गाँव की मस्जिद में एक नए
मुआज्ज़िन (अज़ान देने
वाला) की नियुक्ति
की गयी. उसका
काम था अजान
देना और वक़्त
प़र गाँव वालों
को नमाज़ पढाना.
जो नमाज़ पढ़ाते
हैं, उन्हें मस्जिद
का इमाम कहा जाता
है. मुआज्ज़िन इमाम
साहेब बन गए.
मदरसे के बाद
रोज़ी-रोटी का
मसला दरपेश था.
स्कूल-कालेज पढ़े
नहीं, जाएँ तो
कहाँ? संयोग से
किसी की सिफारिश
प़र यह नयी
नौकरी मिल गयी.
गाँव की मुस्लिम
जमात चंदा कर
उसे १०००/- तनखाह
देती और खाना
घरों से आ
जाता. रफ्ता-रफ्ता
मुआज्ज़िन गाँव के
मुसलमानों की लाइफलाइन
का हिस्सा बन
गया. सीधे-सादे
किसानों और मजदूरों
के इस गाँव
में इमाम साहेब
इज्ज़त की निगाह
से देखे जाने
लगे. मज़हबी मामला
हो या झगडे
का, इमाम की
अदालत में फैसले
होते. रफ्ता-रफ्ता
वह गाँव के
मुसलमानों का क़ाज़ी
(न्यायाधीश) बन गया.
गरीब मुआज्ज़िन, इमाम
उसके बाद अब
वह काजी बन
गया था. जो
वह फैसला कर
देता, मुसलमान उसे
मान लेते. मर्तबा
बढ़ा तो इज्ज़त
बढ़ी. इज्ज़त बढ़ी
तो लोग इर्द-गिर्द बढ़ गए.
लोग बढे तो
चंदा बढ़ गया.
तोहफे और आमदनी
में बढ़ोतरी हो
गयी. जवानी ने
अंगडाई ली. घर
बसाने का ख्याल
आ गया. अल्ला-अल्ला घर में
एक दुल्हन भी
आगई. अब क़ाज़ी
के पास एक
घर था, बीवी
थी और ज़रुरत
के एतबार से
खुशहाली भी. एक
दिन एक जवान
औरत क़ाज़ी के
हुज़ूर में हाज़िर
हुयी और इंसाफ
की दुहाई दी.
उसके पति ने
उसे तलाक दे
दिया था. पति
को बुलाकर पूछा
गया कि तलाक
क्योंकर दिया. उसने कहा
क़ि यह औरत
बदज़बान है और
बदकिरदार भी. अपने
मरद प़र भी
शक करती है.
औरत ने कहा
क़ि उसका शक
सही है.यह
एक दूसरी औरत
से ताल्लुक रखता
है और उससे
शादी करना चाहता
है.क्योंकि वह
पैसेवाली है. क़ाज़ी
ने नौजवान से
अकेले में पूछा
तो उसने कुबूल
कर लिया. नौजवान
ने बताया क़ि
तलाक के बाद
अब वह शादी
कर सकता है
क्योंकि उसकी प्रेमिका
अपने पिता की
एकलौती बेटी है
और उसके पास
काफी ज़मीन है.
क़ाज़ी ने पूछा,
इस हल से
खुद क़ाज़ी को
क्या फायदा होगा?
नौजवान ने कहा
क़ि वह मसला
हल हो जाने
प़र ५ बीघा
खेत उसके नाम
कर सकता है.
क़ाज़ी ने कहा,
जाओ,बैनामे की
तय्यारी करो. नौजवान
चला गया. अब
क़ाज़ी तलाकशुदा औरत
के पास आया,
कहा क़ि तेरे
शौहर ने तीन
बार तलाक दे दिया
है. अब तू
उसकी बीवी नहीं
रही. यही इस्लाम
का कानून है.यही मेरा
फ़तवा है. औरत
ने तड़प कर
कहा,"यह कैसा फ़तवा
है? यह कैसा इस्लाम है?
वह बेक़सूर है लेकिन उसे
ही सजा दी गयी
है.जो मुजरिम है,
वह बेगुनाह हो गया, वह
अब एक दूसरी लड़की
से शादी करेगा. अब
वह अपने बच्चों को
कहाँ लेकर जाएगी? कैसे
परवरिश करेगी? उसने कहा, नहीं,
यह इन्साफ नहीं है. वह
अपने अधिकार की लड़ाई लड़ेगी.
क्योंकि वह गलत नहीं
है. वह अदालत जाएगी.
वह पढ़ी-लिखी नहीं
है, लेकिन ईमान की रौशनी
उसमें भी है. इस्लाम
ऐसा नहीं हो सकता".
और फिर एक
दिन खबर आई
क़ि औरत ने
अदालत का दरवाज़ा
खटखटा दिया है.
क़ाज़ी को अदालत
ने सम्मन भेजा
है. पूछा है
क़ि वह हाज़िर
होकर बताये क़ि
उसने फ़तवा किस
हैसियत से जारी
किया है? क्या
एक मुआज्ज़िन को फ़तवा जारी
करने का हक है?
क्या इस्लाम में तीन तलाक
जाएज़ है? क़ाज़ी क़ी
सिट्टी-पिट्टी गुम. वह
तो एक मुआज्ज़िन
था, उसके पास
इतना इल्म कहाँ?
गाँव में तो
सब चल जाता
है. लेकिन यह
गाँव क़ी औरत....?
94FF, Ashiana Green, Ahinsa khand
II, Indirapuram, GZB-201014 NCR alpsankhyaktimes94gzb.com
मोहन कुमार कश्यप की नई पुस्तक का नाम है 'मरने से पहले'.
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