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शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

हुसैन क़त्ल तो होते रहेंगे/मुहर्रम-उल-हराम/रंजन जैदी


हुसैन क़त्ल  तो  होते  रहेंगे  बरसों-बरस,  हुसैनियत  कभी  पामाल  हो  नहीं  सकती / हरेक  ज़ुल्म  के  पीछे  छुपा  है  एक  यज़ीद, यज़ीदियत  की  उम्र  भी  बड़ी  नहीं  होती / छुआ  नमाज़  में  खाके-शिफ़ा  तो  इल्म  हुआ, खुदा  गवाह  के  कर्बोबला  पे  क्या  गुजरी/ ये शामे-गरीबां है आओ मिल-बैठें/न जाने फिर कभी हम हों न हो के ये हिजरी / दुआ करो के हमेशा मुहब्बतें बरसें, मुहब्बतें हैं  इबादत की कीमती गठरी/ न कोई ज़ुल्म न ज़ालिम हमारे बीच रहे, ज़मीं पे अम्न  का रुतबा हो, खुश हो हर बशरी.                               09415111271 AlpsT-Litterature

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