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मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

यादों का सफ़र/रंजन जैदी

दिल्ली बदल रही है. उसका रंग-रूप, उसकी भाषा, पहचान, चाल-चलन, हदें, सोच और बहुत कुछ अब पहले जैसा नहीं रहा है. जामा मस्जिद की रौनक, उर्दू बाज़ार का इल्मी जलवा, मशायरों की रौनकें, आपस की मुहब्बतें, टी-हॉउस की बहसें और कुतुबखाना अजीज़िया के बाहर बड़े-बड़े शायरों, अदीबों की बैठकें वक्त की रेत के नीचे दफ़्न हो चुकी हैं. अब तो बस आह निकलती है कि क्या रौनक थी, वक्त ने कैसे ज़माने का चलन छीन लिया. दिल्ली, दुनिया के चंद खूबसूरत शहरों में से एक है. इसे अरब हिंदुस्तान का 'उरूसुलबलाद' कहते हैं. जिसे कभी नींद ही नहीं आती है. जो खुद भी जगता है और सारे देश को भी जगाता रहता है. समुद्र-तट से २३९ मीटर की ऊँचाई प़र बसा यह शहर अपने ३००० वर्षों का इतिहास लिये गलियों, गलियारों, खंडहरों, मीनारों, विकास की तस्वीरें दिखाते हुए निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है. कहते हैं कि यह शहर पांडवों के समय इन्द्रप्रस्थ के नाम से जाना जाता था. शायद हस्तिनापुर के नाम से भी. मूलतः पुरानी दिल्ली इन्द्रप्रस्थ से लेकर लालकिले तक फैली हुई थी. नाम कुछ भी रहा हो प़र, शहर आज भी जिंदा है. शताब्दियों के कारवानों के पैरों के निशान आज भी दिल्ली की हथेलियों प़र अंकित हैं. अरावली की संगलाख वादियों में अगर आजतक पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता की मुहब्बत के नगमें गूंजते हैं तो महरौली की पथरीली बावड़ियों से  मुग़ल शहजादियों की दर्दनाक चीखें भी सुनाई देती रहती हैं. अगर इसी शहर ने तुगलकाबाद की महराबों से इतिहास के पन्नों के बीच लोबान के धुएं को उठते  देखा है तो शाहजहानाबाद की सूखती नहरों में फूटते और बहते हुए खून के फव्वारे भी देखे हैं. इसी शहर ने लालकिले की बुर्जों से मुग़ल सल्तनत के सूरज को डूबते हुए देखा है तो देश को अंग्रेजी साम्राज के अधीन गुलाम होते हुए भी देखा है. यमुना का पानी इतनी बार लाल हुआ है कि अरावली के जंगलों से फलहारी परिंदों ने भी अपने रिश्ते तोड़ लिये.आज भी दिल्ली की सरहदों के अन्दर-बाहर (हर तरफ) इब्रहीम लोदी, तैमूर लंग, नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली की चमकती तलवारें और उनके घोड़ों की टापों की आवाजें गूंजती रहती हैं. वह १४वीं  शताब्दी का ज़माना था. दिल्ली प़र मुहम्मद बिन तुगलक का शासन था.इसी के ज़माने में मोरक्को के तापियर निवासी विद्वान् इब्नेबतूता पैदल चलकर उत्तरी अफ्रीका और फारस को पार कर भारत में दाखिल हुए. तुगलक ने उसे काज़िये-शह्र (मुख्य न्यायाधीश) की पदवी देकर सम्मानित किया. वह नौ वर्षों तक दिल्ली में ससम्मान रहा और तुगलक की राजनीति का हिस्सा बना रहा. शहर ने देखा है मरहठा भाऊ राव की फौजों का आतंक और ईस्ट इण्डिया कंपनी की सेना की तोपों की घन-गरज. हादसे, वक्त की मुट्ठी में बंद रेत की तरह बहते चले गए. न कोई सिकंदर रहा, न कलंदर. मगर दिल्ली अब भी अपने पूरे जाहोजलाल के साथ उरूसुल्बलाद बनी हुई है.डेढ़ सौ वर्षों तक दिल्ली सात दरवाज़ों से घिरी रही थी. हर दरवाज़ा शह्र को एक रास्ता देता था. अंग्रेजों ने एक रास्ते का नाम रखा जार्ज पंचम रोड, एक का हेस्टिंग रोड. एक का क्लीव रोड तो दूसरे का बेलेजली रोड. बाबर, हुमायूं, अकबर और शाहजहाँ रोड प्रतीक के रूपमें रखे गए. एक सड़क आखरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के नाम से भी है जिसके बाद मुगलों का सूरज डूब गया. अंगेजों ने जिन सड़कों का नाम रखा, उनके अपने ऐतिहासिक कारण थे जैसे, जार्ज पंचम रोड प़र किंग जोर्ज की मूर्ति थी. लार्ड हेस्टिंग (रोड) ने न केवल दिल्ली को वरन अवध की बेगमात और बनारस के राजा के राजकोष को बड़ी निर्दयता से लूटा था बल्कि उसने बनारस के राजा को तो   बंदी बनाकर जेल तक में डाल दिया था. लार्ड क्लायु (रोड) ने प्लासी के युद्ध में नवाब सिराजुद्दौला को पराजित कर उसका सिर धड से अलग कर दिया था. लार्ड बेलेजली (रोड) ने युद्ध के दौरान टीपू सुल्तान की तलवार तोड़ी थी और जनरल हेवलोक (हेवलोक स्क्वायर) ने झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई का क़त्ल किया था. जिन बादशाहों के नाम प़र रोड पह्चंवाये गए, उसका अर्थ था कि ये वे शूरवीर और पराक्रमी मुस्लिम शासक थे जिन्हें हराना आसान नहीं था, किन्तु अंग्रेजों ने उन्हें भी न केवल हरा दिया बल्कि उनकी डायनेस्टी को ही हमेशा के लिये समाप्त कर दिया.                                                  (जारी)/-2                                                                                                                               09415111271

शनिवार, 27 नवंबर 2010

हम भी मुंह में ज़बान रखते हैं


आज़ादी के बाद हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों की निरंतर उपेक्षा की जाती रही है. मैंने तो अपनी बात  सद्यः प्रकाशित   पुस्तक 'हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान' की भूमिका  में लिख दी है.  शीर्षक है-हम भी मुंह में ज़बान रखते हैं. इस सम्पादित पुस्तक में दूसरे जाने-माने प्रबुद्ध, प्रतिष्ठित साहित्यकारों के आलेख भी हैं. हिंदी में मुस्लिम साहित्यकारों को लेकर आप क्या सोचते हैं? क्या हिंदी केवल किसी एक जाति, संप्रदाय, वर्ग, समूह या समुदाय की भाषा है? अपनी राय अवश्य लिखें>ranjanzaidi@yahoo.co.in  0941511127

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शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

26/11की रात..... बेशक वो रात खौफ की परछाइयों में थी/रंजन जैदी


बेशक वो रात खौफ की परछाइयों में थी, ऐसी अनोखी रात कि शीशे पिघल गए / हर चीख ज़ुल्मतों के खंडर में दुबक गयी, ऐसी घटायें आयीं कि रिश्ते सिमट गए / आसूदगी में डूबके तकिये लहू हुए, कितने ही ख्वाब खौफ में आसूदह हो गए / कितने ही  माहताब ज़मींदोज़ हो गए / बस आग थी धुंआ था धमाकों का शोर था, लम्हों की सिसकियों में न रिक्कत, न ज़ोर था / ऐसी अनोखी सूरते-हालात अल्लतश / कब ज़ीस्त आँख मूँद ले और सांस ले हबस / अपने उठाये हाथ दुआ मांगते थे सब, इन ज़ुल्मतों को चीरके तू भेज आफताब / ऐसी अँधेरी रात कभी फिर न आ सके, अल्लाह जालिमों के मज़ालिम का कर हिसाब.    09415111271 alpst-literature.com

रविवार, 14 नवंबर 2010

'टोबाटेक सिंह' प़र फ़िल्में / रंजन जैदी

कालजयी  उर्दू कहानी टोबाटेक सिंह प़र अब  बालीवुड की नज़र दौड़ रही है. सादत हसन मंटो की यह कहानी भारत पाक विभाजन के बवंडर की एक अलमनाक दास्तान बयान करती है. इस कहानी प़र फिल्म बनाने का ख्याल सबसे पहले ब्रिटिश फिल्म निर्माता निर्देशक कीन मैक मोलिन के मस्तिष्क में आया था, जिसकी स्क्रिप्ट जाने-माने उर्दू साहित्यकार  तारिक अली ने तैयार कीथी और तीन महीने की लगातार शूटिंग कर इसे पूरा किया गया था. इस फिल्म का नाम पार्टीशन था. सन १९८७ में यह टेलीफिल्म पहली बार बीबीसी नेछोटे परदे  प़र रिलीज़ की. यह एक ऐसी फिल्म थी जिसे देखकर दर्शकों के दिल भर आये थे और हिजरत के अहसास ने हिंद-पाक महाजरीनों तथा शरणार्थियों के घाव ताज़े कर दिए थे. इस फिल्म में रंग-मंच के जाने-माने कलाकारों में रोशन सेठ, जोहरा सहगल, ज़िया मोहिउद्दीन, जान श्राप्नल और सईद मिर्ज़ा ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी. इसमें लाहोर पागलखाने का सेट लन्दन में ही लगाया गया था. आश्चर्य की बात यह है कि इस फिल्म के निर्देशक ने पकिस्तान की कभी यात्रा नहीं की थी और न ही इस फिल्म की शूटिंग के लिये यूनिट के किसी भी सदस्य को पाकिस्तान जाना पड़ा था.  सन १९९५ में इसी कहानी प़र दिल्ली दूरदर्शन की निदेशक मीरा की नज़र पड़ी और उन्होंने इसपर फिल्म बनाने का बीड़ा उठाया. इसके लिये उन्होंने पाकिस्तान से वहां के मशहूर अभिनेता शुजात हाशमी को भारत आने की दावत दी जिन्होंने आगे चलकर फिल्म में सरदार टोबाटेक सिंह की भूमिका निभाई. इस फिल्म को भी काफ़ी सराहा गया. फिर, २००५ में पाकिस्तान को इस कहानी प़र फिल्म बनाने का अंग्रेजी ख्याल आया. मंटो, विभाजन के दौरान पाकिस्तान चले गए थे. लेकिन उन्हें पकिस्तान रास नहीं आया था. इस अंग्रेजी फिल्म का निर्देशन लाहौर के कीन्ज़ कालेज की अफिया मिथाईल ने किया था. यह फिल्म सर्व-प्रथम २००५ में ही अमेरिका में दिखाई गयी, जिसमें बिशन सिंह की भूमिका अभिनेता अमीर राना ने निभाई थी.  ताज़ा खबर यह है कि मंटो की उर्दू कहानी टोबाटेक सिंह  प़र अब बालीवुड फिल्म बनाएगा. इन दिनों जानेमाने अभिनेता और निर्देशक आमिर खां अपनी टीम के साथ इसी कहानी प़र जोरशोर से काम में व्यस्त हैं. निश्चय ही यह एक बेहतर कदम होगा.        .              09415111271

