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सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

व्याकुलता/रंजन जैदी

हमने समंदर की ख़ामोशी देखी / लहरों का मौन-वृत्त भी / दूर क्षितिज में----/ आकाश को झुक कर / धरती के माथे को चूमते देखा / फिर भी तुम-----/  खामोश हाशिये प़र चट्टान बनी /  मुद्दत से इस इंतज़ार में हो/ कि---- / आसमान प़र चाँद निकलेगा./ लहरें उछाल मारती हुई / तुहारे पांव का स्पर्श करेंगीं /रूह को सरशार करती हुई तुमसे / संवाद करेंगीं./ लेकिन सोचो, गौर से सोचो / धरती के जन्म की भी कुंडली होती है /  उसका भी भूगोल होता है /  धरती से जब कोई पर्वत उठ कर / चाँद छूने का यत्न करता है / तो------ / अनेक सदियाँ टूट जाती हैं.                            09415111271 AlpsT-literature.com

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