इस तरह ग़ालिब की अज़ीम शाइरी, उसका फ़न, चिंतन और दर्शन
का फलक पहले से भी ज़्यादा बुलंदो-बाला नज़र आने लग जाता है. अब्दुर रहमान
बिजनौरी ने तो यहीं तक हदबंदी नहीं की बल्कि ग़ालिब की शाइरी पर होती रहने वाली बहस को न केवल नये आयाम दिए बल्कि अपनी
रचनात्मक आलोचना के मापदंडों के आधार पर उसे वैश्विक साहित्य की 'श्रेष्ठ निधि' बताया.
इससे 'दीवाने-ग़ालिब' को दुनियाभर में नये
नज़रिये से देखा और परखा जाने लगा.
अब्दुर रहमान बिजनौरी
की जीवनी पर निगाह डालें तो हमें मालूम होगा कि उनका व्यक्तित्व इतना आकर्षक था कि
तत्कालीन नवाब मोहसिनुलमुल्क, मौलाना मुहम्मद
अली, डॉ. अंसारी और मौलाना अब्दुलहक़
जैसे विद्वान तक उम्र में बेहद छोटे अब्दुर रहमान बिजनौरी की प्रशंसा किये नहीं थकते
थे. मुफ़्ती अनवारुलहक़ जब 'दीवाने ग़ालिब' पुस्तक के संपादन पर कार्य
कर रहे थे तब उनका प्रयास था कि किसी भी सूरत से अब्दुररहमान बिजनौरी की जीवनी के कुछ
अंश मिल जाएँ जिन्हें 'दीवाने ग़ालिब' में सम्मिलित किया जा सके, लेकिन अनवारुलहक़ को इसमें तनिक भी सफलता नहीं मिली. यहां तक कि
1940 में जब अब्दुररहमान
बिजनौरी के पुत्र मुहम्मद फ़ातेह अब्दुररहमान
बिजनौरी ने 'बाक़ियाते-बिजनौरी' का प्रकाशन किया तो लगा कि इसमें अब्दुर रहमान बिजनौरी
के जीवन से सम्बद्ध काफी-कुछ जानकारियां हासिल होंगीं लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. 1945 में जब फर्रुख
ने 'यादगारे-बिजनौरी' का प्रकाशन किया
तब अब्दुर रहमान बिजनौरी के बारे में कुछ रौशनी दिखाई दी लेकिन यह भी घने अँधेरे में
मात्र दिए की रौशनी जैसी ही थी.
जिला बिजनौर के एक
क़स्बे 'स्योहारा' के रहने वाले नूरुल इस्लाम शहर के एक संभ्रांत व्यक्ति
थे जो पेशे से क़ाज़ी-शहर थे. अब्दुर रहमान बिजनौरी इसी क़ज़िए-शहर के पुत्र थे. बिजनौरी
के जीवन के सम्बन्ध में जो और जानकारियां छन-छन कर उपलब्ध होती रही हैं, उसके अनुसार
इनके पूर्वज आज़रबाइजान से गमन कर भारत
आये थे. बाद में इसी खाप के एक पूर्वज को क़ाज़ी के पद पर नियुक्त कर दिया गया था.
उपलब्ध जानकारी के
अनुसार नूरुल इस्लाम के पुत्र बिजनौरी का जन्म 1885 में हुआ था. भोपाल की रियासत के
उपलब्ध पुराने दस्तावेज़ों से पता चलता है कि बिजनौरी का जन्म 10 जून,1887 को हुआ था.
कई भाई-बहनों के बीच बिजनौरी की शिक्षा-दीक्षा शुरूआती दिनों में घर पर, बाद में
1902 में कोयटा हाई स्कूल से 10 वीं की परीक्षा पास की. बाद की वकालत तक की पढाई उन्होंने
1909 में आज के अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय में की.
वह एक अच्छे वक्ता
थे. छात्र राजनीति में उतरने के बाद उनके आंदोलन बंद नहीं हुए थे. तसद्दुक़ अहमद शेरवानी
और डॉ. महमूद के साथ उनका यूनिवर्सिटी से ‘प्रशासनिक निकाला’ हुआ लेकिन बाद में उन्हें
वापस भी ले लिया गया.
अब्दुर रहमान बिजनौरी
के संघर्ष की कहानी 'सीधे-सादे रास्तों का
सफर नहीं है'.1912 से पहले तक का सफर
टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुज़रता हुआ बिजनौरी को कभी इंग्लैण्ड ले गया तो कभी फ़्रांस. कभी
मिस्र तो कभी जर्मनी.
