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रविवार, 31 अक्टूबर 2010

न जाने क्या हुआ मुझको..../रंजन जैदी

अजब सी दिल में बेचैनी / समंदर जैसी हलचल है / न जाने क्या हुआ मुझको/मैं कब से मौन बैठी हूँ. / अभी! कल तक उछलती-भागती थी तितलियों के संग / मुझे फूलों की खुशबू और नरमी कितनी भाती थी/अभी! कल तक मुझे बारिश की बूँदें दिल लुभाती थीं /  बहुत होता तो मुट्ठी भींच लेती थी/न जाने बादलों से अब मुझे क्यूँ शर्म आती है / दुपट्टा कुछ छुपाता है, हया कुछ और कहती है / न जाने क्या हुआ मुझको / मैं कब से मौन बैठी हूँ. / घरौंदे, गीली मिट्टी से बनाती थी अभी कल तक / समंदर के किनारे रेत प़र लिखती थी अपना नाम सपनों में/किसी कागज़ की किश्ती को बहाती थी समंदर में / कभी उसपर झपटती और फँस जाती मैं लहरों में / धनक रंगों के सपनों तक मैं कितनी बार लायी हूँ / चमकती बिजलियों को कैदकर कमरे में लायी  हूँ /  न जाने क्या हुआ मुझको / मैं कब से मौन बैठी हूँ. / मैं ठंडी नर्म मिट्टी में, बहुत अहिस्ता चलती थी/ गरजते बादलों से भी नहीं मैं खौफ खाती थी /  मैं कल तक अजनबी से भी बहुत बेख़ौफ़ मिलती थी /  मगर अब हाल ये है कि, मैं डर जाती हूँ खुद से ही / न जाने क्या हुआ मुझको /  मैं कब से मौन बैठी हूँ. / अजब सी दिल में बेचैनी / समंदर जैसी हलचल है...  09415111271 AlpsT-Litterature

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