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शनिवार, 6 नवंबर 2010

.सर्व हित सुखाय / जनार्दन मिश्र

हम दो मित्रों के बीच /चल रही थी बातचीत/कैसे दो पत्थरों के बीच/उग आई लहलहाती हुई घास/सूखे मन को भी सर्व हित सुखाय  सहलाकर/अपने जैसे / हरा-भरा कर देती है/ ऐसे में मित्र ने एक चुहिया को/ इंगित करते  हुए कहा/मित्र! देखो/कितनी सुन्दर/गोल-मटोल/थुलथुली सी यह चुहिया/ कंप्यूटर के तार प़र/उछल-कूद मचा रही है/अपनी बातों को आगे बढ़ाते हुए कहा/यह सब-----/ मुझे बहुत अच्छा लगता है/किसी गिलहरी को/अपने दोनों हाथ सरीखे पैरों से पकड़कर/किसी फल या दाने को कुतरना/इस डाल से उस डाल प़र फुदकना/हरी-भरी घास प़र/छलांगें लगाते हुए/ किसी हिरण को देखना/एक दिन तो सुबह-सुबह बेटे ने कहा/पिता जी! देखिये न/बाथरूम में एक काक्रोच/कितना अलमस्त बैठा है/ वाकई मैंने देखा तो...../पाया कि, / इस क्रूर दुनिया के/ घात-प्रतिघात से / निरापद---- / वह ऐसे बैठा है / मानो कोई तपस्वी / मैंने कहा, बेटा!/ इसे भूल से भी मत मारना / न परिवार के किसी सदस्य को बताना / आज से तुम भी जान लो कि / यह दुनिया----/ सबके लिये है./     09415111271 AlpsT-Litterature

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