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बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

बुझने के बाद जलना गवारा नहीं किया/डॉ. रंजन जैदी

हमने कोई भी काम दोबारा नहीं किया
इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है?-- मुज़फ्फर हुसैन
उर्दू के जाने-माने शायर शहरयार अब इस दुनिया में नहीं रहे. अब  जिसमे-इ-शहरयार को  वक़्त के गुबार ने  अपनी चादर से ढक कर कब्र की तारीकी में दफ़्न कर दिया है. शहरयार का जन्म उत्तर प्रदेश के शहर बरेली में सन १९३६ में हुआ था. 76 वर्ष की उम्र में तन्हाई का दंश सहते-सहते वह गत सप्ताह १३ फरवरी को इस दुनिया से रुखसत हो गए. दिल्ली में रह रही  उनकी  तलाकशुदा पत्नी प्रोफ़ेसर नजमा शहरयार इस अवसर पर भी उन्हें देखने नहीं आईं. बताया जाता है कि उनकी मृत्यु ब्रेन-हैम्ब्रेज से हुई थी. काफी समय से वह एकांतवास में जी रहे थे क्यूंकि उनके दो पुत्रों में बड़ा पुत्र हुमायूँ शहरयार दुबई में और छोटा बेटा फरीदूं मुंबई  में रह रहा है और बेटी डॉ.सायमा शहरयार भी अपने पति के साथ दुबई में रहने लगी थी.  शहरयार की बीमारी के दिनों में उनके पुत्र-पुत्री निरंतर उनसे संपर्क बनाये रहे थे. जबकि  तलाक के बाद कभी भी शहरयार अपनी पत्नी नजमा के संपर्क में नहीं आये. इसका ज़िक्र उन्होंने अपने एक शेर में भी किया है-बुझने के बाद जलना गवारा नहीं किया, हमने कोई भी काम दोबारा नहीं किया।' यह सच है कि उन्होंने  दोबारा कभी शादी नहीं की.
शहरयार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उर्दू के प्रोफ़ेसर थे. एक शायर होने के नाते वह किसी परिचय के मोहताज नहीं थे. उनके बहुत से शोधार्थियों  में (मेरे एक अभिन्न-मित्र) होनहार शायर और उर्दू साहित्यालोचक  शिष्य गज़नफर अली गज़नफर (जो अब जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की उर्दू अकादमी में उपाध्यक्ष हैं) भी थे और उन दिनों संयोग से वह मेरे रूम पार्टनर थे. मेरे कमरे पर अक्सर उर्दू और हिंदी के युवा छात्र साहित्यकारों  का जमावड़ा रहा करता था लेकिन उर्दू के प्राध्यापकों में प्रोफ़ेसर खुर्शीद अहमद के अतितिक्त शहरयार साहब अपने शिष्य गज़नफर के पास ही आते थे. एकबार वह आये और देर तक बैठे भी रहे लेकिन उन्होंने न तो मेरी ओर देखा और न ही मेरा सलाम कुबूल किया. स्पष्ट है कि उनके इस रूखे व्यवहार की शिकायत बाद में मैंने गज़नफर से की जिसने उन्हीं दिनों अपनी उर्दू आलोचना की पुस्तक की भूमिका में मेरा ज़िक्र भी किया था और शहरयार ने इसकी प्रशंसा भी की थी, शिकायत सुनकर शहरयार साहब अचानक गज़नफर के साथ मेरे कमरे पर आगये और इतनी मासूमियत से उन्होंने मुझसे माफ़ी मांगी कि मेरी आंखे आँसुवों  से भर आईं. उन्होंने कहा कि खुदा की क़सम मैंने आपको नहीं देखा था. कहीं आप भी दूसरों की तरह मुझे मगरूर न समझ बैठिएगा. मैं आज भी दावे से कह् सकता हूँ कि शहरयार में एक मासूम बच्चा हमेशा से जिंदा रहा था जो कभी मगरूर हो ही नहीं सकता था. यदि वह मिच्योर होता तो उर्दू की प्रोफ़ेसर शहनाज़ हाश्मी और दूसरों के दबाव में आकर नजमा आपा से कभी शादी न करता. नजमा आपा से शहरयार की मानसिक-यकसूई कभी नहीं रही. बस, वह रिश्ते निभाते थे और अपने भीतर के दर्द को अपने अशआर में पिरोते थे. मैं जब भी उर्दू विभाग में तारिक छतारी (संप्रति: जाने माने उर्दू कथाकार और उर्दू विभाग के हेड) या प्रोफ़ेसर कोकब कदर (नवाब वाजिद अली के पड़पोते) के पास जाता तो मुझे शहरयार अपने चेंबर में तनहा बैठे दिखाई देते. एकबार उनके पास उनके पुराने दोस्त  भाई मुज़फ्फर अली को देखा तो देखकर ख़ुशी हुई. तब वह फिल्म उमराव जान के लिए  शहरयार के ग़ज़ल संग्रह ख़्वाबों के दर बंद है से गजले निकालने और उसमें भी तरह-तरह की  तब्दीलियाँ करने में व्यस्त रहा करते थे. (कालांतर में इसी ग़ज़ल संग्रह को सन १९८७ में साहित्य अकादमी का पुरस्कार प्रदान किया गया.) शहरयार को ये तब्दीलियाँ बुरी लगती थीं. फिल्म अंजुमन और फिर गमन में नग्मे लिखने का जो उन्हें तजुर्बा हुआ था, उससे वह खुश नहीं थे. इसी लिए मुज़फ्फर भाई उनके कलेक्शन से गज़ले निकालते रहते थे. फिल्म उमराव जान की एक ग़ज़ल में जहाँ गुबार ही गुबार है का इस्तेमाल हुआ था, को संगीतकार खय्याम निकालने तक पर तुले हुए थे और शहरयार तैयार नहीं हो रहे थे. बाद में मुज़फ्फर भाई भी तैयार नहीं हुए और खय्याम को अंततः मजबूर होकर इसे लेना ही पड़ा. शहरयार को मुज़फ्फर भाई की फिल्म उमराव जान के गीतों से पहले न तो उर्दू शायरी में और न ही फ़िल्मी मिडिया में जाना जाता था.अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उनसे  पहले तक बशीर बद्र  जाने जाते थे. फिल्मों में जाने की उनकी कोशिशें कभी समाप्त नहीं हुईं लेकिन अलीगढ़ से कभी सशक्त प्रदर्शन हिंदी कवि नीरज ने ही किया. शहरयार, नीरज के बाद की पैदावार थे. नीरज को भी मुंबई कभी रास नहीं आई. शहरयार को भी नहीं. वह अलीगढ़ के अपने मकान में ही अपना सुकून तलाशते रहे. इसी लिए वह कभी मुशायरों के भी हरदिल अज़ीज़ शायर नहीं रहे. उनके भीतर का बच्चा मानो कभी अपनी मां की गोद से बाहर निकलने की हिम्मत ही न जुटा   पता हो. आज वह कब्रिस्तान के सन्नाटे में बेख़ौफ़ होकर कब्र की तयशुदा गहराई में सो चुका है, शायद कभी न जागने के लिए. Mob; 9350934635  http://alpst-literature.com/

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