आओ लिख दूं...!
गुलाब की पंखड़ियों प़र तुम्हारा नाम.
और उन्हें रख दूं --
किताब के पन्नों के बीच,
फिर भूकंप आ जाए,
फिर सदी गुज़र जाए.
सभ्यता के नए अध्याय के लिये,
सत्य का अन्वेषक,
पुरातत्वविद,
गड़े खजाने की तरह एक दिन,
किताब के बोसीदा पन्नों को देख कर,
उनमें चिपकी पंखुड़ियां पाकर,
उनपर तुम्हारा नाम पढ़कर,
शोध करेगा,
प्रबंध लिखेगा,
पुरस्कार के लिये दौड़ें लगाएगा.
वह बताएगा कि यह नाम,
लाखों साल पहले,
सभ्यता-काल की हरखू बाई का है.
नहीं---- जोधाबाई का है,
नहीं-नहीं,
मीराबाई का है,
नहीं तो मिर्ज़ा हादी रुसवा की उमराव जान का है.
लेकिन सत्य का अन्वेषक पुरातत्वविद,
यह नहीं जान पायेगा कि तुम,
एक गरीब मजदूर की बेटी थीं,
अभावों में पली-बढ़ी थीं,
आँखों में आसमान छूने के सपने थे.
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