शनिवार, 6 नवंबर 2010

आओ शहद करलें / रंजन जैदी

कैफेटेरिया के एक कोने में वह मेरे सामने बैठी थी. हम दोनों के बीच गहरी ख़ामोशी छाई हुई थी. दोनों एक-दूसरे प़र अपनी निगाहें टिकाये हुए थे. जब बेयरे ने आकर पूछा कि, "कुछ और साब...?", तो मैं चौंक कर उसकी ओर उन्मुख हो गया. मैंने कहा, "हाँ, दो हॉट काफ़ी और कुछ स्नैक्स भी ...!" मैं जानता था कि दिव्या को काफ़ी पीने का बहुत शौक है,और वह पुनः काफ़ी पीने में संकोच से काम नहीं लेगी. भले ही दो साल गुज़र गए हों, आदतों में भी कुछ बदलाव अगया हो, प़र मुझे विश्वास  था कि काफ़ी के शौक को दिव्या ने इन दो सालों में भी नहीं छोड़ा होगा. मेरा अंदाज़ा सही निकला . उसने स्वतः ही गर्दन झुका ली थी. दरअसल, हम दोनों ही कैफेटेरिया में कुछ देर और बैठना चाहते थे. बहुत कुछ कहना और सुनना चाहते थे. मैंने महसूस किया कि दिव्या के भीतर कहीं कोई उथल-पुथल मची हुई है और उसका हाल उस मल्लाह की तरह है जो तूफ़ान में अपनी किश्ती को भंवर से निकालने की कोशिश कर रहा हो. वह गिलास के कगारों को पकड़े पेपरवेट की तरह गिलास को मेज़ प़र लगातार घुमा रही थी. मैं उसके भीतर की उथल-पुथल को जानना चाहता था. मैंने पूछा, "क्या बात है, कुछ बताओगी नहीं?" सुनकर उसने गर्दन ऊपर उठाकर मुझे टटोलती नज़रों से देखा. कहा, "रग्घू! मैं तुम्हारे पास लौटना चाहती हूँ. लेकिन मेरी प्रेजेट पोजीशन ऐसी है कि शायद तुम.....?" उसने फिर गर्दन झुका ली थी. मैंने पूछा, "क्यों, तुम्हें लगता है कि अब तुम जोब्लेस हो तो मैं...." "नहीं-नहीं रग्घू! यह बात नहीं है." "तो फिर क्या बात है?" "बात यह है कि...कि मैंप्रिगनेंट हूँ....!" उसने निगाह झुका कर कहा कि वह तीन महीनों से गर्भवती है. मुझे ऐसा लगा जैसे समुद्र की एक मोटी सी लहर पूरी ताक़त के साथ मेरे जिस्म से आ टकराई हो और मेरा समूचा वजूद इस टक्कर से थरथरा उठा हो. मैं सामने आईने में पसीने से भीगते अपने  चेहरे  को स्पष्ट रूप से देख रहा था. दिव्या की आंखे मेरे चेहरे प़र टिकी हुई थीं. बेयरा काफ़ी ले आया था. बेयरे के जाते ही दिव्या ने कहा,"सुनकर अच्छा नहीं लगा न? कोई बात नहीं. मैं अभी पेईंग-गेस्ट हूँ. सड़क प़र नहीं आई हूँ. तुम अपने पहले जैसे रूटीन लाईफ को डिस्टर्ब मत होने दो. मैं मैनेज कर लूंगी. वो तो बस...यूँही जो दिल में था, तुमसे कह दिया. वह भी इसलिए कि आज बरसों बाद मुझसे बात करने के लिये तुमने वक्त निकाला है. डोंट वरी, मैं मैनेज कर लूंगी." उसके पूर्ववत अहम् की अनुभूति कर मुझे ऐसा लगा, मानो मेरे गले में छिले हुए बहुत से फफोले  उभर  आये हों. मैं उसे भिंची-भिंची नज़रों से अपलक देखने लगा था. उसने मोबाईल आन कर उसकी घड़ी में समय देखा. फिर, कोई नंबर डायल करने लगी. इसी बीच मेरे मोबायल प़र मेरी निजी सचिव का फोन अगया था. मैंने कहा कि मैं इस समय दिव्या के साथ हूँ. बाद में बात करूंगा लेकिन दिव्या, बात करते-करते लाबी की तरफ निकल गयी थी. टिशु-पेपर से मुंह साफ़ कर मैंने काफ़ी का सिप लिया और लाबी की तरफ देखने लगा जहाँ ग्लास के उसपार दिव्या किसी से मोबाईल प़र हंस-हंस कर बातें कर रही थी. अजीब लड़की है यह दिव्या भी. शायद मैं इसे कभी नहीं समझ पाऊँगा. हर बार यह मुझे सरपरायिज़ देती आई है.  पहली बार जब हम मिले थे तो उसने अचानक मुझसे पूछा था,"विल यू मैरी विद मी?"  और शादी के बाद, "मैं प्रिकाशंस  में बिलीव करती हूँ, मुझे जल्दी प्रिगनेंसी नहीं चाहिए." अब इतने सालों बाद मिली है तो इस खबर के साथ कि वह प्रिगनेंट है. पता नहीं, इसके पेट में किसका वंश पनप रहा है लेकिन कह रही है कि वह अब फिर मेरे पास लौट आना चाहती है. जब लौटना ही था तो गयी ही क्यों थी? मैंने तो नहीं कहा था कि वह घर छोड़ दे. शादी के बाद औरत मकान को घर बनाती है, दिव्या ने क्या किया? कानों में माँ की आवाज़ गूंजी,"बेटा, दुल्हिन को भी समय दिया कर.वह अकेले बहुत घबराती है. कहीं घुमाने लेजा इसे. इसकी भी दिलजोई कर. इसकी आँखों में बहुत सूनापन देख रही हूँ मैं. मेरी बात समझ रहा है न?" मैं ने काफ़ी का कप ठीक वैसे ही ख़ाली कर दिया  जैसे मैं थकहारकर रात को दिव्या को एक घूँट में सिपकर पी जाया करता था. लेकिन मैं नींद में  महसूस करता कि उसकी उंगलियाँ मेरे जिस्म की नाज़ुक जगहों प़र रेंग रही हैं, उसका हिलोरें लेता बदन मेरे बदन से भीगी-भीगी सांसों के साथ शरारते कर रहा है. मैंने यह सब महसूसते हुए भी उसकी सरगोशियों को सुनने की कभी कोशिश नहीं की. वह अक्सर जगती थी, मैं हर रात सोता था. मैं ऐसा क्यों करता था, यह बात मुझे मालूम थी, लेकिन दिव्या नहीं जानती थी. एक दिन उसने साफ शब्दों में कह दिया, "मैं जा रही हूँ. मैं इस तरह तुम्हारे साथ नहीं रह सकती. हाँ! मैंने माँ जी को कुछ नहीं बताया है. बताना भी नहीं चाहती...." और वह सचमुच एक दिन मेरे घर से चली गयी. मैंने भी उसे नहीं तलाशा. पूरे दो साल गुज़र गए. आज फिर दिव्या के अचानक फोन ने मुझे आश्चर्य में डाल दिया था, "तुम्हें याद है रग्घू, कल मेरी मैरिजनिवर्सरी है. मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ. मैं नौकरी भी छोड़ रही हूँ, एक सर्परयिज़  देना है". और इस फोन के बाद आज दिव्या मेरे सामने थी, एक नए सर्परायिज़ के साथ. वह लाबी से अपनी जगह प़र लौट आई थी. बता रही थी,"तुम्हारी माता जी का फोन था. मैंने उन्हें समाचार दे दिया है. वह बहुत खुश हैं. मैं कल अपने घर में शिफ्ट हो जाऊँगी. अगर तुम्हें एतराज़ हो तो....मैं अपना इरादा बदल सकती हूँ. ...चला जाए?" रात, जब मैं घर के बिस्तर प़र पहुंचा तो कानों में दिव्या के शब्द गूंजने लगे,"मैंने माँ जी को कुछ नहीं बताया है. बताना भी नहीं चाहती.... मैं कल अपने घर में शिफ्ट हो जाऊँगी. अगर तुम्हें एतराज़ हो तो......"                 .     ...  .         09415111271 AlpsT-Litterature

