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मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

तलाश/ रंजन जैदी


जंगल-जंगल  तुमको ढूंढा,  तुम  पानी  में  बैठे  थे / जब  बारिश  का  मौसम  आया,  तब  तुम  मुझको  आये  नज़र. / जीवन  कश्ती, जिस्म  समंदर,  आओ  जीवन  पार  करें / आओ  फिर  तस्वीर  बनाएं, साँसों  से  कोलाज़  भरें./  इस  दुनिया  में  इतना  कुछ  है,  इतने  रंग  कि  हैराँ  हूँ,  तुम  तो  एक  मुकम्मल  दुनिया,  कौन  से  इसमें  रंग  भरें. / आड़ी-तिरछी  रेखाओं  में,  हमने  सड़कें  ढूंढी  थीं,  कितने  ख्वाब  सजाये  मिलकर, और  लकीरों  के  जंगल   में , महल -दुमहले  ढूंढें  हमने. / लेकिन   जिस्म  पसीना  बनकर,  नदियों  से  जा  मिलता  था, नदियाँ  रेत  बहाती  रहतीं, और  मुकद्दर  बन  जाती  थीं / हर  चौराहा  जंगल -जंगल, हर  मैदान  में  दलदल-दलदल, खुश्क  ज़मीं  को  आओ  तलाशें, फिर  से  इसमें  फूल  खिलाएं, शाएद दुनिया बस जाए! 

09415111271 AlpsT-Literature

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