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बुधवार, 7 जुलाई 2010

ग़ालिब ; अदब पर.....ग़ालिब/ranjan zaidi

ग़ालिब ;अदब पर.....

मिर्ज़ा ग़ालिब का असली नाम असदुल्लाह खां था. उनके तूरानी वंशज शाही परिवार सिल्जोती तुर्क नस्ल से थे जिनमें बादशाह अफरासियाब और पुशुंग के किस्से, प्राचीन ईरान की लोककथाओं और फारसी कहानियों में बेहद प्रचलित रहे हैं. एक कता में ग़ालिब स्वीकारते भी हैं के-साकी चो मन पुश्नगी व् अफ्रासियाबीम, वाली के अस्ले-गौहरम अज दूदए-जिम अस्त. जब बादशाह हुमायूँ बाकायदा दिल्ली के तख़्त पर बैठा तो उसने अपने हितैषियों में तूरानी तुर्कों कों भी सम्मानित किया. इन्हीं में ग़ालिब के पूर्वज भी एक थे जो बाद में बादशाह से अनुमति लेकर आगरा में आकर बस गए. ग़ालिब इसी वंश से सम्बंधित रहे हैं. सं.१७९६ में आगरा (उ.प्र.) निवासी अब्दुल्लाह बेग के घर जब उनके बेटे ने जन्म लिया, तब वह रियासत अलवर के महाराजा बख्तावर सिंह की सेना में नौकरी  करते थे. जिस समय असदुल्लाह ५ वर्ष के हुए, उनके पिता एक सैनिक मुहिम के दौरान दुश्मन की गोली से मारे गए. इस स्थिति में उनके लालन-पालन की जिमेदारी उनके चचा मिर्ज़ा नसरुल्लाह बेग पर आ गयी, किन्तु ४ वर्ष बाद वह भी अल्लाह कों प्यारे हो गए. बचपन में पारसी मूल के विद्वान् अब्दुल्समद कों फारसी पढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया.अब्दुल्समद ने ग़ालिब कों फारसी में इतना पारंगत कर दिया था की जब वह फारसी में शाएरी करने लगे तो विद्वान् आश्चर्य-चकित रह गए. (आज भी कहा जाता है की ग़ालिब मूलतः फारसी के आला दर्जे के शाएर थे लेकिन कभी उनके साहित्य पर गंभीरता से शोध नहीं किया गया. अच्छी खबर ये है की इन दिनों ईरान में अवश्य ग़ालिब की फारसी शाएरी पर शोध किया जा रहा है.).खुद ग़ालिब खुद कों फारसी का शाएर मानते थे और फारसी के बुलंद शायरों में वह अमीर खुसरो और फैजी की ही प्रशंसा करते थे.उनकी फारसी-विद्वता से प्रभावित होकर रामपुर रियासत के छोटे नवाब यूसुफ अली खां कों फारसी पढ़ाने के लिए ग़ालिब कों नियुक्त किया गया. कालांतर में जब नवाब यूसुफ अली खा गद्दी पर बैठे तो उन्होंने एक सौ रूपये आजीवन पेंशन के बाँध दिए जो की उन्हें बराबर मिलते रहे. ५०/-प्रतिमाह उन्हें शाही किले से (१८५०-१८५७) मिलते थे .