.सर्व हित सुखाय / जनार्दन मिश्र

हम दो मित्रों के बीच /चल रही थी बातचीत/कैसे दो पत्थरों के बीच/उग आई लहलहाती हुई घास/सूखे मन को भी सर्व हित सुखाय  सहलाकर/अपने जैसे / हरा-भरा कर देती है/ ऐसे में मित्र ने एक चुहिया को/ इंगित करते  हुए कहा/मित्र! देखो/कितनी सुन्दर/गोल-मटोल/थुलथुली सी यह चुहिया/ कंप्यूटर के तार प़र/उछल-कूद मचा रही है/अपनी बातों को आगे बढ़ाते हुए कहा/यह सब-----/ मुझे बहुत अच्छा लगता है/किसी गिलहरी को/अपने दोनों हाथ सरीखे पैरों से पकड़कर/किसी फल या दाने को कुतरना/इस डाल से उस डाल प़र फुदकना/हरी-भरी घास प़र/छलांगें लगाते हुए/ किसी हिरण को देखना/एक दिन तो सुबह-सुबह बेटे ने कहा/पिता जी! देखिये न/बाथरूम में एक काक्रोच/कितना अलमस्त बैठा है/ वाकई मैंने देखा तो...../पाया कि, / इस क्रूर दुनिया के/ घात-प्रतिघात से / निरापद---- / वह ऐसे बैठा है / मानो कोई तपस्वी / मैंने कहा, बेटा!/ इसे भूल से भी मत मारना / न परिवार के किसी सदस्य को बताना / आज से तुम भी जान लो कि / यह दुनिया----/ सबके लिये है./     09415111271 AlpsT-Litterature

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

न जाने क्या हुआ मुझको..../रंजन जैदी

अजब सी दिल में बेचैनी / समंदर जैसी हलचल है / न जाने क्या हुआ मुझको/मैं कब से मौन बैठी हूँ. / अभी! कल तक उछलती-भागती थी तितलियों के संग / मुझे फूलों की खुशबू और नरमी कितनी भाती थी/अभी! कल तक मुझे बारिश की बूँदें दिल लुभाती थीं /  बहुत होता तो मुट्ठी भींच लेती थी/न जाने बादलों से अब मुझे क्यूँ शर्म आती है / दुपट्टा कुछ छुपाता है, हया कुछ और कहती है / न जाने क्या हुआ मुझको / मैं कब से मौन बैठी हूँ. / घरौंदे, गीली मिट्टी से बनाती थी अभी कल तक / समंदर के किनारे रेत प़र लिखती थी अपना नाम सपनों में/किसी कागज़ की किश्ती को बहाती थी समंदर में / कभी उसपर झपटती और फँस जाती मैं लहरों में / धनक रंगों के सपनों तक मैं कितनी बार लायी हूँ / चमकती बिजलियों को कैदकर कमरे में लायी  हूँ /  न जाने क्या हुआ मुझको / मैं कब से मौन बैठी हूँ. / मैं ठंडी नर्म मिट्टी में, बहुत अहिस्ता चलती थी/ गरजते बादलों से भी नहीं मैं खौफ खाती थी /  मैं कल तक अजनबी से भी बहुत बेख़ौफ़ मिलती थी /  मगर अब हाल ये है कि, मैं डर जाती हूँ खुद से ही / न जाने क्या हुआ मुझको /  मैं कब से मौन बैठी हूँ. / अजब सी दिल में बेचैनी / समंदर जैसी हलचल है...  09415111271 AlpsT-Litterature

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

वह अमरीकी लड़की/ धूप की उम्र -रंजन जैदी

वह नाज़ुक सी अमेरिकी लड़की---/ ज़ुनैन-कैम्प के दरवाजे प़र खड़ी/ इस्राएली बुलडोजरों को / अपने नाज़ुक हाथों से रोकना चाहती है ./ कैम्प में बूढ़े भी हैं, बच्चे भी./जवान भी हैं, बीमार भी./औरतें भी हैं/ सपने देखने वाली जवान लडकियां भी/कैम्प फिलिस्तीनी शरणार्थियों का है/कांपते-थरथराते बदन/असमान कीओर उठे हुए/ खुदा से दुआ मांगते हाथ/मुसल्ले प़र झुकी हुई औरतें/रहम की भीख मांगते, आयतें बुदबुदाते बुज़ुर्ग/ बच्चों की आँखों में मासूम आतंक भरे सवाल/इस्राईली क्यों दुश्मन हैं? / अमेरिकी लड़की की आँखों में भी आश्चर्य है/बुश इस्राईल को / ऐसा समर्थन कैसे दे सकता है?/....और ब्लेयर?/ यहूदियों ने तो अंग्रेजों को निकाला था/ यह बात और है कि..../ अंग्रेजों ने ही उन्हें बसाया था/ फिलिस्तीनियों को घर से निकाला था /  यह दो सभ्यताओं की जंग थी / सदियों से जंग जारी थी / इसाई धर्म में आस्था रखने वाले / टॉम हार्न की डायरी के पन्ने फडफडाते हैं / शब्द, निकल-निकलकर चीत्कारते हैं/ बुश अपराधी है/ ब्लेयर अपराधी है/ नाटो के देश भी/ अमेरिकी  लड़की हतप्रभ / टाम-हार्न गलत नहीं है / ब्रिटेन-अमेरिका के अवाम / हत्यारे नहीं हो सकते /मानवता की हत्या नहीं कर सकते / ये मुल्क हमारे हैं / हम एक नयी दुनिया के सर्जक हरकारे हैं / युद्ध अपराधियों प़र / खुली अदालत में मुकद्दमा चलाओ / इन अपराधियों को सूली प़र चढाओ / टॉम हार्न की डायरी के पन्ने फिर फडफडाते हैं/ बेटी संभल / हत्यारे बढ़ते आरहे हैं/ बुलडोज़र गडगडाते  आ रहे हैं / इनकी  आवाजें दीवारे-गिरिया से बुलंद है/ इनकी अक्लें कुंद हैं / रेत के बगूले फडफडाते हैं / इस्राएली बुलडोज़र----/ अमरीकी लड़की की परवाह न कर / उसपर से गुज़रते हुए /  फिलिस्तीनियों की ओर बढ़ जाते हैंसंस्कृतियों का लहू / रेत से लिपट जाता है / ज़ुनैन-कैम्प चीखों से भर जाता है/ अमेरिकी लड़की / बुलडोज़र के नीचे से निकलकर / दौड़-दौड़कर /  औरतों, बच्चों और ज़ख़्मी बूढों को----/  बचाना चाहती है / प़र नहीं!/  उसके हाथों से सब कुछ फिसल जाता है / घायलों का लहू भी / रेत से लिपट जाता है./ बेबसी से वह चिल्लाती है  / तभी उसे / टाम-हार्न की डायरी नज़र आती है  / डायरी समझाती है--- / तुम मर चुकी हो / मेरी तरह कविता बन चुकी हो / ऊपर देखो / खूंखार परिंदों का झुण्ड आ रहा है / एक परिंदा तो तुम्हें खा  रहा है / अमेरिकी लड़की घुटनों के बल/ रेत में धंस जाती है / बेहद निराश और हताश हो  /  चिल्ला उठती है./  हिटलर के अट्टहास गूँज उठते है / गैस-चेंबर से निकल-निकलकर लाशें / चलती हुई/ करीब आकर उसे घेर लेती हैं/ ज़ुनैन-कैम्प प़र रेत की परतें / चढ़ जाती हैं / परिंदे! लाशों को खाकर लौट रहे हैं /  इस्राईली सैनिक--- जवान जिस्मों को टटोल रहे हैं /  ज़ुनैन-कैम्प की सभ्यता  / मिटती जयेगी / लायिसेंस्शुदा आतंकियों के हाथों / दुनिया भर में फैलती जाएगी / कभी हिटलर आयेगा तो कभी बुश / कभी ब्लेयर आयेगा तो कभी कोई और /सभ्यताओं के बगूले उठते / पिरामिड बनाते रहेंगे /   पुरातत्ववेत्ता आते / खुदाई करते रहेंगे /  सच को झूठ, झूठ  को सच बताते  रहेंगे/ अमेरिकी लड़की के हाथों से / सबकुछ फिसलता रहेगा / टाम-हार्न की डायरी का हर पन्ना / इसी तरह फडफडाता रहेगा.  

धूप की उम्र/2             
तुम नहीं जानते        
टाम हार्न डाल कौन था                            
वह न फिलिस्तीनी था, न अरब!  
वह न कौम का लीडर था,                                 न मीडिया-रिपोर्टर!             
वह फूलती साँसों के साथ,                                भाग रहा था------       
रफा के फिलिस्तीनी कैम्प के एक बच्चे को                    गोद में लिए हुए   
लाऊडस्पीकर पर चीखता हुआ    
आग मत बरसाओ    
यहूदियो! आग मत बरसाओ    
प्लीज़डोंट शूट!       
लेकिन वह लहू-लुहान होकर गिर पड़ा     
उसने आसमान पर देखा           
धूप की चादर ने उसे ढ़क लिया था          
वह उठा, बच्चे को गोद में लिए कैम्प पहुँचा            
वह फिर गिरा और माँ को आवाज़ दी        
माँ! मैंने दूध का हक अदा कर दिया     
अंग्रेजों को शर्मिंदा नहीं किया    
मैं जानता हूँ-----            
एक दिन कोई अँगरेज़ आएगा  
फिलिस्तीनियों को बतायेगा                               क़ि-धूप की उम्र नहीं होती है..                              धूप की उम्र नहीं होती है।                                                                                                        09415111271 alpst-literature
          




  

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

सरहदें/ रंजन जैदी

सरहदें हमें बताती हैं,    
हद में रहना अच्छा होता है.   
गुरुत्वाकर्षण की हदें जब भी नक्षत्र तोड़ता है    
खुद टूट कर बिखर जाता है.   
टूटने और बिखरने का दर्द,    
अपने पीछे छोड़ जाता है.    
ऐसा रात के सन्नाटे में आकाश प़र     
हम भी देखते हैं!    
अन्तरिक्ष भी बताता है    
उजाले में अखबार भी बताता  है.   
    
