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रविवार, 22 जनवरी 2012

हवाएं इमोशनल नहीं हुआ करतीं/रंजन जैदी

http://alpst-literature.blogspot.com/ तुम केवल बादल देखते हो/बादलों में बनती आकृतियाँ /स्थिर नहीं रहतीं/वे हवा के साथ बहती हैं/रात को शबनम  और....../दिन को बारिशों से भिगोती हैं/हवा 'सियासत' जानती है/शबनम को सहेज लेती है/बारिशों को छोड़ देती है/तुम सियासत को समझो!/ज़मीन की तह से/ बारिश के पेंड़ उगते हैं/ पेड़ों की हरियाली में / परिंदों के ख्वाब सजते हैं/घोंसले बनते हैं/दुनिया का जन्म होता है/ करोंड़ों वर्षों से ऐसा हो रहा है/ ऐसा ही आगे भी होगा/ तुम सियासत को समझो/ भीगे बादल मत बनो/बादलों की गति और आकृतियाँ / हवाएं तय करती हैं/ हवाएं इमोशनल नहीं हुआ करतीं.

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