नसरुल्लाह बेग की संपत्ति से जो आय अर्जित होती थी उसमें तीन लोगों का हिस्सा लगता था, ग़ालिब के भाई मिर्ज़ा यूसुफ, उनकी मां और ग़ालिब. प्रत्येक के हिस्से में रकम (७५०/- रूपये सालाना) पेंशन के रूप में आती थी जो की १८५७ के विद्रोह के समय तक आती रही. १८५७ के विप्लव के दौरान ये पेंशन ३ वर्षों तक बंद रही, बाद में जब स्थिति अनुकूल हुई तो ये फिर शुरू हो गयी और जो ३ वर्षों का एरिअर था, वो भी वसूल हो गया. १३ वर्ष की आयु में विवाह हो जाने के कारण उनका दिल्ली से रिश्ता जुड़ गया था और वह दिल्ली आने-जाने लगे थे. कालांतर में अंततः ग़ालिब किराये के मकानों में रहते-बसते दिल्ली स्थित मोहल्ला बल्लीमारान में उम्र के आखरी पड़ाव तक बस गए. दिल्ली में ग़ालिब कों मिर्ज़ा नौशा के नाम से भी पुकारा जाता था. इसका कारण ये था की उनकी ससुराल दिल्ली में ही थी और उनके दिल्ली निवासी ससुर नवाब इलाही बक्श, मारूफ उपनाम से उर्दू जगत में अपनी अच्छी पहचान और इज्ज़त रखते थे. यहीं रहते हुए असदुल्ला खा, मिर्ज़ा ग़ालिब बने और मिर्ज़ा ग़ालिब बनकर शोहरत की बुलंदियों कों छुआ. उनकी शोहरत और अजमत का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है की उन्हें बादशाह बहादुरशाह ज़फर द्वारा नजमुद्दौला, दबीरुल्मुल्क, निज़ामेजंग जैसी उपाधियों से सम्मानित किया गया था. इन पुरस्कारों की उन दिनों बड़ी अहमियत थी
      ग़ालिब दिल्ली की उस गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रतीक थे जो उर्दू ज़बान की पहचान हुआ करती थी. उनके शिष्यों में मुंशी हरगोपाल तुफ्ता जैसे हिन्दू जाति से सम्बन्ध रखने वाले शाएर भी थे और मौलाना हाली, मुस्तफा खां शेफ्ता मैकश और जौहर जैसे मुसलमान भी. मैकश और जौहर के बारे में ग़ालिब ने फारसी रुबाई तक कही-ता मैकशो-जौहर दो सुखनवर दारैम/शान-ऐ-दीगर व् शौकतेदिगर दारैम. कभी उन्होंने दोनों के बीच कोई अंतर महसूस नहीं किया. वह अपने दूर-दराज़ के शागिर्दों के पत्रों का उत्तर अवश्य देते थे. इसके लिए हालाँकि उन्हें डाक-टिकटों को काफी तादाद में खरीदना पड़ता था, फिर भी वह संकोच नहीं करते थे. यदि कोई जवाब के लिए टिकट साथ भेज देता था तो वह नाराज़ हो जाते थे. उनके शागिर्दों में मीर मेहदी हुसैन मजरूह, मीर कुर्बान अली सालिक, मिर्ज़ा हातिम अली मेह्र, मिर्ज़ा जियाउद्दीन अहमद खां नय्यर, नवाब अलाउद्दीन खां इल्लाई रईस लोहारू आदि. यही ग़ालिब के शानदार स्वभाव की पहचान थी और उनके संभ्रांत होने का प्रमाण भी. वह जब भी किसी संभ्रांत व्यक्ति से मिलने जाते थे तो वह उनका तहे-दिल से स्वागत करता था. एक बार दिल्ली कालेज में फारसी-प्रोफ़ेसर के पद के लिए प्रशासन ने ग़ालिब को भी न्योता दिया.