धरती के कुछ ऐतिहासिक खड्ड    
खड्डों के विवर इसके गवाह हैं.    
गवाह हैं कुछ वैज्ञानिक भी    
पुच्छल-तारों  की धूलभरी रेखाएं    
हदें तोड़कर------    
पृथ्वी का भूगोल और उसका इतिहास
बनाती-बिगाडती आ रही हैं   
ब्रह्म्हांड के रहस्य का कौतूहल    
बढ़ाते आ रहे हैं, बताते आ रहे हैं कि---    
पृथ्वी की भी हदे हैं, ब्रह्म्हांड की भी सरहदें हैं.   
    
ब्रह्म्हांड की हदें अनंत हैं    
प्रकाश की किरणों प़र    
रंगों के रथ चलते हैं    
असंख्य ग्रहों के तम छटते हैं .    
यही उजास संभावनाएं जगाती है    
शायद कहीं, कोई हमसा वहां मिल जाए,    
हमें सरहदों का सही अर्थ बता जाए.   
    
हम तो स्वप्नजीवी हैं    
कल्पनाओं में ब्रह्म्हांड रचते है    
अन्य ग्रहों में भी वैज्ञानिक होंगे  
हाईड्रोजन-बम और सैनिक होंगे   
शासन, सत्ता, हिंसा, बलात्कार, भ्रष्टाचार, सभी-कुछ होगा    
निर्दोष तिल-तिल मरते होंगे    
दोषी मुक्त भाव से जीते होंगे.   
सबकी अपनी हदें होंगीं    
फिरभी हदें तोड़ते होंगें.   
    
काश कि कोई उड़नतश्तरी    
हमें मिल जाए!    
हमें पृथ्वी से चुरा ले जाए.    
मैं जानना चाहूँगा कि------    
तुम्हारे यहाँ भी क्या,    
हेरोशिमा-नागासाकी की बरसी मनाई जाती है?    
वेतनाम, इराक, अफगानिस्तान जैसे मुल्कों प़र   
अमेरिका जैसे देशों की मीज़ायिलें गिराई जाती है?
    
तुम्हारे यहाँ भी क्या    
फिलिस्तीनियों जैसी मजलूम कौमें रहती है?    
क्या वहां भी इस्राईल और अमेरिका जैसे देश बसते हैं?    
क्यां वहां भी ग्वेटेमाला जैसे कैदियों के कैम्प हैं?    
क्या अमेरिकी सैनिकों की बर्बरीयत से आहत!    
सियासी कैदी, मरकर तारे बन जाते है?    
कहीं आकाश प़र दिखाई देने वाले असंख्य तारे,    
अमरीकी जेलों में यातनाएं सहकर    
मर जाने वाले कैदी तो नहीं?   
    
कोई वैज्ञानिक नहीं बताता   
न ही कोई नुजूमी, ज्योतिषी, खगोलशास्त्री, सब मौन हैं,    
डरे-सहमे से हैं          
मोनिस्ट्री में साधनारत,    
गिरिजो, शिवालों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और दरगाहों में    
धर्म और संस्कृति के मन्त्रों का जाप करते हुए.   
    
मैं चाहता हूँ कि---        
ब्रह्म्हांड की सरहद नापूं    
अन्य ग्रहों के सैनिकों की संगीनों की नोकों प़र                                                                                                    लेटकर इतिहास रचाऊँ     
भीष्म पितामह बन जाऊं.                                                                                                                       09415111271 AlpsT-Litterature

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

दिल्ली का थीम-सांग / रंजन जैदी

रंजन जैदी
दिल्ली का यह थीम-सांग दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित और उप-राज्यपाल  श्री तेजेंद्र खन्ना के नाम-                                                        मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली.   
मेरी      दिल्ली  मेरी ताकत, मेरी पहचान है  तू.   
जिस्म  में  रूह  की   मानिंद   मेरी  जान है तू !  

मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली.मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली.    
   
कितने  तूफां से गुज़र आई है अपनी  दिल्ली,   
आँधियों से भी  न  घबराई है अपनी दिल्ली,    
लोग  आते  रहे  और कारवां  बनता  ही रहा,   
देखलो फिर से हसीं लायी  है अपनी  दिल्ली.  
 
मेरी दिल्ली, मेरी अज़मत, मेरा अभिमान है तू    
मेरी दिल्ली,  मेरी ताकत,  मेरी  पहचान है तू.   

मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली..मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली.  
    
कितने मौसम मेरी  दिल्ली में समां  जाते  हैं,   
कुछ तो झोंके मेरे गुलशन को जला  जाते  हैं,   
फिर भी दिल्ली तेरी गलियों में अज़आँ होती है,   
शंख   के   नाद   फ़ज़ाओं  को   जगा  जाते  हैं.     

मेरे नानक  की दुआओं का गुलिस्तान है तू,   
मेरी  दिल्ली, मेरी ताक़त, मेरी पहचान है तू  
  
मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली...मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली.    
हर नयी सुब्ह तेरी शाम की   अंगड़ाई  है,   
तेरी  रफ़्तार   में,   गुफ़्तार में गहराई   है,   
गोद में तेरे समां जाती है दुनिया की ख़ुशी,   
तू   नए  दौर  की  झंकार  है,  शहनाई  है.   

इक नए  हिंद की  तकदीर  का ऐलान है तू.   
मेरी दिल्ली मेरी ताक़त, मेरी पहचान है तू.   

मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली.  
   
खेल ही खेल में अब आओ मुहब्बत कर लें,   
सारी दुनिया को अहिंसा का सबक हम दे दें,   
जीत और हार  तो इस खेल  की  चौगानें हैं,   
खेल के नाम पे दुश्मन को भी अपना कर लें    

मेरे भारत के हसीं ख्वाब का  गुलदान  है तू,   
मेरी दिल्ली, मेरी ताक़त, मेरी  पहचान है
तू.     
मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली....मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली.      
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alpst-literature: व्याकुलता/रंजन जैदी

alpst-literature: व्याकुलता/रंजन जैदी: "हमने समंदर की ख़ामोशी देखी / लहरों का मौन-वृत्त भी / दूर क्षितिज में----/ आकाश को झुक कर / धरती के माथे को चूमते देखा / फिर भी तुम-----/ ..." 09415111271 AlpsT-Litterature

alpst-literature: तुम नहीं जानते!..../ranjan zaidi

alpst-literature: तुम नहीं जानते!..../ranjan zaidi: "तुम नहीं जानते! / तुम्हारे भीतर भी एक ब्रह्म्हांड है / एक पृथ्वी है / नदियों का जल है / विशाल स..." 09415111271 AlpsT-Litterature

तुम नहीं जानते!..../ranjan zaidi

तुम नहीं जानते! / तुम्हारे भीतर भी एक ब्रह्म्हांड है / एक पृथ्वी है / नदियों का जल है / विशाल सागर है / शिराओं में लहू बहता है / ह्रदय  में ज्वार उठता है./ तुम नहीं जानते!......./ बरगद ने देखे हैं महाप्रलय के दृश्य / शादाब्दियों ने नदियों में तलवारें धोयी हैं / स्पार्टा का युद्ध /जलता हुआ रोम / और हड़प्पा के गाँव / नीड़ की खिडकियों से सब देखती हुई / करोड़ों बार चिड़ियाँ रोई हैं / मगर-----/ उन्हें आजतक कोई चुप नहीं करा पाया / न राम / न ईसा / न बुद्ध / न मुहम्मद / न सुकरात / न नानक! / जल-समाधि, सूली, निर्वाण, मृत्यु, आत्म-हत्या, विष और....../ ज्योति से ज्योति समाने की नियति! /  तुम नहीं जानते.../  कौन, किसको, कब बचा पाया?/ ये सब ब्रह्म्हांड में होता रहा है / ऐसा आगे भी होता रहेगा /क्योंकि पृथ्वी आधारहीन है/ज़मीन होते हुए भी बेज़मीन है./ तुम नहीं जानते..../ कहते हैं कि जो ज़मीन से उखड़ जाते हैं, / वे देर-सवेर सूख जाते हैं / सूरज से उखड़े हम युग तक भूल गए हैं / तीन युगों के त्रिशंकु में अटक गए हैं./ तुम नहीं जानते.../ कब तुम्हारे भीतर के ब्रह्म्हांड में / लाल सिपाही बाण चला दें / आग लगा दें / बाँध उड़ा दें / बेखम्भे की इस पृथ्वी को / महाप्रलय में गेंद बना कर / हवा बना दें / तुमको आगे आना होगा /  एक नया इतिहास रचाना होगा.../ तुम नहीं जानते / तुम्हारे भीतर भी एक ब्रह्म्हांड है.                      09415111271 AlpsT-Litterature

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

alpst-literature: तपिश/रंजन जैदी

alpst-literature: तपिश/रंजन जैदी: "तुम्हारे और मेरे बीच/आंसूं हैं/चमकती धूप भी/न बादल हैं/न झोंके बादे -इसियाँ के/तुम्हे मालूम है..." 09415111271 AlpsT-Litterature

