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सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

देवता मैं बन चुका हूँ/ रंजन ज़ैदी

मत कहो मैं मर चुका हूँ , बुत कोई मैं बन गया हूँ/ ले चलो मंदिर मुझे, देवता मैं  बन चुका हूँ/ अब तलक मैं आदमी था, आदमी की बन्दिगी था/ दुःख भरी इक ज़िन्दगी था/ अब मैं ऊपर उठ चुका हूँ, देवता मैं  बन चुका हूँ /कल तलक मैं पूजता था, सुख की खातिर जूझता था, अब मैं मुक्ति पा चुका हूँ, देवता मैं  बन चुका हूँ. / अब किराये की न चिंता, औ' न मंहगाई का ग़म/ ग़म न सरहद का, सुनामी का, न कुछ खोने का ग़म/ आस्था का दीप अब मैं बन चुका हूँ/देवता मैं  बन चुका हूँ.                                                                                                         भूखी कौमें खुद्दारी में जीते जी मर जाती हैं/                                              या शुभ-लाभ का माला जप कर,गद्दारी कर जाती हैं.                              09415111271 http://alpst-literature.blogspot.com/

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