ग़ालिब सज-धज कर पालकी से कालेज के फाटक तक जा पहुंचे. देर तक इंतजार करते रहे की उन्हें रिसीव करने कोई आएगा, पर कोई नहीं आया. इससे उन्होंने खुद को काफी अपमानित-सा महसूस किया. उन्होंने देर बाद कहार से वापस लौटने के लिए कहा. इस बात की खबर जब अँगरेज़ प्रिंसिपल को लगी तो वह स्तब्ध रह गया. उसने ग़ालिब को सन्देश भिजवाया की प्रशासनिक-व्यवस्था में उनका औपचारिक स्वागत संभव नहीं था. क्योंकि ग़ालिब कालेज में ब-हैसियत कैंडिडेट गए हुए थे न की शाएर मिर्ज़ा ग़ालिब. यही उनकी खुद्दारी थी. जिसने उन्हें उम्र के आखरी दिनों में बहुत परेशान किया. कान से भी ठीक से सुनाई नहीं देता था और स्वभाव में मलंगीपन आ गया था. मैं अदम से भी परे हूँ, वरना गाफिल! बारहा/ मेरी आहे-आत्शीं से बाले-उनका(unqa) जल गया. इस शेर में ग़ालिब ने उन लोगों को संबोधित किया है जो ब्रह्म-ज्ञान अर्थात खुद-शनासी को नहीं समझते, कहते हैं की मैं मुल्के-अदम से दूर जिंदगी और मौत की हदों से दूर निकल चुका हूँ. जब मैं इन सीढियों को पार कर रहा था तो अक्सर ऐसा हुआ की बुलंद गर्दन मेरी पस्ती से भी अधिक महसूस होती रही और मेरी सोजे-मुहब्बत ने उसकी शोहरत के पंख जला दिए थे. उनकी मायूसियों ने उन्हें इसक़दर बेजार कर दिया था की उन्हें इसका इज़हार तक करना पड़ा. मैं हूँ और अफसुर्दगी की आरज़ू ग़ालिब! के दिल/देख कर तर्ज़े-तपाके अहले दुनिया जल गया. यानी, दुनियावालों द्वारा की जाने वाली उनकी उपेक्षा और उनके प्रति की जाने वाली व्यवहारिक उदासीनता से वह इतने क्षुब्ध हैं की अपनी स्वभावगत खुशियों से ही वह विरक्त हो गए हैं. अब तो हाल ये है की उदासी ही अज़ीज़ हो गई है और वह चाहते है की ऐसे ही उदास रहें.क्योंकि जब-जब वह खुश रहने की जुर्रत करते हैं तो दुश्मन उनकी जान लेने पर उतारू हो जाते हैं. कावे-कावे सख्त जानी हाय तन्हाई न पूछ /सुभ : करना शाम का, लाना है जूए-शीर का। \कावे-कावे से तात्पर्य प्रयास और प्रयत्न है। जूए-शीर का लाना अर्थात कठिन कार्य।गालिब फरमाते हैं  के तन्हाई और बेकसी के आलम में सख्त जान बनकर जो मुसीबत झेल रहा हूँ, समझ लो के इस शाम-ऐ-गम का अंत उतना ही मुश्किल है जैसा के फरहाद के लिए पहाड़ को चीर कर दूध की नहर निकालना एक कठिन कार्य था। शेर का साधारण अर्थ तो यही था। किंतु दूसरी पंक्ति में एक अर्थ और भी छुपा हुआ है। कोहकन की मौत थी, अंजाम जूए-शीर का। अर्थात जूए-शीर लाने में सफल होना कोहकन के लिए मृत्यु का संदेश साबित हुआ। इस प्रकार मैं भी इस शाम-गम को मर कर ही ख़त्म कर सकूंगा। 
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मंगलवार, 6 जुलाई 2010