तपिश/रंजन जैदी

तुम्हारे और मेरे बीच/आंसूं हैं/चमकती धूप भी/न बादल हैं/न झोंके  बादे -इसियाँ के/तुम्हे मालूम है/सूरज के बदन से फूटती/आतिशीं रेखाओं जैसा हूँ / तुम्हारी बंद पलकों प़र/उन्हीं रेखाओं से लिखता रहा हूँ/आओ फिर से इन लबों प़र/उम्र के अंगार रख दें/या किसी रूई का फाहा बन/सिमट जाओ टपकती चन्द बूंदों से/चलो मैं फिर उतर जाऊं / समंदर सीप खोले है / चलो फिर से / किसी मोती का सपना देख ले हम-तुम / न जाने कब सुनामी रात की बाँहों में आजाये / न जाने कब रगों का खूं / उबल कर ज़ह्र बन जाए / न जाने कब फ़रिश्ता मौत का सामान ले आये/चलो जिस्मों का अब ये फासला / मिलकर मिटा दें हम/चलो शबनम भरी इस रात में/फिर मुस्कुरा लें हम.    09415111271 AlpsT-Litterature

तुम्हीं बताओ ऐसा क्यों होता है? ranjan zaidi

तुम्हीं बताओ ऐसा क्यों होता है?/अच्छी सोच के चौबारे में, लोग सियासत की बिसात बिछाते हैं, बगीचे की स्थायित्व के लिये, फूल बाज़ार में खुद को बेच आते हैं, तुम्हीं बताओ ऐसा क्यों होता है?/क्यों समंदर की तह में, हम मोती तलाशते हैं, सीप की पीड़ा से अनिभिज्ञ रह जाते  हैं, आस्था और विश्वास के गलीचे प़र, पान की पीक थूक जाते हैं, तुम्हीं बताओ ऐसा क्यों होता है?/ प्रकृति जंगल जलाती है तो उगाती भी है, मानस ऐसा क्यों नहीं करता, धरती की अग्नि पर्वत देती है, मानस विनाश! स्त्री की चौखट, स्वप्निल कीलों से जड़ी प्रतीक्षारत, कि वह आयेगा, प़र वह  नहीं आता, क्यों पथराई ऑंखें जीती रहती हैं, फिर तन मिटटी हो जाता है. तुम्हीं बताओ ऐसा क्यों होता है?      09415111271 AlpsT-Litterature

सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

व्याकुलता/रंजन जैदी

हमने समंदर की ख़ामोशी देखी / लहरों का मौन-वृत्त भी / दूर क्षितिज में----/ आकाश को झुक कर / धरती के माथे को चूमते देखा / फिर भी तुम-----/  खामोश हाशिये प़र चट्टान बनी /  मुद्दत से इस इंतज़ार में हो/ कि---- / आसमान प़र चाँद निकलेगा./ लहरें उछाल मारती हुई / तुहारे पांव का स्पर्श करेंगीं /रूह को सरशार करती हुई तुमसे / संवाद करेंगीं./ लेकिन सोचो, गौर से सोचो / धरती के जन्म की भी कुंडली होती है /  उसका भी भूगोल होता है /  धरती से जब कोई पर्वत उठ कर / चाँद छूने का यत्न करता है / तो------ / अनेक सदियाँ टूट जाती हैं.                            09415111271 AlpsT-literature.com

ऐ अज़ीम अरनिमाल, तू ही बता.../रंजन जैदी

मैंने झेलम के बहते हुए दरिया से पूछा--    
ऑक और चिनार के दरख्तों से पूछा,    
सरहदों की जमी हुई बर्फ से पूछा,     
कल्हण की विधवाओं से पूछा,    
इस गाँव में कोई पुरुष क्यों नहीं है?   
मैंने छति संगपुरा की हरबंस कौर को देखा,    
नींद ने दो वर्षों से दस्तक नहीं दी थी.    
नन्हीं फ़ातिमा भी बैसाखियों प़र जी रही थी,    
वानी हर दस्तक प़र दुबक जाता है,    
यतीमखाने के बच्चे भी पटाखों की आवाज़ों प़र,             
चीखते हुए सिर पीटने लग जाते हैं.   
    
ऐ अज़ीम झेलम के पानियों में रहने वाले देवता बता,                         
क्या राजा विनय दत्ता के raaj में भी,    
बच्चे खेलने को तरसते थे? 
क्या शंकराचार्य-पर्वत प़र बनी उनकी झोपड़ी,     
आतंकियों का ठिकाना बन गयी है?   
हब्बा खातून के मुहब्बत भरे गीत,     
अब वादी में क्यों नहीं गूंजा करते?   
    
ऐ झेलम! तू तो सदियों से देख रहा है,    
कश्मीर और कश्मीरियत से परिचित है,    
धान के खेतों के उस पार----    
वानी की छोटी बहन /                                                                                       घुटी-घुटी आवाज़ों में चीख रही है,    
उसकी बारीक चीखों की गर्मी से,    
वादी की बर्फ पिघल रही  है.    
और कश्मीर सुलग रहा  है.                                                                         ऐ अज़ीम अरनिमाल---                                        कश्मीरियों को रास्ता दिखा ! /                                                              रास्ता   बता---                                                             कि मंज़िल कहाँ है?     
                                      

रविवार, 17 अक्टूबर 2010

आओ लिख दूं.../रंजन जैदी

                              
आओ लिख दूं...!        
गुलाब की पंखड़ियों प़र तुम्हारा नाम.           
और उन्हें रख दूं --    
किताब के पन्नों के बीच,       
फिर भूकंप आ जाए,  
फिर सदी गुज़र जाए.          
सभ्यता के नए अध्याय के लिये,       
सत्य का अन्वेषक,     
पुरातत्वविद,   
गड़े खजाने की तरह एक दिन,          
किताब के बोसीदा पन्नों को देख कर,           
उनमें चिपकी पंखुड़ियां पाकर,            
उनपर तुम्हारा नाम पढ़कर,    
शोध करेगा,    
प्रबंध लिखेगा,
पुरस्कार के लिये दौड़ें लगाएगा.        
वह बताएगा कि यह नाम,      
लाखों साल पहले,       
सभ्यता-काल की हरखू बाई का है.  
नहीं---- जोधाबाई का है,        
नहीं-नहीं,        
मीराबाई का है,           
नहीं तो मिर्ज़ा हादी रुसवा की                                              उमराव जान का है.
लेकिन सत्य का अन्वेषक पुरातत्वविद,        
यह नहीं जान पायेगा कि तुम,          
एक गरीब मजदूर की बेटी थीं,          
अभावों में पली-बढ़ी थीं,          
आँखों में आसमान छूने के सपने थे.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                         09415111271 AlpsT-Litterature

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

तलाश/ रंजन जैदी


जंगल-जंगल  तुमको ढूंढा,  तुम  पानी  में  बैठे  थे / जब  बारिश  का  मौसम  आया,  तब  तुम  मुझको  आये  नज़र. / जीवन  कश्ती, जिस्म  समंदर,  आओ  जीवन  पार  करें / आओ  फिर  तस्वीर  बनाएं, साँसों  से  कोलाज़  भरें./  इस  दुनिया  में  इतना  कुछ  है,  इतने  रंग  कि  हैराँ  हूँ,  तुम  तो  एक  मुकम्मल  दुनिया,  कौन  से  इसमें  रंग  भरें. / आड़ी-तिरछी  रेखाओं  में,  हमने  सड़कें  ढूंढी  थीं,  कितने  ख्वाब  सजाये  मिलकर, और  लकीरों  के  जंगल   में , महल -दुमहले  ढूंढें  हमने. / लेकिन   जिस्म  पसीना  बनकर,  नदियों  से  जा  मिलता  था, नदियाँ  रेत  बहाती  रहतीं, और  मुकद्दर  बन  जाती  थीं / हर  चौराहा  जंगल -जंगल, हर  मैदान  में  दलदल-दलदल, खुश्क  ज़मीं  को  आओ  तलाशें, फिर  से  इसमें  फूल  खिलाएं, शाएद दुनिया बस जाए! 

