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सोमवार, 3 जून 2024

हिन्दी उपन्यास दिल , दरिया-दरिया कथाकार ; डॉ० जेड० ए० जैदी

हिन्दी उपन्यास दिल , दरिया-दरिया कथाकार ; डॉ० जेड० ए० जैदी (एक) सिधौली, उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर की एक तहसील है. इसका छोटा सा रेलवे स्टेशन है लेकिन उसका फैलता हुआ शहर अब सबसे खुद को जोड़ रहा है क्योंकि इस छोटे से शहर के रास्ते 'मिश्रिख' को भी अब छूने लगे हैं और बाड़ी जैसे ऐतिहासिक क़स्बे के अतिरिक्त देश के क्रांतिकारियों की पहचान 'काकोरी' को भी दुनिया से जोड़ रहे हैं. शराफत यार खां मूलतः कस्बा बाड़ी के पुराने जमीदारों के खानदान से संबंध रखते हैं। ज़मीदारी खत्म हो गई तो खानदान भी बिखर गए। नए आसमानों की तलाश में तप्ती हुई प्यासी संगलाख ज़मीनें लखौरी ईंटों के सपने नहीं दिखा सकीं और जो पीछे पुरानी इमारतों की बुनियादें बाकी बचीं, वे कमजोर होती चली गईं। कहते हैं कि एक ईंट गिरती है तो तीन दूसरी अपने आप भुरभुरी होने लगती हैं। समय उन्हें भुरभुराकर लोनी में बदल देता है। जब समय साथ छोड़ता है तो इमारतों के भी अंग-प्रत्यंग गिरते हुए लावारिस बन जाते हैं और पुराना मुहावरा है कि लावारिस मकान हो या मुहल्ले की विधवा, उसपर हर कोई अपना दावा पेश करने लग जाता है। बाड़ी की मस्जिद हो या कब्रिस्तान, कवि नरोत्तम दास का मंदिर हो या पुरातात्विक खंडहर, सबके दावेदार स्वतः ही मशरूम की तरह उग आए लोग, मकान, तिदरियाँ और हवेलियाँ सब अफ़साने बनकर खंडहरों में तब्दील होते चले गए। यहाँ भी बदलते वक्त के साथ लावारिस ज़मीनों पर कब्जों के करील उग-उग कर फैलते चले गए और खंडहरों पर पतावर के नए न सलीब पहचान की तरह पीढ़ियों के हस्ताक्षर बनते चले गए। शराफत यार ख़ान का खानदान इसी बाड़ी के सैय्यदों की निशानी है। उनका ननिहाल लखनऊ में है, वहीं वह पढ़े-लिखे भी। खाला-बी बाड़ी के सय्यद-बाड़े में ब्याही जरूर थीं, किन्तु मन बड़ी बहन के आँगन में ही डोलता रहता था। 15 साल छोटी थीं तो खानदान भर में वह छोटी खाला, छोटी फुप्पो, छोटी मुमानी और बस ऐसे ही रिश्तों का छोटापन उनके बेटे असलम ख़ान तक जा पहुँचा था । शराफत यार ख़ान बड़े थे, रिश्ते में बड़ी खाला के होनहार बेटे थे और लखनऊ में ही रहते थे किन्तु पढ़ाई-लिखाई में मुनीरा बेगम अपने बेटे के लिए एएमयू से बेहतर दूसरी जगह के महत्व को नहीं स्वीकारती थीं, कारण थे शराफत के अब्बाजान स्वर्गीय मीर अमीर हसन एडवोकेट, जिन्होंने मुस्लिम विश्वविद्यालय में न केवल वकालत पढ़ी थी, बल्कि वहाँ की कोर्ट के सदस्य भी रहे थे। आजादी के आंदोलन में उनकी भूमिका भी सराहनीय रही थी। आज अगर वह जीवित होते तो लिबरल मुसलमानों के एक बड़े नेता बनकर उनका प्रतिनिधित्व कर रहे होते। उनके बहुत से दोस्त पाकिस्तान चले गए किन्तु उन्होंने अपने ही मुल्क को अपना ‘देश’ समझा और यहीं की मिट्टी में वह अंततः दफ्न भी हो गए। छोटी-बी बाड़ी में ही रहीं। कसबाई मानसिकता ने उन्हें कभी चौखट लांघने नहीं दी। तब भी नहीं जब उनके पति की सांप्रदायिक दंगा-ग्रस्त कस्बे से मेरठ जाते हुए रास्ते में उन सहित तीन अन्य व्यक्तियों की चाकुओं से हत्या कर गई थी। तब उनके इकलौते पुत्र असलम ख़ान पाँच वर्ष के थे। बड़ी बेगम श्रीमती मुनीरा बेगम ने असलम खान को लखनऊ में ही रखना चाहा लेकिन ज़रीना बेगम की तनहाई को देख कर बहन ने एक पढ़ी-लिखी ट्रेंड लेडी अटेंडेंट तम्बोरा देवी को बाड़ी में जरूर रख दिया ताकि असलम खान की सही निगरानी और बेहतर तालीम पर निगाह