलिश और जापानी भाषाओँ में भी अनुवाद किया जा चुका है. कुछ कहानियों का मंचन और दाज्यू  नामक कहानी पर बाल फिल्म सोसायटी द्वारा फिल्म का निर्माण भी किया गया है.उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियों में  कोशी का घटवार, साथ के लोग, हलवाहा, नौरंगी बीमार है, मेरा पहाड़, और एक पेड़ की याद ने  नयी कहानी को एक नयी पहचान दी है. पहाड़ी इलाकों की गरीबी, कठिन जीवन संघर्ष, उत्पीड़न, यातना, प्रतिरोध, उम्मीद और निराशा से भरे औद्योगिक मजदूरों के हालात, शहरी-कस्बाई और निम्नवर्ग के सामाजिक-नैतिक संकट और समाज में व्याप्त रूढ़िवादी परम्पराएँ जैसी समस्याओं प़र उनकी कहानियों का मूलतः फोकस रहा है.  09415111271

रविवार, 12 सितंबर 2010

khare paani ki machchliyaan...


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09415111271

शनिवार, 11 सितंबर 2010

हिन्दी साहित्य के इतिहास की बुनियाद/रंजन जैदी


    हिन्दी साहित्य के इतिहास की बुनियाद वैष्णव साहित्य के कंकड़-पत्थरों से भरी गयी थी। इन बारीक रोड़ियों में जैन और सिख मतावलंबियों की रागात्मकता का गारा  नहीं मिलाया गया था। 
       यदि बुनियाद में गारे के साथ मसाला बनाते समय सिद्धों और नाथों की रचनाओं को भी इसमें सम्मिलित कर लिया जाता तो आज हम वैष्णव साहित्य की बुर्जों पर जैन] सूफी और सिख साहित्य की नक्काशी का भी आनंद ले रहे होते और साहित्य एक पृथक धर्म के रूप में तमाम मत-मतान्तरों से ऊपर उठ कर अपनी एक नयी परिभाषा को परिभाषित कर रहा होता।    
      यदि ऐसा होता तो इस हवेली के पत्थरों के नाम निश्चय ही वैष्णजैन] सूफी] सिख] सगुण या निर्गुण नहीं होते। यदि व्यक्त 'साहित्य' धर्म के रूप में उभरता तो बौद्ध धर्म की अविरल धारा क्रान्ति की बाढ़ के बीच वैष्णव साहित्य की हवेली में दरारें डाल कर बड़े-बड़े चिंतकों और विचारकों को बहा कर गलियारों में न ले आती] जिन पर कथित निम्न जातियों के पांव पड़ते थे।
      ये वे ही कथित निम्न लोग थे जिन्हों ने साबित किया था  की जिस तरह ज़मीन की कोई सरहद नहीं होती है, उसी तरह इल्म की भी कोई सरहद नहीं हुआ करती है  bYe tc efLr’d dh f”kjkvksa esa ljxksf”k;ka dj ftLe dks ;g vglkl djkrk gS fd ftLe feV~Vh gS vkSj feV~Vh dk fj”rk tehu ls gksrk gS] rks t+ehu ls tqM+s gq, vkneh dks ;g le>us esa nsj ugha yxrh fd “kjhj dk fj”rk /kjrh ls tqM+k gksrk gSA  
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      Hkjrh; lwQ+hokn dk rRo fparu blh ns”k dh /kjrh ls mitk tgka xkaoksa ds गलियारों और mudh चौपालों के वारिसksa की भाषा शास्त्रkचार्यों की भाषा जैसी नहीं थी] न ही उनका तत्व-चिंतन इतना गूढ़ था जो ब्रह्म] जीव और जगत को सही तौर पर परिभाषित न कर पाता हो।  
      Tkks yksx czg~e dks izkIr djus ;k vYykg dh rjQ+ tkus ds fy, bcknrsa djrs gSa] os vYykg ds eq[kfyl cans dgs tkrs gSA tks eq[kfyl bcknrs&b”ds&bykgh esa iwjh rjg ls Mwc tkrs gSa] os vYykg ds eq[kyl gks tkrs gaSA eq[kfyl mUgsa dgrs gSa tks vYykg dh rjQ+ pydj tkrs gSa ysfdu eq[kyl mUgsa dgrs gSa ftudh bcknrksa ls [kq”k gksdj vYykg vius cans dh rjQ+ [kqn pydj vkrk gSA ,sls eq[kyl lwfQ+;k;sdjke dh [k”kcq,a tc fgUnqLrku dh fQ+t+k esa QSyha rks bcknr dk Q+ylQ+k gh cny x;kA vketu us eglwl fd;k fd mudh futkr rks blh nfj;k dh fd”rh ls gS vkSj os rlOoqQ+ dh fdf”r;ksa esa vk&vkdj cSBus yxsA blh fd”rh ls cw vyh dyanj dh vkokt+ lqukbZ nh]^ltu ldkjs tk,axs] uSu Hkjsaxs jks;@fo/kuk ,slh dhft;ks] vkSj dnh u gks;A   