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रविवार, 26 सितंबर 2010

अल्लाह इस पीढ़ी को किसी की नज़र न लगे/ranjan zaidi


नामवर सिंह मुझे हमेशा से प्रभावित करते रहे हैं. मेरा जब पहला हिंदी कहानी संग्रह पर्त-दर-पर्त नवें दशक के शुरूआती दौर में प्रकाशित हुआ तो वह नामवर जी को ही समर्पित था. नामवर जी राही मासूम रज़ा के गहरे मित्र रहे हैं और मैं उनके उपन्यासों प़र शोध कर चुका हूँ.मेरे, राही मासूम रज़ा और नामवर जी के बीच की मज़बूत कड़ी थे उर्दू के जाने-माने शायर और मेरे परमप्रिय  हितैषी डॉ. अजमल अजमली. आज वह भी इस दुनिया में नहीं हैं. उन दिनों मैं नामवर जी से आये-दिन JNU में  मिलने जाया करता था. फिर व्यस्तताओं ने मुझे ऐसा जकड़ा कि अपनों से धीरे-धीरे कहीं तक दूर होता चला गया. गोष्ठियों-संगोष्ठियों में नामवर जी से मुलाकात हो जाती. अच्छा लगता. उन्हें देखकर यही दुआ निकलती कि अल्लाह इस पीढ़ी को किसी की नज़र न लगे. नामवर जी और राजेंद्र यादव, कृष्णा सोबती, अमरकांत, रवीन्द्र कालिया सरीखी अनेक साहित्यिक विभूतियाँ हमारे बीच हैं और हम उनके साथ संम्वाद कर सकते हैं, किन्तु हमारे बाद की पीढ़ी को क्या यह अवसर मिल पायेगा? हमें इनपर गर्व करना चाहिए कि ये हमारे दौर में है, हमने अबतक बहुत से लोगों को खो दिया है. अभी पता चला कि कन्हय्या लाल नंदन भी नहीं रहे. ऐसे बहुत से लोग जो हमें अज़ीज़ थे, हमारे रहबर थे, बाबा नागार्जुन, नगेन्द्र, विष्णु प्रभाकर, शमशेर, रमाकांत, कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी,  और राजेंद्र अवस्थी, सरीखे कितने ही लोग, देखते-देखते हमारे बीच से चले गए. हमारे बाद की पीढ़ी के लिये ये लोग इतिहास बन जायेंगे.(गंगा प्रसाद विमल जानते हैं कि हमलोगों का अवस्थी जी के साथ कितना गहरा नाता रहा है.)  लेकिन उनके साहित्यिक योगदान का आजतक ठीक से आकलन तक नहीं किया गया.). मुझे याद है मेरे नूर काव्य-संग्रह के विमोचन के समय  मनोहर श्याम जोशी ने कहा था कि यदि हिंदी साहित्य को जिंदा रखना है तो हमें मुस्लिम साहित्यकारों का हिंदी साहित्य में स्वागत करना होगा और उस पीढ़ी को सम्मान देना होगा जिसने हिंदी साहित्य को तमाम विवादों के बावजूद उसे संवृद्ध किया है. नामवर जी किसी भी खेमे से क्यों न जुड़े रहे हों, उन्हें देखकर हमें उनमें ठेठ बनारसीपन की अनुभूति होती रही है, जैसी मैं मनोहर श्याम जोशी में लखनवीपन की अनुभूति करता था. आज नामवर जी बहुत याद आये तो नज़्म के रूप मैं जज़्बात कुछ् यूँ उबल पड़े-- मैं खुशनसीब हूँ, तुमको मैं देख सकता हूँ, वो बदनसीब हैं जिनको तुम्हारी कद्र नहीं / अज़ीम लोग ज़माने मे कम ही आते है, तुम इक  अज़ीम फ़साना हो दौर-ए-इसयाँ का / मैं चाहता हूँ कि जिंदा रहो हजारों बरस, तुम्हारे इल्म के चर्चे हमेशा होते रहें / ज़िहानतों  के समंदर कभी न सूखें  कहीं, दिए  जो  तुमने  जलाए, हमेशा  जलते  रहें / अदब  का  नूर, हमारा गुरूर तुमसे है,हमारी इल्मे-बसीरत, शऊर तुमसे है / मेरी दुआ है कि तुमको मिले हयात-ए-अदब, तुम्हारा नाम रहे ता-अबद कि ता-अबद.  
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alpsT-litterature: अल्लाह इस पीढ़ी को किसी की नज़र न लगे/ranjan zaidi

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शनिवार, 25 सितंबर 2010

एक चिट्ठी पाक प्रेमिका को.../रंजन जैदी

यह नज़्म मैंने  तब लिखी थी जब मैं जवान और खूबसूरत था और AMU  में MA का  Student हुआ करता था. उन्हीं दिनों पकिस्तान की एक खूबसूरत अमीरज़ादी हिन्दुस्तान आई तो उससे बेसाख्ता इश्क हो गया. यह मेरा पहला-पहला इश्क था. वह भी मुझसे बहुत प्यार करने लगी. तब हम दोनों नहीं जानते थे कि हम दो मुल्क हैं और हमारे बीच सरहदे हायल है. वीजा ख़त्म होने प़र वह मायूस होकर पाकिस्तान लौट गयी. फिर उसने मुझे पकिस्तान से ख़त लिखने शुरू  किये और बुलाया. अफ़सोस कि उसकी यह ख्वाहिश मैं पूरी नहीं कर सका. वक्त गुज़रता रहा. उसकी मुहब्बत बढती रही. और भी ग़म थे ज़माने में मुहब्बत के सिवा - का मतलब सामने था. इल्म की सरहदें लांघता हुआ दिल्ली आ गया. सहाफ़त (हिंदी पत्रकारिता और लेखन)  के पेशे में आते ही मुझपर भारत-पाक विभाजन की त्रासदी का खुलासा हुआ, और मेरे पाकिस्तानी महबूब की मंज़िल उसकी शादी तक पहुँच गयी. उसका शौहर उसे ब्याह कर अमेरिका  लेकर चला  गया.  अब वह अपने बच्चों की वफ़ादार माँ है. पता नहीं कब से , दुनिया के मुल्कों की सरहदें कितने-कितने  दिलों को मजरूह (ज़ख़्मी)करती आ रही हैं. ये ख़त मेरे महबूब की  शादी से कुछ  वक्त पहले का है. यह ख़त मुझे उसतक पहुँचाने की कभी हिम्मत नहीं हुई, लेकिन जब उसने यह नज़्म रेडियो (विदेश प्रसारण) प़र सुनी तो उसने फोन प़र इसकी इत्तिला दी. मुझे उसकी सिसकियाँ आज भी याद हैं.  जब मेरा  नूर काव्य-संग्रह तैयार हुआ तो मैंने  इस नज़्म को भी उसमें शामिल कर लिया. बरसों बाद इधर  न्यू जरसी   (अमेरिका) से जब मेरे एक अज़ीज़ नौजवान दोस्त (जो वहां एक बड़े ओहदे प़र है)  निशांत  गुप्ता का मेल आया जिसने स्टुडेंट लाइफ में इस नज़्म को पढ़ रखा था (मेल में उसने इस नज़्म का ज़िक्र किया था ) और इसे फिर से पढ़ने की ख्वाहिश ज़ाहिर की थी  तब मुझे लगा मानो मैं फिर से माज़ी (अतीत)की गुंजान वादियों में लौट गया हूँ.  तब मुझे फिर से बहुत कुछ याद आगया था. वह नज़्म मैंने उसे मेल कर दिया, अपने पाठकों के लिये भी वही नज़्म प्रस्तुत है ----- ऐ मेरे हमदमो-हमराज़, फलां इब्ने-फलां, तूने लिक्खा है कि फिलफौर चले आओ यहाँ, कैसे आ जाऊं  मेरे पांव में ज़ंजीरें हैं, मुझसे वाबस्ता मेरे ख्वाब की ताबीरें हैं, सरहदों प़र भी सियासत के कड़े पहरे हैं, खार्ज़ारों में जड़े खौफज़दः चेहरे हैं, मैं परिन्दः भी नहीं हूँ कि जो उड़ कर आऊँ, अजनबी देस की धरती पे तुझे छू पाऊँ./ दिल की गहराई से तू मेरी हकीकत सुन ले, मेरे अफ़कार से गुलहाय-अकीदत चुन ले, मुझसे मुमकिन नहीं गुलशन में बहारों से गुरेज़, यानी फूलों से मुहब्बत करूं खारों से गुरेज़, खार दे मुझको मगर ये गुले-सद-चाक न दे, मैं हूँ हिंदी तू मुझे मश्विराए-पाक न दे, इतनी निस्बत भी अगर है तो यही क्या कम है, तुझको ग़म सिर्फ मेरा, मुझको वतन का गम है./ तू अगर चाहे मेरे मुल्क में आ सकती है, शम्मा-इलहाक़ के सहरा में जला सकती है, तू अगर आये तो मैं दिल को मना सकता हूँ, खूं में डूबे हुए माज़ी को भुला सकता हूँ, मैं परिन्दः भी नहीं हूँ कि जो उड़ कर आऊँ...कैसे आजाऊं मेरे पांव में ज़ंजीरें हैं./..बनायीं मेंह ने दीवार प़र लकीरे कुछ, खबर न थी कि लकीरों में तुझको पाऊंगा,यूँ ज़ख्म-खुर्दः किसी मुल्क की तरह ऐ दोस्त, अजीयतों की तवारीख में तलाशूंगा/ तो मैंने तेरी कलाई में चूड़ियाँ डालीं, बड़े शऊर से मेहदी का रंग उसको दिया, मैं तेरी मांग सजाने लगा सितारों से, दुल्हन के रूप में घंटों मैं तुझको देखा किया, तभी लबों पे तेरी थर्थराह्तें कौन्धीं, कहा, न आज भी दीवार लांघ पाऊंगी, तू जितना चाहे सजा ले संवार ले मुझको, मैं चाहकर भी लकीरें मिटा न पाऊंगी. कैसे आजाऊँ मेरे पांव में ज़ंजीरें हैं. मुझसे वाबस्ता मेरे ख्वाब की ताबीरें हैं  ../ अकबराबाद के पुर-नूर नज़ारों की कसम, और कश्मीर के गुलपोश बहारों की कसम, मादरे-हिंद के महके हुए गेसू की क़सम, जिससे दुनिया है मुअत्तर उसी खुशबू की कसम, सुब्ह को सुब्ह-ए-बनारस मुझे याद आएगी, शाम को शाम-ए-अवध और भी तड़पायेगी, हिंद है सुब्ह-ए-चमन और मैं हूँ बादे-नसीम, हिंद महका हुआ इक फूल है, मैं उसकी शमीम. मुझसे कहता है तू हमदम कि वतन छोड़ के आ, एक बुलबुल से ये कहता है चमन छोड़ के आ...........,कैसे आ जाऊं  मेरे पांव में ज़ंजीरें हैं, मुझसे वाबस्ता मेरे ख्वाब की ताबीरें हैं.   09415111271 AlpsT-Litterature