File Photo> well known author (late) sri kamleshwer  & (L to R) Dr. ranjan zaidi  reciting his poem                                                                                                                                                                                                                                                          

शनिवार, 3 जुलाई 2010

bulandiyaan/ranjan zaidi


तुमको गर चाहिए बुलंदी तो, सायबां को तलाश मत करना/जिस सितारे को ढूंढते हैं लोग, उस सितारे की तरह तुम बनना//धूपइन  खलाओं में और सूरज हैं, और सूरज में भी समंदर हैं/तुम परिंदे हो आसमां में उड़ो, बादलों पर यकीन मत करना जिस्म को जलाती है, रूह को जिलाती है/धूप इक सियासत है, इससे बेहतर है फासले रखना. कैसी  अजीब  बात  है, दो  अजनबी  मिले /कुछ  गुफ्तगू  के  साथ, खराबात  भी  हुई /फिर जिस्म एक हो गए और गुल मचल उठे /छोटा सा ये  फ़साना  है, आदम  के  ख्वाब  का/मैं छूना चाहता हूँ आसमानों को, खुदा रहमत की तू बरसात कर दे./ रुको, देखो, बुलंदी कितनी मुश्किल है, कहीं हमको ज़मीं प़र फिर न लौट आना पड़े. ....-मुझे है खबर के तेरी नज़र, मेरी दस्त-ए-हिना की है पारखी/ तू मिला मुझे तो कुछ यूँ लगा, के हवा चली है बहार की/ तू न शेर था, न ही काफिया, न अदब की  सिन्फ का किताब्चा / तू गले मिला तो  तमाम  सिन्फ, मेरी शायरी मे समां गए. कहाँ नहीं है, वो हर तरफ है /वो तुझ में मुझमें बसा हुआ है /मैं कैसे कह्दूं  कि तू खुदा है , मेरा खुदा तो हरिक जगह  है. धरती देखी, अम्बर देखे, देखे कुदरत के नज़्ज़ारे, इससे आगे और भी कुछ है, आँखों को विश्वास नहीं है./ गर वो आजाते तो रिक्क़त से मैं रोता रहता, इस बरस भी मुझे तन्हा ही लगा ईद का चाँद/मेरी पलकों से जो टूटे हैं सितारे अबके, तू छुपाले उसे आये न नज़र ईद का चाँद./ मुफलिसी ने मेरे रुखसार के रंग छीन लिए, अब किसी चाँद को मैं कैसे कहूं ईद का चाँद./ कौन हो तुम जिसे ख्वाबों से  मुहब्बत है बहुत, जिंदगी भी तो किसी ख्वाब का खमियाज़ा है./ तुम्हारी शख्सियत में कितने सारे राज़ पिन्हाँ हैं, तुम्हें देखा तो कितने लोग याद आने लगे / चेहरा है सख्त और तसव्वुर! खुदा-पनाह, देते हैं जब मिसाल तो कहते हो, क्या हुआ? /मैं जनता हूँ मुहब्बत भी एक जज्बा है,.तुम अपनी प्यास से अपना गिलास भर लेना/हरेक शय में मुहब्बत का नूर पिन्हाँ है, यकीं न हो तो जुनूं में तलाश कर लेना./ जन्नत में थे तो हमने फरिश्तों से ये कहा, मुझको ज़मीं पे भेज, वहां तू भी साथ चल / और देख, कितने फूल खिले हैं ज़मीन पर / हूरों के साथ रहके तुझे कुछ खबर नहीं, हव्वा ने कितनी हूरों को मिस्मार कर दिया./वो  कौन  है  जो  दिखा  रहा  है, हसीन  मंज़र कि  आँख  हैराँ /ज़मीं पे जिसने उतार दी है, इरम सी वादी, हयात-ए-अबदी  /उठो कि  हम  भी  झुका लें  सिर  को, यकीन  करलें  कि  इक  खुदा  है.
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parti palarपरती पलार/ranjan zaidi

परती पलार हिंदी की एक त्रैमासिक पत्रिका है जो आश्रम रोड वार्ड न.१०, अरिया, बिहार से प्रकाशित होती है और यह उसका पांचवे वर्ष का चौथा अंक है. महेंद्र कुमार सिंह नीलम  का  गीत शायद याद तुम्हें कुछ आये और जोगेश्वर ज़ख़्मी का गीत 'ऋतु ने किया श्रृंगार'  पत्रिका के खूबसूरत गीत है. अंक में साहित्य की अनेक विधाएं देखने को मिलती हैं. एक अच्छा प्रयास कहा जा सकता है. ऐसे में जब हिंदी साहित्य के पाठकों की संख्या में निरंतर गिरावट आती जा रही हो, पाठकों की तुलना में लेखक और कवि अधिक हो गए हों, साहित्य की रणभेरी लेकर कुरुक्षेत्र में उतरना आसान काम नहीं है.साहित्य के पन्ने अख़बारों से रफ्ता-रफ्ता गायब हो गए, बड़ी पत्रिकाएं बंद हो गयीं, महानगरों के छपास के शिकारी उपन्यास और कहानी संग्रह प्रकाशित कराने के लिये जोड़तोड़ करने लगें, पुरस्कार प्राप्त करने के लिये फीसें भरने लगें, तो साफ लगने लगता है कि अब हिंदी साहित्य का पतन शुरू हो चुका है. ऐसे में दूर-दराज़ के गाँव, कस्बों और छोटे शहरों में रहने वाला साहित्यकार ही साहित्य को जिंदा रख सकता है और परती-पलार में प्रकाशित रचनाएँ इस बात की गवाही भी देती हैं.यही हमारा संबल है. यही वह आशा है जो हिंदी को जिंदा रखेगी.वर्ना दिल्ली का कथित साहित्यकार तो हिंदी को जीतेजी ही मार देगा.परती-पलार को  उम्मीद की एक किरण के रूप में देखा जा सकता है, बधाई.(मुख्य संपादक: समरेन्द्र देव, प्रधान:नमिता सिंह; आवरण:विज्ञान्व्रत/नितिन गर्ग) जनवरी-जुलाई-2010 (आप भी अपनी पत्रिका अवलोकनार्थ भेजें>पता; alpsT-litterature, 94FF,Ashiana Greens,Ahinsa Khand-II,Indira Puram,GZB-201010 NCR)                                                                                                     09415111271

