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शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

26/11की रात..... बेशक वो रात खौफ की परछाइयों में थी/रंजन जैदी


बेशक वो रात खौफ की परछाइयों में थी, ऐसी अनोखी रात कि शीशे पिघल गए / हर चीख ज़ुल्मतों के खंडर में दुबक गयी, ऐसी घटायें आयीं कि रिश्ते सिमट गए / आसूदगी में डूबके तकिये लहू हुए, कितने ही ख्वाब खौफ में आसूदह हो गए / कितने ही  माहताब ज़मींदोज़ हो गए / बस आग थी धुंआ था धमाकों का शोर था, लम्हों की सिसकियों में न रिक्कत, न ज़ोर था / ऐसी अनोखी सूरते-हालात अल्लतश / कब ज़ीस्त आँख मूँद ले और सांस ले हबस / अपने उठाये हाथ दुआ मांगते थे सब, इन ज़ुल्मतों को चीरके तू भेज आफताब / ऐसी अँधेरी रात कभी फिर न आ सके, अल्लाह जालिमों के मज़ालिम का कर हिसाब.    09415111271 alpst-literature.com

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