अँधेरे में खरहरा सा
स्वर करता वह
इतिहास में जीवित है
वर्तमान में नहीं
वर्तमान अधीन है.
चमकती जिल्द प़र
अंधेरों की परतें और
मरे हुए पशुओं की दुरगंध
साबुन से भी नहीं हटती-
ठंडे कमरे की लकड़ी बन
खुशबू के जंगल में
खुद जलकर दहकाता है
सांसों के सागर में
वह डूबकर खुद भी
कुलीन बन जाता है-
लेकिन मुट्ठी खुलते ही जुगनू/
उड़ जाता है
गबरू घर लौट आता है
पत्नी] बच्चों के बीच
नज़रे झुकाए हुए
ग्लानि से भरा
चीत्कार उठता है
-
ऐसे] जैसे-----
मानो उसके भीतर कोई अपना मर गया हो
या उसके भीतर
बीती सदियों का -कोई दुर्ग
हरहराकर ढह गया हो.
-0-
09415111271 
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