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर

बाबा साहेब                                                                                         अमीर लोंग, कुछ तो दिखावे के लिए और कुछ सचमुच साहित्यिक रूचि के कारण अपने-अपने घरों में ऐसे गुलाम रखा करते थे, जो साहित्य और कला में दक्ष हुआ करते थे। क्लाविसेस सेबिनेस के बारे में सैनेडा का कहना है कि उसने अपने ११ गुलामों को होमर, हैसिओईड और ९ अन्य गीतकारों की रचनाएं याद करा दी थीं। जब उसके एक मित्र ने यह टिप्पणी  की कि इससे सस्ती तो किताबों की अलमारियां होंगीं, तब यह  उत्तर दिया गया कि "नहीं, जो घर का मालिक जानता है, घर के लोंग भी वही जानें। इन अतिशयोक्तियों के अलावा, सच्चाई तो यह  है कि छपाई आदि की सुविधा नहीं होने के कारण पढ़े-लिखे गुलाम आवश्यक समझे जाते होंगे। शिलालेखों में मुक्त किए ऐसे गुलामों का बार-बार उल्लेख मिलता है, जो डाक्टर होते थे, इनमें कुछ विशेषज्ञ भी थे। सारांश यह  कि गुलाम तभी तक साथ रखे जाते हैं, जब तक स्वार्थों की सिद्धि  होती है। जब ये बोझ लगने लगते हैं, तब स्वामी उन्हें अपना कहने और अपने बराबर रखने से इनकार कर देते हैं।                                                                                                                                            वजूद का अहसास
हमारे पास सपने होते हैं और हम सपनों पर मंथन करते हैं, लेकिन हम किसी नतीजे तक नहीं पहुच पाते, क्योकि हम नतीजों से डरते हैं। हर इंसान चाहता है कि वो एक बेहतर जिंदगी जिए और उसकी जिंदगी में खुशहाली रहे, लेकिन ऐसा नहीं होता है। क्योंकि इन्सान के हाथ में कुछ नहीं होता है। उसमें तो इतनी भी ताक़त नहीं होती है कि वो अपनी दीवार के उसपार देख सके। फिर भी वो ख़ुद कों ताक़तवर और बेहद अक्लमंद समझता है। इस लिए ख़ुद में झाँक कर देखो और महसूस करो के तुम क्या हो और तुम्हारा वजूद क्या है।

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हुसैन क़त्ल तो होते रहेंगे/मुहर्रम-उल-हराम/रंजन जैदी


हुसैन क़त्ल  तो  होते  रहेंगे  बरसों-बरस,  हुसैनियत  कभी  पामाल  हो  नहीं  सकती / हरेक  ज़ुल्म  के  पीछे  छुपा  है  एक  यज़ीद, यज़ीदियत  की  उम्र  भी  बड़ी  नहीं  होती / छुआ  नमाज़  में  खाके-शिफ़ा  तो  इल्म  हुआ, खुदा  गवाह  के  कर्बोबला  पे  क्या  गुजरी/ ये शामे-गरीबां है आओ मिल-बैठें/न जाने फिर कभी हम हों न हो के ये हिजरी / दुआ करो के हमेशा मुहब्बतें बरसें, मुहब्बतें हैं  इबादत की कीमती गठरी/ न कोई ज़ुल्म न ज़ालिम हमारे बीच रहे, ज़मीं पे अम्न  का रुतबा हो, खुश हो हर बशरी.                               09415111271 AlpsT-Litterature

<a =" "></a> हिन्दी उपन्यास दिल , दरिया-दरिया कथाकार ; डॉ० जेड० ए० जैदी

हिन्दी उपन्यास दिल , दरिया-दरिया कथाकार ; डॉ० जेड० ए० जैदी (एक) सिधौली, उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर की एक तहसील है. इसका छोट...

इस्मत चुगताई /Ismat Apa/Ranjan Zaidi इस्मत चुगताई यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि उर्दू साहित्य की

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