      larksa vkSj lwfQ+;ksa us tc fd”rh dks izrhd dk :i fn;k rks fd”rh esa lokj yksxksa ds O;ogkj esa izse ds Hkkoksa dk izLQq`Vu gksus yxkA izse us Qkjlh vkSj laLd`r dks vkRelkr dj dchj dks ,slh t+cku ns nh ftlus KkuekxZ ds gj pkSjkgs dks jks”kfu;ksa ls Hkj fn;kA ;gka u Hkjrh; osnkar Fkk u [kkfyl cljs ls vk;kfrr rlOoqQ+] ;gka dkxn dh ys[kh dk dksbZ egRo u gksdj tks ns[kk] ogh futkr dk earj cu x;k] fgUnw rqjd dh ,d jkg gS] lrxq# bgS crkbZ@dg dchj lquks gks larks] jke u dgsm [kqnkbZA   
      ,slk ugha Fkk fd KkuekfxZ;ksa ds ;s eqlkfQ+j fd”rh esa vdsys Fks] jTtc Fks] ckck “ks[k Q+jhn Fks] ;kjh lkgc gksa ;k nfj;k lkgc] “kkg cjdrqYykg gksa ;k vCnqy lenA cqYys”kkg ls ysdj lkyl] ;dje vkSj dk;e rd lHkh us lnk lusgh lqfeju dh ckr dghA                                                                                                                     
     ;g og ih<+h Fkh tks साधारण जातियों के अलाव से तप कर निकलh Fkh और जनता की भाषा में उनसे संवाद djrh FkhA संवाद की यही साधारण भाषा बहती हुई सूफियों] नाथों और दरवेशों के मठों] [kkudkgksa] vkSj  दरगाहों के हुजरों तक igqaprh pyh x;h] जिसने कालांतर में एक नए युग का lw=ikr किया।
      Hkkjrh; lwQh n”kZu us viuh nyhy nh fd gj ckg~;:i dk ,d var%dj.k gksrk gSA mnkgj.k nsrs gq, mUgksaus crk;k fd tSls gj Qy ds “kjhj ij fNyds ds :i esa ,d vkoj.k gksrk gSA mlh rjg vkoj.k ds vanj rRo ;kuh xwnk gksrk Hkh gSA   
      felky ds :i esa ge dsys dks ysaA dsys dk vkdkj&izdkj tgka Hkh og iSnk gksrk gS] ,d gh :i esa tUe ysrk gSA vkoj.k ls vuqeku yxk;k tkrk gS fd dsyk lsgrean gksxk ;k ughaA vkoj.k Qy dk ckg~;:i gS tks gesa dsys dh feBkl] lqxa/k] lM+ka/k] mlds lkSan;Z vkSj fonzwirk ls ifjfpr djkrk gS fdUrq ge fNyds ds Hkhrj ds lR; dks ml le; rd ugha tku ikrs gSa tc rd ge mldk lsou u dj ysaA rks] xwnk ckfru gS vkSj fNyds dk vkoj.k mldk t+kfgj ;kuh] ckg~;:iA
      ;gh lEca/k “kjhj vkSj vkRek dk gSA var%dj.k dh fLFkfr vn`”; vo”; gS fdUrq ogh lR; gS ftls ge vkRek dh “kfDr dgrs gaSA
      “kjhj LoLFk gksrk gS] ikSf’Vd vkgkj ls vkSj vkRek LoLFk gksrh gS la;e] fu;e] R;kx] v/;kRe vkSj [kqnk dh bcknr lsA ;g lxq.k vkSj fuxqZ.k ds ijLij la?k’kZ dh vfUofr FkhA
      इस युग में जिस निर्गुण काव्य की सर्जना हुbZ] वह संत और सूफी काव्य के वर्गीकरण से मूलतः मुक्त-काव्य सि) हुआ जिसकी दार्शनिक व्याख्या ब्रह्मवाद से लेकर अद्वैतवाद तक की गयी। नतीजा ;g  हुआ कि जो बौढ्धिक जाति का भाषायिक-साहित्य संवत १२५० से १५५० तक नाथों] सूफियों और संतों dh मार्फ़त जातेता झील में एकत्र हुआ] उसे हवेलियों के तत्व-चिंतकों ने उलीचने की कोशिशें नहीं कीं] क्योंकि तत्कालीन बौद्धिक वर्ग इस दौरान की भाषायिक क्रान्ति को मान्यता देने के लिए कतिपय तैयार नहीं था।   
