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मंगलवार, 10 जुलाई 2012

.फोरबा उपन्यास से. ./ रंजन जैदी

     इन दिनों मैं सचमुच बहुत व्यस्त रहता हूँ। अख़बारों और पत्रिकाओं में भी नहीं लिख पा  रहा हूँ। कारण हैं अपने उपन्यास फोरबा पर दिनरात काम  करना। मैं नहीं जानता कि  मैं इसमें कितना कामियाब हूँगा लेकिन यह तो विश्वास अवश्य है कि पाठक निराश भी नहीं होगे । अगर इस माह मेरी एक नयी पुस्तक न आ रही होती और मैं मीडिया के कुछ अन्य तो मैं शायद इस उपन्यास को  और भी अधिक समय दे पाता ।  उपन्यास का अंश देखें----- थोड़ी सी गुनगुनी धूप बाहर से अन्दर आ गयी थी। मैंने अपनी डायरी में लिखा, पहाड़ों की धूप  कितनी अजीब होती है।, बिलकुल ऐसे ही जैसे कोहरे से घिरे सात पहाड़ों  के पीठासीन के द्वार से  मैं बाहर निकल आया हूँ और लग रहा है मानो मेरे कानों में हजारों---हज़ार  नुकरई घंटियाँ  सी बजने लगी हों।  ऐसा क्यों लगता है मानो नदी की तरफ जाने के लिए मैं गिरते झरने के  बारीक जलधागों से बुनी नाव में लेटकर बहा चला जा रहा हूँ और नाव मुझे किसी विशालकाय  पहाड़ के अंचल  में बिखरी दूधिया बर्फ से ढकी किसी कब्र में पहुंचकर खुद भी वहीं जम जाती है। यह भी कितनी अजीब बात है कि  कभी-कभी एक खूबसूरत कोलाज़ बनते-बिगड़ते  एक साथ कितने मायने दे जाता है......फोरबा उपन्यास से./ रंजन जैदी           * http://zaidi.ranjan20@gmail.com   Mob:+91  9350934635

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