रखी जा सके। तम्बोरा देवी कस्बा लहर पुर अर्थात लोहारी पुर से थीं। कहते हैं कि राजा चंद्र सेन गौड़ ने 1707 में मुस्लिम शासक को पराजित कर इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था । राजा टोडरमल इसी कस्बे के रहने वालों में थे। तम्बोरा देवी गौड़ के पूर्वजों मेँ कुछ लोग ग़ाज़ी ताहिर के नेतृत्व में पासियों के युद्ध के बाद 1707 में जब राजा चंद्र सेन गौड़ का शासन आया तो तम्बोरा देवी के पूर्वज अवध में जाकर बस गए थे क्योंकि तब तक अवध पर अकबर बादशाह का शासन कायम हो चुका था। तंबोरा देवी एक संस्कारित महिला थीं । वह मुनीरा बेगम के साथ समाज कल्याण संबंधी कार्यों से भी जुड़ी रहती थीं। उसने गौड़ मुस्लिम युवक से कभी प्रेम-विवाह किया किन्तु उसने मुंबई जाकर किसी अन्य महिला से विवाह कर लिया। इस घटना के बाद से उसने फिर कभी प्रेम विवाह को महत्व नहीं दिया। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्नातक थीं और बहुत ही सौम्य प्रकृति की गंभीर महिला भी। जब उसने समाज कल्याण स्वयंसेवी सामाजिक संस्था का बाड़ी में दफ्तर खोला तो उसने स्थानीय बच्चों की शिक्षा की ओर भी ध्यान दिया जिसमें इंग्लिश और मैथ्स को प्रथम प्राथमिकता दी गई थी। इससे स्थानीय बच्चे उसके ‘टिटोरियल क्लासेस’ में तेजी से आने लगे और सैय्यद बाड़ा का खंडहर फिर से आबाद होने लगा। असलम खान को तंबोरा देवी ने मानो गोद ही ले लिया था। समय ने भी तो उसकी ज़िंदगी को बदलकर रख दिया था। उसने असलम खान को न केवल पढ़ाया-लिखाया, बल्कि बेटे की तरह पाल-पोस कर उन्हें संस्कार दिए। उसे बड़ा होते देख तंबोरा देवी फूली न समाती। उसे देखते ही उसके पेट में ऐंठन सी महसूस होने लग जाती थी। अजीब सा लगाव होता जा रहा था, जैसे वह उसकी ही माँ हो। जब वह अलीगढ़ जाने वाला था और तम्बोरा देवी उसे सी-आफ करने सिधौली के स्टेशन पर गई हुई थीं तब वह बहुत भावुक होने लगी थीं। वह उसे अपलक देखती रहना चाहती थीं, लेकिन आँखें डबडबा जाती थीं। तभी वह समय भी आया जब अत्यंत भावुक होकर वह एकाएक असलम खान को सीने से लगाकर रो पड़ीं। असलम ख़ान ने उन्हें बहुत समझाया, परिपक्वता का प्रदर्शन कर उन्हें रोका नहीं, रोने दिया। हालांकि इस संवेदनशील वातावरण में वह स्वयं भी बहुत भावुक हो गया था। उसने कहा, "माँ, बस मेरे लिए दुआ कीजियेगा। यह न कहिएगा कि हम आईएएस बने,.आईपीएस बनें.और फिर बाद में फेल हो जाएं, जैसे भाई.....।” उसने हंसने का भी प्रयास किया ताकि मैडम का मन हल्का हो जाए लेकिन.... 'मम्मा! मैं जल्दी मिलने आऊँगा।” “असलम, आपने अभी क्या कहा? फिर से कहिए.....!” “कुछ ग़लत..... कह गया क्या मैं ?” देवी भरभराकर रो पड़ी थीं,” आपने हमें माँ कहा, ममा कहा?” “कह दीजिए कि नहीं हैं! जो हैं वही तो मुंह से निकला। अम्मी ने जन्म दिया ममा, लेकिन आपने तो पैरों पर खड़ा कर दिया, बोलना सिखा दिया, बता दिया कि दुनिया से कैसे टक्कर लें। आप माँ नहीं तो क्या हैं आप मेरी माँ ही रहेंगी। अम्मी अपनी जगह पर हैँ, आप अपनी जगह पर, अब जाएं?” “कहिए जल्दी आएंगे!” उस दिन असलम ने तंबोरा देवी की दोनों आँखों को चूमा था और अपनी भावुकता को काबू कर ट्रेन में बैठ गया था। लेकिन उसके जीवन के हर क्षण अविस्मरणीय थे। तंबोरा देवी ने तो देर तक आँखें ही नहीं खोलीं थीं कि कहीं असलम आँखों से ओझल न हो जाए लेकिन अंततः ट्रेन की सींटी ने तंबोरा देवी को आँखें खोलने पर मजबूर कर दिया था [शेष, अगले एपिसोड में....-/2] <> +91 9350 934 635

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