बुधवार, 22 सितंबर 2010

शनिवार, 18 सितंबर 2010

शेखर जोशी को चंद्रयान पुरस्कार-२०१०


कोलकाता. हिंदी के लब्ध-प्रतिष्ठित कथाकार शेखर जोशी को मानिक दफ्तरी ज्ञानविभा ट्रस्ट के प्रथम चंद्रयान पुरस्कार-२०१० से सम्मानित किया गया है. ट्रस्ट की ओर से शेखर जोशी को मानदेय के रूप में ३१,०००=०० भेंट किये गए. पुरस्कार समोराह कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद् में आयोजित किया गया.
शेखर जोशी का जन्म सितम्बर १९३२ में अल्मोड़ा जनपद के ओजिया गाँव में हुआ था. प्रारंभिक शिक्षा अजमेर और देहरादून में हुयी. कथा लेखन को दायित्वपूर्ण कर्म मानने वाले जोशी हिंदी के सुपरिचित कथाकार हैं. उन्हें उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार और साहित्य भूषण पहल सम्मान से पहले ही सम्मानित किया जा चुका है. उनकी कहानियों का विभिन्न भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, चेक, रूसी, पोलिश और जापानी भाषाओँ में भी अनुवाद किया जा चुका है. कुछ कहानियों का मंचन और दाज्यू  नामक कहानी पर बाल फिल्म सोसायटी द्वारा फिल्म का निर्माण भी किया गया है.उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियों में  कोशी का घटवार, साथ के लोग, हलवाहा, नौरंगी बीमार है, मेरा पहाड़, और एक पेड़ की याद ने  नयी कहानी को एक नयी पहचान दी है. पहाड़ी इलाकों की गरीबी, कठिन जीवन संघर्ष, उत्पीड़न, यातना, प्रतिरोध, उम्मीद और निराशा से भरे औद्योगिक मजदूरों के हालात, शहरी-कस्बाई और निम्नवर्ग के सामाजिक-नैतिक संकट और समाज में व्याप्त रूढ़िवादी परम्पराएँ जैसी समस्याओं प़र उनकी कहानियों का मूलतः फोकस रहा है.  09415111271

रविवार, 12 सितंबर 2010

khare paani ki machchliyaan...


