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बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

तपिश/रंजन जैदी

तुम्हारे और मेरे बीच/आंसूं हैं/चमकती धूप भी/न बादल हैं/न झोंके  बादे -इसियाँ के/तुम्हे मालूम है/सूरज के बदन से फूटती/आतिशीं रेखाओं जैसा हूँ / तुम्हारी बंद पलकों प़र/उन्हीं रेखाओं से लिखता रहा हूँ/आओ फिर से इन लबों प़र/उम्र के अंगार रख दें/या किसी रूई का फाहा बन/सिमट जाओ टपकती चन्द बूंदों से/चलो मैं फिर उतर जाऊं / समंदर सीप खोले है / चलो फिर से / किसी मोती का सपना देख ले हम-तुम / न जाने कब सुनामी रात की बाँहों में आजाये / न जाने कब रगों का खूं / उबल कर ज़ह्र बन जाए / न जाने कब फ़रिश्ता मौत का सामान ले आये/चलो जिस्मों का अब ये फासला / मिलकर मिटा दें हम/चलो शबनम भरी इस रात में/फिर मुस्कुरा लें हम.    09415111271 AlpsT-Litterature

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