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शनिवार, 25 सितंबर 2010

एक चिट्ठी पाक प्रेमिका को.../रंजन जैदी

यह नज़्म मैंने  तब लिखी थी जब मैं जवान और खूबसूरत था और AMU  में MA का  Student हुआ करता था. उन्हीं दिनों पकिस्तान की एक खूबसूरत अमीरज़ादी हिन्दुस्तान आई तो उससे बेसाख्ता इश्क हो गया. यह मेरा पहला-पहला इश्क था. वह भी मुझसे बहुत प्यार करने लगी. तब हम दोनों नहीं जानते थे कि हम दो मुल्क हैं और हमारे बीच सरहदे हायल है. वीजा ख़त्म होने प़र वह मायूस होकर पाकिस्तान लौट गयी. फिर उसने मुझे पकिस्तान से ख़त लिखने शुरू  किये और बुलाया. अफ़सोस कि उसकी यह ख्वाहिश मैं पूरी नहीं कर सका. वक्त गुज़रता रहा. उसकी मुहब्बत बढती रही. और भी ग़म थे ज़माने में मुहब्बत के सिवा - का मतलब सामने था. इल्म की सरहदें लांघता हुआ दिल्ली आ गया. सहाफ़त (हिंदी पत्रकारिता और लेखन)  के पेशे में आते ही मुझपर भारत-पाक विभाजन की त्रासदी का खुलासा हुआ, और मेरे पाकिस्तानी महबूब की मंज़िल उसकी शादी तक पहुँच गयी. उसका शौहर उसे ब्याह कर अमेरिका  लेकर चला  गया.  अब वह अपने बच्चों की वफ़ादार माँ है. पता नहीं कब से , दुनिया के मुल्कों की सरहदें कितने-कितने  दिलों को मजरूह (ज़ख़्मी)करती आ रही हैं. ये ख़त मेरे महबूब की  शादी से कुछ  वक्त पहले का है. यह ख़त मुझे उसतक पहुँचाने की कभी हिम्मत नहीं हुई, लेकिन जब उसने यह नज़्म रेडियो (विदेश प्रसारण) प़र सुनी तो उसने फोन प़र इसकी इत्तिला दी. मुझे उसकी सिसकियाँ आज भी याद हैं.  जब मेरा  नूर काव्य-संग्रह तैयार हुआ तो मैंने  इस नज़्म को भी उसमें शामिल कर लिया. बरसों बाद इधर  न्यू जरसी   (अमेरिका) से जब मेरे एक अज़ीज़ नौजवान दोस्त (जो वहां एक बड़े ओहदे प़र है)  निशांत  गुप्ता का मेल आया जिसने स्टुडेंट लाइफ में इस नज़्म को पढ़ रखा था (मेल में उसने इस नज़्म का ज़िक्र किया था ) और इसे फिर से पढ़ने की ख्वाहिश ज़ाहिर की थी  तब मुझे लगा मानो मैं फिर से माज़ी (अतीत)की गुंजान वादियों में लौट गया हूँ.  तब मुझे फिर से बहुत कुछ याद आगया था. वह नज़्म मैंने उसे मेल कर दिया, अपने पाठकों के लिये भी वही नज़्म प्रस्तुत है ----- ऐ मेरे हमदमो-हमराज़, फलां इब्ने-फलां, तूने लिक्खा है कि फिलफौर चले आओ यहाँ, कैसे आ जाऊं  मेरे पांव में ज़ंजीरें हैं, मुझसे वाबस्ता मेरे ख्वाब की ताबीरें हैं, सरहदों प़र भी सियासत के कड़े पहरे हैं, खार्ज़ारों में जड़े खौफज़दः चेहरे हैं, मैं परिन्दः भी नहीं हूँ कि जो उड़ कर आऊँ, अजनबी देस की धरती पे तुझे छू पाऊँ./ दिल की गहराई से तू मेरी हकीकत सुन ले, मेरे अफ़कार से गुलहाय-अकीदत चुन ले, मुझसे मुमकिन नहीं गुलशन में बहारों से गुरेज़, यानी फूलों से मुहब्बत करूं खारों से गुरेज़, खार दे मुझको मगर ये गुले-सद-चाक न दे, मैं हूँ हिंदी तू मुझे मश्विराए-पाक न दे, इतनी निस्बत भी अगर है तो यही क्या कम है, तुझको ग़म सिर्फ मेरा, मुझको वतन का गम है./ तू अगर चाहे मेरे मुल्क में आ सकती है, शम्मा-इलहाक़ के सहरा में जला सकती है, तू अगर आये तो मैं दिल को मना सकता हूँ, खूं में डूबे हुए माज़ी को भुला सकता हूँ, मैं परिन्दः भी नहीं हूँ कि जो उड़ कर आऊँ...कैसे आजाऊं मेरे पांव में ज़ंजीरें हैं./..बनायीं मेंह ने दीवार प़र लकीरे कुछ, खबर न थी कि लकीरों में तुझको पाऊंगा,यूँ ज़ख्म-खुर्दः किसी मुल्क की तरह ऐ दोस्त, अजीयतों की तवारीख में तलाशूंगा/ तो मैंने तेरी कलाई में चूड़ियाँ डालीं, बड़े शऊर से मेहदी का रंग उसको दिया, मैं तेरी मांग सजाने लगा सितारों से, दुल्हन के रूप में घंटों मैं तुझको देखा किया, तभी लबों पे तेरी थर्थराह्तें कौन्धीं, कहा, न आज भी दीवार लांघ पाऊंगी, तू जितना चाहे सजा ले संवार ले मुझको, मैं चाहकर भी लकीरें मिटा न पाऊंगी. कैसे आजाऊँ मेरे पांव में ज़ंजीरें हैं. मुझसे वाबस्ता मेरे ख्वाब की ताबीरें हैं  ../ अकबराबाद के पुर-नूर नज़ारों की कसम, और कश्मीर के गुलपोश बहारों की कसम, मादरे-हिंद के महके हुए गेसू की क़सम, जिससे दुनिया है मुअत्तर उसी खुशबू की कसम, सुब्ह को सुब्ह-ए-बनारस मुझे याद आएगी, शाम को शाम-ए-अवध और भी तड़पायेगी, हिंद है सुब्ह-ए-चमन और मैं हूँ बादे-नसीम, हिंद महका हुआ इक फूल है, मैं उसकी शमीम. मुझसे कहता है तू हमदम कि वतन छोड़ के आ, एक बुलबुल से ये कहता है चमन छोड़ के आ...........,कैसे आ जाऊं  मेरे पांव में ज़ंजीरें हैं, मुझसे वाबस्ता मेरे ख्वाब की ताबीरें हैं.   09415111271 AlpsT-Litterature

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