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बुधवार, 13 सितंबर 2017

मुंशी प्रेमचंद : नव-मूल्यांकन--03/ डॉ. रंजन ज़ैदी

प्रकाश्य पुस्तक : 'काल-चक्र' की कड़ी -3  /डॉ. रंजन ज़ैदी
पुस्तक : काल-चक्र के लेखक: रंजन ज़ैदी 

      जैसा  कि  ऊपर कहा जा चुका है कि प्रेमचंद  का उपन्यास सुखदास  जार्ज इलियट के उपन्यास साइलस मार्नर का हिंदी रूपांतरण है लेकिन पढ़ने पर लगता है कि यह एक भारतीय परिदृश्य पर लिखी गई कृति है. बात यह है कि जार्ज इलियट और मुंशी प्रेमचंद  के व्यक्तित्व व कृतित्व में बहुत बड़ा अंतर नहीं था. दोनों की जड़ें ज़मीन में फैली थीं. दोनों का जन्म देहात में हुआ था, सोच एक जैसी थी. दोनों परिष्कृत साहित्य के कुशल अध्येता थे. भाषा पर अधिकार था. दोनों के नाम असली नहीं थे. विश्व साहित्य में दोनों अपने उप-नामों से ही जाने गए, प्रतिष्ठित हुए.

      इलियट को चर्च से और प्रेमचंद को मंदिरों से कोई विशेष लगाव नहीं था. लेकिन दोनों की अनास्था में भी आस्था का प्रदर्शन था. मानस के प्रति दोनों में गहरी सहानुभूति थी. अंतर मात्र इतना था कि इलियट की कृतियों का सफर गाँव  से शहर की तरफ जाता था और प्रेमचंद का शहर से गाँव की तरफ. जो नीति  के विरुद्ध था वह था प्रकृति के विरुद्ध कार्य करना. इसमें वे विनाश की सम्भावना अधिक देखते थे. दोनों अपने देसी दोस्तों से प्रभावित रहे थे. प्रेमचंद, दयाराम निगम से प्रभावित थे तो इलियट अपने अभिन्न मित्र जॉन  चैपमैन से. सभी सामान कलाप्रेमी थे.*   

      प्रेमचंद, इलियट से इस क़दर प्रभावित थे कि जब उन्होंने 'साइलस मार्नर उपन्यास पढ़ा तो उन्होंने उसका अनुवाद करने में देर नहीं की. अनुवाद पूरा करने तक उन्होंने अपने इर्द-गिर्द के माहौल को खालिस भारतीय बनाये रखा. जब सुखदा के नाम से यह उपन्यास प्रकाशित हुआ तो पाठक चकित हो गया. सबको लगा कि यह तो भारतीय परिवेश की एक सशक्त औपन्यासिक कृति है.

      विचारों में सामान विकासशीलता के होते  पात्रों को खुलें में सांस लेने की पूरी आज़ादी थी. सामान विशेषता ने ही दोनों को एक-दूसरे से प्रभावित किया था. इनके अतिरिक्त प्रेमचंद द्वारा ओपेंद्र नाथ अश्क को भेजे गए पत्र से पता चलता है कि वह  रोमाँ  रोलाँ  से भी कम प्रभावित नहीं थे. उनके अनुसार,'रोमान रोलाँ  का विवेकानंद ज़रूर पढ़ो.* हंस के मार्च 1934 की हंसवाणी में प्रेमचंद ने अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा कि 'उनके प्रसिद्ध  उपन्यास जान क्रिस्टोफर के विषय में तो हम कह सकते हैं कि एक कलाकार की आत्मा का इससे सुन्दर चित्र उपन्यास साहित्य में नहीं है.

      बड़ी अजीब बात है कि मुंशी प्रेमचंद ने कहीं भी फ़्रांसिसी साहित्यकार अनातोले फ़्रांस की प्रशंसा नहीं की है. हालाँकि उन्होंने  फ़्रांस की अमर कृति थायस का अहंकार रूपांतरित किया वह भी तब जब 1925 में रामचंद टंडन ने उनसे ऐसा करने के लिए कहा. लेकिन अपने सम्पादकीय में प्रेमचंद ने इस कृति और फ़्रांस के साहित्य की कहीं तक प्रशंसा अवश्य  की  यह बात और है कि उस सम्पादकीय में प्रेमचंद का साहित्यकार कहीं नज़र नहीं आता है. ठीक इसके उलट प्रेमचंद रूसी साहित्य की प्रशंसा किये नहीं थकते थे. एक जगह वह लिखते हैं, कहानी-उपन्यास में रूस का मुक़ाबला कोई देश नहीं कर सकता. चेखब छोटी कहानियों का बादशाह है. तुर्गनेव के क़लम में बड़ा दर्द है. गोर्की किसानों-मज़दूरों का अपना लेखक है. टॉलस्टाय सर्वोपरि है. उसकी हैसियत शहंशाह की सी है. 25 बरस पहले भी थी और आज भी है. टॉलस्टाय के आगे तुर्गनेव बौना है.* टॉलस्टाय के साहित्य ने प्रेमचंद को सोचने का एक नजरिया दिया था. बोल्शेविस्ट उसूलों ने प्रेमचंद को सहमति का अवसर दिया बताया कि किसान रूस का हो या भारत का, सरकार से अपने हक़ की मांग क्यों नहीं मनवा सकता? वह क्यों बग़ावत नहीं कर सकता है?

      रूस में किसानों को जगाने के लिए टॉलस्टाय सक्रिय थे, गोर्की और चेखब थे, तुर्गनेव थे लेकिन भारत में प्रेमचंद सरीखे कितने कथाकार थे? लेखन का कार्य तो आज भी लोग कर रहे हैं, लेकिन आज भारत में किसान आत्महत्याएं कर रहा है, अपनी फसलों को सड़ने के लिए फ़ेंक रहा है, उसका भविष्य अंधकारमय हो चुका  है. आज साहित्य में कोई प्रेमचंद नहीं रहा है जो किसानो के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर उनके लिए इंक़लाब की पृष्ठभूमि तैयार करे.
      आज भी प्रेमचंद अकेले हैं. जो लोग हैं, वे पुरस्कारों के लिए दौड़ रहे हैं, फेसबुक पर आत्मप्रचार कर रहे हैं. किसान हथेलियों में मुंह छुपाकर भरभराकर बेआवाज़ सुबुक रहा है कि कोई उसका रोना न सुन ले. प्रेमचंद ने अपने समय में  धरती की गंध सूंघ ली थी और पूस की एक रात को इतना तवील बना दिया था कि उस समय के किसानों की मिटटी आजतक आंसुओं से भीगती रहती है. कोई है जो उठकर इंक़लाब का नारा बुलंद  करे, धरती पुत्रों को उनका हक़ दिला सके?
[क्रमशः जारी/-4] 
    
* मदनगोपाल, मुंशी प्रेमचंद , एशिया पब्लिशिंग हॉउस ,1964 पृ. 165
* प्रेमचंद  चिट्ठी-पत्री भाग-2 , पृ.236 
* अमृतराय :प्रेमचंद:क़लम का सिपाही, पृ.516    
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