      वह यह  समझने के लिए भी कतिपय तय्यार नहीं था कि कौमों और समुदायों के अपने कुछ अलग  विश्वास] आस्थाएं और अकीदे होते हैं] लेकिन जीने के तरीके और तरीकों से जन्मी समस्याएं समान होती हैं] जिन्हें अलग-अलग धर्मों में नहीं बांटा जा सकता हैA शासक वर्ग का एक ही धर्म होता है] शासन और सत्ता पर कब्ज़ा बनाये रखना। वह शासक चाहे मौर्य हो या अफगान] तुर्क हो या जाट] लोदी हो या गुर्जर] मुग़ल हों या राजपूत] ब्राह्मण हो या शूद्र] शासक अत्याचार करता है और शासित अत्याचार सहता है। जब इन दोनों में टकराव की स्थिति जन्म लेती है तो क्रान्ति की आंधी चलती है और आंधियां कभी भी दिशाहीन नहीं हुआ करती हैं।
       तो] जब सामाजिक और सांस्कृतिक क्रान्ति ने दस्तक दी तो कबीर ने खालिस हिन्दुओं के पाखंड को ही नहीं लताड़ा] उन्होंने मुसलामानों के पाखंडों पर भी हमला किया। गुरू नानक देव ने मुल्लाओं को लताड़ा तो पंडितों को भी नहीं बख्शा। उस आंधी में हमें सूफियों] संतों और जातेता साहित्यकारों की घन-गरज साफ़ सुनाई देती है। 
       इस तरह यदि हम देखें तो पायेंगे कि जहाँ सूफियों ने हुमायूं पर फिकरे कसे] तो वहीं मलिक मोहम्मद जायसी ने अलाउद्दीन खिलजी को भी नहीं बख्शा। यहीं पर सूफीवाद का तत्वचिंतन हमें एक न;s आसमान के नीचे लाकर खड़ा कर देता है] जहाँ हम महमूद-ओ-अयाज़ का मतलब एक पंक्ति में आकर समझने लग जाते हैं।   
      यही तत्वचिंतन के सूत्र और आस्था हमें तमाम मत-मतान्तरों से ऊपर जाकर सामान्य जनता के बीच ला खड़ा करते है] जो आमजन के रूप में शोषण का शिकार होती हैं और सीधी-नाथों] योगियों तथा शास्त्रचार्यों के बीच का अन्तर जान लेती हैं और पहचान लेती हैं कि शंकराचार्य का बौf)क-चिंतन गोरखनाथ] बाबा फरीद] कबीर दास] गुरू नानक और तुलसी दास से कितना पृथक और गूढ़ है। 
      वह जान लेती है कि सूफियों dh साधना-पद्धति नाथ योगियों की साधना-पद्धति से कितनी भिन्न और सरल है जिसमें चमत्कार नहीं] यथार्थ की साँसों का नियंत्रण है। पाखंडी योगियों का तिलिस्म नहीं] आस्थाa] विश्वास और कर्म का सत] तत्वचिंतन है। उसका कारण ;g था कि सूफी-संतों का तत्वचिंतन घृणा पर बसेरा नहीं Mkys हुए था। उनका मूल-मन्त्र था] प्रेम! मानव का मानव से प्रेम] जो भावkभिव्यक्ति में नाथ] योगी और वैष्णव शब्दावली से इतर नहीं] केवल केव्लत्ववादी के अत्यन्त समीप था और केवलवाद का यही सि)kaत अवतारवाद से सम्बन्ध जोड़ कर उसे राबिया इब्ने&अरबी को अपनी ओर खींच लाया।  
       शाएद इसी केवलत्व के सिद्धांत ने महमूद शबिस्त्री को भी आकर्षित कर उसे गुशन-ए-राज़ जैसी कृति की रचना करने पर बाध्य कर दिया फैजी ने नल&दमन की कथा को फ़ारसी में पिरोया। मौलाना रूम की मसनवियों में भारतीय लोक&कथाओं के पात्र फ़ारसी के रास्ते ईरान और फिर अरब तक पहुंचे। जायसी के अखरावट] आखरी कलाम और पद्मावत ने सूफी काव्य की चिंतनधारा को नए आयाम दे दिए ।    
        एक लहर थी जो बसंत की बयार बन कर तत्वज्ञानियों के दार्शनिक चिंतन को छूती हुई सूफीवाद को जीवन्तता प्रदान करती हुई आम जनता की साँसों में घुलती चली गयी। हमीदुद्दीन नागौरी ने सिद्ध किया कि चित्त जगत के बाहर है और जगत चित्त के बाहर। साधक के चित्त में प्रवेश करते ही जगत बाहर आ जाता है और जगत में प्रवेश करते ही चित्त से बाहर आ जाता है। शेख हमीदुद्दीन नागौरी के सम्बन्ध में हिन्दी के कतिपय मुसलमान कवि (लेखक- शैलेश जैदी पृष्ठ:७०) पुस्तक में उनके दार्शनिक चिंतन पर विस्तार से  प्रकाश डाला गया है। 
