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रविवार, 24 अक्टूबर 2010

सरहदें/ रंजन जैदी

सरहदें हमें बताती हैं,    
हद में रहना अच्छा होता है.   
गुरुत्वाकर्षण की हदें जब भी नक्षत्र तोड़ता है    
खुद टूट कर बिखर जाता है.   
टूटने और बिखरने का दर्द,    
अपने पीछे छोड़ जाता है.    
ऐसा रात के सन्नाटे में आकाश प़र     
हम भी देखते हैं!    
अन्तरिक्ष भी बताता है    
उजाले में अखबार भी बताता  है.   
    
धरती के कुछ ऐतिहासिक खड्ड    
खड्डों के विवर इसके गवाह हैं.    
गवाह हैं कुछ वैज्ञानिक भी    
पुच्छल-तारों  की धूलभरी रेखाएं    
हदें तोड़कर------    
पृथ्वी का भूगोल और उसका इतिहास
बनाती-बिगाडती आ रही हैं   
ब्रह्म्हांड के रहस्य का कौतूहल    
बढ़ाते आ रहे हैं, बताते आ रहे हैं कि---    
पृथ्वी की भी हदे हैं, ब्रह्म्हांड की भी सरहदें हैं.   
    
ब्रह्म्हांड की हदें अनंत हैं    
प्रकाश की किरणों प़र    
रंगों के रथ चलते हैं    
असंख्य ग्रहों के तम छटते हैं .    
यही उजास संभावनाएं जगाती है    
शायद कहीं, कोई हमसा वहां मिल जाए,    
हमें सरहदों का सही अर्थ बता जाए.   
    
हम तो स्वप्नजीवी हैं    
कल्पनाओं में ब्रह्म्हांड रचते है    
अन्य ग्रहों में भी वैज्ञानिक होंगे  
हाईड्रोजन-बम और सैनिक होंगे   
शासन, सत्ता, हिंसा, बलात्कार, भ्रष्टाचार, सभी-कुछ होगा    
निर्दोष तिल-तिल मरते होंगे    
दोषी मुक्त भाव से जीते होंगे.   
सबकी अपनी हदें होंगीं    
फिरभी हदें तोड़ते होंगें.   
    
काश कि कोई उड़नतश्तरी    
हमें मिल जाए!    
हमें पृथ्वी से चुरा ले जाए.    
मैं जानना चाहूँगा कि------    
तुम्हारे यहाँ भी क्या,    
हेरोशिमा-नागासाकी की बरसी मनाई जाती है?    
वेतनाम, इराक, अफगानिस्तान जैसे मुल्कों प़र   
अमेरिका जैसे देशों की मीज़ायिलें गिराई जाती है?
    
तुम्हारे यहाँ भी क्या    
फिलिस्तीनियों जैसी मजलूम कौमें रहती है?    
क्या वहां भी इस्राईल और अमेरिका जैसे देश बसते हैं?    
क्यां वहां भी ग्वेटेमाला जैसे कैदियों के कैम्प हैं?    
क्या अमेरिकी सैनिकों की बर्बरीयत से आहत!    
सियासी कैदी, मरकर तारे बन जाते है?    
कहीं आकाश प़र दिखाई देने वाले असंख्य तारे,    
अमरीकी जेलों में यातनाएं सहकर    
मर जाने वाले कैदी तो नहीं?   
    
कोई वैज्ञानिक नहीं बताता   
न ही कोई नुजूमी, ज्योतिषी, खगोलशास्त्री, सब मौन हैं,    
डरे-सहमे से हैं          
मोनिस्ट्री में साधनारत,    
गिरिजो, शिवालों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और दरगाहों में    
धर्म और संस्कृति के मन्त्रों का जाप करते हुए.   
    
मैं चाहता हूँ कि---        
ब्रह्म्हांड की सरहद नापूं    
अन्य ग्रहों के सैनिकों की संगीनों की नोकों प़र                                                                                                    लेटकर इतिहास रचाऊँ     
भीष्म पितामह बन जाऊं.                                                                                                                       09415111271 AlpsT-Litterature

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