जब उनके सफर का रास्ता
हैदराबाद, अलीगढ और मुरादाबाद से होकर भोपाल के नवाबज़ादा मुहम्मद हमीदुल्लाह खां की रियासत तक पहुंचा तो जैसे बिजनौरी
को उनकी अपनी मंज़िल मिल गई. ऐसी ही दुनिया तो वह चाहते थे. वह चाहते थे, हिंदुस्तान
की ज़बानों को बोलने, लिखने और अपनी बात कहने की आज़ादी हो, अदब में जंगे-आज़ादी और अपनी
क़ौमों की तरक्की के रास्ते हमवार हों, मुल्क तरक़्क़ी करे लेकिन अंग्रेज़ों की ग़ुलामी
से आज़ादी के बाद.
नए पद और नए अदबी माहौल
ने बिजनौरी को नयी ज़िन्दगी और नया सुकून दिया जिससे उनके जीवन में ठहराव आया. उनकी
जीवनी के अध्ययन से पता चलता है कि 1916 में रियासत भोपाल के शिक्षा मंत्रालय में जब
उन्हें वरिष्ठ शिक्षा सलाहकार पद की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी तो मारे ख़ुशी के उनका चेहरा
देखने के क़ाबिल बन गया था. उनके आने से मानों भोपाल की साहित्यिक शामें रंगीन और अदब
के चराग़ों से जगमगा उठी थीं.
1918 में अपने समय
के बड़े उर्दू-शायर साकिब लखनवी जब भोपाल
आये तो रियासत में तत्कालीन वज़ीरे-माल शेख
मतीउज़्ज़मां के निवास पर उनका स्वागत किया गया. शहंशाह हुसैन रिज़वी ने 'दीवाने साकिब' की भूमिका में लिखा है कि....'यह वह ज़माना था जब उर्दू के फ़ाज़िल अदीब यानि
साहित्यकार डा. अब्दुर-रहमान बिजनौरी (एम्.ए.,पीएचडी), संपादक 'दीवाने ग़ालिब नुसखये-हमीदिया'
के भोपाल पहुँचते ही वहां की अदबी महफ़िलों में मानों नई ज़िन्दगी सी तैर गई थी. मिर्ज़ा
से शाम की मुलाक़ातें अक्सर शेरो-सुख़न का बहाना बन जातीं, जिनके वसीले डॉ. अब्दुररहमान
बिजनौरी होते. डॉ बिजनौरी के प्रयासों से ही भोपाल में टैगोर के नाटकों का उर्दू में
अनुवाद करवाया गया जिसमें The king of dark chamber का अनुवाद 'कुचियेस्तान' के नाम
से उनके मित्र मुफ़्ती ने किया.
जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि डॉ.अब्दुररहमान बिजनौरी की शोहरत का स्तम्भ
मिर्ज़ा असदुल्ला खां ग़ालिब के 'दीवाने ग़ालिब' की अविस्मरणीय और कालजयी भूमिका
थी जिसे डॉ. अब्दुर रहमान बिजनौरी ने लिखा
था. हालाँकि लिखने से पहले तक वह ग़ालिब की शायरी से बेहद डरे हुए से महसूस होते हैं.
उन्हीं के अनुसार उन्हें नींद तक नहीं आया करती थी. अर्ध-निद्रावस्था में उन्हें लगता
मानो वह ग़ालिब के पास पहुँचने के क़रीब
हैं लेकिन उनके ओरा से आग की ऐसी तपिश फूट रही है कि वह झुलसे जा रहे हैं.
उन्होंने अपने वतन
मुरादाबाद से 1916 में मित्र बैरिस्टर आसिफ
अली को जो पत्र लिखा, उसमें इसका ज़िक्र किया गया है. वह एक जगह लिखते हैं, 'मैं 'दीवाने ग़ालिब' की समीक्षा की दृष्टि से
एक लेख लिखना चाहता हूँ लेकिन साहस नहीं जुटा पा रहा हूँ. अल्लाहो अकबर, क्या इंस्टीट्यूशन
है, जिसके सामीप्य पर परिंदे तक के पंख जल जाएँ.’
डॉ. बिजनौरी की जीवनी
और उससे सम्बंधित प्राप्त आलेखों, टिप्पणियों और प्रबंधों के अध्ययन से पता चलता है
कि वह ग़ालिब के प्रबुद्ध शैदाईयों में से थे. उनका मानना था कि ग़ालिब पर अभी बहुत काम किये जाने की
ज़रुरत है. लखनऊ से तत्कालीन प्रकाशित 'नया
दौर' पत्रिका में उनके सम्बन्ध में कई आलेख प्रकाशित किये गए थे. इसके अतिरिक्त
मुंबई से प्रकाशित होते रहने वाला उर्दू मासिक 'शायर' (अंक : अप्रैल,1973) में भी कई लेख पढ़े जा सकते हैं. डॉ. बिजनौरी
के जीवन और कृतित्व पर अभी बहुत काम किये जाने की ज़रुरत है. जिससे हमें पता चलेगा कि
ज़मीं खा गयी आसमान कैसे-कैसे.
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*प्रकाश्य पुस्तक : लकीरें अदब की / डॉ रंजन ज़ैदी
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