ऑक और चिनार के दरख्तों से पूछा,
सरहदों की जमी हुई बर्फ से पूछा,
कल्हण की विधवाओं से पूछा,
इस गाँव में कोई पुरुष क्यों नहीं है?
मैंने छति संगपुरा की हरबंस कौर को देखा,
नींद ने दो वर्षों से दस्तक नहीं दी थी.
नन्हीं फ़ातिमा भी बैसाखियों प़र जी रही थी,
वानी हर दस्तक प़र दुबक जाता है,
यतीमखाने के बच्चे भी पटाखों की आवाज़ों प़र,
चीखते हुए सिर पीटने लग जाते हैं.
ऐ अज़ीम झेलम के पानियों में रहने वाले देवता बता,
क्या राजा विनय दत्ता के raaj में भी,
बच्चे खेलने को तरसते थे?
क्या शंकराचार्य-पर्वत प़र बनी उनकी झोपड़ी,
आतंकियों का ठिकाना बन गयी है?
हब्बा खातून के मुहब्बत भरे गीत,
अब वादी में क्यों नहीं गूंजा करते?
ऐ झेलम! तू तो सदियों से देख रहा है,
कश्मीर और कश्मीरियत से परिचित है,
धान के खेतों के उस पार----
वानी की छोटी बहन / घुटी-घुटी आवाज़ों में चीख रही है,
उसकी बारीक चीखों की गर्मी से,
और कश्मीर सुलग रहा है. ऐ अज़ीम अरनिमाल--- कश्मीरियों को रास्ता दिखा ! / रास्ता बता--- कि मंज़िल कहाँ है?

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