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09415111271

शनिवार, 11 सितंबर 2010

हिन्दी साहित्य के इतिहास की बुनियाद/रंजन जैदी


    हिन्दी साहित्य के इतिहास की बुनियाद वैष्णव साहित्य के कंकड़-पत्थरों से भरी गयी थी। इन बारीक रोड़ियों में जैन और सिख मतावलंबियों की रागात्मकता का गारा  नहीं मिलाया गया था। 
       यदि बुनियाद में गारे के साथ मसाला बनाते समय सिद्धों और नाथों की रचनाओं को भी इसमें सम्मिलित कर लिया जाता तो आज हम वैष्णव साहित्य की बुर्जों पर जैन] सूफी और सिख साहित्य की नक्काशी का भी आनंद ले रहे होते और साहित्य एक पृथक धर्म के रूप में तमाम मत-मतान्तरों से ऊपर उठ कर अपनी एक नयी परिभाषा को परिभाषित कर रहा होता।    
      यदि ऐसा होता तो इस हवेली के पत्थरों के नाम निश्चय ही वैष्णजैन] सूफी] सिख] सगुण या निर्गुण नहीं होते। यदि व्यक्त 'साहित्य' धर्म के रूप में उभरता तो बौद्ध धर्म की अविरल धारा क्रान्ति की बाढ़ के बीच वैष्णव साहित्य की हवेली में दरारें डाल कर बड़े-बड़े चिंतकों और विचारकों को बहा कर गलियारों में न ले आती] जिन पर कथित निम्न जातियों के पांव पड़ते थे।
      ये वे ही कथित निम्न लोग थे जिन्हों ने साबित किया था  की जिस तरह ज़मीन की कोई सरहद नहीं होती है, उसी तरह इल्म की भी कोई सरहद नहीं हुआ करती है  bYe tc efLr’d dh f”kjkvksa esa ljxksf”k;ka dj ftLe dks ;g vglkl djkrk gS fd ftLe feV~Vh gS vkSj feV~Vh dk fj”rk tehu ls gksrk gS] rks t+ehu ls tqM+s gq, vkneh dks ;g le>us esa nsj ugha yxrh fd “kjhj dk fj”rk /kjrh ls tqM+k gksrk gSA  
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      Hkjrh; lwQ+hokn dk rRo fparu blh ns”k dh /kjrh ls mitk tgka xkaoksa ds गलियारों और mudh चौपालों के वारिसksa की भाषा शास्त्रkचार्यों की भाषा जैसी नहीं थी] न ही उनका तत्व-चिंतन इतना गूढ़ था जो ब्रह्म] जीव और जगत को सही तौर पर परिभाषित न कर पाता हो।  
      Tkks yksx czg~e dks izkIr djus ;k vYykg dh rjQ+ tkus ds fy, bcknrsa djrs gSa] os vYykg ds eq[kfyl cans dgs tkrs gSA tks eq[kfyl bcknrs&b”ds&bykgh esa iwjh rjg ls Mwc tkrs gSa] os vYykg ds eq[kyl gks tkrs gaSA eq[kfyl mUgsa dgrs gSa tks vYykg dh rjQ+ pydj tkrs gSa ysfdu eq[kyl mUgsa dgrs gSa ftudh bcknrksa ls [kq”k gksdj vYykg vius cans dh rjQ+ [kqn pydj vkrk gSA ,sls eq[kyl lwfQ+;k;sdjke dh [k”kcq,a tc fgUnqLrku dh fQ+t+k esa QSyha rks bcknr dk Q+ylQ+k gh cny x;kA vketu us eglwl fd;k fd mudh futkr rks blh nfj;k dh fd”rh ls gS vkSj os rlOoqQ+ dh fdf”r;ksa esa vk&vkdj cSBus yxsA blh fd”rh ls cw vyh dyanj dh vkokt+ lqukbZ nh]^ltu ldkjs tk,axs] uSu Hkjsaxs jks;@fo/kuk ,slh dhft;ks] vkSj dnh u gks;A   
      larksa vkSj lwfQ+;ksa us tc fd”rh dks izrhd dk :i fn;k rks fd”rh esa lokj yksxksa ds O;ogkj esa izse ds Hkkoksa dk izLQq`Vu gksus yxkA izse us Qkjlh vkSj laLd`r dks vkRelkr dj dchj dks ,slh t+cku ns nh ftlus KkuekxZ ds gj pkSjkgs dks jks”kfu;ksa ls Hkj fn;kA ;gka u Hkjrh; osnkar Fkk u [kkfyl cljs ls vk;kfrr rlOoqQ+] ;gka dkxn dh ys[kh dk dksbZ egRo u gksdj tks ns[kk] ogh futkr dk earj cu x;k] fgUnw rqjd dh ,d jkg gS] lrxq# bgS crkbZ@dg dchj lquks gks larks] jke u dgsm [kqnkbZA   
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     ;g og ih<+h Fkh tks साधारण जातियों के अलाव से तप कर निकलh Fkh और जनता की भाषा में उनसे संवाद djrh FkhA संवाद की यही साधारण भाषा बहती हुई सूफियों] नाथों और दरवेशों के मठों] [kkudkgksa] vkSj  दरगाहों के हुजरों तक igqaprh pyh x;h] जिसने कालांतर में एक नए युग का lw=ikr किया।
      Hkkjrh; lwQh n”kZu us viuh nyhy nh fd gj ckg~;:i dk ,d var%dj.k gksrk gSA mnkgj.k nsrs gq, mUgksaus crk;k fd tSls gj Qy ds “kjhj ij fNyds ds :i esa ,d vkoj.k gksrk gSA mlh rjg vkoj.k ds vanj rRo ;kuh xwnk gksrk Hkh gSA   
      felky ds :i esa ge dsys dks ysaA dsys dk vkdkj&izdkj tgka Hkh og iSnk gksrk gS] ,d gh :i esa tUe ysrk gSA vkoj.k ls vuqeku yxk;k tkrk gS fd dsyk lsgrean gksxk ;k ughaA vkoj.k Qy dk ckg~;:i gS tks gesa dsys dh feBkl] lqxa/k] lM+ka/k] mlds lkSan;Z vkSj fonzwirk ls ifjfpr djkrk gS fdUrq ge fNyds ds Hkhrj ds lR; dks ml le; rd ugha tku ikrs gSa tc rd ge mldk lsou u dj ysaA rks] xwnk ckfru gS vkSj fNyds dk vkoj.k mldk t+kfgj ;kuh] ckg~;:iA
      ;gh lEca/k “kjhj vkSj vkRek dk gSA var%dj.k dh fLFkfr vn`”; vo”; gS fdUrq ogh lR; gS ftls ge vkRek dh “kfDr dgrs gaSA
      “kjhj LoLFk gksrk gS] ikSf’Vd vkgkj ls vkSj vkRek LoLFk gksrh gS la;e] fu;e] R;kx] v/;kRe vkSj [kqnk dh bcknr lsA ;g lxq.k vkSj fuxqZ.k ds ijLij la?k’kZ dh vfUofr FkhA
      इस युग में जिस निर्गुण काव्य की सर्जना हुbZ] वह संत और सूफी काव्य के वर्गीकरण से मूलतः मुक्त-काव्य सि) हुआ जिसकी दार्शनिक व्याख्या ब्रह्मवाद से लेकर अद्वैतवाद तक की गयी। नतीजा ;g  हुआ कि जो बौढ्धिक जाति का भाषायिक-साहित्य संवत १२५० से १५५० तक नाथों] सूफियों और संतों dh मार्फ़त जातेता झील में एकत्र हुआ] उसे हवेलियों के तत्व-चिंतकों ने उलीचने की कोशिशें नहीं कीं] क्योंकि तत्कालीन बौद्धिक वर्ग इस दौरान की भाषायिक क्रान्ति को मान्यता देने के लिए कतिपय तैयार नहीं था।   
      वह यह  समझने के लिए भी कतिपय तय्यार नहीं था कि कौमों और समुदायों के अपने कुछ अलग  विश्वास] आस्थाएं और अकीदे होते हैं] लेकिन जीने के तरीके और तरीकों से जन्मी समस्याएं समान होती हैं] जिन्हें अलग-अलग धर्मों में नहीं बांटा जा सकता हैA शासक वर्ग का एक ही धर्म होता है] शासन और सत्ता पर कब्ज़ा बनाये रखना। वह शासक चाहे मौर्य हो या अफगान] तुर्क हो या जाट] लोदी हो या गुर्जर] मुग़ल हों या राजपूत] ब्राह्मण हो या शूद्र] शासक अत्याचार करता है और शासित अत्याचार सहता है। जब इन दोनों में टकराव की स्थिति जन्म लेती है तो क्रान्ति की आंधी चलती है और आंधियां कभी भी दिशाहीन नहीं हुआ करती हैं।
       तो] जब सामाजिक और सांस्कृतिक क्रान्ति ने दस्तक दी तो कबीर ने खालिस हिन्दुओं के पाखंड को ही नहीं लताड़ा] उन्होंने मुसलामानों के पाखंडों पर भी हमला किया। गुरू नानक देव ने मुल्लाओं को लताड़ा तो पंडितों को भी नहीं बख्शा। उस आंधी में हमें सूफियों] संतों और जातेता साहित्यकारों की घन-गरज साफ़ सुनाई देती है। 
       इस तरह यदि हम देखें तो पायेंगे कि जहाँ सूफियों ने हुमायूं पर फिकरे कसे] तो वहीं मलिक मोहम्मद जायसी ने अलाउद्दीन खिलजी को भी नहीं बख्शा। यहीं पर सूफीवाद का तत्वचिंतन हमें एक न;s आसमान के नीचे लाकर खड़ा कर देता है] जहाँ हम महमूद-ओ-अयाज़ का मतलब एक पंक्ति में आकर समझने लग जाते हैं।   
      यही तत्वचिंतन के सूत्र और आस्था हमें तमाम मत-मतान्तरों से ऊपर जाकर सामान्य जनता के बीच ला खड़ा करते है] जो आमजन के रूप में शोषण का शिकार होती हैं और सीधी-नाथों] योगियों तथा शास्त्रचार्यों के बीच का अन्तर जान लेती हैं और पहचान लेती हैं कि शंकराचार्य का बौf)क-चिंतन गोरखनाथ] बाबा फरीद] कबीर दास] गुरू नानक और तुलसी दास से कितना पृथक और गूढ़ है। 
      वह जान लेती है कि सूफियों dh साधना-पद्धति नाथ योगियों की साधना-पद्धति से कितनी भिन्न और सरल है जिसमें चमत्कार नहीं] यथार्थ की साँसों का नियंत्रण है। पाखंडी योगियों का तिलिस्म नहीं] आस्थाa] विश्वास और कर्म का सत] तत्वचिंतन है। उसका कारण ;g था कि सूफी-संतों का तत्वचिंतन घृणा पर बसेरा नहीं Mkys हुए था। उनका मूल-मन्त्र था] प्रेम! मानव का मानव से प्रेम] जो भावkभिव्यक्ति में नाथ] योगी और वैष्णव शब्दावली से इतर नहीं] केवल केव्लत्ववादी के अत्यन्त समीप था और केवलवाद का यही सि)kaत अवतारवाद से सम्बन्ध जोड़ कर उसे राबिया इब्ने&अरबी को अपनी ओर खींच लाया।  
       शाएद इसी केवलत्व के सिद्धांत ने महमूद शबिस्त्री को भी आकर्षित कर उसे गुशन-ए-राज़ जैसी कृति की रचना करने पर बाध्य कर दिया फैजी ने नल&दमन की कथा को फ़ारसी में पिरोया। मौलाना रूम की मसनवियों में भारतीय लोक&कथाओं के पात्र फ़ारसी के रास्ते ईरान और फिर अरब तक पहुंचे। जायसी के अखरावट] आखरी कलाम और पद्मावत ने सूफी काव्य की चिंतनधारा को नए आयाम दे दिए ।    
        एक लहर थी जो बसंत की बयार बन कर तत्वज्ञानियों के दार्शनिक चिंतन को छूती हुई सूफीवाद को जीवन्तता प्रदान करती हुई आम जनता की साँसों में घुलती चली गयी। हमीदुद्दीन नागौरी ने सिद्ध किया कि चित्त जगत के बाहर है और जगत चित्त के बाहर। साधक के चित्त में प्रवेश करते ही जगत बाहर आ जाता है और जगत में प्रवेश करते ही चित्त से बाहर आ जाता है। शेख हमीदुद्दीन नागौरी के सम्बन्ध में हिन्दी के कतिपय मुसलमान कवि (लेखक- शैलेश जैदी पृष्ठ:७०) पुस्तक में उनके दार्शनिक चिंतन पर विस्तार से  प्रकाश डाला गया है। 
       विद्वान लेखक के अनुसार शेख साहब का वह्दतुल&वजूद के दर्शन में विश्वास था कि सृष्टि पदार्थ देखने में कितने ही भिन्न क्यों न हों] यदि उनकी वास्तविकता पर विचार किया जाए तो वे मूलतः एक ही हैं। पुस्तक में समां] (जिसमें शेख हमीदुद्दीन नागौरी की काफ़ी रूचि थी) को लेकर फुतः-ए-सलातीन के हवाले से एक किस्से का ज़िक्र किया गया है।  
      विद्वान लेखक लिखता है कि सुलतान इल्तुतमिश के राज्यकाल में शेख नागौरी दिल्ली पधारे। वहाँ वह दिन-रात समां सुनते रहते और उसी में मगन रहते। सम्राट उनका बहुत मान-सम्मान करता था। दरबार में मुफ्तियों ने बादशाह के कान भरे तो उन्हें दरबार में बुलाकर उनसे सवाल किया गया कि समां शरीअत के विरूद्ध है या नहीं\ उत्तर मिला कि समा] आलिमों के लिए हराम है और साधकों के लिए हलाल।
       इस प्रकार हम देखते हैं कि शहाबुद्दीन नागौरी का सूफी चिंतन नाथ-पंथी प्रवृतियों को आत्मसात करने वाला था। शेगनी गयी जोगिनी करी] गनी गयी को देसA अयन रसायन संचरे] रंग जो मोर ओस।   
      तसव्वुफ़ का यह  चिंतन तत्कालीन नाथ योगियों पर भी पड़ा] गोरखबानी में आए शब्द इसका प्रमाण हैं। जैसे बाबा गोरखनाथ की यह स्वीकृति कि उत्पति हिंदू जरना जोगी] अकलि परी मुसलमानीA इसका उदहारण है। इसी परम्परा के एक अन्य कवि हैं अलख दास। इनका असली नाम अब्दुल कुद्दूस गंगोही था । इन्होने दाऊद कृत चंदायन का फ़ारसी में पद्यान्वाद किया और ख़ुद भी केवलत्व के सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए अपनी रचना रुश्द्नमा  में इसको व्याख्यायित किया।     
      उन्होंने सच्चे सूफी की पहचान को परिभाषित करते हुए कहा कि जो लोग परम सत्य को प्राप्त कर लेते हैं] और ईश्वर के अलावा दूसरी सभी वस्तुओं से विमुख हो चुके होते हैं] वे ही सूफी कहलाते हैं। उनके अनुसार सच्चा इंसान समस्त वाह्याम्बरों से मुक्त होता है।  
      हमें सूफी संत-साहित्य में कबीर और नानक भी इसी चिंतन का सर्वत्र अलख जगाते दिखाई देते हैं। इन्हीं संतों] कवियों और दार्शिनिकों ने हमें सोच के नए आयाम दिए और हम ये समझ पाये कि मानव जीवन की अभिव्यक्ति ही साहित्य का सहज धर्म है। इस धर्म का नाम हिन्दू&मुसलमान नहीं है। 
       अमृता प्रीतम के अनुसार ये तो मैं से आगे मैं तक पहुaaWचने की यात्रा है। उस मैं तक पहुँचने की जिसमें सबसे पहले मैं की पहचान जमा होती है। जहाँ गैर सा गैर दर्द अपना हो जाता हैA bस प्रकार हम कह सकते हैं कि इसीलिए साहित्यकार से साहित्य का गहरा नाता स्थापित हुआ] इसे हम चिंतन का भी नाम दे सकते हैं। चिंतन जितना गहरा] जितना यथार्थ और मानव&मूल्यों की उन्नति का प्रेरक होगा] उतना ही वह आत्मीय] टिकाऊ और लोकप्रिय होगा। यूसुफ़-&जुलेखा की कहानी हो या रानी पद्मावती और रत्नसेन की कथा] जब वे अपनी आत्मा की गहराइयों के साथ आम-जन तक पहुँचती हैं तो सरहदें लाँघ जाती हैं] भले ही उनकी अभिव्यक्ति की भाषा कोई भी क्यों न रही हो। खुसरो से लेकर बुरहानुद्दीन जानम या इनसे लेकर इंशाल्लाह खां तक हिन्दी साहित्य की यात्रा कहीं भी अजानी महसूस नहीं होती] क्योंकि हिन्दी भाषा और इसके साहित्य की समृद्धि में भारत के सभी धर्मों और सम्प्रदायों के अनुयाइयों ने समान रूप से योगदान दिया है।     

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