       विद्वान लेखक के अनुसार शेख साहब का वह्दतुल&वजूद के दर्शन में विश्वास था कि सृष्टि पदार्थ देखने में कितने ही भिन्न क्यों न हों] यदि उनकी वास्तविकता पर विचार किया जाए तो वे मूलतः एक ही हैं। पुस्तक में समां] (जिसमें शेख हमीदुद्दीन नागौरी की काफ़ी रूचि थी) को लेकर फुतः-ए-सलातीन के हवाले से एक किस्से का ज़िक्र किया गया है।  
      विद्वान लेखक लिखता है कि सुलतान इल्तुतमिश के राज्यकाल में शेख नागौरी दिल्ली पधारे। वहाँ वह दिन-रात समां सुनते रहते और उसी में मगन रहते। सम्राट उनका बहुत मान-सम्मान करता था। दरबार में मुफ्तियों ने बादशाह के कान भरे तो उन्हें दरबार में बुलाकर उनसे सवाल किया गया कि समां शरीअत के विरूद्ध है या नहीं\ उत्तर मिला कि समा] आलिमों के लिए हराम है और साधकों के लिए हलाल।
       इस प्रकार हम देखते हैं कि शहाबुद्दीन नागौरी का सूफी चिंतन नाथ-पंथी प्रवृतियों को आत्मसात करने वाला था। शेगनी गयी जोगिनी करी] गनी गयी को देसA अयन रसायन संचरे] रंग जो मोर ओस।   
      तसव्वुफ़ का यह  चिंतन तत्कालीन नाथ योगियों पर भी पड़ा] गोरखबानी में आए शब्द इसका प्रमाण हैं। जैसे बाबा गोरखनाथ की यह स्वीकृति कि उत्पति हिंदू जरना जोगी] अकलि परी मुसलमानीA इसका उदहारण है। इसी परम्परा के एक अन्य कवि हैं अलख दास। इनका असली नाम अब्दुल कुद्दूस गंगोही था । इन्होने दाऊद कृत चंदायन का फ़ारसी में पद्यान्वाद किया और ख़ुद भी केवलत्व के सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए अपनी रचना रुश्द्नमा  में इसको व्याख्यायित किया।     
      उन्होंने सच्चे सूफी की पहचान को परिभाषित करते हुए कहा कि जो लोग परम सत्य को प्राप्त कर लेते हैं] और ईश्वर के अलावा दूसरी सभी वस्तुओं से विमुख हो चुके होते हैं] वे ही सूफी कहलाते हैं। उनके अनुसार सच्चा इंसान समस्त वाह्याम्बरों से मुक्त होता है।  
      हमें सूफी संत-साहित्य में कबीर और नानक भी इसी चिंतन का सर्वत्र अलख जगाते दिखाई देते हैं। इन्हीं संतों] कवियों और दार्शिनिकों ने हमें सोच के नए आयाम दिए और हम ये समझ पाये कि मानव जीवन की अभिव्यक्ति ही साहित्य का सहज धर्म है। इस धर्म का नाम हिन्दू&मुसलमान नहीं है। 
       अमृता प्रीतम के अनुसार ये तो मैं से आगे मैं तक पहुaaWचने की यात्रा है। उस मैं तक पहुँचने की जिसमें सबसे पहले मैं की पहचान जमा होती है। जहाँ गैर सा गैर दर्द अपना हो जाता हैA bस प्रकार हम कह सकते हैं कि इसीलिए साहित्यकार से साहित्य का गहरा नाता स्थापित हुआ] इसे हम चिंतन का भी नाम दे सकते हैं। चिंतन जितना गहरा] जितना यथार्थ और मानव&मूल्यों की उन्नति का प्रेरक होगा] उतना ही वह आत्मीय] टिकाऊ और लोकप्रिय होगा। यूसुफ़-&जुलेखा की कहानी हो या रानी पद्मावती और रत्नसेन की कथा] जब वे अपनी आत्मा की गहराइयों के साथ आम-जन तक पहुँचती हैं तो सरहदें लाँघ जाती हैं] भले ही उनकी अभिव्यक्ति की भाषा कोई भी क्यों न रही हो। खुसरो से लेकर बुरहानुद्दीन जानम या इनसे लेकर इंशाल्लाह खां तक हिन्दी साहित्य की यात्रा कहीं भी अजानी महसूस नहीं होती] क्योंकि हिन्दी भाषा और इसके साहित्य की समृद्धि में भारत के सभी धर्मों और सम्प्रदायों के अनुयाइयों ने समान रूप से योगदान दिया है।     

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