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बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

तुम्हीं बताओ ऐसा क्यों होता है? ranjan zaidi

तुम्हीं बताओ ऐसा क्यों होता है?/अच्छी सोच के चौबारे में, लोग सियासत की बिसात बिछाते हैं, बगीचे की स्थायित्व के लिये, फूल बाज़ार में खुद को बेच आते हैं, तुम्हीं बताओ ऐसा क्यों होता है?/क्यों समंदर की तह में, हम मोती तलाशते हैं, सीप की पीड़ा से अनिभिज्ञ रह जाते  हैं, आस्था और विश्वास के गलीचे प़र, पान की पीक थूक जाते हैं, तुम्हीं बताओ ऐसा क्यों होता है?/ प्रकृति जंगल जलाती है तो उगाती भी है, मानस ऐसा क्यों नहीं करता, धरती की अग्नि पर्वत देती है, मानस विनाश! स्त्री की चौखट, स्वप्निल कीलों से जड़ी प्रतीक्षारत, कि वह आयेगा, प़र वह  नहीं आता, क्यों पथराई ऑंखें जीती रहती हैं, फिर तन मिटटी हो जाता है. तुम्हीं बताओ ऐसा क्यों होता है?      09415111271 AlpsT-Litterature

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