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रविवार, 26 सितंबर 2010

अल्लाह इस पीढ़ी को किसी की नज़र न लगे/ranjan zaidi


नामवर सिंह मुझे हमेशा से प्रभावित करते रहे हैं. मेरा जब पहला हिंदी कहानी संग्रह पर्त-दर-पर्त नवें दशक के शुरूआती दौर में प्रकाशित हुआ तो वह नामवर जी को ही समर्पित था. नामवर जी राही मासूम रज़ा के गहरे मित्र रहे हैं और मैं उनके उपन्यासों प़र शोध कर चुका हूँ.मेरे, राही मासूम रज़ा और नामवर जी के बीच की मज़बूत कड़ी थे उर्दू के जाने-माने शायर और मेरे परमप्रिय  हितैषी डॉ. अजमल अजमली. आज वह भी इस दुनिया में नहीं हैं. उन दिनों मैं नामवर जी से आये-दिन JNU में  मिलने जाया करता था. फिर व्यस्तताओं ने मुझे ऐसा जकड़ा कि अपनों से धीरे-धीरे कहीं तक दूर होता चला गया. गोष्ठियों-संगोष्ठियों में नामवर जी से मुलाकात हो जाती. अच्छा लगता. उन्हें देखकर यही दुआ निकलती कि अल्लाह इस पीढ़ी को किसी की नज़र न लगे. नामवर जी और राजेंद्र यादव, कृष्णा सोबती, अमरकांत, रवीन्द्र कालिया सरीखी अनेक साहित्यिक विभूतियाँ हमारे बीच हैं और हम उनके साथ संम्वाद कर सकते हैं, किन्तु हमारे बाद की पीढ़ी को क्या यह अवसर मिल पायेगा? हमें इनपर गर्व करना चाहिए कि ये हमारे दौर में है, हमने अबतक बहुत से लोगों को खो दिया है. अभी पता चला कि कन्हय्या लाल नंदन भी नहीं रहे. ऐसे बहुत से लोग जो हमें अज़ीज़ थे, हमारे रहबर थे, बाबा नागार्जुन, नगेन्द्र, विष्णु प्रभाकर, शमशेर, रमाकांत, कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी,  और राजेंद्र अवस्थी, सरीखे कितने ही लोग, देखते-देखते हमारे बीच से चले गए. हमारे बाद की पीढ़ी के लिये ये लोग इतिहास बन जायेंगे.(गंगा प्रसाद विमल जानते हैं कि हमलोगों का अवस्थी जी के साथ कितना गहरा नाता रहा है.)  लेकिन उनके साहित्यिक योगदान का आजतक ठीक से आकलन तक नहीं किया गया.). मुझे याद है मेरे नूर काव्य-संग्रह के विमोचन के समय  मनोहर श्याम जोशी ने कहा था कि यदि हिंदी साहित्य को जिंदा रखना है तो हमें मुस्लिम साहित्यकारों का हिंदी साहित्य में स्वागत करना होगा और उस पीढ़ी को सम्मान देना होगा जिसने हिंदी साहित्य को तमाम विवादों के बावजूद उसे संवृद्ध किया है. नामवर जी किसी भी खेमे से क्यों न जुड़े रहे हों, उन्हें देखकर हमें उनमें ठेठ बनारसीपन की अनुभूति होती रही है, जैसी मैं मनोहर श्याम जोशी में लखनवीपन की अनुभूति करता था. आज नामवर जी बहुत याद आये तो नज़्म के रूप मैं जज़्बात कुछ् यूँ उबल पड़े-- मैं खुशनसीब हूँ, तुमको मैं देख सकता हूँ, वो बदनसीब हैं जिनको तुम्हारी कद्र नहीं / अज़ीम लोग ज़माने मे कम ही आते है, तुम इक  अज़ीम फ़साना हो दौर-ए-इसयाँ का / मैं चाहता हूँ कि जिंदा रहो हजारों बरस, तुम्हारे इल्म के चर्चे हमेशा होते रहें / ज़िहानतों  के समंदर कभी न सूखें  कहीं, दिए  जो  तुमने  जलाए, हमेशा  जलते  रहें / अदब  का  नूर, हमारा गुरूर तुमसे है,हमारी इल्मे-बसीरत, शऊर तुमसे है / मेरी दुआ है कि तुमको मिले हयात-ए-अदब, तुम्हारा नाम रहे ता-अबद कि ता-अबद.  
09415111271 AlpsT-Litterature

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